Friday, November 25, 2011

समाप्त होता हड़ताल का अधिकार


भूमंडलीकरण के दौर में हड़तालें सुनने में नहीं आ रही हैं। एक समय था जब निजी क्षेत्र हो अथवा सार्वजनिक क्षेत्र, हड़ताल होना अथवा तालाबंदी एक सामान्य सी बात थी। 1989 में कुल 1397 हड़तालें हुई और 389 तालाबंदियां हुई इनमें कुल 1364 हजार मजदूर शामिल थे। वर्ष 2008 तक आते-आते मात्र 250 हड़ताल और 182 तालाबंदी की घटनाएं हुई। हड़ताल और तालाबंदी दोनों श्रम विवाद के सूचक हैं। इस तरह क्या यह समझा जा सकता है कि पहले से श्रम विवाद अब कम हो गए हैं अथवा मजदूरों और प्रबंधन के बीच संबंध बहुत मधुर हो गया है। शायद ऐसा कुछ नहीं हुआ है, बल्कि भूमंडलीकरण के वर्तमान दौर में ठेके पर मजदूर रखने की परंपरा शुरू हो गई है। नियमित मजदूर और कामगार अब लगभग नहीं रखे जा रहे। सफाई कर्मचारी हों, गार्ड हों, ड्राईवर अथवा क्लर्क ज्यादातर अब ठेके पर ही रखे जा रहे हैं। विनिर्माण क्षेत्र में अब अधिकतर काम सहायक इकाईयों द्वारा करवा लिया जाता है। लघु उद्यमी ठेके के मजदूरों से ही सब काम करवा लेते हैं। नियमित कर्मचारी जैसे-जैसे रिटायर होते जाते हैं नई भर्तियां ठेके के कामगारों की ही हो रही हैं। ये कामगार सामान्यत: किसी भी प्रकार के श्रम कानूनों के अंतर्गत नहीं आते और इस कारण उनका हड़ताल करते हुए कोई लाभ लेना संभव ही नहीं है। प्रबंधन के साथ किसी भी प्रकार का विवाद उनकी नौकरी ही खत्म कर देता है। हालांकि देश में श्रमिकों के हित की रक्षा के लिए कड़े श्रम कानूनों का प्रावधान है, जिनके अनुसार मजदूरों को भविष्य निधि, ईएसआई और अन्य प्रकार की सुविधाएं देने के नियम हैं, लेकिन यह सभी नियम उन्हीं कामगारों पर लागू होते हैं जो किसी फर्म के नियमित कर्मचारी होते हैं। ठेकेदारों के माध्यम से भाड़े पर लिए कामगारों पर यह नियम लागू नहीं होते। ऐसे में जब देश में विनिर्माण, सेवा क्षेत्र इत्यादि में ठेके पर लिए गए कामगारों का अनुपात लगातार बढ़ता जा रहा है तो कामगारों में असुरक्षा बढ़नी स्वाभाविक है। इसका एक और नुकसान उन्हें विभिन्न प्रकार के शोषण का शिकार होना है। हाल ही में देश की सबसे बड़ी कार कंपनी मारुति में श्रमिकों की हड़ताल खासी चर्चा में रही है। हरियाणा स्थित मारुति के मनेसर संयंत्र में श्रमिकों और प्रबंधन के बीच खासा संघर्ष रहा है। इसके अतिरिक्त मारुति की अन्य इकाईयों में भी श्रमिकों की हड़ताल विशेष रूप से चर्चा में रही। इस हड़ताल के चलते मारुति का उत्पादन और आमदनी तो प्रभावित हो ही रही है, साथ ही साथ मारुति पर बाजार छिनने का भी खतरा मंडरा रहा है। इस हड़ताल की विशेषता यह है कि श्रमिक अधिक मजदूरी के लिए नहीं, बल्कि बर्खास्त श्रमिकों की बहाली और स्वतंत्र श्रमिक संघ को मान्यता देने की मांग को लेकर हड़ताल पर हैं। प्रबंधन और श्रमिकों के बीच में हुआ तथाकथित समझौता भी विवाद का विषय बना हुआ है, क्योंकि इसके माध्यम से प्रबंधन द्वारा श्रमिकों से सही आचरण की शर्त मनवाई गई है। अब श्रमिकों पर यह आरोप लगाया जा रहा है कि वे समझौते का उल्लंघन कर रहे हैं। मारूति प्रबंधन हड़ताली कर्मचारियों के साथ समझौते की बजाय मनेसर संयंत्र को ही कहीं और स्थानांतरित करने की फिराक में हैं। पूर्व में एयर इंडिया के पायलटों की हड़ताल भी काफी चर्चा में रही। उसकी खास बात यह थी कि उनकी मांगों में से एक मांग यह थी कि एयर इंडिया का प्रबंधन ठीक किया जाए और उसमें व्याप्त भ्रष्टाचार समाप्त हो। कुछ समय पहले कैग