हर दंगा अपने पीछे गहरे जख्म छोड़ जाता है। यह समाज को विभाजित कर देता है और जन्म के आधार पर लोगों का ध्रुवीकरण कर देता है। प्रत्येक नागरिक समाज को इस प्रकार के सामाजिक तनाव से खुद को मुक्त करना होगा। दुर्भाग्य से गुजरात में लंबे समय से दंगों का इतिहास रहा है। गुजरात में आखिरी बड़ा दंगा 2002 में हुआ था। ऐसे में गुजरात दंगों का पुनरावलोकन करने के साथ-साथ यह देखना भी महत्वपूर्ण है कि दंगों के दस साल बाद गुजरात आज कहां खड़ा है? इस दशक में गुजरात दंगों से मुक्त रहा है। उम्मीद की जानी चाहिए कि 2002 की दुर्भाग्यपूर्ण घटनाएं फिर कभी न दोहराई जाएं। आज गुजरात का एजेंडा सामाजिक विभाजन का नहीं है। आज इसका लक्ष्य विकास, नागरिकों के जीवनस्तर में सुधार और विश्व के सफलतम समाजों से होड़ लेना है। गुजराती 2002 की स्मृतियों से उबरना चाहते हैं। इन दंगों की याद वे लोग ताजा कर रहे हैं जो अतीत की दुखद स्मृतियों को प्रासंगिक बनाए रखना चाहते हैं। 27 फरवरी, 2002 को साबरमती एक्सप्रेस के डिब्बे नंबर एस-6 में लगाई गई आग एक बर्बर हरकत थी। इस घटना को देश में सांप्रदायिक माहौल खराब करने की नीयत से कुछ शैतानी तत्वों ने अंजाम दिया था। इससे पूरा समाज चकित रह गया। बहुत से लोग प्रतिशोध की अग्नि में जलने लगे। हिंसा इतनी व्यापक हो गई कि राज्य के सुरक्षा बंदोबस्त नाकाफी सिद्ध हुए। दंगों से निपटने के लिए सेना बुलाई गई। इस हिंसा में बहुत से निर्दोष मारे गए। दर्जनों लोग पुलिस फायरिंग में मारे गए। इसकी तुलना 1984 में सिख विरोधी दंगों से करें तो दंगाइयों से निपटने में पुलिस की निष्कि्रयता सामने आती है। गुजरात दंगों में हजारों आरोप-पत्र दाखिल हुए, बहुत से लोगों को दोषी ठहराया गया, कुछ मामले अभी भी लंबित हैं। बहुत से महत्वपूर्ण मामलों की न्यायपालिका निगरानी कर रही है। भारत में अब तक किसी भी दंगे में इतने आरोपपत्र दाखिल नहीं किए गए और इतने लोगों को दोषी नहीं ठहराया गया, जितना गुजरात दंगे में। दूसरी ओर 1984 के सिख विरोधी दंगों में नाममात्र के आरोपपत्र दाखिल किए गए। यहां तक कि सिखों की हत्याओं पर पीयूसीएल की रिपोर्ट को भी प्रतिबंधित कर दिया गया। इन दंगों में मीडिया ने चुप्पी साधे रखी और न्यायपालिका निष्कि्रय रही। गुजरात के राजनीतिक नेतृत्व, खासतौर पर मुख्यमंत्री नरेंद्र मोदी को नेतृत्व की गंभीर परीक्षा से गुजरना पड़ा। क्या वह गोधरा और गोधरा के पश्चात के हालात के लिए जिम्मेदार हैं? बहुत से लोग मोदी के खिलाफ माहौल बनाए रखना चाहते हैं। मोदी और गुजरात सरकार उनके द्वारा खड़ी की गई बहुत सी बाधाओं को पार कर चुके हैं। तमाम परेशानियों के बावजूद राज्य ने अभूतपूर्व विकास किया। गुजरात की विकास दर दोहरे अंकों में पहुंच गई। राज्य में 24 घंटे बिजली आती है। नर्मदा परियोजना के कारण सूखाग्रस्त इलाकों में पानी पहुंच गया है। लालफीताशाही पर लगाम लग गई है। भ्रष्टाचार में कमी आई है और विश्वस्तरीय सड़कों का जाल बिछ गया है। इसके कारण घरेलू और अंतरराष्ट्रीय निवेशक गुजरात की और आकृष्ट हुए हैं। आज विश्व गुजरात को उसकी विकास गाथा और जबरदस्त आर्थिक संभाव्यता के कारण जानता है। इस विकास का लाभ प्रदेश के निचले तबके तक पहुंचा है। राज्य के बढ़ते राजस्व से अनेक सामाजिक कल्याण और गरीबी उन्मूलन के कार्यक्रम चलाए जा रहे हैं। गुजरात के हिंदू और मुसलमान, दोनों ही इस विकास के भागीदार हैं। अनेक अध्ययनों से पता चलता है कि गुजरात के मुसलमानों की आर्थिक स्थिति देश के अन्य भागों के मुसलमानों की अपेक्षा बेहतर है। पिछले दस वर्षो में गुजरात बदल चुका है और यह कुछ एनजीओ और कांग्रेस पार्टी को रास नहीं आ रहा है। गुजरात के बदले रूप से उनकी राजनीति को लाभ नहीं पहुंचता। इसलिए उनके लिए यह जरूरी है कि गुजरात की दंगाग्रस्त राज्य की छवि को जिंदा रखा जाए। राजनीतिक रूप से वे हार रहे हैं। कांग्रेस चुनाव में नरेंद्र मोदी को हरा नहीं सकती इसलिए वह उन्हें सत्ता से बेदखल करने के लिए नए हथकंडे अपना रही है। कांग्रेस की शुरुआती रणनीति थी कि मीडिया के एक वर्ग का इस्तेमाल करते हुए नरेंद्र मोदी के खिलाफ अफवाहें, झूठफरेब और कुप्रचार किया जाए। वर्षो तक एक भयावह कहानी सुनाई जाती रही कि दंगाइयों ने क्या-क्या किया। यह पूरी कहानी गढ़ी हुई थी। दंगों में संलिप्तता के संबंध में गुजरात पुलिस को नरेंद्र मोदी के खिलाफ कोई सबूत नहीं मिला। अदालत में विशेष जांच दल के लिए याचिका दाखिल की गई। गुजरात पुलिस के विशेष जांच दल को भी मोदी के खिलाफ कोई साक्ष्य नहीं मिला। इसके बाद सीबीआइ के पूर्व अधिकारियों का जांच दल बनाया गया। मीडिया की खबरों से संकेत मिल रहा है कि उसमें भी मोदी के खिलाफ कोई साक्ष्य नहीं है। हर मुठभेड़ फर्जी मुठभेड़ नहीं होती। अन्य राज्यों में यह माना जाता है कि मुठभेड़ जायज है और उसकी जांच राज्य का तंत्र ही करता है। हालांकि गुजरात में मुठभेड़ की जांच करने के कानूनी मापदंड अलग हैं। लश्करे-तैयबा के आतंकियों से संबद्ध एक महिला कार्यकर्ता और उसके कुछ साथी एक पुलिस मुठभेड़ में मारे गए थे। केंद्र सरकार ने इस मुठभेड़ को वास्तविक बताने वाला शपथपत्र वापस ले लिया। लश्करे-तैयबा ने अपनी वेबसाइट में भी उसे अपना कार्यकर्ता बताया है। एक अदालत ने विशेष जांच दल का गठन कर इस मामले की जांच सौंप दी। इस दल में केंद्र सरकार और एनजीओ द्वारा नामित अधिकारियों को शामिल किया गया। ऐसे में इस जांच दल से निष्पक्षता की उम्मीद कैसे रखी जा सकती है। पिछला एक दशक गुजरात सरकार के लिए चुनौतीपूर्ण रहा