| उत्तर प्रदेश विधानसभा में पारित चार राज्यों के प्रस्ताव ने बुंदेलखंड इलाके के लोगों में दशकों पुरानी मांग पूरा होने की उम्मीद जगा दी है। हालांकि महज छह जिलों, 22 विधानसभा सीटों और एक करोड़ से भी कम आबादी के उत्तर प्रदेश के बुदेलखंड का अलग राज्य बनना तब तक संभव नहीं होगा, जब तक मध्यप्रदेश के बुंदेलखंड को भी इसमें मिलाने की प्रक्रिया प्रारंभ न हो। प्राकृतिक संपदा के मामले में संपन्न बुंदेलखंड क्षेत्र में बारिश बहुत कम होती है और यह सरकारी उपेक्षा का शिकार रहा है। यहां दो साल में एक बार जब भी सूखा पड़ता है, सरकारें राहत का मलहम लगाने लगती हैं, लेकिन बुद्धिजीवियों, राजनीतिज्ञों और आम लोगों का बड़ा वर्ग मान चुका है कि अलग राज्य के अलावा कोई विकल्प नहीं है। दो साल पहले कांग्रेस महासचिव राहुल गांधी और उसके बाद उप्र की मुख्यमंत्री मायावती सूखाग्रस्त बुंदेलखंड का दर्द जानने गए और दोनों ने ही अलग राज्य की मांग का समर्थन किया था। इससे पहले गंगाचरण राजपूत, राजा बुंदेला, सत्यव्रत चतुव्रेदी सहित कई कांग्रेसी आंदोलन की अगुवाई करते रहे हैं। अटलबिहारी वाजपेयी के प्रधानमंत्रित्व काल में बुंदेलखंड की सभी लोकसभा सीटों पर भाजपा काबिज थी। अपने घोषणा पत्र और जन सभाओं में भाजपा नेता पृथक राज्य की मांग उठाते रहे लेकिन सत्ता संभालने के बाद सब भूल गए। बहरहाल इतने व्यापक राजनीतिक समर्थन के बावजूद अलग राज्य की मांग में कोई प्रगति न होना स्पष्ट दर्शाता है कि राजनीतिज्ञों का असल मकसद बुंदेलखंड के नाम पर महज सियासत करना है। अलग राज्य की मांग को लेकर 1942 से चल रहा आंदोलन कुछ साल पहले उग्र हो गया था और बुंदेलखंड मुक्ति मोर्चा के संयोजक शंकरलाल मेहरोत्रा और अन्य चार लोग राष्ट्रीय सुरक्षा कानून के तहत महीनों जेल में रहे। मेहरोत्रा के असामयिक निधन के बाद अभिनेता व कांग्रेसी नेता राजा बुंदेला आंदोलन की कमान संभाले हैं। मौदहा के विधायक बादशाह सिंह का संगठन भी अलग राज्य की राजनीति करता है। भारत के नक्शे के ठीक मध्य में स्थित बुंदेलखंड का क्षेत्र यमुना, नर्मदा, चंबल और टौंस नदियों के बीच लगभग 400 किलोमीटर पूर्व से पश्चिम और इतना ही उत्तर से दक्षिण वर्गाकार फैला है । लगभग 1.60 लाख वर्ग किमी क्षेत्रफल वाले इस भू-भाग की भाषा, संस्कृति, आचार-विचार में एकरूपता के बावजूद यह दो राज्यों (उप्र और मप्र) में विभाजित हैं। ऐतिहासिक साक्ष्यों के अनुसार सन 200-500 ईस्वी में इस क्षेत्र की पहचान अलग राज्य के रूप में रही है और यह स्वरूप चंदेलों (सन 831- 1203 ई) और उसके बाद बुंदेलों, व अंग्रेजों के शासनकाल तक बरकरार रहा। बुंदेला शासकों के दौरान यह बुंदेलखंड कहलाया। स्वतंत्रता से पहले बुंदेलखंड राज्य बनाया गया और उसकी राजधानी नौगांव बनी लेकिन दो महीने बाद ही इसका विभाजन विंध्यप्रदेश के रूप में हो गया था । 1942 में प्रसिद्ध साहित्कार व संपादक पं. बनारसीदास चतुव्रेदी ने टीकमगढ़ रियासत के महाराज वीर सिंह देव के सहयोग से पृथक राज्य का आंदोलन शुरू किया था। देश के पहले गृह मंत्री सरदार वल्लभभाई पटेल ने अनेक रियासतें मिला अलग बुंदेलखंड राज्य की परिकल्पना प्रस्तुत की थी, लेकिन तत्कालीन केंद्र सरकार नहीं मानी। 1948 में जवाहरलाल नेहरू, विट्ठल भाई पटेल व पट्टाभि सीतारामैय्या की अगुआई में गठित जेवीपी आयोग ने बुंदेलखंड का पृथक अस्तित्व नहीं स्वीकारा लेकिन 1955 में राज्य पुनर्गठन आयोग के प्रमुख केएम पणिक्कर ने इसके औचित्य का समर्थन किया। बुंदेलखंड के पन्ना में हीरे की खदानें हैं, यहां का ग्रेनाइट जग विख्यात है। यहां गोरा पत्थर, सीमेंट पत्थर, रेत-बजरी के भंडार हैं। तालाबों की मछलियां कोलकाता के बाजार में बिकती हैं। जंगलों में मिलने वाला तेंदू पत्ता हरा सोना कहा जाता है। खजुराहो, झांसी, ओरछा जैसे स्थल सालभर पर्यटकों को आकषिर्त करते हैं। अनुमान है कि दोनों राज्यों के बुंदेलखंड मिला कर कोई एक हजार करोड़ की आय सरकार के खाते में जमा कराते हैं, लेकिन इलाके के विकास पर इसका दस फीसद भी खर्च नहीं होता। सवाल उठ रहा है कि नए राज्यों के गठन का आधार क्या हो? पुरानी मांग या भौगोलिक संरचना या क्षेत्रों का पिछड़ापन या छोटे राज्यों का सिद्धांत। देखा जाए तो इस रूप में बुंदेलखंड राज्य की मांग का आधार सशक्त है। बहरहाल मध्यप्रदेश सरकार की चुप्पी बुंदेलखंड को सुलगा रही है। |
Friday, November 25, 2011
कब बहुरेंगे दिन बुंदेलखंड के
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