Friday, November 25, 2011

आबादी के संकट का मिथक टूटेगा!

इकतीस अक्टूबर, 2011 को प्रात: सात बजकर बीस मिनट पर लखनऊ में नरगिस नामक बच्ची के जन्म पर परिवार में उत्सव का सा माहौल था। यह उत्सव ऐसे क्षेत्र में मनाया जा रहा था जहां सामान्यत: बच्ची के जन्म लेने पर मातम न भी हो परंतु खुशी का माहौल भी नहीं होता। पर नरगिस के जन्म पर उत्सव इसलिए हो रहा था क्योंकि उसने वि के सात अरबवें इंसान के रूप में जन्म लिया। वि में जनसंख्या के इन आंकड़ों को लेकर अलग तरह की तस्वीर प्रस्तुत की जा रही है। माना जा रहा है कि जनसंख्या वृद्धि ही, गरीबी, बेरोजगारी, सीमित संसाधनों का संकट और आर्थिक पिछड़ेपन के लिए जिम्मेदार है। इसके लिए विकासशील व अविकसित देशों को उत्तरदायी ठहराने का प्रयास हो रहा है। आंकड़ों पर नजर डालें तो वि की सात अरब जनसंख्या के पांच सबसे बड़े भागीदार देश, चीन (19.4 प्रतिशत), भारत (17.5 प्रतिशत), अमेरिका (4.5 प्रतिशत), इंडोनेशिया (3.4 प्रतिशत) और ब्राजील (2.8 प्रतिशत) हैं। केवल भारत और चीन मिलकर दुनिया की कुल आबादी का 37 प्रतिशत हैं। एक अनुमान के मुताबिक वर्ष 2050 तक यह जनसंख्या दस अरब तक पहुंच सकती है। यदि इसे भारत के संदर्भ में देखें तो भारत की जनसंख्या 1.21 अरब के आसपास है। यानी दुनिया का प्रत्येक सातवां व्यक्ति भारतीय है। इसमें पांच सर्वाधिक आबादी वाले राज्य उत्तर प्रदेश, महाराष्ट्र, बिहार, बंगाल और आंध्र प्रदेश में भारत की कुल आबादी का लगभग 50 प्रतिशत हिस्सा है। वैिक स्तर पर चीन दुनिया का सर्वाधिक आबादी वाला देश है परंतु उसने अपनी जनसंख्या बढ़ोतरी दर नियंत्रित करने में सफलता पाई है। पश्चिमी देशों का मानना था कि जब तक चीन अपनी जनसंख्या नियंत्रित नहीं करता तब तक वह आर्थिक प्रगति नहीं कर सकता। इस तर्क को मुंह चिढ़ाते हुए माओ ने कहा था कि हर चीनी बालक केवल मुंह ही नहीं बल्कि दो हाथ लेकर भी पैदा होता है। वह चीन पर बोझ नहीं होता, बल्कि चीनी प्रगति में पूरा योगदान देता है। माओ के इस तर्क को चीन ने काफी हद तक सच साबित भी कर दिखाया। उसने सभी मिथकों को तोड़ते हुए विकास के नये कीर्तिमान स्थापित किये। जनसंख्या को लेकर पश्चिमी देश इसलिए दुनिया पर दबाव बनाते रहे हैं क्योंकि उन्होंने वर्ष 1950 तक अपनी जनसंख्या इतनी कर ली थी कि दुनिया में यूरोपीय जाति की प्रधानता हो चुकी थी। 1000 ईस्वी तक यूरोपीय जाति के लोग दुनिया की आबादी का केवल आठवां भाग थे। 1500 ईस्वी के आसपास उन्होंने यूरोप से बाहर निकल कर वि के दूसरे हिस्सों को हथियाना आरंभ किया और अमेरिका तक पर कब्जा कर डाला। 1750 तक दुनिया की आबादी में यूरोपीय लोगों का हिस्सा पांचवां हो चुका था और 1900 तक आते-आते यूरोपीय जनसंख्या दुनिया की कुल आबादी का एक तिहाई भाग हो चुकी थी। गौरतलब है कि इस दौरान यूरोपीय देशों में जनसंख्या वृद्धि और प्रगति साथ-साथ हो रही थी। कालांतर में अपनी प्रधानता स्थापित करने के बाद उन्होंने कहना शुरू कर दिया कि जनसंख्या बढ़ोतरी पर रोक लगनी चाहिए। साथ ही तर्क दिये जाने लगे कि जनसंख्या में बढ़ोतरी के लिए विकासशील और अविकसित देश जिम्मेदार हैं। यह चिंता भी जाहिर की जा रही है कि जनसंख्या बढ़ोतरी से संसाधनों का संकट पैदा हो जाएगा परंतु दुनिया में अमेरिका के बाद सबसे अधिक कृषि