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Monday, May 28, 2012

काले धन के खिलाफ खोखली पहल


अपने वादे के मुताबिक सरकार ने काले धन पर संसद में श्वेत पत्र पेश तो कर दिया है, लेकिन यह कदम महज औपचारिकता भरा लग रहा है। इसमें काले धन की आधी हकीकत भी सामने नहीं आ पाई। कुल 97 पेज के इस श्वेत पत्र में न तो यह बताया गया है कि भारतीयों का कितना काला धन देश या विदेश में जमा है और न ही जमाकर्ताओं के नाम का खुलासा है। हां, इसमें काले धन की समस्या से निजात पाने के लिए लोकपाल और लोकायुक्त के गठन की पुरजोर पैरवी जरूर की गई है। यह दावा भी किया गया है कि स्विस बैंकों में जमा काले धन में कमी आई है। हालांकि श्वेत पत्र में धन का ब्यौरा न देने की वजह इसका कोई एक आंकड़ा और इसके बारे में पता लगाने के लिए कोई सर्वमान्य विधि का नहीं होना बताया गया है। श्वेत पत्र में कहा गया है कि काले धन को लेकर कोई विश्वसनीय आंकड़ा नहीं है और न ही इसका पता लगाने के लिए कोई सर्वमान्य विधि है। अब तक जो भी आकलन आए हैं, सभी अलग-अलग तरह के हैं। ऐसे में अगर इसे केंद्र सरकार की एक पहल मानी जाए तो भी सबसे बड़ा सवाल यह है कि आखिर विदेशों में जमा काला धन कब वापस आ पाएगा? क्या श्वेत पत्र से आगे भी सरकार कार्रवाई कर पाएगी और अगर सरकार ऐसी कोई कार्रवाई करेगी भी तो देश को इसके लिए और कितना इंतजार करना होगा। श्वेत पत्र का स्याह पहलू श्वेत पत्र में वित्तीय अपराध से तेजी से निपटने के लिए फास्ट ट्रैक अदालतों का जिक्र है और अपराधियों को कडे़ दंड देने की बात कही गई है। कुल 97 पेज के इस दस्तावेज में इस धारणा को गलत साबित करने की कोशिश की गई है कि सरकार काले धन की समस्या से निपटने के लिए पर्याप्त कदम नहीं उठा रही है। काले धन की समस्या से निपटने के लिए श्वेत पत्र की प्रस्तावना में प्रणब मुखर्जी ने कहा कि उनकी सरकार ने पांच विधेयक पेश किए, जो लोकपाल विधेयक, न्यायिक जवाबदेही विधेयक, व्हिसल ब्लोअर विधेयक, शिकायत निपटान विधेयक और सार्वजनिक खरीद विधेयक हैं। ये विधेयक संसद में विभिन्न स्तरों पर विचाराधीन हैं। श्वेत पत्र में यह जरूर बताया गया है कि रियल एस्टेट, शेयर बाजार, सर्राफा, सार्वजनिक खरीदारी, एनजीओ आदि क्षेत्रों में सबसे ज्यादा काला धन बनाया जाता है। मगर विदेशी बैंकों में जमा काले धन को वापस लाने की कोई स्पष्ट नीति सरकार ने नहीं बताई है। भाजपा ने भी इस श्वेत पत्र को निराशा करने वाला बताते हुए खारिज किया, जबकि भाजपा के वरिष्ठ नेता जसंवत सिंह ने तो यहां तक कह दिया कि यह श्वेत पत्र बिकनी के जैसा है, जो आवश्यक चीजों को ढक लेती है। श्वेत पत्र में बताया गया है कि काले धन के मामले में दुनिया भर में भारत 15वें स्थान पर है। इस सूची के आधार पर पहले नंबर पर चीन है, जबकि दूसरे स्थान पर