Monday, May 28, 2012

सरकार के लिए भरी होंगे अगले दो साल


यूपीए के लिए खुशी मनाने को कुछ ज्यादा नहीं है कि उसकी सरकार को सत्ता में बने रहते हुए तीन साल हो गए हैं। यूपीए-2 ने जनता से किसी प्रयोजन और उत्तरोत्तर आंतरिक सद्भाव तक के प्रति कोई वास्तविक सरोकार प्रदर्शित नहीं किया है। राष्ट्रपति चुनाव के मसले पर जैसा कि विभिन्न घटक दलों के परस्पर विरोधी संकेतों से अंदाजा होता है वे अलग-अलग दिशाओं में जोर लगा रहे हैं। यूपीए का नेतृत्व दिशाहीन और विचारों से खाली है। ऐसा कोई संकेत नहीं कि वह 2014 से पहले अपनी गिरावट को रोक सकता हो और यह चुनाव वह हारने के लिए तैयार बैठा लगता है। यूपीए ने उन वादों को पूरा करने के अवसरों को बर्बाद किया है, जिनका लाभ उठाकर वह 2009 में किए गए अपने उन वादों को पूरा कर सकता था, जिनके कारण वह सत्ता में लौटा था। सबसे महत्वपूर्ण वादा तो समावेशी भारत निर्माण का था, जिसमें वृद्धि और आय का विभाजन कम होता और सामाजिक मेल-मिलाप अधिक होता। आम आदमी केंद्रित नीतियों को लागू करने के स्थान पर यूपीए-2 नवउदारवाद का गुलाम बन गया है। उसने बड़े व्यवसाय को सारी सुविधाएं मुहैया कराई और प्राकृतिक संसाधनों को लूटने की खुली छूट दी। कृषि की इस हद तक उपेक्षा की कि दसियों लाख किसानों के लिए यह अलाभकारी हो गया, जिससे आत्महत्याओं में तेजी से बढ़ोतरी हुई। भारत के सकल घरेलू उत्पाद के फल मुख्यतया आबादी के सबसे ऊपरी पायदान के 10-15 फीसद लोगों को मिले हैं। देश के अनेक भागों में गरीबी, खासतौर पर संसाधन गरीबी बढ़ी है, कुपोषण तथा शिशु मौतों का आंकड़ा और भारी ही होता जा रहा है। भोजन की प्रति व्यक्ति उपलब्धता में कमी आई है। रोजगार में बढ़ोतरी एक फीसद प्रति वर्ष से भी कम हुई है, श्रमशक्ति में वाषिर्क वृद्धि आधा फीसद भी नहीं रही है। सार्वजनिक सेवाओं तक पहुंच अधिक असमान हो गई है। आय की असमानताएं चौड़ी और गहरी हो गई हैं। संगठित व्यवसाय और धीरे-धीरे विदेशी निवेश के लिए खुदरा व्यापार को खोलने से लाखों छोटे दुकानदारों और व्यापारियों के सामने रोजी-रोटी कमाने का संकट पैदा हो गया है, जो वैसे भी जैसे-तैसे गुजर-बसर कर पाते हैं। 100 प्रतिशत प्रत्यक्ष विदेशी निवेश को इजाजत देने के सवाल पर लोकसभा में बुरी तरह मार खाने के बावजूद यूपीए-2 सरकार ने अपना एजेंडा छोड़ा नहीं है। प्रधानमंत्री अब भी पोस्को समझौते को आगे बढ़ाने का ख्याल पाले हुए हैं, जो न केवल पर्यावरण और वन कानूनों का उल्लंघन करता है बल्कि इस परियोजना को तीन सरकारी कमेटियों द्वारा पहले ही अस्वीकार किया जा चुका है। वास्तव में ऊपरी ढांचे, खनन और उद्योंगों से जुड़ी अनगिनत परियोजनाओं को तेजी से मंजूरी देने के लिए प्रधानमंत्री कार्यालय एक विशेष उद्देश्य प्रकोष्ठ का गठन करने जा रहा है। भारतीय नीति निर्माता और खासतौर पर प्रधानमंत्री कार्यालय किसी भी कीमत पर प्रत्यक्ष विदेशी निवेश को आकषिर्त करने के लिए इंडिया ब्रांड इक्यूटी कंसेप्टको आगे बढ़ाने में लगे हैं। जो भी चीज इससे अलग ले जाती है, उसे अवरोधक के रूप में देखा जाता है, जिसका अर्थ है- लाइसेंस परमिट राज में वापस लौटना। उद्योग जगत के ढिंढ़ोरचियों ने नीति पक्षाघातकी समाप्ति औरदूसरी पीढ़ी के सुधारोंकी संस्था की मांग करने के लिए जोरदार अभियान शुरू किया है, जिसका आशय अधिक विनियमीकरण, सार्वजनिक क्षेत्रों का अधिक निजीकरण, तथाकथित सार्वजनिकनिजी ाजनिकनिजी भागीदारी के माध्यम से सार्वजनिक सेवाएं, अधिक उदार निवेश और व्यापार का दौर और थोड़ी-बहुत श्रम सुरक्षा के मौजूदा कानूनों का भी खात्मा करना है। वास्तविकता यह है कि नीति पक्षाघातकहीं नहीं है। पश्चिम की क्रेडिट रेटिंग एजेंसियां राजनीति से प्रेरित दोहरे मापदंड अपनाती हैं। कर्ज के मामले में उनको अगर मापदंड अमेरिका