द्वारा दी गई रिपोर्ट के आधार पर पायलटों का तर्क सही सिद्ध होता है। एयर इंडिया के द्वारा निजी क्षेत्र की विमानन कंपनियों को लाभ पहुंचाने हेतु जानबूझकर लाभकारी मार्गो से अपनी सेवाएं समाप्त करने, बिना आवश्यकता के जानबूझकर विमानों को लीज पर लेने और 44 हजार करोड़ रुपये के नए विमानों की खरीद आदि के निर्णय वास्तव में एयर इंडिया को डुबोने के लिए पर्याप्त कारण रहे हैं। आनन-फानन में पायलटों की हड़ताल तो समाप्त हो गई, लेकिन ये प्रश्न अभी भी बरकरार हैं। एयर इंडिया के पायलटों की अधिकतर मांगों को दरकिनार करते हुए बर्खास्तगी का डर दिखाकर पायलटों की हड़ताल समाप्त करवा दी गई। मारूति के हड़ताल के संदर्भ में हरियाणा सरकार श्रमिक हड़ताल को एक राजनीतिक षड्यंत्र बता रही है। यदि मामले की तह तक जाएं तो पाते हैं कि निजी क्षेत्र में काम करने वाले श्रमिक शोषण और प्रतिकूल कार्य दशाओं के कारण निरंतर कुंठा का शिकार बन रहे हैं। नए प्रकार के क्षेत्रों जैसे बीपीओ, कॉल सेंटर और आईटी के क्षेत्र में कर्मचारियों को यूनियन बनाने का अधिकार भी नहीं है। उसी प्रकार खुदरा क्षेत्र में उतर रही बड़ी कंपनियों वॉलमार्ट आदि में काम करने वाले कर्मचारी यूनियन नहीं बना सकते। देश में किसी भी प्रकार से प्रवेश पाने की इच्छुक दुनिया की सबसे बड़ी खुदरा कंपनी, श्रमिकों के शोषण और यूनियन बनाने का प्रयास करने वालों की प्रताड़ना के लिए विश्व भर में प्रसिद्ध है। देश की बड़ी-बड़ी कंपनियों द्वारा अपने अधिकतम कार्यो की आउटसोर्सिग करवाने के कारण वहां कार्यरत श्रमिकों पर नौकरी छूटने का डर उन्हें अपने हितों के लिए लड़ने से रोकता है। इन सब कारणों से देश में हड़तालें और तालाबंदियां लगभग समाप्ति की ओर है। इस सबसे हम निष्कर्ष निकाल सकते हैं कि वास्तव में देश में हड़तालों और तालाबंदियों के कम होने का कारण यह नहीं है कि श्रमिकों का शोषण नहीं हो रहा है अथवा प्रबंधन श्रमिकों का पूरा ख्याल रख रहा है या नहीं। यह भी कि कार्य दशाएं पहले से कहीं बेहतर हो गई हैं कि नहीं। सच्चाई तो यह है कि केंद्र और राज्य सरकारों तथा उनके द्वारा संचालित संस्थानों में जहां केंद्रीय वेतन आयोग की सिफारिशें लागू होती हैं के अतिरिक्त अर्थव्यवस्था के तमाम दूसरे क्षेत्रों में श्रमिकों को मंहगाई भत्ता तक नसीब नहीं होता है। समय-समय पर की जाने वाली वेतन वृद्धि तथाकथित रूप से कंपनी के नतीजों पर निर्भर करती है। ऐसे में अधिकतर श्रमिक जो ठेकेदारी प्रथा के अंतर्गत काम करते हैं न्यूनतम वेतन भी नहीं पाते हैं। कुछ विशेष प्रकार के कार्यो को छोड़कर शेष श्रमिक नितांत कम वेतन पर काम करने के लिए बाध्य हैं। ऐसे में कंपनियों की जेबें मोटी होती जा रही है और श्रमिकों को जीवन यापन के लिए संघर्ष करना पड़ता है। निजी क्षेत्र की कंपनियां मोटा लाभ कमा रही हैं। वर्ष 1990-91 में जहां केंद्र सरकार के सार्वजनिक क्षेत्र के प्रतिष्ठानों का कर लाभ मात्र 3820 करोड़ रुपये था वर्ष 2009-10 में वह बढ़कर लगभग 1,24,126 करोड़ रुपये पहुंच गया। ऐसे में श्रमिकों के हितों की रक्षा के लिए श्रम कानूनों में बदलाव करते हुए ठेकेदारी प्रथा के माध्यम से काम करवाने को भी कंपनी का कर्मचारी माना जाना चाहिए। यदि ऐसा होता है तो न सिर्फ श्रमिकों का कंपनी के प्रति नजरिया बदलेगा, बल्कि वह अपने काम और कंपनी के उत्पादन में अधिक वफादारी सेकाम करेगा। (लेखक स्वतंत्र टिप्पणीकार हैं)

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