रूस। केंद्रीय प्रत्यक्ष कर बोर्ड (सीबीडीटी) के अध्यक्ष की अगुवाई में आठ सदस्य वाली टीम ने यह रिपोर्ट पेश की है। पर अहम सवाल यह है कि सरकार काले धन को लेकर वास्तव में सक्रिय है या फिर सक्रिय होने का स्वांग कर रही है। यह सवाल आए दिन सुर्खियां बटोर रहा है। पर काले धन को लेकर सरकार का रवैया क्या है, यह अभी पूरी तरह साफ नहीं है। ऐसे में लोगों में यह धारणा बन रही है कि सरकार जान-बूझकर लोगों का नाम छुपा रही है। भले सरकार यह कहे कि वह काले धन की समस्या को गंभीरता से ले रही है, लेकिन ताज्जुब होता है कि इस समय देश जिन समस्याओं का सामना कर रहा है, उनमें भ्रष्टाचार और काले धन से जुड़े मामले सबसे अहम हैं। फिर भी सरकार इन मामलों पर आक्रामक रुख अपनाने के बजाय बचाव की मुद्रा अपना रही है और कर क्षमादान जैसे नब्बे के दशक में अपनाए जा चुके घिसे-पिटे टोटकों को फिर से आजमाने का इरादा जता रही है। कब खुलेगी कलई सरकार ने काले धन का आकलन करने के लिए तीन अलग-अलग संस्थाओं को जिम्मेदारी दी है। इन संस्थाओं के नाम हैं नेशनल इंस्टीट्यूट ऑफ पब्लिक फाइनेंस एंड पॉलिसी, नेशनल इंस्टीट्यूट ऑफ फाइनेंस एंड मैनेजमेंट और नेशनल काउंसिल फॉर अप्लायड इकोनॉमिक रिसर्च। उम्मीद है कि ये तीनों संस्थाएं सितंबर 2012 तक अपनी रिपोर्ट सौंप देगी। यह सच है कि भारत में काले धन के बारे में अलग-अलग अनुमान हैं और अलग आंकड़े दिए जा रहे हैं। बाबा रामदेव से लेकर सीबीआइ के निदेशक तक अपने-अपने आंकड़े दे चुके हैं, लेकिन उनके सत्यापन का कोई तरीका नहीं है। बता दें कि श्वेत पत्र में सरकार ने भी अपना अनुमान नहीं दिया है, पर सीबीआइ निदेशक के मुताबिक यह राशि करीब 500 अरब अमेरिकी डॉलर है, जबकि भाजपा टास्क फोर्स के मुताबिक यह राशि 500 अरब से 14 खरब अमेरिकी डॉलर है। दूसरी ओर अमेरिका की ग्लोबल फाइनेंशियल स्टडी के अर्थशास्त्री देवकार द्वारा किए गए एक अध्ययन के बाद यह निष्कर्ष निकाला गया है कि 1948 से 2008 के बीच भारत से करीब 20 लाख करोड़ रुपये देश से बाहर भेजे गए हैं। इसमें करीब 50 प्रतिशत काला धन 1991 के बाद देश से बाहर गया है, जबकि 2000 से 2008 के बीच इसमें से करीब एक तिहाई राशि देश से बाहर भेजी गई है। यही नहीं, अमेरिकी संस्था ग्लोबल फाइनेंशियल इंटेग्रिटी (जीएफआइ) की रिपोर्ट के मुताबिक 2002 से 2006 के दौरान भारत में हर साल करीब 22.7 अरब डॉलर धनराशि बाहर गई है। फिलहाल इन पैसों के खातेदारों के नाम अज्ञात हैं, लेकिन संभावना जताई जा रही है कि देर-सबेर इनके नामों का खुलासा हो जाएगा। यह कालाधन सिर्फ स्विट्जरलैंड, लिंचेस्टाइन में ही नहीं, बल्कि कैरेबियाई द्वीप केमैन आइलैंड, जिब्राल्टर, मोनाको, लक्जमबर्ग से लेकर दुबई तक के बैकों में जमा है। सवाल यह है कि काले धन के अंकाउट धारक डीटीए (डबल टैक्सेशन एवॉयडेंस एग्रीमेंट) की