Thursday, July 5, 2012

विकास निधि का दुरुपयोग


उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री अखिलेश यादव ने प्रदेश के विधायकों को एक तोहफा देने की कोशिश की। उन्होंने दो लाख करोड़ रुपये के कर्ज वाले प्रदेश के माननीय विधायकों को विकास निधि से बीस लाख रुपये तक की कार खरीदने की छूट की घोषणा की। अखिलेश यादव से उनके समर्थकों को बहुत उम्मीद है और उनके विरोधियों को आशंका है कि वे उम्मीद पर खरे न उतर जाएं। सत्ता का एक स्वाभाविक अवगुण होता है वह जमीनी वास्तविकता से नेता को काट देती है। जनता के वोट से चुनकर सत्ता में आने वाले नेता को लगता है कि चुनाव के बाद जनतंत्र स्थगित हो जाता है और राजतंत्र शुरू हो जाता है। इसी मानसिकता के चलते सरकारों के मुखिया रेवड़ी बांटने को अपना वैधानिक अधिकार समझने लगते हैं। अखिलेश यादव को जिसने भी यह सलाह दी थी वह उनका हितैषी तो नहीं ही है। अपने फैसले को वापस लेकर प्रदेश के युवा मुख्यमंत्री ने संदेश दिया है कि वे गलतियों से सीखने और उन्हें सुधारने के लिए तैयार हैं। सांसद निधि की शुरुआत 1993 में तत्कालीन प्रधानमंत्री पीवी नरसिंहा राव ने की थी। सांसदों को सामूहिक रूप से भ्रष्ट करने की यह शुरुआत थी। सांसदों की खरीद-फरोख्त करके अपनी सरकार बचाने वाले नरसिंहा राव को सांसदों को खुश करने का यह नायाब तरीका नजर आया। उसके बाद कोई सरकार इसे खत्म करने का राजनीतिक साहस नहीं जुटा सकी। सांसद निधि के आधार राज्यों ने विधायक निधि की शुरुआत की। सांसद और विधायक निधियां उनके क्षेत्रों के बजाय उनके विकास का औजार बन गई हैं। हाल यह है कि जो ईमानदारी से अपने क्षेत्रों में काम कराते हैं और जो सिर्फ कमीशन को ध्यान में रखकर काम कराते हैं, दोनों के अपने-अपने ठेकेदारों की एक फौज तैयार हो गई है। जिस जनता के लिए काम होता है उसे पता है कि सांसद या विधायक महोदय का इसमें कितना हिस्सा होता है। इसके बाद भी किसी को भ्रष्टाचार के प्रमाण की जरूरत हो तो वह सीएजी की रिपोर्ट पढ़ ले। या सांसद और विधायक निधि के तहत होने वाले काम की दर और बाजार भाव पता कर ले, उसे सैकड़ों सुरेश कलमाडी मिल जाएंगे। ज्यादातर बड़े नेता सांसद निधि के पैसे का इस्तेमाल ही नहीं करते। सीएजी की रिपोर्ट के मुताबिक 2004 से 2009 के बीच सांसद निधि का आधा पैसा इस्तेमाल ही नहीं हुआ। इसके बावजूद केंद्र सरकार ने सांसद निधि का पैसा सालाना दो करोड़ से बढ़ाकर पांच करोड़ रुपये कर दिया है। सासंद निधि के इस्तेमाल का एक नायाब तरीका बिहार के एक बाहुबली सांसद ने बताया। उनका कहना था कि उनके पास हर समय पांच-छह लड़के रहते हैं जो उनके लिए कुछ भी करने को तैयार रहते हैं। अब उनके खर्चा पानी का इंतजाम करना तो बनता है न। सांसद महोदय सांसद निधि से दस से पंद्रह लाख रुपये के काम का जिम्मा इनमें से प्रत्येक को दे देते हैं। इस ताकीद के साथ कि इसमें आधा तुम्हारा और बाकी का काम करा देना। उनकी नजर में लूट का यह समतावादी सिद्धांत है। उत्तर प्रदेश में विधानसभा चुनाव के बाद सत्ता परिवर्तन हुआ। यह जितना महत्वपूर्ण है उससे ज्यादा अहम है अखिलेश यादव का मुख्यमंत्री बनना। राज्य के राजनीतिक दलों के नेतृत्व में लंबे समय से कोई परिवर्तन नहीं हुआ है। वही-वही चेहरे देखकर लोग ऊब चुके हैं। अखिलेश का नेतृत्व एक ताजा हवा के झोंके की तरह आया जो पढ़ा-लिखा और सुसंस्कृत है, अपने विरोधियों से भी सम्मान से पेश आता है। लोगों को उम्मीद थी और अभी है कि समाजवादी पार्टी की कार्यसंस्कृति बदलेगी और उत्तर प्रदेश बदलेगा। लोगों को उम्मीद है कि राज्य के नए मुख्यमंत्री विकास के नए उपाय सुझाएंगे और उन पर अमल करेंगे। विधायकों को अपने क्षेत्र की बेहतर सेवा के लिए सुविधाएं मिलें इससे किसी को इनकार नहीं हो सकता, पर इसके लिए उन्हें बीस लाख की गाड़ी चाहिए, इससे कोई कैसे सहमत हो सकता है। राज्य में गेहूं सड़ने की जांच इलाहाबाद उच्च न्यायालय के आदेश पर हो रही है। जाहिर है प्रदेश के पास पर्याप्त भंडारण क्षमता नहीं है। देश में पैदा होने वाली सब्जियों और फलों का एक-तिहाई भंडारण क्षमता के अभाव में बर्बाद हो जाता है। ऐसे में क्या यह अच्छा नहीं होता कि राज्य सरकार तय करती कि विधायक निधि में जो बढ़ोतरी की जा रही है, पहले साल में उसका बढ़ा हुआ पैसा कोल्ड स्टोरेज बनाने पर खर्च किया जाएगा। उत्तर प्रदेश वित्त निगम दो करोड़ तक के कोल्ड स्टोरेज पर पच्चीस फीसदी सब्सिडी भी देता है। इस पैसे से प्रदेश के हर लोकसभा क्षेत्र में एक नया कोल्ड स्टोरेज खुल सकता है। इससे किसानों को अपने उत्पाद को ज्यादा समय तक रखने और बेहतर कीमत पाने का अवसर मिलता। रोजगार के अवसर बढ़ते। इससे सरकार का बेरोजगारी भत्ते का बिल घटता। जिस राज्य के पास संसाधनों की कमी हो उसे उपलब्ध संसाधनों के बेहतर उपयोग के नए-नए तरीके खोजने चाहिए। अखिलेश यादव को मुख्यमंत्री के तौर पर अपने पहले कार्यकाल में जैसा अवसर मिला है उनके पिता मुलायम सिंह यादव को कभी नहीं मिला। मुलायम सिंह यादव तीन बार राज्य के मुख्यमंत्री बने। तीनों बार उनकी ताकत सरकार चलाने से ज्यादा सरकार बचाने में खर्च हुई। अखिलेश यादव को सरकार की स्थिरता की बारे में सोचने की भी जरूरत नहीं है। चुनाव में उन्हें कमोबेश हर वर्ग का समर्थन मिला है। वह जातिवाद या सांप्रदायिकता के रथ पर सवार होकर सत्ता में नहीं आए हैं। उत्तर प्रदेश के इतिहास में मायावती के बाद अखिलेश यादव दूसरे मुख्यमंत्री होंगे जिसे पांच साल का पूरा कार्यकाल मिलेगा। प्रदेश कांग्रेस शरणागत है। भाजपा ने तय कर लिया है कि उत्तर प्रदेश में उसका मुकाबला कांग्रेस से ही रहेगा। मायावती और उनकी बहुजन समाज पार्टी पिछले पांच साल में हुए भ्रष्टाचार के मुकदमों में उलझी रहेगी। अखिलेश को निष्कंटक राज मिला है। उन्हें कोई खतरा है तो अपनी ही पार्टी के लोगों से और ऐसे सलाहकारों से जो विधायकों को बीस लाख की गाड़ी जनता के पैसे से खरीदने की सलाह देते हैं। लखनऊ में चर्चा है कि अखिलेश के करीबी उन्हें अर्जुन बताते हैं जो कौरवों से घिरे हुए हैं। अगर ऐसा है तो उन्हें इस चक्रव्यूह से जल्दी निकलना होगा, क्योंकि उम्मीद के नाउम्मीदी में बदलने में ज्यादा समय नहीं लगता। राजनीति में सही फैसले से भी ज्यादा जरूरी होता है सही समय पर सही फैसला। समाजवादी पार्टी को 20 लाख की गाड़ी से ज्यादा जरूरत साइकिल की है। (लेखक वरिष्ठ स्तंभकार हैं) 12श्चश्रल्ल2@Aंॠ1ंल्ल.Yश्रे

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