के लिए अपनाना हो तो, उदाहरण के लिए वे स्पेन का सहारा लेती हैं। स्पेन में सार्वजनिक कर्ज- जीडीपी अनुपात 69 प्रतिशत है जबकि अमेरिका के लए यह आंकड़ा 103 प्रतिशत है। भारत का यह अनुपात 60 फीसद से कम है। यदि निजी सहित कुल कर्ज को देखा जाए तो अमेरिका उन देशों में निकलेगा, जिन पर सबसे ज्यादा कर्ज लदा है। उस पर दुनिया का कर्ज उसके वाषिर्क उत्पादन से तीन गुना ज्यादा है। जर्मनी का कुल कर्ज अनुपात 385 है और जापान का 470 जबकि भारत का यह अनुपात मात्र 129 है। यूपीए-2 की सरकार के तीन साल के अंत पर भारत अधिक असंतुलित, लड़ाई- झगड़ों में फंसा एक दुखी समाज है। नीतियां सही करने के स्थान पर सरकार इनसे पैदा असंतोष से निपटने के लिए निर्मम ताकत का इस्तेमाल करने पर उतारू रहती है। यह नंगे और दर्दनाक ढंग से भारत की प्रमुख आदिवासी पट्टी में दिखाई पड़ता है, जहां लाखों लोगों को वनों, चारागाहों और जलाशयों आदि जैसे साझे संपत्ति-संसाधनों से वंचित किए जाने के चलते सामाजिक असंतोष से जन्मा नक्सलवाद फल- फूल रहा है। इस पट्टी में सरकार अपने ही लोगों के खिलाफ युद्ध में ताकत के इस्तेमाल में इजाफा कर रही है। सरकार के वे प्रयास भी कम महत्वपूर्ण नहीं हैं, जो विनाशकारी परियोजनाओं के विरोध में जमीनी स्तर पर चल रहे प्रदर्शनों को कुचलने के लिए चल रहे हैं। इनमें से कुछ ये हैं- ओडिशा में पास्को और टाटा स्टील, छत्तीसगढ, झारखंड और गोआ में खनन, उत्तराखंड, हिमाचल और उत्तरपूर्व में अंधाधुध बन रहे बांध तथा कोडनकुलम (तमिलनाडु), जैतापुर (महाराष्ट्र), मीठीविर्दी (गुजरात), फतेहाबाद (हरियाणा), कोवादा (आंध्र प्रदेश) और चुर्का ( मध्य प्रदेश ) आदि। इसके अलावा यूपीए-2 सरकार की एक अन्य विफलता मुस्लिमों की स्थिति पर सच्चर कमेटी रिपोर्ट को पर कार्यवाई न करने और जिन जिलों में अलपसंख्यक समुदाय की अच्छी-खासी संख्या है, उनमें कार्यक्रमों को ठीक से लागू न किए जाने में निहित है। यूपीए-2 ने 2004 का चुनाव आंशिक तौर पर सांप्रदायिक हिंसा के विरोध में जनआक्रोश के चलते जीता था। पर वह 1984 के सिख विरोधी दंगों के पीड़ितों और गुजरात में 2002 के मुस्लिम विरोधी हत्याकांड के शिकार लोगों को न्याय दिलाने के अपने वादे पर अमल नहीं कर पाई है। विदेश नीति और सुरक्षा संबंधी प्रश्नों पर भी सरकार का रिकार्ड अच्छा नहीं रहा है। ऐसे में जबकि एक बहुध्रुवीय वि-व्यवस्था उभर रही है, उसने भारत को अमेरिका के साथ करीब से जोड़ कर दुनिया के मामलों में एक स्वतंत्र मार्ग अपनाने के विकल्प को कम कर दिया है। अमेरिकी-भारतीय परमाणु सहयोग समझौते के कारण भारत ने अपने आप को , परमाणु ऊर्जा पर आधारित एक अनुचित, अत्यंत जोखिमपूर्ण और महंगे रास्ते पर डाल दिया और परमाणु- अस्त्र मुक्त वि के लिए संघर्ष के एजेंडा को छोड़ दिया है। भारत ने अनगिनत द्विपक्षीय समझौते किए हैं, जो विदेशी कॉरपोरेशनों के लिए एक समान राष्ट्रीय व्यवहार की मांग करते हैं। ईरान, फिलिस्तीन, लीबिया और सीरिया जैसे महत्वपूर्ण प्रश्नों पर यूपीए-2 का रवैया असंतुलित रहा है। इसके चलते अरब जगत में भारत के प्रति सद्भाव में कमी आई है। इस दौरान भारत ने अपने पड़ोसियों के साथ संबंधों को सुधारने के काम को अनदेखा किया है। सियाचीन और सर क्रीक विवादों को निपटा कर, व्यापारिक उदारीकरण करके तथा वीसा अवरोधों को खत्म करके वह पाकिस्तान के साथ संबंधों के नए अध्याय को शुरू करने के की बड़ी पहल करने से वह बचता रहा है। नई दिल्ली ने तीस्ता जल विवाद पर बांग्लादेश के साथ समझौता करने के बहुमूल्य अवसर को गंवा दिया है। लिट्टे विरोधी सैनिक कार्रवाई के अंतिम दौर में श्रीलंका में तमिल नागरिकों की सामूहिक हत्याओं पर भारत की भूमिका पूरी तरह से निंदनीय रही है।

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