जद में आते हैं या नहीं? डीटीए इसलिए बना है कि अप्रवासी टैक्स की दोहरी मार से बचें या देश से धन लूटकर ले जाने वालों के लिए? भारत सरकार डीटीए के अनुच्छेद 26 के हवाले से यह तर्क देती है कि हम काले धन के खाताधारकों के नाम बता नहीं सकते। इससे सूचना देने वाली सरकारों से वादा खिलाफी होती है। दूसरी ओर देश की बहुसंख्यक जनता तो विदेशी बैंकों में गया काला धन वापस आते हुए देखना चाहती है, क्योंकि देश का पैसा विदेशों में जमा रखने वाले देश के गुनहगार है और देश की जनता को उन गुनहगारों के नाम जानने का हक है। इसके अलावा यह देश की अर्थव्यवस्था और सरकार की साख से जुड़ा मामला भी है। तो मिल जाती राहत जनवरी, 2011 में अंतरराष्ट्रीय मुद्रा कोष यानी आइएमएफ की ओर से जारी रिपोर्ट में कहा गया कि एशिया की उभरती आर्थिक ताकतों में भारत प्रमुख है, लेकिन मनी लॉन्डरिंग ओर चरमपंथियों तक आर्थिक सहायता पहुंचने का खतरा उसके लिए एक बड़ी चुनौती है। बात सिर्फ यही नहीं है, विदेशों में जमा काला धन वापस लाकर देश की आर्थिक रफ्तार के आड़े आ रही अंतराष्ट्रीय बाजार की मंदी को निष्प्रभावी किया जा सकता है। दूसरी तरफ देश के राजकोषीय घाटे को कम करने में भी इससे मदद मिल सकती है। काले धन और घोटालों का आकार बढ़ता जा रहा है, क्योंकि काले धन की जड़ पर प्रहार करने का हौसला कोई नहीं जुटा पा रहा। समाधान चाहिए तो बड़ी मछलियों को साफ करना होगा। महज दिखावा करने के बजाय दृढ़ इच्छाशक्ति दिखानी होगी। अन्यथा, संसद में यों ही श्वेत पत्र पेश होते रहेंगे। बहस भी होगी, लेकिन समस्या खत्म नहीं होगी। (लेखक स्वतंत्र टिप्पणीकार हैं)

Tuesday, November 29, 2011

विकास पर भारी भूख और कुपोषण


योजना आयोग से जुड़े ‘इंस्टीट्यूट ऑफ एप्लायड मैनपावर रिसर्च’ की हाल में जारी मानव विकास रिपोर्ट के मुताबिक देश में मानव विकास सूचकांक 2011 में 1999-2008 के बीच 21 फीसद की वृद्धि हुई है। यह अच्छी खबर है। पर रिपोर्ट में सबसे ज्यादा चौंकाने वाली बात गुजरात के बारे में कही गयी है कि औद्योगिक रूप से विकसित इस राज्य में भूख और कुपोषण की समस्या सबसे अधिक है। उसमें भी अनुसूचित जाति और जनजाति की महिलाएं सबसे ज्यादा कुपोषित हैं। सूचकांक में गुजरात की स्थिति देश के कई छोटे राज्यों से भी खराब है। केरल, हिमाचल प्रदेश, गोवा, जम्मू-कश्मीर और पूवोत्तर राज्यों की स्थिति गुजरात से बेहतर बतायी गई है। यह हमारे देश के उस राज्य की तस्वीर है, जिसका डंका विकास के नाम पर दुनिया भर में बज रहा है कि निवेश के लिए इससे बेहतर कोई दूसरा राज्य नहीं है। अमेरिकी कांग्रेस ने हाल में जारी एक रिपोर्ट में गुजरात के आर्थिक विकास के मॉडल की खूब सराहना की थी। ऐसे में यह जमीनी हकीकत नरेन्द्र मोदी शायद ही सुनना पंसद करें कि उनके विकसित गुजरात में कुपोषितों