Friday, November 18, 2011

आरटीई कानून के लिए केंद्र को चाहिए हर साल Rs 45 हजार करोड़

शिक्षा का अधिकार (आरटीई) लागू करने के लिए केंद्र सरकार से ज्यादा धन की मांग कर रहे राज्यों को और भी जेब ढीली करनी होगी। अकेले केंद्र सरकार के खजाने पर अब 45,000 करोड़ रुपए सालाना का बोझ पड़ेगा। यह बोझ वर्ष 2011 की जनगणना के आंकलन का परिणाम है। मिडडे मील का दायरा नौंवी व 10वीं कक्षा तक बढ़ाने पर भी विचार किया जा रहा है। 12वीं योजना का प्रारूप तैयार हो चुका है जिसे राष्ट्रीय विकास परिषद की बैठक में मंजूरी भी मिल चुकी है। 12वीं योजना में शिक्षा के क्षेत्र गठित कमेटी ने अनेक महत्वपूर्ण सुझाव दिये हैं जिन्हें 12वीं योजना में शामिल किया जा रहा है। हाल में हुई योजना आयोग की संचालन समिति की बैठक में शिक्षा का अधिकार कानून को लागू करने के लिए धन का अनुमान लगया। शिक्षा सचिव ने बैठक में बताया कि जनगणना के नए आंकड़े आने के बाद आरटीई का खर्च बढ़ेगा। अकेले केंद्र सरकार को 45 हजार करोड़ रुपए प्रतिवर्ष चाहिए। यह अनुमान 65:35 अनुपात का है। यानि 65 प्रतिशत खर्चा केंद्र सरकार और 35 प्रतिशत खर्चा राज्य सरकार उठाएगी। योजना आयोग सैद्धांतिक तौर पर धन उपलब्ध कराने पर सहमत हो गया है। बैठक में कहा गया है कि आरटीई ही देश के हर स्कूल में लागू करने के लिए इसका दायरा बढ़ेगा। मानव संसाधन विकास मंत्रालय ने कहा कि आरटीई को लागू करने के लिए 2009 में 1.84 लाख रुपए का आवंटन किया था लेकिन दिए गए वास्तव में केवल 1.44 लाख। यानि आने वाले पांच सालों में भी खर्चे की तंगी रहगी। आरटीई को लागू करने के मुद्दे पर राज्य सरकारें शोर मचा रही है। हर राज्य कहता है कि उसका बजट गड़बड़ा गया है। राज्य सरकारें अपने हिस्से को 35 प्रतिशत से घटाकर 10 प्रतिशत करने की मांग कर रहे हैं। लेकिन ताजा अनुमान में जब केंद्र सरकार का बजट बढ़ा है तो राज्यों पर और भी बोझ बढ़ेगा। संचालन समिति के सामने प्रस्ताव आया है कि मिडडे मील का दायरा 9वीं व 10वीं कक्षा तक बढा़या जाएा। मिडडे मील के कारण स्कूलों में इनरोलमेंट काफी बढ़ा है। योजना आयोग ने कहा कि नहीं होने देंगे धन की कमी जनसं ख्या बढ़ने से बढ़ा खर्च, राज्यों पर भी बढ़ेगा बोझ

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