है। गुजरात में सामाजिक तनाव का इतिहास रहा है, जबकि पिछले दस वर्षों में गुजरात में पूरी शांति रही। गुजरात ने अपने अतीत से पीछा छुड़ाकर आर्थिक विकास के रास्ते पर चलने का प्रयास किया है। गुजरात की त्रासदी यह है कि चूंकि मोदी के विरोधी उन्हें राजनीतिक रूप से नहीं हरा सकते इसलिए वे एनजीओ और मीडिया के एक वर्ग के पीछे छुपकर वार कर रहे हैं। यही उम्मीद की जा सकती है कि न्यायपालिका इस पचड़े से अलग रहे। दोषियों को सजा मिलनी ही चाहिए, किंतु मीडिया में दोषसिद्धि और साक्ष्यों के साथ खिलवाड़ का सिलसिला बंद होना चाहिए। सौहार्द्र और विकास ही सबसे अच्छा इलाज है। गुजरात में दो पक्षों के बीच संघर्ष जारी है। एक गुजरात को 2002 के दौर में खींच कर ले जाना चाहता है और दूसरे का विश्वास है कि यह सदी गुजरात के नाम रहेगी। अब गुजरात के सामने इस नकारात्मक शक्ति से पार पाने की चुनौती है। (लेखक राज्यसभा में विपक्ष के नेता हैं) 1ी2श्चश्रल्ल2ी@Aंॠ1ंल्ल.Yश्रे
Showing posts with label पेज न. ८. Show all posts
Showing posts with label पेज न. ८. Show all posts
Wednesday, February 29, 2012
Monday, February 27, 2012
योजनाओं की सफलता का मंत्र
क्यों असफल हो रही हैं ग्रामीणों को रोजगार, स्वास्थ्य या शिक्षा संबंधी मनरेगा, एनआरएचएम या सर्वशिक्षा अभियान जैसी योजनाएं। अगर हम 1965 के भयंकर खाद्य संकट से उबरकर आज 251 मिलियन टन अनाज उपजाकर खाद्यान्न निर्यात करने की स्थिति में आ गए हैं तब क्यों नहीं खत्म कर सकते इन कार्यक्रमों में व्याप्त भ्रष्टाचार? किसी प्रजातंत्र में सामूहिक चेतना विभिन्न स्वरूप में विकसित होती है। अगर अन्ना हजारे भ्रष्टाचार के खिलाफ इस चेतना के नेतृत्वकर्ता बन सकते हैं तब स्वयं भारत सरकार क्यों नहीं इन योजनाओं के प्रति जनचेतना को इतनी प्रबल बना सकती कि कोई भी सरकारी मशीनरी सही डिलीवरी करने को मजबूर हो? दरअसल दोष सरकार की सोच व समझ का है जो मीडिया का सही इस्तेमाल अपने अभिजात्यवर्गीय सोच की वजह से नहीं कर पा रही है। विविधतापूर्ण भारतीय लोकतंत्र में जहां एक तरफ राष्ट्रीय चैनलों की महत्वपूर्ण भूमिका है वहीं क्षेत्रीय चैनलों की उपादेयता को नकारना प्रजातंत्र को कमजोर करने के समान है। एक उदाहरण लें। पेट्रोल की कीमत अगर दो रुपये बढ़ती है तब समूचे देश में हाहाकार मच जाता है, विपक्ष आगबबूला हो जाता है और भारतीय राष्ट्रीय मीडिया हांफ-हांफ कर 123 करोड़ जनता के साथ हो रही ज्यादती को दिन भर दिखाता है। सरकार को कई बार झुकना पड़ता है, लेकिन ठीक दूसरी तरफ पिछले पांच वर्षो में डाई-अमोनियम फॉस्फेट यानी डीएपी खाद की कीमत आधिकारिक रूप से तीन गुना बढ़ जाती है, लेकिन एक पत्ता भी नहीं खड़कता। बिहार सहित उत्तर भारत के तमाम राज्यों में पिछले दो सालों से रासायनिक खाद की भयंकर किल्लत हो रही है, लेकिन शायद ही किसी राष्ट्रीय मीडिया की नजर में यह बात आई हो। दरअसल दोष राष्ट्रीय मीडिया का नहीं है। कुल 123 करोड़ जनता के लिए किसी भी राष्ट्रीय मीडिया का 24 घंटे में इन खबरों को समेटना संभव नहीं है। राष्ट्रीय खबरों की अपनी ही संख्या इतनी बड़ी होती है जिनमें कई बार क्षेत्रीय, लेकिन बेहद जरूरी मुद्दे राष्ट्रीय मीडिया की नजर से ओझल होते रहते हैं। किसी भी राष्ट्रीय चैनल के लिए अपने रिपोर्टिग नेटवर्क को 600 से ऊपर के जिलों में या हजारों तहसीलों तक अपने समाचार नेटवर्क को ले जाना संभव नहीं है। इसके अलावा सबसे बड़ी दिक्कत है टीआरपी का शहरी क्षेत्रों में ही केंद्रित होना। जहां देश के सात बड़े शहरों के लिए 3500 टैम मीटर्स हैं वहीं संपूर्ण भारत के लिए मात्र 6000 टैम मीटर्स लगे हैं। भारत का 65 प्रतिशत किसान जो ग्रामीण भारत में रहता है, वहां टैम मीटर इसलिए नहीं लगाए जाते हैं, क्योंकि उनकी क्रय-शक्ति उतनी नहीं है कि विज्ञापनदाता उन्हें लुभा सकें। सूचना मंत्रालय की नीति के अनुसार वही चैनल विज्ञापन पाने का हकदार होता है जिसकी टीआरपी राष्ट्रीय स्तर पर 0.02 प्रतिशत हो। नतीजा यह होता है कि बीमारू राच्यों में क्षेत्रीय चैनल जिनकी व्युअरशिप काफी अधिक है, इस वर्ग से बाहर हो जाते हैं। परिणामस्वरूप व्यापक पैमाने पर अशिक्षा, अभाव व गरीबी-जनित अज्ञानता राच्य सरकार की मशीनरी को यह मौका देती है कि मानव विकास के मद में आए केंद्रीय धन को अपनी जेब में रख ले। उत्तर प्रदेश में एनआरएचएम में 8800 करोड़ में से 5000 करोड़ का घपला और करीब आधा दर्जन हत्याएं बहुत कुछ बयां करती हैं। किसी भी समुन्नत प्रजातंत्र में सरकार के कार्यो व नीतियों के प्रति जनता को शिक्षित करने में मीडिया की एक अहम भूमिका होती है इसलिए अगर मनरेगा या एनआरएचएम सरीखे कार्यक्रमों को देश के किसी बड़े अंग्रेजी अखबार के माध्यम से जनता के बीच ले जाने का प्रयास किया जाए तब वह निरर्थक होगा। लगभग यही स्थिति है मनोरंजन चैनलों और न्यूज चैनलों के बीच में। यह सही है कि मनोरंजन चैनलों की व्युअरशिप न्यूज चैनल की तुलना में कई गुना ज्यादा है, लेकिन जिस मन:स्थिति में मनोरंजन चैनल देखा जाता है या जिस आयुवर्ग के लोगों में ऐसे चैनल ज्यादा लोकप्रिय हैं उनमें अगर कोई सरकार मनरेगा या सर्वशिक्षा अभियान के बारे में जनता को शिक्षित करना चाहती है तब वह बेमानी होगा। विडंबना यह है कि भारत सरकार अपने जनोपयोगी कार्यक्रम के प्रचार-प्रसार के लिए अपने बजट का 70 प्रतिशत हिस्सा मनोरंजन चैनलों पर खर्च करती है। विज्ञापन के महत्वपूर्ण सिद्धांतों में यह बार-बार कहा गया है कि मीडियम का चुनाव टारगेट व्युअरशिप को ध्यान में रखकर किया जाना चाहिए, लेकिन भारत सरकार शायद अब तक इस मूल सिद्धांत से परिचित नहीं रही है। भारत सरकार इलेक्ट्रॉनिक मीडिया के लिए विज्ञापन के रूप में 300 करोड़ रुपए खर्च करती है, लेकिन उसको खर्च करने की प्रक्रिया पर एक बड़ा प्रश्नचिह्न लगा है। खबरिया चैनल और खास करके क्षेत्रीय चैनल जो संप्रेषण का एक सशक्त माध्यम हो सकते थे, सरकार लगातार उन्हें नजरअंदाज करती रही। उसको यह भी अहसास नहीं हो पाया कि देश में दोषपूर्ण टैम मीटर पर आधारित विज्ञापन नीति पूरे उद्देश्य को खारिज कर देगी। 