Monday, November 21, 2011

संसद, सरकार और मैक्यावली की शिक्षा

सद के शीतकालीन सत्र शुरू होने के ऐन पहले सरकार ने पेट्रोल के दाम में करीब दो रुपए प्रति लीटर की कमी करने की घोषणा की है। पहली नजर में यह एक शुभ संकेत लग सकता है। आखिरकार, यह फैसला संसद में विपक्ष और यहां तक कि खुद यूपीए में शामिल कुछ सहयोगी दलों की तीखी आलोचना से बचने के लिए ही तो लिया गया है। इससे कुछ लोगों को यह भी लग सकता है कि सरकार, कम से कम संसद के प्रति जवाबदेही की अपनी संवैधानिक जिम्मेदारी के प्रति कुछ संवेदनशीलता तो दिखा रही है। लेकिन वास्तव में इस कदम के पीछे कहीं न कहीं एक शातिराना मंसूबा भी छिपा हुआ है। यह शातिराना खेल, यूपीए-दो सरकार के मैक्यावली की शिक्षा के वफादारी भरे अनुसरण से जुड़ा हुआ है और शासकों के लिए मैक्यावली की यह शिक्षा क्या है- पहले तुम ज्यादा से ज्यादा जितना बुरा कर सकते हो, जनता को दिखाओ और उसके बाद उसमें कुछ सुधार कर दो। लोग इस पर राहत की सांस लेंगे। हालांकि इसका अर्थ यह नहीं है कि मौजूदा सरकार ने जितना बुरा कर के दिखाया है, उससे और बुरा कर ही नहीं सकती थी। असल में इस पूरे खेल का संबंध पेट्रोल की कीमतें बढ़ाने के दस दिन में ही उसमें कमी करने के लिए दी गई सरकार की दलील से है। सरकार की ओर से यह दलील दी जा रही है कि अंतरराष्ट्रीय बाजार में कच्चे तेल के दाम गिर गए हैं, इसलिए पेट्रोल के दाम घटाए गए हैं। लेकिन, सचाई यह है कि 4 नवम्बर को जब पिछली बार पेट्रोल के दाम में करीब दो रुपए की बढ़ोतरी की गई थी, अंतरराष्ट्रीय मानक ब्रेंट में कच्चे तेल का दाम 112.22 डॉलर प्रति बैरल था और 16 नवम्बर को यही दाम 115.61 डॉलर प्रति बैरल चल रहा था। इसी तरह रुपए के मुकाबले डॉलर के मूल्य में सुधार की दलील झूठी है। सचाई यह है कि पिछली बढ़ोतरी के बाद से रुपए के मुकाबले डॉलर कुछ महंगा ही हुआ था। जहां पिछले महीने एक डॉलर का मूल्य 47 रुपए के करीब था, अब 52 रुपए के करीब हो गया है। इससे आयातित तेल का दाम रुपयों में और बढ़ ही जाता है। दरअसल, भारत में पेट्रोलियम उत्पादों की कीमतों का अंतरराष्ट्रीय बाजार में कच्चे तेल की कीमतों में उतार-चढ़ाव से शायद ही कोई सीधा संबंध है। मिसाल के तौर पर 2011 के जनवरी में, जब पेट्रोल की कीमत में 2.5 रुपए प्रति लीटर की बढ़ोतरी की गई थी तो उस समय कच्चे तेल के एक बैरल का दाम 99 डॉलर के करीब चल रहा था। इसी तरह मई में जब पेट्रोल के दाम में 5 रुपए प्रति लीटर की बढ़ोतरी की गई थी, कच्चे तेल का दाम 110 से 115 डॉलर प्रति बैरल के बीच चल रहा था। जुलाई में पेट्रोल के दाम में की गई 33 पैसा प्रति लीटर की बढ़ोतरी को अगर हम छोड़ दें तो सितम्बर में जब पेट्रोल के दाम में 3 रुपए 14 पैसा प्रति लीटर की बढ़ोतरी की गई, कच्चे तेल के दाम 105 से 108 डॉलर प्रति बैरल के बीच ही झूल रहे थे। साफ है कि पेट्रोल की कीमतों में ये बढ़ोतरियां सबसे बढ़कर सरकारी खजाने के लिए अतिरिक्त राजस्व जुटाने के लिए की जा रही थीं और यह सब अगले सलाना बजट की तैयारी में किया जा रहा है, जिसका मुख्य मकसद राजकोषीय घाटे में कमी करना है। जबकि दूसरी तरफ अगर निजी कंपनियों तथा संपन्नों को दी गई विशाल कर रियायतें ही वापस ले ली जाएं तो समूचा राजकोषीय घाटा खुद ही गायब हो जाएगा। यूपीए-दो सरकार ने तेल क्षेत्र