विकास पर भारी भूख और कुपोषण
योजना आयोग से जुड़े ‘इंस्टीट्यूट ऑफ एप्लायड मैनपावर रिसर्च’ की हाल में जारी मानव विकास रिपोर्ट के मुताबिक देश में मानव विकास सूचकांक 2011 में 1999-2008 के बीच 21 फीसद की वृद्धि हुई है। यह अच्छी खबर है। पर रिपोर्ट में सबसे ज्यादा चौंकाने वाली बात गुजरात के बारे में कही गयी है कि औद्योगिक रूप से विकसित इस राज्य में भूख और कुपोषण की समस्या सबसे अधिक है। उसमें भी अनुसूचित जाति और जनजाति की महिलाएं सबसे ज्यादा कुपोषित हैं। सूचकांक में गुजरात की स्थिति देश के कई छोटे राज्यों से भी खराब है। केरल, हिमाचल प्रदेश, गोवा, जम्मू-कश्मीर और पूवोत्तर राज्यों की स्थिति गुजरात से बेहतर बतायी गई है। यह हमारे देश के उस राज्य की तस्वीर है, जिसका डंका विकास के नाम पर दुनिया भर में बज रहा है कि निवेश के लिए इससे बेहतर कोई दूसरा राज्य नहीं है। अमेरिकी कांग्रेस ने हाल में जारी एक रिपोर्ट में गुजरात के आर्थिक विकास के मॉडल की खूब सराहना की थी। ऐसे में यह जमीनी हकीकत नरेन्द्र मोदी शायद ही सुनना पंसद करें कि उनके विकसित गुजरात में कुपोषितों की तादाद यूपी और ओडिशा जैसे पिछड़े माने जाने वाले राज्यों से ज्यादा है। भूख सूचकांक में भी उसकी हालत यूपी, बंगाल और ओडिशा से खराब है। भूख को लेकर 17 राज्यों में हुए सव्रेक्षण में गुजरात 13वें स्थान पर रहा। कहने का आशय यही है कि केवल आर्थिक विकास से कोई राज्य खुशहाल नहीं हो सकता। भलें ही आज गुजरात औद्योगिक रूप से सम्पन्न राज्य है, पर गरीबों के पेट भरने का इंतजाम करने में व ह यूपी और ओडिशा से भी पीछे है। योजना आयोग की मानव विकास रिपोर्ट ने जाहिर कर दिया है कि गुजरात के विकास का लाभ केवल उद्योग को ही हो रहा है। राज्य में पांच साल की उम्र के 63.7 फीसद बच्चे रक्ताल्पता का शिकार हैं और 44.6 फीसद कुपोषण की मार झेल रहे हैं। यानी पर्याप्त आर्थिक तरक्की के बावजूद पोषण के मामले में वह पीछे छूट गया हैं। सव्रेक्षण के मुताबिक गुजरात, तमिलनाडु, महाराष्ट्र और कर्नाटक में गरीबों की हालत बेहद खराब है। वैिक स्तर पर देखें तो भारत में कुपोषण उससे अधिक गरीब और कम विकसित बांग्लादेश और नेपाल से भी अधिक है। बांग्लादेश में शिशु मृत्युदर 48 प्रति हजार है जबकि भारत में यह 67 प्रति हजार है। यह आंकड़ा उप सहारा अफ्रीकी देशों से भी अधिक है। भारत में कुपोषण दर लगभग 55 प्रतिशत है जबकि अफ्रीका में यह 27 फीसद है। सेव द चिल्ड्रेन रिपोर्ट के अनुसार भारत में रोजना पांच हजार से अधिक बच्चे कुपोषण के चलते मर जाते हैं। देश में हर साल 25 लाख शिशुओं की अकाल मृत्यु होती है तथा 42 फीसद गंभीर कुपोषण का शिकार होते हैं। एक अनुमान के मुताबिक दुनिया में 14,600 बच्चे रोज मर जाते हैं। मतलब वि में कुल मरने वाले बच्चों में एक तिहाई भारत के हैं। यह अलग बात है कि यहां अनाज गोदामों में सड़ जाता है या उसके भंडारण की उचित व्यवस्था नहीं है। बहरहाल 2001 में उच्चतम न्यायालय ने भूख और कुपोषण से लड़ाई के लिए 60 दिशा-निर्देश दिए थे। एक दशक होने वाला है, पर सरकार न्यायालय के दिशा निर्देशों के पालन में नाकाम रही है। नेशनल फैमिली हेल्थ यानी राष्ट्रीय परिवार स्वास्थ्य सव्रेक्षण के तीसरे दौर के आकलन के अनुसार आवश्यक पौष्टिक खुराक न मिलने के कारण भारत में 50 लाख बच्चे प्रति वर्ष मर जाते हैं यानी प्रति छह सेकेंड में एक बच्चा इस कारण दम तोड़ देता है। वि बैंक की रिपोर्ट भी कहती है कि बच्चों की कुल मृत्यु में से आधी केवल आवश्यक न्यूनतम भोजन न मिलने के कारण होती है। मलेरिया, डायरिया, और निमोनिया से होने वाली बाल मृत्यु की घटनाओं के लिए कुपोषण की स्थिति 50 फीसद से भी ज्यादा जिम्मेदार है। वहीं दूसरी तरफ, बच्चों को मिलने वाले भोजन और पोषण को लेकर भी गंभीर चिंता व्यक्त की गई है। इस निमित्त सरकार द्वारा जारी एकीकृत बाल विकास कार्यक्रम व मिड डे मील जैसी योजनाओं के भी संतोषजनक परिणाम नहीं आ रहे हैं। इसीलिए रिपोर्ट में आईसीडीएस को नया रूप देने की सिफारिश की गई है। क्योंकि कुपोषण के कारण दुनिया में भारत की छवि खराब होती जा रही है। कुपोषण के निदान हेतु घरेलू खाद्य सुरक्षा सुनिश्चित करनी होगी। हम ब्राजील से सीख ले सकते हैं जहां भूख और कुपोषण ‘राष्ट्रीय लज्जा’ माना जाता है। इसके लिए एक मजबूत जन समर्पण और पहल जरूरी है।
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