1965 में जब भारत खाद्य के भयंकर संकट से जूझ रहा था उस समय हरित क्रांति का बिगुल बजाने में भारतीय अखबारों व रेडियो की बड़ी भूमिका रही। यह अखबारों और रेडियो की ही ताकत थी कि उसने किसानों में उत्साह पैदा किया कि 1966 में मैक्सिको से आए 1800 टन बेहतरीन किस्म के बीज का आयात किया गया। वर्तमान में जनता व सरकार के बीच में बढ़ते अविश्वास का एक मुख्य कारण है सरकार का न्यूज मीडिया विरोधी शाश्वत-भाव। उसके बाद की सरकारों ने मीडिया को लगातार शत्रु भाव से देखना शुरू किया। नतीजा यह हुआ कि सरकार की अच्छी से अच्छी योजनाएं भी जनता की सामूहिक चेतना को उन योजनाओं के प्रति सुग्राह्य नहीं बना पाईं। (लेखक न्यूज ब्राडकास्टर्स एसोसिएशन के सचिव हैं) 1ी2श्चश्रल्ल2ी@Aंॠ1ंल्ल.Yश्रे
एनसीटीसी पर बेजा हड़बड़ी
एक ओर आतंकवाद जहां जटिल समस्या का रूप लेता जा रहा है वहीं हमारे रणनीतिकारों के पास इससे निपटने के लिए प्रभावी नीति और उस पर अमल की इच्छाशक्ति का अभाव दिखता है। इस क्रम में भारत सरकार ने अब आतंकवाद को देशव्यापी समस्या मानते हुए इससे निपटने के लिए एनसीटीसी यानी राष्ट्रीय आतंकवाद निरोधक केंद्र के गठन का निर्णय लिया है, लेकिन इसके अमल में आने से पहले ही कई राज्यों द्वारा इसका विरोध शुरू होना कई सवाल खड़े करता है। इन सवालों में पहला सवाल यही है कि जब हमारे पास मल्टी एजेंसी सेंटर और राष्ट्रीय जांच एजेंसी जैसी संस्थाएं पहले से मौजूद हैं तो ऐसे में एक और नई एजेंसी एनसीटीसी के गठन का औचित्य क्या है? सरकार संस्थाओं के ऊपर संस्थाएं बनाती जा रही है, लेकिन इन्हें प्रभावी बनाने और जमीनी स्तर पर मजबूत करने के लिए कोई कदम नहीं उठा रही। इसका परिणाम यह हुआ है कि हमारे पास राज्यों के पुलिस बल के अलावा दूसरे कई सशस्त्र बल और खुफिया एजेंसियां मौजूद होने के बावजूद अपेक्षित सफलता नहीं मिल पा रही। आतंकवादी हमलों के न रुकने पर अपनी विफलता को ढकने के लिए और राजनीतिक लाभ लेने के लिए सरकार हर बार किसी न किसी नई संस्था का गठन करके जनता में संदेश देने की कोशिश करती है कि वह सतर्क है और प्रभावी उपाय किए जा रहे हैं, लेकिन वस्तुस्थिति यही है कि कहीं कुछ नहीं हो रहा होता है। यदि ऐसा होता तो इसका वास्तविक परिणाम कुछ न कुछ अवश्य दिखता। उदाहरण के तौर पर वर्ष 2001 में प्रधानमंत्री के नेतृत्व वाली कैबिनेट समिति ने मल्टी एजेंसी सेंटर को मंजूरी दी थी, जिसे वर्ष 2009 में गठित भी कर दिया गया, लेकिन इस संस्था के अस्तित्व में आने के तीन वर्ष बाद भी स्थिति जस की तस है। कुछ ऐसा ही हाल एनआइए यानी राष्ट्रीय जांच एजेंसी का भी है। इस क्रम में अब कहा जा रहा है कि अमेरिका की तर्ज पर हमें भी एफबीआइ जैसी संघीय पुलिस की आवश्यकता है, लेकिन हम भूल जाते हैं कि भारत की तुलना अमेरिका से नहीं हो सकती। अमेरिका की आबादी जहां करीब 31 करोड़ है वहीं भारत की आबादी 120 करोड़ से भी ज्यादा है। प्रति एक हजार आबादी पर पुलिस बलों की संख्या के मामले में भी हम अमेरिका से काफी पीछे हैं और सबसे बड़ा सवाल कि अमेरिका जितना पैसा अपनी संघीय पुलिस पर खर्च करता है, क्या हम उतना पैसा खर्च करने की स्थिति में हैं और क्या वैसे दूसरे तमाम संसाधन हमारे पास मौजूद हैं। यदि एनसीटीसी की ही बात की जाए तो इसका बजट लगभग ढाई हजार करोड़ रुपये का होगा। मेरा मानना है कि हमारे पास जो भी संस्थाएं पहले से हैं यदि उन्हें ही ठीक तरह से उपयोग किया जाए तो आतंकवाद समेत दूसरी तमाम चुनौतियों से निपटा जा सकता है। आखिर हम क्यों आइबी और रॉ को कमतर आंकने की भूल कर रहे हैं। जयपुर विस्फोट के बाद महाराष्ट्र एटीएस प्रमुख हेमंत करकरे से जयपुर में मेरी मुलाकात हुई थी। उस दौरान मैंने उनसे पूछा था कि क्या अलग-अलग राज्यों में आतंकवादियों के खिलाफ कार्रवाई करने में उन्हें किसी तरह की परेशानी होती है और क्या उन्हें मिलने वाली खुफिया सूचनाएं पक्की होती हैं? इसके प्रत्युत्तर में उनका कहना था कि आतंकवादियों के खिलाफ कार्रवाई में उन्हें अलग-अलग राज्यों से तालमेल बनाने में किसी तरह की कोई परेशानी नहीं होती और न ही इसमें कोई और समस्या आड़े आती है। जहां तक खुफिया सूचनाओं की बात है तो अपने नेतृत्व में सुलझाए गए कुल 13 आतंकवादी मामलों में 9 मामले आइबी की सूचना के आधार पर और 2 मामले राज्य पुलिस की मदद से और एक मामला औचक रूप से हल होने की बात उन्होंने स्वीकार की। इससे साफ है कि केंद्र सरकार द्वारा दिया जा रहा यह तर्क कि एकीकृत राष्ट्रीय सुरक्षा एजेंसी न होने से आतंकवादियों के खिलाफ तत्काल कार्रवाई करने में दिक्कत होती है और इसमें राज्य की पुलिस अथवा दूसरे संगठनों की मदद देर से मिलती है, एक झूठ के अलावा और कुछ नहीं। कुछ लोगों का तर्क है कि टाडा और पोटा जैसे आतंकवाद निरोधक कानून अब अस्तित्व में नहीं हैं, जिसका फायदा आतंकवादियों को मिल रहा है और वे बेधड़क अपने मंसूबों को अंजाम दे रहे हैं। मैं इससे सहमत नहीं हूं। जब ये कानून अस्तित्व