Saturday, November 12, 2011

ऐसे हादसों से कब लेंगे सबक

हरिद्वार में गायत्री परिवार के संस्थापक श्रीराम शर्मा आचार्य के जन्मशती समारोह के दौरान मची भगदड़ में बीस से ज्यादा लोगों की मौत ने एक बार फिर आयोजकों और सरकारी व्यवस्था की पोल खोल कर रख दी। देश-विदेश में गायत्री परिवार से जुड़े लाखों श्रद्धालु हैं और उसके हर आयोजन में बहुत भीड़ उमड़ती है। इस बार आचार्य की जन्मशती का आयोजन बड़े पैमाने पर मनाया जाना था अत: भारी भीड़ उमड़ना तय माना जा रहा था। कहा जा रहा है कि देशिवदेश के करीब दो लाख से अधिक श्रद्धालु जमा थे। हर धार्मिक समारोहों की तरह इस समारोह में भी महिलाओं की भागीदारी सर्वाधिक थी। नतीजतन मरने वालों में सर्वाधिक महिलाएं ही रहीं। हादसे की वजह हवनकुंड तक पहुंचने की जल्दबाजी बतायी जा रही है। कुछ कह रहे हैं कि हवनकुंड के वाले धुएं के कारण हादसा हुआ। हालांकि आयोजकों का दावा है कि कार्यक्रम बेहद अनुशासित ढंग से चल रहा था और सुरक्षा के पुख्ता इंतजाम थे। सीसीटीवी कैमरे लगे थे और पुलिस-प्रशासन के अलावा बड़ी संख्या में गायत्री परिवार के स्वयंसेवक भी मुस्तैदी से लोगों की सेवा में जुटे थे। फिर सवाल उठना स्वाभाविक है कि हादसे को क्यों नहीं रोका जा सका? यह बात भी छनकर आ रही है कि सुरक्षा का फोकस भक्तजनों और श्रद्धालुओं से कहीं ज्यादा माननीयों पर केंद्रित था। अब तो जांच के बाद ही पता चलेगा कि किन कारणों से हादसा हुआ और इसके लिए कौन जिम्मेदार है लेकिन यह तय है कि छोटी-छोटी चूक से भीषण हादसे हो जाते हैं जबकि प्रशासनिक सूझबूझ से इन्हें टाला जा सकता है। लेकिन बिडम्बना है कि कई- कई बार के हादसों के बावजूद न सरकारें सबक लेती दिखती हैं और न आयोजकगण। इसी साल जनवरी में मकर संक्राति के पावन पर्व पर इडुक्की (केरल) के शबरीमाला मंदिर से लौट रहे श्रद्धालुओं की भगदड़ में सौ से ज्यादा लोगों की जानें चली गयी थी और अनेक घायल हुए थे। 1999 में भी मकर संक्रांति के दिन इस मंदिर में भगदड़ मची थी जिसमें कई लोग लोग मारे गए थे। उप्र के प्रतापगढ़ के निकट स्थित कृपालु महाराज के आश्रम में मची भगदड़ में भी अनेक लोग मारे गये थे। 2008 में हिमाचल प्रदेश के विलासपुर स्थित नैना देवी के मंदिर मार्ग 162 लोगों की जानें गयी। कुंभ के आयोजन में भी ऐसे हादसे होते रहे हैं। इस मामले में सबसे बड़ा सवाल आयोजकों के उत्तरदायित्वों और जिम्मेदारियों को लेकर है। आज देश के पावन कहे जाने वाले अधिकांश मंदिर और तीर्थस्थल स्थानीय प्रबंधन और सरकार की बदइंतजामी का शिकार हैं। भारत धर्म प्रधान देश है जहां विभिन्न धर्म और संप्रदाय के लोग रहते है। यहां सभी धर्मों के आस्था केंद्र हैं, जहां खास मौकों या पवरे पर हजारों-लाखों लोगों की भीड़ उमड़ती है। लेकिन आयोजकों की बदइंतजामी के कारण हादसे हो जाते हैं। विडम्बना यह कि हादसों के बाद भी लापरवाही चरम पर देखने को मिलती है। घायलों के इलाज के लिए न अपेक्षित डॉक्टरी सुविधा उपलब्ध होती है और न ही उनको समय से अस्पताल पहुंचाया जाता है। यह भी गौरतलब है कि मंदिरों, तीर्थस्थलों और धार्मिक समारोहों में अब पहले से ज्यादा भीड़ उमड़ती है लेकिन उस लिहाज से सुरक्षा का बेहतर इंतजाम नहीं किया जा रहा है। इसी का दुष्परिणाम है कि भीषण हादसे रुक नहीं रहे हैं। 14 अप्रैल 1986 में हरिद्वार कुंभ मेले में हर की पैड़ी के ऊपर कांगड़ा पुल पर मुख्य स्नान के दिन भगदड़ से करीब 52 लोगों की मौत हुई जबकि पुलिस- प्रशासन की सतर्कता से इस भीड़ को रोका जा सकता था। तीन फरवरी 1954 को इलाहाबाद कुंभ मेले में भगदड़ मचने से लगभग कई सौ जानें गयी थीं। कौन नहीं जानता है कि कुंभ सनातनधर्मियों एक विव्यापी आयोजन है जिसमें देश-विदेश से लाखों श्रद्धालु पुण्य अर्जित करने गंगा तट पर जमे रहते हैं। लेकिन उस हिसाब से व्यवस्था भी तो चाक-चौंबद होनी चाहिए। लेकिन तमाम दावों के बावजूद पोल खुल ही जाती है। गौर से देखा जाए तो ये हादसे छोटी-छोटी गलतियों के कारण घटित होते हैं। जरा सी सतर्कता से इन पर काबू पाया जा सकता है लेकिन इस पर ध्यान नहीं जाता। तमाम हादसों के कारणों की तहकीकात की जाए तो मुख्य रूप से सरकार और आयोजकों की घोर लापरवाही ही मुख्य वजह बनती है। अगर सरकारी अमला, मंदिर प्रबंधन और धार्मिक कार्यक्रम के आयोजक व्यवस्था को लेकर सतर्क रहें तो हादसों को टाला जा सकता है। लेकिन दुखद बात यह है कि हादसों से सबक लेने के बजाए उस पर मिट्टी डालने का प्रयास किया जाता है। जांच बैठाकर कर्त्तव्यों की इतिश्री समझ ली जाती है। आज जरूरत इस बात की है कि धार्मिक आयोजनों, मेले या अन्य समारोहों का आयोजन करने से पहले उसकी सुरक्षा व्यवस्था चाक-चौबंद कर ली जाए अन्यथा इस तरह के हादसे होते ही रहेंगे।

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