Wednesday, November 30, 2011

लिंग परीक्षण पर प्रतिगामी प्रस्ताव

योजना आयोग के प्रस्ताव, नीतियां अक्सर बहस का माहौल तैयार करती हैं। बीते दिनों योजना आयोग ने भ्रूण लिंग परीक्षण पर प्रतिबंध में ढील देने वाला जो प्रस्ताव रखा, उस पर सवाल खड़े हो गए हैं। यह नीति में बड़े बदलाव वाला प्रस्ताव है यानी इस मुददे पर अपनी पूर्व राय से हटना। योजना आयोग की एक बैठक में प्रस्ताव रखा गया कि देश में लड़कियों की संख्या में वृद्धि करने के लिए पीसी एंड पीएनडीटी एक्ट(प्री कनसीव एंड प्री नेटल डायगोस्टिक टेक्नीक) में संशोधन किया जाए। प्रस्ताव में बेटियों के सुरक्षित जन्म या उनके जन्म को सुनिश्चित करने के लिए सरकार गांवों में भ्रूण लिंग परीक्षण पर प्रतिबंध हटाने और आंगनबाड़ी, एएनएम, आशा कार्यकर्ताओं व स्वयंसेवी संस्थाओं की सहायता से माताप्िाता को लड़की के सुरक्षित जन्म के लिए प्रेरित करने पर जोर है। यदि अभिभावक उसकी परवरिश करने में सक्षम नहीं है तो उसे गोद लेने का जिम्मा सरकार का होगा।EOFप्ट ए फीमेल फोटस नामक इस अभियान में सरकार आंगनबाड़ी, एएनएम, आशा कार्यकर्ताओं को ही नहीं बल्कि गर्भवती मां व उसके परिवार को इंसेंटिव देगी। ये लोग बेटियों की हत्या रोकने के लिए गर्भधारण करने वाली महिलाओं की भ्रूण लिंग जांच कराएंगे, यदि जांच से पता चला कि भ्रूण कन्या का है तो वे माता-पिता से पूछेंगे कि वे उसे जन्म देंगे, यदि उत्तर न में मिला तो आंगनबाड़ी, एएनएम कार्यकर्ता आदि उस अवांछित कन्या भ्रूण को जन्म देने के बावत अभिभावक को प्रेरित करेंगे। योजना आयोग का मानना है कि पीसी व पीएनडीटी एक्ट के लागू होने के इतने साल बाद भी कन्या भ्रूण हत्या के अनुपात में कोई सुधार नहीं दिखाई देता। लिहाजा नीति में बदलाव करके लड़कियों के घटते अनुपात को बढ़ाया जाए। नवीनतम जनगणना के आंकड़ों के मुताबिक प्रति 1000 बालकों पर 914 बालिकाएं हैं जबकि एक दशक पूर्व प्रति हजार लड़कों पर 927 बालिकाएं थीं। 1971 में यह संख्या 940 थी। अपने मुल्क में कन्या भ्रूण हत्या के आंकड़े भयावह हैं जबकि ऐसा करना कानूनी अपराध है। एक लंबे संघर्ष के बाद 1994 में पीएनडीटी एक्ट लागू किया गया, जिसके तहत भ्रूण लिंग परीक्षण जांच पर प्रतिबंध लग गया। इस कानून का अल्ट्रासांउड लॉबी ने अपने आर्थिक हितों के मददेनजर कड़ा विरोध किया। कुछ सालों बाद इसे और कड़ा बनाने के लिए इसमें संशोधन किया गया। कानून का उल्लघंन करने वाला यदि दोषी पाया गया तो उसे सजा व जुर्माना देने का प्रावधान भी है। मगर असलियत का खुलासा सरकारी सव्रे ही करते हैं। केंद्रीय स्वास्थ्य मंत्रालय के वाषिर्क सव्रे 2010- 2011 के तहत देश के नौ राज्यों में लिंग परीक्षण जांच की बात सामने आई है। गौरतलब यह भी है कि इस कानून के लागू होने के बाद कानून का उल्लंघन करने वालों के खिलाफ कार्रवाई बहुत कम हुई हैं। अधिकतर मामलों में सजा नहीं हुई। भ्रूण लिंग परीक्षण जांच संबंधी कानून को लागू करने में सरकार ने सुस्ती बरती, इसकी तसदीक 2001 2011 जनगणना के आंकड़े करते हैं। अखिल भारतीय जनवादी महिला संस्था की महासचिव सुधा सुंदर रमन का सवाल है कि सरकार को कानून का सख्ती से अमल करने के बावत सुझाव न देकर योजना आयोग का यह प्रस्ताव प्रतिगामी कदम साबित होगा। यह दुर्भाग्यपूर्ण है कि योजना आयोग इस हास्यास्पद प्रस्ताव के जरिए मौजूदा कानून को कम करके आंक रहा है। इससे हालात और जटिल होंगे। पहले एक्ट में सरकार ने जिस काम को अपराध की क्षेणी में रखा, अब उसे अपराध नहीं माना जाएगा, क्या उचित होगा? योजना आयोग के इस प्रस्ताव में यह भी कहा गया है कि जो अभिभावक लड़की को जन्म देने के बाद उसका पालन-पोषण करने में अनिच्छा जाहिर करेंगे, ऐसी लड़कियों को सरकार गोद ले लेगी। उन्हें पालना घर, बालगृह आदि में भेज दिया जाएगा। ऐसे सरकारी व सरकारी अनुदान से संचालित केद्रों में बदइंतजामी, बच्चियों के शारीरिक व यौन शोषण की खबरें आए दिन छपती रहती हैं। सचाई तो यह है कि कानून पर पाबंदी उठाने या प्रतिबंध में ढील दिए जाने के पक्ष में एक मजबूत लॉबी सक्रिय है और यदि ऐसा हुआ तो देश में कन्या भ्रूण हत्याओं की संख्या में बढ़ावा होने की आशंका भी नजर आती है। इस विवादास्पद प्रस्ताव से पैदा होने वाली जटिलताओं व असहमति के स्वरों पर व्यापक विचार-विमर्श होना चाहिए। बेशक स्वास्थ्य एवं परिवार कल्याण, मानव संसाधन विकास एवं पंचायती राज मंत्रालयों में मोटे तौर पर इस योजना पर सहमति है मगर अन्य पहलूओं को भी ध्यान में रखना होगा। इसे आखिरी व कारगर हथियार मानने की अपेक्षा बेटी बचाओ संबंधी दूसरे अभियानों पर फोकस करने के बावत भी सोचा जा सकता है। पाबंदी पर ढील देना या आंगनबाड़ी, एएनएम को नकद प्रोत्साहन देना इस सामाजिक बीमारी का शर्तिया और पक्का इलाज नहीं है। इस पर ध्यान रखने की जरूरत है।

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