में थे तो इनका उपयोग किसके खिलाफ किया गया? टाडा और पोटा के अंतर्गत आतंकवादियों से कहीं ज्यादा आम लोगों को कैद किया गया और बाद में इसका इस्तेमाल राजनीतिक दुश्मनी निकालने के लिए होने लगा। आतंकवाद के खिलाफ सिर्फ कठोर कानून बना देने से क्या होगा जब तक कि हम ऐसा प्रभावी तंत्र और राजनीतिक इच्छाशक्ति नहीं विकसित करते जिससे आतंकवाद का उन्मूलन हो सके। एनसीटीसी पर राज्यों के विरोध को खारिज नहीं किया जा सकता। यदि यह संस्था अस्तित्व में आती है तो राज्यों की अपनी निजी स्वतंत्रता और अधिकार प्रभावित हो सकते हैं। इस बात की क्या गारंटी है कि केंद्र से संचालित यह संस्था स्वतंत्र और निष्पक्ष रूप से काम कर पाए, जबकि दूसरी तमाम ऐसी संस्थाओं के दुरुपयोग के उदाहरण सामने हों। इनमें सीबीआइ का उदाहरण भी एक है। हमें नहीं भूलना चाहिए कि सीबीआइ भी किसी राज्य में बिना संबंधित राज्य सरकार की अनुमति से जांच कार्य शुरू नहीं कर सकती। एक बार उसे जांच की अनुमति मिल जाती है तो ही वह मिले सबूतों के आधार पर किसी से पूछताछ कर सकती है, गिरफ्तारी कर सकती है और अभियोजन का काम शुरू कर सकती है, जबकि एनसीटीसी के मामले में ऐसा नहीं है। एनसीटीसी के गठन के लिए हवाला दिया जा रहा है कि गैरकानूनी गतिविधि निवारक कानून, 1967 के 43 ए के तहत केंद्र को यह अधिकार है कि वह आवश्यक महसूस होने पर देश के विभिन्न हिस्सों में किसी की भी गिरफ्तारी कर सकती है और इसके लिए राज्यों की अनुमति आवश्यक नहीं। इस कानून की यह व्याख्या सही नहीं, क्योंकि संविधान में राज्यों को केंद्र के अनुचित हस्तक्षेप से संरक्षण मिला हुआ है। यहां तक कि सीआरपीएफ अथवा अर्द्धसैनिक बलों को भी राज्यों की अनुमति के बिना तैनात नहीं किया जा सकता। जाहिर है ऐसा होने पर राज्यों के पास संघीय ढांचे को कमजोर करने और उससे छेड़छाड़ करने के लिए अदालत में जाने का रास्ता खुला हुआ है। कुल मिलाकर राष्ट्रीय सुरक्षा के मुद्दे को राजनीतिक अहम का शिकार बनाया जा रहा है, जो किसी भी तरह ठीक नहीं। यह आवश्यक है कि एनसीटीसी पर तार्किक बहस के बाद आम सहमति तक पहुंचा जाए और इसके बाद ही इस पर फैसला हो। (लेखक आतंकवाद प्रतिरोधी नीतियों के विश्लेषक हैं) 1ी2श्चश्रल्ल2ी@Aंॠ1ंल्ल.Yश्रे
Saturday, February 18, 2012
सुप्रीम कोर्ट की सजगता
अन्ना हजारे का आंदोलन दम तोड़ रहा है और बाबा रामदेव का अभियान फिलहाल ठंडा पड़ा हुआ है, किंतु इससे घबराने की जरूरत नहीं है। दरअसल, हालिया तीन फैसलों से सुप्रीम कोर्ट ने सुनिश्चित कर दिया है कि कानून के लंबे हाथ घोटालेबाजों के गिरेबां तक पहुंच रहे हैं। इन फैसलों से कानून के शासन में नागरिकों का विश्वास बढ़ा है। ये तीन फैसले हैं-2जी स्पेक्ट्रम लाइसेंस रद कर नए सिरे से नीलामी, आम नागरिकों को भ्रष्ट मंत्रियों के खिलाफ मामला दर्ज करने का अधिकार और केंद्रीय सतर्कता आयुक्त का सशक्तिकरण। इन तीन फैसलों में सबसे प्रमुख है 2जी लाइसेंस आवंटन के संबंध में सेंटर फॉर पब्लिक इंटरेस्ट लिटिगेशन, डॉ. सुब्रमण्यम स्वामी और अन्य की याचिका पर फैसला। इस ऐतिहासिक फैसले में जस्टिस जीएस सिंघवी और अशोक कुमार गांगुली ने सरकार द्वारा आवंटित 122 लाइसेंसों को रद कर दिया है और अनेक कंपनियों पर जुर्माना भी लगाया है। फैसले में सुप्रीम कोर्ट ने गैर सरकारी संगठनों और उन नागरिकों की सराहना की है, जो इस मामले को लेकर अदालत में पहुंचे। डॉ. सुब्रमण्यम स्वामी बनाम मनमोहन सिंह व अन्य मामले में डॉ. स्वामी ने एक मंत्री पर मामला चलाने के अपने अधिकार पर जोर दिया। उन्होंने अदालत का ध्यान खींचा कि प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह 2जी स्पेक्ट्रम मामले में पूर्व संचार मंत्री ए राजा के खिलाफ केस दर्ज करने की अनुमति देने संबंधी आवेदन पर कोई फैसला नहीं ले रहे हैं। अदालत के सामने मुद्दा यह था कि क्या एक नागरिक को भ्रष्टाचार निरोधक कानून 1988 के तहत जनसेवकों के खिलाफ मुकदमा चलाने का अधिकार है? और क्या सक्षम अधिसत्ता के लिए एक निश्चित समयसीमा में इस संबंध में फैसला लिया जाना आवश्यक है? जस्टिस जीएस सिंघवी और एके गांगुली की खंडपीठ ने डॉ. स्वामी के पक्ष में फैसला सुनाया। अदालत ने एटॉर्नी जनरल की इस दलील को ठुकरा दिया कि एक नागरिक जनसेवक के खिलाफ मुकदमा दर्ज नहीं कर सकता। उन्होंने कहा कि पहले भी एटॉर्नी जनरल की ऐसी ही एक दलील को सुप्रीम कोर्ट की संविधान पीठ अंतुले मामले में खारिज कर चुकी है। अदालत ने विनीत नारायण मामले में तीन सदस्यीय खंडपीठ के फैसले को उद्धृत किया। न्यायाधीशों ने कहा कि इस मामले में खंडपीठ ने व्यवस्था दी थी कि नागरिकों को अदालत में मामला दर्ज करने का अधिकार है। साथ ही सक्षम अधिसत्ता को एक निश्चित समयसीमा में फैसला लेने का आदेश दिया गया था। उस मामले में अदालत ने कहा था कि जनसेवकों के ईमानदारी से विमुख होने का कोई भी मामला विश्वासघात की श्रेणी में आता है और इससे कड़ाई से निपटा जाना चाहिए। अगर जनसेवकों का आचरण दोषपूर्ण है तो इसकी अविलंब जांच होनी चाहिए और अगर उसके खिलाफ प्रथम दृष्टतया मामला नजर आता है तो तुरंत मामला दर्ज होना चाहिए। अंतत: अदालत ने जनसेवकों पर मामला दर्ज करने के संदर्भ में सरकार को फैसला लेने की तीन माह की समयसीमा दी है। अदालत ने सरकार को इस समयसीमा का दृढ़ता से पालन करने को कहा है। हालांकि अगर किसी मामले में एटॉर्नी जनरल या किसी कानून अधिकारी से सलाह लेने की जरूरत है तो एक अतिरिक्त माह का समय और लिया जा सकता है। जजों ने कहा कि संविधान पीठ के फैसले