की तादाद यूपी और ओडिशा जैसे पिछड़े माने जाने वाले राज्यों से ज्यादा है। भूख सूचकांक में भी उसकी हालत यूपी, बंगाल और ओडिशा से खराब है। भूख को लेकर 17 राज्यों में हुए सव्रेक्षण में गुजरात 13वें स्थान पर रहा। कहने का आशय यही है कि केवल आर्थिक विकास से कोई राज्य खुशहाल नहीं हो सकता। भलें ही आज गुजरात औद्योगिक रूप से सम्पन्न राज्य है, पर गरीबों के पेट भरने का इंतजाम करने में व ह यूपी और ओडिशा से भी पीछे है। योजना आयोग की मानव विकास रिपोर्ट ने जाहिर कर दिया है कि गुजरात के विकास का लाभ केवल उद्योग को ही हो रहा है। राज्य में पांच साल की उम्र के 63.7 फीसद बच्चे रक्ताल्पता का शिकार हैं और 44.6 फीसद कुपोषण की मार झेल रहे हैं। यानी पर्याप्त आर्थिक तरक्की के बावजूद पोषण के मामले में वह पीछे छूट गया हैं। सव्रेक्षण के मुताबिक गुजरात, तमिलनाडु, महाराष्ट्र और कर्नाटक में गरीबों की हालत बेहद खराब है। वैिक स्तर पर देखें तो भारत में कुपोषण उससे अधिक गरीब और कम विकसित बांग्लादेश और नेपाल से भी अधिक है। बांग्लादेश में शिशु मृत्युदर 48 प्रति हजार है जबकि भारत में यह 67 प्रति हजार है। यह आंकड़ा उप सहारा अफ्रीकी देशों से भी अधिक है। भारत में कुपोषण दर लगभग 55 प्रतिशत है जबकि अफ्रीका में यह 27 फीसद है। सेव द चिल्ड्रेन रिपोर्ट के अनुसार भारत में रोजना पांच हजार से अधिक बच्चे कुपोषण के चलते मर जाते हैं। देश में हर साल 25 लाख शिशुओं की अकाल मृत्यु होती है तथा 42 फीसद गंभीर कुपोषण का शिकार होते हैं। एक अनुमान के मुताबिक दुनिया में 14,600 बच्चे रोज मर जाते हैं। मतलब वि में कुल मरने वाले बच्चों में एक तिहाई भारत के हैं। यह अलग बात है कि यहां अनाज गोदामों में सड़ जाता है या उसके भंडारण की उचित व्यवस्था नहीं है। बहरहाल 2001 में उच्चतम न्यायालय ने भूख और कुपोषण से लड़ाई के लिए 60 दिशा-निर्देश दिए थे। एक दशक होने वाला है, पर सरकार न्यायालय के दिशा निर्देशों के पालन में नाकाम रही है। नेशनल फैमिली हेल्थ यानी राष्ट्रीय परिवार स्वास्थ्य सव्रेक्षण के तीसरे दौर के आकलन के अनुसार आवश्यक पौष्टिक खुराक न मिलने के कारण भारत में 50 लाख बच्चे प्रति वर्ष मर जाते हैं यानी प्रति छह सेकेंड में एक बच्चा इस कारण दम तोड़ देता है। वि बैंक की रिपोर्ट भी कहती है कि बच्चों की कुल मृत्यु में से आधी केवल आवश्यक न्यूनतम भोजन न मिलने के कारण होती है। मलेरिया, डायरिया, और निमोनिया से होने वाली बाल मृत्यु की घटनाओं के लिए कुपोषण की स्थिति 50 फीसद से भी ज्यादा जिम्मेदार है। वहीं दूसरी तरफ, बच्चों को मिलने वाले भोजन और पोषण को लेकर भी गंभीर चिंता व्यक्त की गई है। इस निमित्त सरकार द्वारा जारी एकीकृत बाल विकास कार्यक्रम व मिड डे मील जैसी योजनाओं के भी संतोषजनक परिणाम नहीं आ रहे हैं। इसीलिए रिपोर्ट में आईसीडीएस को नया रूप देने की सिफारिश की गई है। क्योंकि कुपोषण के कारण दुनिया में भारत की छवि खराब होती जा रही है। कुपोषण के निदान हेतु घरेलू खाद्य सुरक्षा सुनिश्चित करनी होगी। हम ब्राजील से सीख ले सकते हैं जहां भूख और कुपोषण ‘राष्ट्रीय लज्जा’ माना जाता है। इसके लिए एक मजबूत जन समर्पण और पहल जरूरी है।

