Monday, November 21, 2011

भिखारियों के भार से दबती दिल्ली


दिल्ली में भिखारी और बढ़ गए हैं। सरकारी आंकड़ों पर यदि भरोसा करें तो इस समय दिल्ली में साठ हजार से अधिक भिखारी सक्रिय हैं। इनमें से कोई 30 फीसद 18 साल से कम आयु के हैं। इनमें 69.94 प्रतिशत पुरुष और 30.06 फीसद महिलाएं हैं। वैसे एक स्वयंसेवी संस्था के मुताबिक इन दिनों दिल्ली में एक लाख से अधिक लोगों का पेशाभीख मांगना है जिसे अक्तूबर आते-आते दुगना होने की आशंका है। संबद्ध विभागों की निष्क्रियता, संसाधनों के अभाव और भीख मांगने के काम को संगठित व माफिया के हाथों जाने के कारण दिल्ली में यह अभिशाप दिन-दुगनी, रात-चौगुनी प्रगति कर रहा है। यह खतरे की घंटी भी है और विडंबना भी कि दिल्ली में मजबूरी या अपनी मर्जी से भीख मांगने वाले बहुत कम ही हैं। अधिकांश भिखारी अपने आकाओं के इशारे पर यह काम करते हैं। मंगलवार को हनुमान मंदिर या जुम्मे के दिन जामा मस्जिद या फिर रविवार को गोल डाकखाने के गिरजाघर के सामने भिखारियों को छोड़ने और लेने के लिए बाकायदा बड़े वाहन आते हैं। सीलमपुर, त्रिलोकपुरी, सीमापुरी, कल्याणपुरी जैसी कई अनाधिकृत बस्तियों में बच्चों को भीख मांगने का बाकायदा प्रशिक्षण दिया जाता है। विकलांग, दुधमुंहे बच्चे, कुष्ठरोगी आदि विशेष मांग पर सप्लाईकिए जाते हैं। वैसे तो भीख मांगने को सरकार ने कानूनन गुनाह घोषित कर रखा है, लेकिन अभी तक माना जाता रहा था कि यह एक सामाजिक समस्या है और इसे कानून के डंडे से ठीक नहीं किया जा सकता। बीते कुछ सालों में दिल्ली में जिस तरह से रोजगार के अवसर पैदा हुए, उसके बावजूद लोगों द्वारा सरेआम हाथ फैलाने को समाजशास्त्री बहुत हद तक नजरअंदाज करते रहे और अब हालात यह है कि भिखारी कानून-व्यवस्था के लिए चुनौती बन गए हैं। दिल्ली के धार्मिक स्थलों के अलावा दक्षिणी दिल्ली की लगभग सभी लाल बत्तियों पर भिखारियों का कब्जा है। कुछ विकलांग हैं, कुछ औरतें है- जो खुद को गर्भवती या बच्चे के लिए दूध या फिर किसी अस्पताल का पर्चा दिखा कर पैसे मांगती हैं। नट के करतब या फिर गाना गा कर भीख मांगने के काम में बच्चों की बड़ी संख्या शामिल हैं। हाथ में भगवान के फोटो ले कर रिरियाने से धर्मप्राण जनता न चाहते हुए भी मना नहीं कर पाती। प्रशासन की बेबसी की बानगी है कि संसद भवन से कुछ ही दूरी पर गुरुद्वारा बंगला साहिब के पीछे तो पूरे फुटपाथ पर भिखारियों का कब्जा है। ये भिखारी स्मैक बेचते भी पकड़े जाते रहे हैं। जबकि ठीक सामने कनाट प्लेस थाना है और पुलिस वाले वहां से मुंह फेर कर निकल जाते हैं। दिल्ली का समाज कल्याण विभाग भी इन भिखारियों के सामने अपनी मजबूरी का रोना रोता है। अगस्त 2009 में दिल्ली में 1518 भिखारी पकड़े गए। इनमें से 1099 दूसरे राज्यों के थे। दिल्ली सरकार ने लाख लिखा-पढ़ी की, लेकिन कोई भी राज्य इन भिखारियों को वापस लेने को राजी नहीं हुआ। भिखारियों से निबटने के लिए दिल्ली के पास अपना कोई कानून नहीं है और यहां पर द बांबे प्रिवेंशन आफ बेगर्स एक्ट-1969’ के तहत ही कार्रवाई की जाती है। राज्य के समाज कल्याण महकमे के पास महज 12 मोबाइल कोर्ट हैं। इनमें समाज कल्याण विभाग के अलावा पुलिस वाले होते हैं। उम्मीद की जाती है कि ये दस्ते हर रोज भीड़-भाड़ वाली जगहों, धार्मिक स्थलों आदि पर छापामारी कर भिखारियों को पकड़ें। पकड़े गए भिखारियों को किंग्सवे कैंप स्थित अदालत में पेश किया जाता है। अपराध साबित होने पर एक से तीन साल की सजा हो जाती है। गौर करने लायक बात है कि पकड़े गए भिखारियों को रखने के लिए दिल्ली में 11 आश्रय स्थल हैं, जिनकी क्षमता महज 2018 है। एक तरफ भिखारियों की इतनी बड़ी संख्या और दूसरी ओर उन्हें रखने के लिए इतनी कम जगह। तभी ये आश्रय स्थल भिखारियों को शातिर अपराधी और ढीठ बना रहे हैं। कहा जाता है कि इन आश्रय गृहों में भिखारियों को कई काम सिखाए जाते हैं, जिससे वे बाहर जा कर अपना जीवनयापन सम्मानजनक तरीके से कर पाएं। लेकिन हकीकत में सभी ट्रेनिंग सेंटर महज कागजों पर हैं और आश्रय गृहों की गंदगी, काहिली और अराजकता उन्हें एक अच्छे भिखारीसे ज्यादा कुछ नहीं बना पाती है। सरकार को देश की आर्थिक प्रगति के मद्देनजर इस समस्या को गंभीरता से देखना होगा। ये अकर्मण्य लोग राष्ट्र की मुख्य धारा व विकास की गति से अलग-थलग हैं और इनके कारण गरीबी उन्मूलन की कई योजनाएं भ्रष्टाचार की भेंट चढ़ जाती हैं। असल में भिखारीपन की वजह को तलाशना जरूरी है। हम अभी भी सन् 1969 के कानून के बदौलत इस सामाजिक अपराध से जूझने के असफल प्रयास कर रहे हैं, जबकि इन चालीस सालों में देश की आर्थिक्-सामाजिक तस्वीर बहुत बदल गई है। भिखारी की परिभाषा अलग-अलग राज्यों में अलग-अलग हैं। कहीं पर नट, मदारी आदि को पारंपरिक कला का संरक्षक कहा जाता है तो कोई राज्य इन्हें भिखारी मानता है। भूमंडलीकरण के दौर में भारत के आर्थिक सशक्तीकरण का मूल आधार यहां का सशक्त मानव संसाधन है और ऐसे में लाखों हाथों का बगैर काम किए दूसरों के सामने फैलना देश की छवि को धूमिल कर रहा हैं।

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