के आलोक में डॉ. स्वामी को ए राजा के खिलाफ मामला दर्ज कराने का अधिकार है। कहानी यहीं खत्म नहीं हो जाती। यह पूरा मामला प्रधानमंत्री के आचरण और डॉ. स्वामी द्वारा लिखे गए अनेक पत्रों के संदर्भ में प्रधानमंत्री कार्यालय की प्रतिक्रिया के चारो ओर घूम रहा है। डॉ. स्वामी सुप्रीम कोर्ट इसलिए गए क्योंकि उच्च न्यायालय ने उनकी याचिका खारिज कर दी थी। सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि उच्च न्यायालय ने बिल्कुल मिथ्या अनुमान पर फैसला लिया कि इस मामले में प्रधानमंत्री ने सीबीआइ को जांच सौंपी हुई है। असल में 4 मई, 2009 को केंद्रीय सतर्कता आयुक्त ने जांच की थी और रिपोर्ट की प्रति सीबीआइ के निदेशक को भेजी थी कि कहीं 2जी स्पेक्ट्रम मामले में आपराधिक साजिश तो नहीं हुई? इसके बाद सीबीआइ ने एफआइआर दर्ज की। इसके करीब एक साल बाद तक मामला ठंडे बस्ते में पड़ा रहा और सीबीआइ ने तभी जांच आगे बढ़ाई जब अदालत ने इसमें दखल दिया। अदालत ने कहा कि साक्ष्यों से पता चलता है कि प्रधानमंत्री की पहल पर सीबीआइ ने न तो केस दर्ज किया और न ही जांच शुरू की। करीब एक साल पहले डॉ. स्वामी ने प्रधानमंत्री को अभिवेदन दिया था कि सीबीआइ द्वारा एफआइआर दर्ज कराई जाए और इस पर सतत निगरानी रखी जाए। प्रधानमंत्री कार्यालय द्वारा प्रस्तुत शपथपत्र में कहा गया है कि एक दिसंबर, 2008 को मामला प्रधानमंत्री के समक्ष प्रस्तुत किया गया और उन्होंने संबंधित अधिकारी को तथ्यों की विवेचना और पड़ताल करने को कहा। चौंकाने वाली बात यह है कि इन निर्देशों का पालन करने के बजाय अधिकारी ने अभिवेदन को संचार मंत्रालय में भेज दिया। उस समय तक यह मंत्रालय उन्हीं ए राजा के अधीन था, जिनके खिलाफ डॉ. स्वामी ने गंभीर आरोप लगाए थे। इन अधिकारियों ने प्रधानमंत्री को आरोपों की गंभीरता और मामले को चार माह के भीतर निपटाने के सुप्रीम कोर्ट के निर्देश के बारे में नहीं बताया। जस्टिस सिंघवी से सहमति प्रकट करते हुए जस्टिस गांगुली ने कहा कि आज देश में भ्रष्टाचार ने न केवल संवैधानिक शासन के सामने खतरा पैदा कर दिया है, बल्कि इसने भारतीय लोकतंत्र और कानून के शासन को भी खतरे में डाल दिया है। इसलिए यह अदालत का कर्तव्य है कि किसी भी भ्रष्टाचार विरोधी कानून की इस तरह व्याख्या करे जिससे भ्रष्टाचार के खिलाफ जंग मजबूत हो। उन्होंने फैसला दिया कि अगर सरकार चार माह के भीतर जनसेवकों के खिलाफ मामला दर्ज करने के आवेदन पर फैसला नहीं करती तो यह मान लिया जाएगा कि सरकार ने मामला दर्ज करने की अनुमति दे दी है। तीसरे और अंतिम मामले में अदालत ने 2जी घोटाले की जांच पर स्वतंत्र निगरानी की अपील ठुकरा दी। हालांकि अदालत ने व्यवस्था दी कि भविष्य में सीबीआइ द्वारा की गई जांच की रिपोर्ट केंद्रीय सतर्कता आयुक्त को भेजी जाए और केंद्रीय सतर्कता आयुक्त एक सप्ताह के भीतर जांच की विवेचना कर अपने मत व सुझाव से अदालत को अवगत कराए। कहने की आवश्यकता नहीं कि इन फैसलों से जनता का मनोबल और कानून के शासन के प्रति विश्वास बढ़ा है। (लेखक वरिष्ठ स्तंभकार हैं) 1ी2श्चश्रल्ल2ी@Aंॠ1ंल्ल.Yश्रे
Wednesday, February 15, 2012
कठघरे में दो प्रधानमंत्री
भारत और पाकिस्तान के प्रधानमंत्रियों के पास रास्ते की पहचान के लिए दो अलग-अलग प्रकाशपुंज हैं। एक देश के सुप्रीम कोर्ट ने प्रधानमंत्री को बचा लिया है, जबकि दूसरे देश के सुप्रीम कोर्ट ने वहां के प्रधानमंत्री को अवमानना के मामले में कोर्ट में हाजिर होने को कहा है। हालांकि इन दोनों मामले में कोई समानता नहीं है, फिर भी कोर्ट का संदेश एक जैसा है। संदेश है कि न्यायपालिका स्वतंत्र है। वह किसी दबाव में नहीं आती। प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह से चूक हुई है। चूक यह है कि प्रधानमंत्री कार्यालय ने तत्कालीन संचार मंत्री ए. राजा के अभियोजन की अनुमति 16 महीने तक नहीं दी। राजा मनमाने एवं गैरकानूनी तरीके से मोबाइल कंपनियों को 2 जी स्पेक्ट्रम के लाइसेंस देने के आरोपी हैं। सुप्रीम कोर्ट ने इस मामले में मनमोहन सिंह को दोषमुक्त करार दिया है। कोर्ट का कहना है कि प्रधानमंत्री खुद हर मामले को विस्तार से नहीं देख सकते। प्रधानमंत्री उपयुक्त कार्रवाई तभी कर सकते थे जब उनके सलाहकार मंत्री के खिलाफ लगे आरोपों की गंभीरता से उन्हें अवगत कराते, लेकिन इस मामले में यह विश्वास करना कठिन है कि प्रधानमंत्री कार्यालय ने मनमोहन सिंह को राजा के खिलाफ मामला दर्ज करने की मंजूरी के बारे में सूचना नहीं दी होगी और वह भी तब जब यह 16 महीने से लंबित था। हकीकत तो यह है कि लगातार याद दिलाए जाने पर भी प्रधानमंत्री कार्यालय का जवाब यही होता था कि मामला सीबीआइ के पास भेजा हुआ है, जबकि मंजूरी के लिए किसी जांच की जरूरत नहीं थी। जाहिर है, कुछ दूसरे कारणों से विलंब हुआ। नि:संदेह इस प्रकरण में प्रधानमंत्री की किरकिरी हुई है, क्योंकि मामला उनके मंत्रिमंडलीय सहयोगी से जुड़ा हुआ है। सफाई देने मात्र से मामला धुल नहीं गया है। यह सही है कि प्रधानमंत्री साझा सरकार का नेतृत्व कर रहे हैं और उन्हें अपने सहयोगी द्रमुक की संवेदनशीलता के प्रति सजग रहना चाहिए था। राजा और प्रधानमंत्री के बीच हुए पत्राचार से यह स्पष्ट है कि प्रधानमंत्री कार्यालय को यह जानकारी थी कि राजा किस तरह सभी नियमों को दरकिनार कर कुछ खास कंपनियों की मदद कर रहे थे। इसके बावजूद प्रधानमंत्री कार्यालय ने कुछ नहीं किया। मतलब साफ है, या तो कोई कार्रवाई नहीं करने का निर्देश था या फिर प्रधानमंत्री कार्यालय खुद उलझन