Tuesday, May 17, 2011

सरकार को कब तक हांकेगी शीर्ष अदालत



देश में भूख व कुपोषण से हो रही मौतों से चिंतित सुप्रीमकोर्ट ने केंद्र सरकार को 50 लाख टन अतिरिक्त अनाज देश के सबसे गरीब 150 जिलों को आवंटित करने का आदेश दिया है। यह आवंटन उसके द्वारा नियुक्त समिति की निगरानी में किया जाएगा। पीपुल्स यूनियन फॉर सिविल लिबर्टीज (पीयूसीएल) की याचिका पर यह आदेश देते हुए कोर्ट ने यह भी ताकीद की है कि अब देश में भूख से एक भी मौत नहीं होनी चाहिए। याचिका में पंजाब में भारी मात्रा में खाद्यान्न नष्ट किए जाने की शिकायत की गई थी। सुप्रीमकोर्ट भूख और कुपोषण को लेकर कितना गंभीर है, इसका अंदाजा इसी बात से लगाया जा सकता है कि छुट्टी होने के बावजूद न केवल याचिका की सुनवाई की, बल्कि सख्त आदेश भी पारित किया। सुप्रीमकोर्ट ने साफ कहा कि हमारी चिंता देश में हो रही भूख से मौतों को लेकर है और हमें नहीं लगता कि इससे ज्यादा कोई और बात हो सकती है। साथ ही कोर्ट का कहना था कि देश में गरीबों के पास इतना पैसा नहीं है कि वे जिंदा रहने के लिए अनाज खरीद सकें। इसीलिए अदालत ने सरकार से न्यायमूर्ति डीपी वाधवा की निगरानी में गर्मी के दौरान इन जिलों के गरीबों और समाज के कमजोर वर्गो को अतिरिक्त अनाज वितरित करने का भी निर्देश दिया है। वधवा समिति केंद्र सरकार के परामर्श से कमजोर वर्ग की पहचान करेगी और लक्षित लाभार्थियों को अन्न वितरित करने की सिफारिश करेगी। इसके अलावा कोर्ट ने वाधवा समिति को 22 जुलाई से पहले रिपोर्ट दाखिल करने को कहा। यही नहीं, अदालत ने अतिरिक्त अनाज प्राप्त करने वाले इन राज्यों के मुख्य सचिवों को आदेश दिया है कि वह पहले से आवंटित अनाज का वितरण कर लें। इसके बाद अतिरिक्त अनाजों को वितरण गरीबों के बीच किया जाए। इससे पहले भी 10 मई को कोर्ट ने देश में कुपोषण के कारण होने वाली मौतों पर चिंता जाहिर की थी। जिस पर केंद्र सरकार ने कोर्ट से कहा था कि सार्वजनिक वितरण प्रणाली (पीडीएस) के तरह 50 लाख टन अनाज गरीबी रेखा से नीचे रहने वाले परिवारों को अगामी दो हफ्तों में वितरित कर दिया जाएगा। अत: कोर्ट ने अपने रुख पर कायम रहते हुए कई बार दोहराया कि अगर गोदामों में अनाज रखने की जगह नहीं है या विभिन्न कारणों से अनाज नष्ट हो रहा है तो इसे सस्ती दर पर गरीबी रेखा के नीचे जीवन जीने वाले परिवारों में क्यों नहीं बांट दिया जा रहा है? साथ ही सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि देश में कुपोषण के कारण हजारों लागों की मौतें हो जाती हैं। हो सकता है यह संख्या तीन हजार भी न हो, लेकिन हमारे देश में तीन लोग भी इस कारण से मरते हैं तो यह चिंता का विषय है। कोर्ट ने यह भी कहा कि वर्तमान स्थिति में इसका कोई औचित्य नहीं है कि दस लोगों के परिवार को भी 35 किलो खाद्यान्न वितरण किया जाता है और एक व्यक्ति को भी इतना ही। ऐसे में अकेला व्यक्ति बचे हुए अनाज को अधिक दर पर बेचने की कोशिश बरता है, जबकि दस लोगों को पेट भरने के लिए परिवार के मुखिया को अतिरिक्त अनाज खरीदना पड़ता है। वह भी गैर बीपीएल दरों पर। अत: इस असमानता को दूर करना होगा। हमारे देश में रख-रखाव और भंडारण की पर्याप्त सुविधा न होने से हर साल 50,000 करोड़ से ज्यादा का खाद्यान्न बर्बाद हो जाता है। जरा साचिए, इतने खाद्यान्न से कितने भूखे लोगों और उनके परिवार का पेट भरा जा सकता है। यह एक ऐसे देश की शर्मसार करने वाली तस्वीर है, जहां आज भी प्रतिदिन 26 करोड़ लोग एक वक्त बिना खाए भूखे सोने के लिए मजबूर हैं। यह सही है कि गरीबों को खाना देने की कई योजनाएं अरसे से हमारे यहां चल रही है। घटी दरों पर खाद्यान्न देने के कार्यक्रम भी होते रहते हैं। कहने के लिए राशन की व्यवस्था भी है, लेकिन इन सबके बावजूद हकीकत यह है कि लोग भूख से मरते हैं। गोदामों में खाद्यान्न हैं, लेकिन वह जरूरमंदों तक नहीं पहुंच पाता। यह सच है कि भारत में जितने गरीब लोग रहते हैं, उसे देखते हुए अनाज का उत्पादन बढ़ाना पड़ेगा और फिर उसकी बर्बादी रोकने के लिए उचित भंडारण की व्यवस्था भी करनी पड़ेगी। एक अनुमान के मुताबिक, हमारे यहां फसल की कटाई से लेकर उसे गोदाम में पहुंचाने तक जितने अनाज की बर्बादी होती है, उतना तो ऑस्ट्रेलिया में फसल की उपज होती है। हालांकि पिछले छह दशक में गरीबी और भुखमरी से लड़ने के लिए हमने काफी प्रयास किया है। फिर भी आज देश गरीबी और भुखमरी से छुटकारा पाने के लिए संघर्ष कर रहा है। ऐसे में यह सवाल अहम है कि क्या सरकार इस दिशा में सकारात्मक प्रयास कर रही है? भले ही सरकारी और गैर-सरकारी प्रयास हर स्तर पर किए जाते हैं, लेकिन आंकड़े बताते हैं कि आधुनिकता व भूमंडलीकरण के बावजूद स्थिति में कोई क्रांतिकारी बदलाव नहीं हो पा रहा है। दूसरी ओर सरकार के सामने सबसे बड़ी समस्या यह है कि अनाज का वितरण किस तरह से किया जाए। क्योंकि सरकार के पास इस समय गरीबों की संख्या को लेकर कोई ठोस आंकड़ा नहीं है। अब तक इस देश में गरीबों की गणना और गरीबी के आंकड़ों को लेकर जितना विवाद हुआ है, इतना शायद ही विकास के किसी मुद्दे पर हुआ हो। जहां एक ओर देश में गरीबी का हिसाब-किताब योजना आयोग रखता है, वहीं दूसरी ओर ग्रामीण विकास मंत्रालय भी इस संबंध में गुणा-भाग करता रहता है। फिर भी सरकार के ये दोनों हिस्से मिलकर