को, जनता की कीमत पर राजस्व बटोरने के लिए एक दुधारू गाय बनाकर रख दिया है। इस प्रक्रिया में वह हर तरफ से मुद्रास्फीति की आग में तेल ही छिड़कती रही है। इसलिए, स्वाभाविक है कि संसद का शीत सत्र हंगामेदार होने जा रहा है। महंगाई के अलावा, भ्रष्टाचार के मुद्दे पर भी इस सत्र में सरकार और विपक्ष के बीच जोरदार टकराव की नौबत आ सकती है। वामपंथी पार्टियां, सभी आवश्यक वस्तुओं की कीमतों में लगातार जारी बढ़ोतरी के जरिए, जनता पर डाले जा रहे अभूतपूर्व अतिरिक्त बोझ का मुद्दा जोर-शोर से उठाएंगी। महंगाई पर अंकुश लगाने के सरकार के सारे दावों का सच तो यही है कि खाद्य मुद्रास्फीति इस समय 12 फीसद के करीब चल रही है। सब्जी-भाजियों के दाम 26 फीसद ऊपर चल रहे हैं, तो दालों के 14 फीसद। फलों के दाम 12 फीसद ऊपर हैं, तो अंडा, मछली, मांस के दाम 13 फीसद ऊपर और दूध के दाम 12 फीसद ऊपर। दूसरे शब्दों में आम आदमी के रोजमर्रा के गुजारे पर ही भारी हमला हो रहा है। जहां तक उच्च पदों पर व्याप्त भ्रष्टाचार का सवाल है, संसद की स्थायी समिति लोकपाल तथा लोकायुक्तों से संबंधित विधेयक पर विचार कर रही है। बेशक, हमें संसदीय स्थायी समिति की सिफारिशों की प्रतीक्षा रहेगी। बहरहाल, इसी भ्रष्टाचार के कुछ भीमकाय घोटालों की जांच विभिन्न सत्ताओं द्वारा की जा रही है और इनमें से कुछ मामलों में तो सीधे सुप्रीम कोर्ट की निगरानी में जांच की जा रही है। 2जी स्पेक्ट्रम घोटाले की जांच संसद की लोकलेखा समिति और संयुक्त संसदीय समिति द्वारा जारी है। इनके अलावा हमारे देश में पेंशन के क्षेत्र में 26 फीसद प्रत्यक्ष विदेशी निवेश की इजाजत देने के कैबिनेट के फैसले और खुदरा व्यापार में प्रत्यक्ष विदेशी निवेश की इजाजत जैसे इसी रास्ते पर बढ़े दूसरे कदमों का भी सवाल है। अगर पेंशन क्षेत्र संबंधी फैसले को संसद का अनुमोदन हासिल हो गया, तो इस समय पेंशन फंड में मौजूद लगभग 12 अरब डॉलर की परिसंत्तियों तक अंतरराष्ट्रीय वित्तीय पूंजी के हाथ पहुंच जाएंगे। यूपीए-एक ने 2005 में पेंशन फंड नियामक व विकास प्राधिकार विधेयक-2005 तैयार किया था। लेकिन वामपंथी पार्टियों के विरोध के चलते, जिनका समर्थन सरकार के बने रहने के लिए जरूरी था, उस विधेयक का किसी को अता-पता ही नहीं चला। इसी तरह वामपंथ के विरोध के चलते बैंकिंग व बीमा के क्षेत्रों में प्रस्तावित उदारवादी सुधार करने के सरकार के मंसूबे पूरे नहीं हो पाए। सचाई यह है कि वामपंथ की इसी भूमिका का फल था कि 2008 में आए विव्यापी वित्तीय संकट से भारत अपेक्षाकृत बचा रह गया। बहरहाल, अब यूपीए-दो की सरकार पेंशन फंड विधेयक संसद से पारित कराना चाहती है और भाजपा के तत्पर व मुखर समर्थन से इस कोशिश में कामयाब हो सकती है। अगर ऐसा होता है तो हमारे देश के करोड़ों पेंशनभोगी कर्मचारी, जो अब तक वि वित्तीय उथल-पुथल से सुरक्षित बने रहे थे। हमें यह समझना होगा कि एक उदीयमान अर्थव्यवस्था के नाम पर विकसित दुनिया द्वारा की जा रही मांगों ने भारत से विनाशकारी रास्ते पर बढ़ने का दबाव बढ़ा दिया है। अंतरराष्ट्रीय वित्तीय निगमों की भारत से अनाप-शनाप सट्टे बाजाराना मुनाफे बटोरने की लुटेरी भूख इस दबाव के पीछे है। सरकार को इस आत्मघाती रास्ते पर बढ़ने से रोकना ही होगा।

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