में था। प्रधानमंत्री कार्यालय का लचर रवैया हो या फिर राजनीतिक मजबूरियां, इससे न तो प्रधानमंत्री और न ही द्रमुक के साथ गठबंधन की अध्यक्षता करने वाली सोनिया गांधी की नैतिक जिम्मेदारी कम होती है। मेरा मानना है कि प्रधानमंत्री कार्यालय का इतना अधिक विस्तार कर दिया गया है कि इससे दायित्वों को लेकर उलझन और एक ही काम कई जगह होने की स्थिति बन गई है। प्रधानमंत्री जवाहर लाल नेहरू के सिर्फ एक सचिव थे-त्रिलोक सिंह। वह ही शरणार्थियों के पुनर्वास का काम भी देखा करते थे। जब लाल बहादुर शास्त्री प्रधानमंत्री बने तो उन्होंने एलके झा को अपना सचिव बनाया। उस वक्त तक प्रधानमंत्री कार्यालय छोटा था। प्रधानमंत्री कार्यालय का वास्तविक विस्तार इंदिरा गांधी के प्रधानमंत्री बनने के बाद हुआ। उन्होंने इसे समानांतर सरकार में तब्दील कर दिया। सभी मंत्रालयों का एक-एक अधिकारी प्रधानमंत्री कार्यालय में तैनात कर दिया गया। इस तरह यह एक तरह से मिनी सरकार बन गया। मनमोहन सिंह ने इसे यथावत बनाए रखा। नतीजा है कि आज प्रधानमंत्री कार्यालय का सीधा दखल सभी मंत्रालयों में है। प्रधानमंत्री कार्यालय पर एक और आघात सुप्रीम कोर्ट द्वारा 122 लाइसेंसों को रद किए जाने से लगा है। ये सारे लाइसेंस राजा ने जारी किए थे। कोर्ट ने अब इनकी नीलामी का निर्देश दिया है। कोर्ट के संकेत के अनुसार 2001 के भाजपा शासनकाल के समय से लेकर अब तक जारी किए गए लाइसेंसों की जांच होनी चाहिए। जिस वक्त प्रमोद महाजन संचार मंत्री थे उस समय मैं राज्यसभा का सदस्य था। तब महाजन के बारे में भी तरह-तरह की चर्चाएं होती थीं। यहां तक कि अटल बिहारी वाजपेयी जैसे बड़े कद वाले प्रधानमंत्री भी उन पर लगाम कसने में असमर्थ थे। पाकिस्तान में सुप्रीम कोर्ट ने प्रधानमंत्री यूसुफ रजा गिलानी को राष्ट्रपति आसिफ अली जरदारी के खिलाफ भ्रष्टाचार के मामलों को फिर से खोलने के लिए स्विस सरकार को लिखने का निर्देश दिया था। जनरल परवेज मुशर्रफ ने जरदारी और उनकी पत्नी बेनजीर भुट्टो के खिलाफ इन मामलों को नेशनल रिकंसिलिएशन ऑर्डिनेंस के जरिए बंद कर दिया था। अब सुप्रीम कोर्ट ने इस अध्यादेश को संविधान की भावनाओं के विपरीत करार दिया है। इसके बचाव में गिलानी का कहना है कि पाकिस्तान के राष्ट्रपति को संविधान के तहत छूट हासिल है यानी उनके खिलाफ मुकदमा नहीं चल सकता। इस तरह दोनों देशों-भारत और पाकिस्तान के प्रधानमंत्रियों के सामने नैतिक सवाल खड़ा है। अवमानना के लिए गिलानी की खिंचाई हो सकती है और उन्हें अपना पद गंवाना पड़ सकता है। प्रधानमंत्री कार्यालय की चूक की नैतिक जिम्मेदारी स्वीकार कर मनमोहन सिंह इस्तीफे की पेशकश कर सकते हैं। लोकतंत्र में ये सब सामान्य बातें हैं। फिर भी, भारत में इस संबंध में अंतिम निर्णय तो संसद के निर्वाचित सदस्य ही करेंगे। पाकिस्तान में निर्वाचित नेशनल असेंबली का एक लोकतांत्रिक कोना तो है, लेकिन वास्तविक शक्ति सेना के हाथों में है। हालांकि, पाकिस्तान में एक तीसरी शक्ति के रूप में सुप्रीम कोर्ट का उदय हुआ है। यह संयोग है कि सेना इस सुप्रीम कोर्ट का साथ दे रही है। सेना ने ही गिलानी के मामले को आगे बढ़ाया है। गिलानी ने मेमोगेट से सेना को नाराज कर दिया था। दरअसल, जरदारी सरकार ने सेना की बगावत के खतरे को लेकर अमेरिका से हस्तक्षेप करने का अनुरोध किया था। इस मामले की जांच के लिए सुप्रीम कोर्ट ने जो आयोग बनाया है वह राष्ट्रपति जरदारी या प्रधानमंत्री गिलानी की पसंद नहीं है। सुप्रीम कोर्ट के चीफ जस्टिस इफ्तिखार चौधरी ने बहुत हद तक पाकिस्तान की न्यायपालिका की स्वतंत्रता को फिर से बहाल किया है। लेकिन आज भी सैन्य कोर्ट और यहां तक कि अभियोजन के दौरान असैनिक अधिकारियों के खिलाफ याचिका स्वीकार करने का अधिकार हाइकोर्ट को नहीं है। भारत में इस तरह की समस्या नहीं है, लेकिन भ्रष्टाचार ने तमाम संस्थाओं को अशक्त बना दिया है। सुप्रीम कोर्ट के फैसले से आस बंधती है-भारत में भी और पाकिस्तान में भी। (लेखक प्रख्यात स्तंभकार हैं) 1ी2श्चश्रल्ल2ी@Aंॠ1ंल्ल.Yश्रे
Wednesday, December 28, 2011
निराशा के बीच नई उम्मीदें
कभी धूप, कभी छाया-भारत की कहानी सदा से यही रही है। भारत की प्रतिष्ठा या बदनामी इसी पर निर्भर होती है कि कब कितनी धूप है और कब कितनी छाया। भ्रष्टाचार ने पूरे साल माहौल को धुंधला बनाए रखा। शासकीय अकर्मण्यता ने राष्ट्र को अलग से पीड़ा दी है। 2011 में एक के बाद एक भ्रष्टाचार के कई कंकाल सरकार की अलमारी से बाहर आए। राष्ट्रमंडल खेल सफल रहे, लेकिन ये खेल फर्जी ठेकों, बढ़ा-चढ़ा कर दिखाए गए खर्च और खराब प्रबंधन के कारण बदनाम हो गए। जब राष्ट्रमंडल खेलों के कर्ता-धर्ता सुरेश कलमाड़ी और सहयोगी गिरफ्तार कर लिए गए तो राष्ट्र ने खुद को शर्मिदा महसूस किया। सरकारी अलमारी से निकला एक और कंकाल 2जी स्पेक्ट्रम घोटाला था। एक अनुमान के मुताबिक इसने राजकीय खजाने को, 40 हजार करोड़ का चूना लगाया, जबकि एक अन्य आंकड़ा एक लाख 76 हजार करोड़ का है। इस दौरान एक सकारात्मक घटना भी हुई। गांधीवादी अन्ना हजारे सामने आए। उन्होंने भ्रष्टाचार से निपटने के लिए लोकपाल की संस्था बनाने की मांग की। हजारे वास्तव में सरकार के प्रति सिविल सोसायटी की नाराजगी का प्रतिनिधित्व करते दिखे। लोकपाल की मांग को लेकर हजारों लोग सड़क पर उतर आए। जनता के भारी दबाव और अन्ना के अनशन के कारण संबंधित बिल लाने के लिए संसद का शीतकालीन सत्र बढ़ाना पड़ा। एक नए प्रकार का भारत आकार लेने लगा। लोगों को यह अहसास हो गया कि उनकी आवाज तभी सुनी