योग्य भूमि भारत के ही पास है। चीन के पास भी खेती योग्य भूमि हमसे कम है। आज भी 4.5 प्रतिशत जनसंख्या वाला अमेरिका, वि के कुल उपलब्ध संसाधनों का 25 प्रतिशत अकेले दोहन करता है। यानी अमेरिका का एक व्यक्ति भारत के 12 व्यक्तियों के बराबर संसाधनों का उपभोग कर रहा है। वि के उपलब्ध सीमित संसाधनों का 86 प्रतिशत भाग केवल 20 प्रतिशत सर्वाधिक सुविधा संपन्न व अमीर लोगों द्वारा उपभोग हो रहा है। जबकि सर्वाधिक 20 प्रतिशत गरीब केवल 1.3 प्रतिशत ही उपभोग कर पाते हैं। इस प्रकार, संसाधनों का संकट उपभोग से नहीं अपितु अति-उपभोग अथवा दुरुपयोग से पैदा होता है। जनसंख्या वृद्धि बेरोजगारी से भी जोड़ी जा रही है। यूरोप और अमेरिका में जहां एक ओर जनसंख्या में गिरावट दर्ज की गयी, वहीं रोजगार के अवसर बढ़े हों, ऐसा देखने को नहीं मिला। भारतीय जनगणना 2011 के आंकड़ों पर नजर डालें तो केरल सबसे कम जनसंख्या वृद्धि दर वाला राज्य है, लेकिन वहां बेरोजगारी सर्वाधिक है। रोजगार या बेरोजगारी को जनसंख्या घटने या बढ़ने से नहीं जोड़ा जा सकता बल्कि यह सरकार की नीतियों पर निर्भर करता है। चिंता जाहिर की जा रही है कि जनसंख्या वृद्धि आर्थिक विकास को प्रभावित करती है। यदि जनसंख्या घटने या बढ़ने का संबंध वास्तव में अमीरी या गरीबी से होता तो अमेरिका में इस समय एक भी व्यक्ति बेरोजगार न होता। भारत से तीन गुना अधिक क्षेत्रफल वाले अमेरिका की (जिसकी आबादी हमसे करीब चार गुना कम है), 12 प्रतिशत कार्यशक्ति बेरोजगार घूम रही है। करोड़ों अमेरिकी बेघर हैं। यही हाल उस रूस का है जो क्षेत्रफल के हिसाब से हमसे पांच गुना अधिक बड़ा और आबादी में आठ गुना कम है। वहां दो करोड़ से अधिक लोग बेरोजगारी की मार झेल रहे हैं। ये दुनिया के औद्योगिक रूप से विकसित वे दो राष्ट्र हैं, जहां न जनसंख्या की समस्या है न संसाधनों की, फिर भी वे बेरोजगारी का दंश झेल रहे हैं। भारत को भविष्य की आर्थिक महाशक्ति के रूप में देखा जा रहा है। ऐसे में जरूरी है यहां मानव संसाधन की कार्यकुशलता व दक्षता बढ़ाने की। जहां तक जनसंख्या वृद्धि नियंत्रित करने का प्रश्न है तो 2011 की जनगणना के आंकड़ों के अनुसार इस वृद्धि दर में कमी आई है। लेकिन यह पर्याप्त नहीं है। अर्मत्य सेन जैसे अर्थशास्त्री जनसंख्या नियंतण्रहेतु कठोर कदम उठाने के पक्ष में नहीं है। उनका मानना है कि शिक्षा एवं स्वास्थ्य सुविधाएं उपलब्ध करा जनसंख्या वृद्धि दर पर रोक लग सकती है। शिक्षा से सोचने-समझने का दायरा बढ़ता है और परिवार नियोजन की जानकारी के प्रचार-प्रसार में मदद मिलती है। महिलाओं की सक्रिय भागीदारी से केरल में जन्मदर में कमी का उदाहरण उल्लेखनीय है। दूसरे, बाल श्रम पर सख्त पाबंदी लगनी चाहिए क्योंकि गरीबों की सोच है कि जितने बच्चे होंगे उतने कुछ कमाकर लाएंगे। वृद्धावस्था व सामाजिक सुरक्षा के उचित प्रबंधन से यह मिथक तोड़ना होगा कि बेटा बुढ़ापे का सहारा होता है। इन प्रयासों से भी जनसंख्या पर काफी हद तक नियंतण्रकिया जा सकता है। चीन ही नहीं जब जर्मनी जैसा देश शून्य जनसंख्या वृद्धि दर हासिल कर सकता है, ईरान जैसा मजहबी देश जनसंख्या पर नियंतण्रस्थापित करने में सफल हो सकता है तो भारत के लिए यह असंभव चुनौती नहीं होनी चहिए।

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