देश को यह नहीं बता पा रहे हैं कि आखिर देश में गरीब कितने हैं? पर अब योजना आयोग ने एक ऐसा विचित्र फरमान जारी किया हुआ है, जिसका कोई तुक नहीं है। उसने राज्यों से साफ कहा है कि गरीबी रेखा से नीचे की आबादी को 36 फीसदी तक सीमित रखें। बीते महीने सुप्रीमकोर्ट ने एक जनहित याचिका पर सुनवाई करते हुए इस पर हैरत जताई है। कोर्ट ने साफ कहा कि आयोग का यह निर्देश समझ से परे है। गरीबी रेखा की अधिकतम सीमा इस तरह कैसे तय की जा सकती है? क्या किसी राज्य में युवाओं या बुजुर्गो की अधिकतम संख्या का निर्धारण हो सकता है? अत: कोर्ट ने कहा कि आयोग का काम गरीबी मिटाने का लक्ष्यबद्ध कार्यक्रम बनाना है, लेकिन ऐसा लगता है कि उसकी दिलचस्पी उस बात में है कि गरीबों की संख्या किस तरह कम करके दिखाई जाए। इस चक्कर में उसने अर्थशास्त्रीय मानदंडों को ताक पर रख दिया है। हालांकि देश के विभिन्न राज्यों के बीच जो अंतर है, वह किसी से छिपा नहीं है। ऐसे में बिहार, झारखंड या छत्तीसगढ़ में गरीबी रेखा से नीचे की आबादी का अनुपात वही कैसे हो सकता है, जो गुजरात, केरल या कर्नाटक में हो? बेशक देश की आजादी के छह दशक बाद आज भी गरीबी एक गंभीर समस्या बनी हुई है, क्योंकि दुनिया के अधिकांश देशों में गरीबी और भूखमरी की जो स्थिति है, उन देशों की तुलना में भारत की स्थिति तो काफी विकराल है। यही वजह है कि संयुक्त राष्ट्र विकास कार्यक्रम की रिपोर्ट में हमें मानव जीवन के सूचकांक की कसौटी पर 134वें और ग्लोबल हंगर इंडेक्स में भूख से लड़ रहे 88 देशों की सूची में भारत को 66वें स्थान पर रखा गया है, जो हमारी हालत दर्शाने के लिए काफी है। इसके साथ ही भुखमरी के कई अन्य आंकड़े भी दर्शाते हैं कि गरीबी के मोर्चे पर हमारी हालत क्या है। अहम प्रश्न यह भी है कि भूख की वजह से होने वाली पीड़ाओं और कुपोषण के अलावा कुछ भयानक नतीजे होते हैं, जैसे शरीर की मानसिक वृद्धि न होना, मस्तिष्क का पूरी तरह से विकास नहीं हो पाना। वहीं बच्चों का वजन उनके उम्र के हिसाब से कम होना इत्यादि कई ऐसे कई दुखद पहलू हैं। आज पांच में से एक भारतीय कुपोषण का शिकार है, जबकि 58 प्रतिशत गर्भवती महिलाएं एनीमिया के शिकार हैं। वहीं 3 वर्ष से कम आयु के 46 प्रतिशत बच्चों का वजन उनके उम्र के हिसाब से कम है। साफ है कि देश की बहुसंख्य जनता या तो भूखी है या फिर भोजन के नाम पर जो खा रही है, उसे इंसानी भोजन में शुमार नहीं किया जा सकता। ऐसे में जरूरत इस बात की है कि सबको समान ढंग से भोजन मुहैया हो सके। सुप्रीमकोर्ट ने इस मामले में सख्ती तो दिखाई है, लेकिन देखना होगा कि सरकार इसे कितनी गंभीरता से लेती है। क्योंकि महज अन्न की उपलब्धता से लोगों को संतुलित भोजन नहीं मिल पाएगा, बल्कि एक ऐसी व्यवस्था बनानी होगी जिससे जरूरतमंदों तक अन्न समय रहते पहुंचाया जा सके।