जाएगी जब वे उसे उठाएंगे। यह देखने लायक था कि कांग्रेस को छोड़कर सभी राजनीतिक पार्टियां एक मंच पर इकट्ठा थीं। दुर्भाग्य से सरकार उस समय सक्रिय हुई जब मामला हाथ से निकल चुका था। उसने अपनी विश्वसनीयता वापस लाने के लिए भी कुछ नहीं किया। शासकीय अकर्मण्यता का असर अर्थव्यवस्था पर पड़ा। कीमतें बढ़ने लगीं और मुद्रास्फीति दो अंकों का आंकड़ा छूने लगी। इससे भी ज्यादा खराब था औद्योगिक उत्पादन में आई गिरावट। देशी और विदेशी, दोनों तरह के निवेशकों ने हाथ खींच लिए और रुपया अमेरिकी डॉलर के मुकाबले 18 प्रतिशत गिर गया। पहले का आशावाद, खासकर लोगों का आत्मविश्वास, कम हो गया और आर्थिक मंदी के भय से लोग आशंकित हो उठे। आर्थिक सुधारों के मसीहा प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह संसद के सामने खुदरा कारोबार (रिटेल) में प्रत्यक्ष विदेशी निवेश का प्रस्ताव लाए। विकास के कामों पर खर्च करने के लिए पैसा जुटाने के लिए पेंशन बिल लाया गया। रिटेल में एफडीआइ के भय का इतना असर हुआ कि राजनीतिक पार्टियां जिनमें कांग्रेस के सहयोगी दल भी थे, इसके विरोध में एक साथ हो गए। यह प्रधानमंत्री के लिए एक और झटका था। उनके प्रति लोगों का विश्वास इसलिए भी हिल गया है, क्योंकि वह विकास दर को पहले की तरह नौ प्रतिशत तक ले जाने में सक्षम नहीं दिख रहे। यह अब 7 प्रतिशत के आसपास घूम रही है। यह विकास दर न्यूनतम है, क्योंकि इससे नीचे आने पर कारखानों में तालाबंदी और भारी बेरोजगारी होगी। कांग्रेस ने अपनी प्रतिष्ठा थोड़ी बचा ली, क्योंकि भाजपा ने पेंशन बिल पर उसका समर्थन किया, लेकिन एफडीआइ पर 26 प्रतिशत की सीमा लगाकर। साल के आखिरी दिनों ने देश के 65 प्रतिशत गरीबों के लिए खाद्य सुरक्षा के उपायों को सामने आते देखा। पीछे की सीट से ड्राइव कर रही कांग्रेस अध्यक्ष सोनिया गांधी ने प्रधानमंत्री को इसे अपनाने के लिए बाध्य किया। हालांकि यह योजना पहले से दबाव झेल रहे राजकोष पर 95 हजार करोड़ का बोझ डालेगी, लेकिन यह यूपी, पंजाब और उत्तराखंड समेत पांच राज्यों के चुनाव में कांग्रेस के लिए वोट जुटा सकती है। मुख्यमंत्री जयललिता के विरोध के बावजूद तमिलनाडु के कुडनकुलम में एक हजार मेगावाट वाले न्यूक्लियर पॉवर प्लांट को खोले जाने की घोषणा में प्रधानमंत्री की देर से आई मजबूती दिखाई देती है। उनका ऐसा ही संकल्प मार्च में खुदरा कारोबार में एफडीआइ लाने की घोषणा में दिखाई दिया था। आर्थिक सुधारों की लॉबी ने अभी तक उम्मीद नहीं छोड़ी है। मनमोहन सिंह सरकार का उजला पक्ष यह है कि उसने पड़ोसी देशों से रिश्ते सुधारे हैं। भारत के साथ समीकरण के महत्व को रेखांकित करने के लिए मनमोहन सिंह ने रूस की यात्रा की और चीन तथा अमेरिका के राष्ट्रपति से मिले। भारत अगले साल संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद का स्थायी सदस्य बनने की उम्मीद कर रहा है, क्योंकि उसे रोकने वाले अकेले देश चीन ने अच्छे संकेत दिए हैं। अगले साल और आने वाले साल दर साल तक भारत के पक्ष में सबसे बड़ी बात यह है कि देश लोकतंत्र और पंथनिरपेक्षता के मूल्यों के लिए प्रतिबद्ध हो रहा है। हिंदू और मुसलमान एक साथ रहना सीख गए हैं। अल्पसंख्यक अपनी बात मजबूती से रख रहे हैं, क्योंकि खुशहाली में उनका हिस्सा अभी भी कम है। सुरक्षा बलों की संयुक्त कमान ने माओवादियों के महत्वपूर्ण नेता किशन को मार गिराया। फिर भी माओवादी अपने संघर्ष से पीछे नहीं हटे हैं, क्योंकि ज्यादातर जगहों पर गरीबी और पिछड़ापन उन्हें आगे बढ़ने में मदद करते हैं। सच है कि अगले साल भारत सात प्रतिशत की विकास दर को ही कायम रख पाएगा, लेकिन गरीबी हटाने के लिए 9 प्रतिशत की विकास दर चाहिए। इसलिए यह साल चुनौती भरा होगा। शायद पहले प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू का यह कथन सच है कि आने वाली पीढि़यों को अधिक मेहनत करनी पड़ेगी। फिर भी, लोगों ने खुद में और देश में जो विश्वास पैदा कर लिया है वह उम्मीद जगाता है कि 2012 में सूरज की रोशनी फैलती जाएगी और अंधेरा छंटता जाएगा। आशावाद हर भारतीय का कर्तव्य है। (लेखक प्रख्यात स्तंभकार हैं)
Friday, November 25, 2011
समाप्त होता हड़ताल का अधिकार
भूमंडलीकरण के दौर में हड़तालें सुनने में नहीं आ रही हैं। एक समय था जब निजी क्षेत्र हो अथवा सार्वजनिक क्षेत्र, हड़ताल होना अथवा तालाबंदी एक सामान्य सी बात थी। 1989 में कुल 1397 हड़तालें हुई और 389 तालाबंदियां हुई इनमें कुल 1364 हजार मजदूर शामिल थे। वर्ष 2008 तक आते-आते मात्र 250 हड़ताल और 182 तालाबंदी की घटनाएं हुई। हड़ताल और तालाबंदी दोनों श्रम विवाद के सूचक हैं। इस तरह क्या यह समझा जा सकता है कि पहले से श्रम विवाद अब कम हो गए हैं अथवा मजदूरों और प्रबंधन के बीच संबंध बहुत मधुर हो गया है। शायद ऐसा कुछ नहीं हुआ है, बल्कि भूमंडलीकरण के वर्तमान दौर में ठेके पर मजदूर रखने की परंपरा शुरू हो गई है। नियमित मजदूर और कामगार अब लगभग नहीं रखे जा रहे। सफाई कर्मचारी हों, गार्ड हों, ड्राईवर अथवा क्लर्क ज्यादातर अब ठेके पर ही रखे जा रहे हैं। विनिर्माण क्षेत्र में अब अधिकतर काम सहायक इकाईयों द्वारा करवा लिया जाता है। लघु उद्यमी ठेके के मजदूरों से ही सब काम करवा लेते हैं। नियमित कर्मचारी जैसे-जैसे रिटायर होते जाते हैं नई भर्तियां ठेके के कामगारों की ही हो रही हैं। ये कामगार सामान्यत: किसी भी प्रकार के श्रम कानूनों के अंतर्गत नहीं आते और इस कारण उनका हड़ताल करते हुए कोई लाभ लेना संभव ही नहीं है। प्रबंधन के साथ किसी भी प्रकार का विवाद उनकी नौकरी ही खत्म कर देता है। हालांकि देश में श्रमिकों के हित की रक्षा के लिए कड़े श्रम कानूनों का प्रावधान है, जिनके अनुसार मजदूरों को भविष्य निधि, ईएसआई और अन्य प्रकार की सुविधाएं देने के नियम हैं, लेकिन यह सभी नियम उन्हीं कामगारों पर लागू होते हैं जो किसी फर्म के नियमित कर्मचारी होते हैं। ठेकेदारों के माध्यम से भाड़े पर लिए कामगारों पर यह नियम लागू नहीं होते। ऐसे में जब देश में विनिर्माण, सेवा क्षेत्र इत्यादि में ठेके पर लिए गए कामगारों का अनुपात लगातार बढ़ता जा रहा है तो कामगारों में असुरक्षा बढ़नी स्वाभाविक है। इसका एक और नुकसान उन्हें विभिन्न प्रकार के शोषण का शिकार होना है। हाल ही में देश की सबसे बड़ी कार कंपनी मारुति में श्रमिकों की हड़ताल खासी चर्चा में रही है। हरियाणा स्थित मारुति के मनेसर संयंत्र में श्रमिकों और प्रबंधन के बीच खासा संघर्ष रहा है। इसके अतिरिक्त मारुति की अन्य इकाईयों में भी श्रमिकों की हड़ताल विशेष रूप से चर्चा में रही। इस हड़ताल के चलते मारुति का उत्पादन और आमदनी तो प्रभावित हो ही रही है, साथ ही साथ मारुति पर बाजार छिनने का भी खतरा मंडरा रहा है। इस हड़ताल की विशेषता यह है कि श्रमिक अधिक मजदूरी के लिए नहीं, बल्कि बर्खास्त श्रमिकों की बहाली और स्वतंत्र श्रमिक संघ को मान्यता देने की मांग को लेकर हड़ताल पर हैं। प्रबंधन और श्रमिकों के बीच में हुआ तथाकथित समझौता भी विवाद का विषय बना हुआ है, क्योंकि इसके माध्यम से प्रबंधन द्वारा श्रमिकों से सही आचरण की शर्त मनवाई गई है। अब श्रमिकों पर यह आरोप लगाया जा रहा है कि वे समझौते का उल्लंघन कर रहे हैं। मारूति प्रबंधन हड़ताली कर्मचारियों के साथ समझौते की बजाय मनेसर संयंत्र को ही कहीं और स्थानांतरित करने की फिराक में हैं। पूर्व में एयर इंडिया के पायलटों की हड़ताल भी काफी चर्चा में रही। उसकी खास बात यह थी कि उनकी मांगों में से एक मांग यह थी कि एयर इंडिया का प्रबंधन ठीक किया जाए और उसमें व्याप्त भ्रष्टाचार समाप्त हो। कुछ समय पहले कैग द्वारा दी गई रिपोर्ट के आधार पर पायलटों का तर्क सही सिद्ध होता है। एयर इंडिया के द्वारा निजी क्षेत्र की विमानन कंपनियों को लाभ पहुंचाने हेतु जानबूझकर लाभकारी मार्गो से अपनी सेवाएं समाप्त करने, बिना आवश्यकता के जानबूझकर विमानों को लीज पर लेने और 44 हजार करोड़ रुपये के नए विमानों की खरीद आदि के निर्णय वास्तव में एयर इंडिया को डुबोने के लिए पर्याप्त कारण रहे हैं। आनन-फानन में पायलटों की हड़ताल तो समाप्त हो गई, लेकिन ये प्रश्न अभी भी बरकरार हैं। एयर इंडिया के पायलटों की अधिकतर मांगों को दरकिनार करते हुए बर्खास्तगी का डर दिखाकर पायलटों की हड़ताल समाप्त करवा दी गई। मारूति के हड़ताल के संदर्भ में हरियाणा सरकार श्रमिक हड़ताल को एक राजनीतिक षड्यंत्र बता रही है। यदि मामले की तह तक जाएं तो पाते हैं कि निजी क्षेत्र में काम करने वाले श्रमिक शोषण और प्रतिकूल कार्य दशाओं के कारण निरंतर कुंठा का शिकार बन रहे हैं। नए प्रकार के क्षेत्रों जैसे बीपीओ, कॉल सेंटर और आईटी के क्षेत्र में कर्मचारियों को यूनियन बनाने का अधिकार भी नहीं है। उसी प्रकार खुदरा क्षेत्र में उतर रही बड़ी कंपनियों वॉलमार्ट आदि में काम करने वाले कर्मचारी यूनियन नहीं बना सकते। देश में किसी भी प्रकार से प्रवेश पाने की इच्छुक दुनिया की सबसे बड़ी खुदरा कंपनी, श्रमिकों के शोषण और यूनियन बनाने का प्रयास करने वालों की प्रताड़ना के लिए विश्व भर में प्रसिद्ध है। देश की बड़ी-बड़ी कंपनियों द्वारा अपने अधिकतम कार्यो की आउटसोर्सिग करवाने के कारण वहां कार्यरत श्रमिकों पर नौकरी छूटने का डर उन्हें अपने हितों के लिए लड़ने से रोकता है। इन सब कारणों से देश में हड़तालें और तालाबंदियां लगभग समाप्ति की ओर है। इस सबसे हम निष्कर्ष निकाल सकते हैं कि वास्तव में देश में हड़तालों और तालाबंदियों के कम होने का कारण यह नहीं है कि श्रमिकों का शोषण नहीं हो रहा है अथवा प्रबंधन श्रमिकों का पूरा ख्याल रख रहा है या नहीं। यह भी कि कार्य दशाएं पहले से कहीं बेहतर हो गई हैं कि नहीं। सच्चाई तो यह है कि केंद्र और राज्य सरकारों तथा उनके द्वारा संचालित संस्थानों में जहां केंद्रीय वेतन आयोग की सिफारिशें लागू होती हैं के अतिरिक्त अर्थव्यवस्था के तमाम दूसरे क्षेत्रों में श्रमिकों को मंहगाई भत्ता तक नसीब नहीं होता है। समय-समय पर की जाने वाली वेतन वृद्धि तथाकथित रूप से कंपनी के नतीजों पर निर्भर करती है। ऐसे में अधिकतर श्रमिक जो ठेकेदारी प्रथा के अंतर्गत काम करते हैं न्यूनतम वेतन भी नहीं पाते हैं। कुछ विशेष प्रकार के कार्यो को छोड़कर शेष श्रमिक नितांत कम वेतन पर काम करने के लिए बाध्य हैं। ऐसे में कंपनियों की जेबें मोटी होती जा रही है और श्रमिकों को जीवन यापन के लिए संघर्ष करना पड़ता है। निजी क्षेत्र की कंपनियां मोटा लाभ कमा रही हैं। वर्ष 1990-91 में जहां केंद्र सरकार के सार्वजनिक क्षेत्र के प्रतिष्ठानों का कर लाभ मात्र 3820 करोड़ रुपये था वर्ष 2009-10 में वह बढ़कर लगभग 1,24,126 करोड़ रुपये पहुंच गया। ऐसे में श्रमिकों के हितों की रक्षा के लिए श्रम कानूनों में बदलाव करते हुए ठेकेदारी प्रथा के माध्यम से काम करवाने को भी कंपनी का कर्मचारी माना जाना चाहिए। यदि ऐसा होता है तो न सिर्फ श्रमिकों का कंपनी के प्रति नजरिया बदलेगा, बल्कि वह अपने काम और कंपनी के उत्पादन में अधिक वफादारी सेकाम करेगा। (लेखक स्वतंत्र टिप्पणीकार हैं)
Subscribe to:
Posts (Atom)