हम एक राष्ट्र के रूप में आतंकवाद को समाप्त करने के बारे में गंभीर क्यों नहीं, जबकि सब जानते हैं कि आतंक का साया आज देश के लगभग हर राज्य पर मंडराने लगा है? जब कभी आतंकवाद का सामना करने के लिए कोई कदम उठाया जाता है तो क्यों वह किसी न किसी विवाद का मुद्दा बन जाता है? इस विसंगति के विभिन्न कारणों में एक बड़ा कारण यह भी है कि केंद्र और राज्यों के बीच न तो लक्ष्य में सहमति होती है और न ही कार्यशैली में। मौजूदा विवाद राष्ट्रीय आतंकवाद विरोधी केंद्र के गठन पर आरंभ हुआ है। अनेक राज्यों ने आरोप लगाया है कि इस कदम से केंद्र सरकार राज्यों के अधिकार क्षेत्र में हस्तक्षेप कर रही है और देश के संघीय ढांचे को बिगाड़ रही है। सबसे पहले इस बात को जानना जरूरी है कि क्या किसी ऐसी व्यवस्था की आवश्यकता है जिसमें आतंकवाद के विरुद्ध राष्ट्रीय स्तर पर कार्रवाई की जा सके? हम जानते हैं कि हमारे पास कई नियम कायदे हैं, जिनके माध्यम से आज आतंकवाद जैसे अपराधों का सामना किया जाता है। यह भी साफ है कि केंद्र के अतिरिक्त राज्यों के पास भी कई व्यवस्थाएं हैं और इन पर अमल करने के लिए कई संगठन हैं। ये संगठन जांच गिरफ्तारी और दंड- सबके बारे में हैं लेकिन अक्सर तालमेल के अभाव में कार्रवाई या तो समय पर नहीं होती या आरम्भ होने पर भी बीच में अटक जाती है। आतंकवाद संगठित अपराध होता है जो जितना जमीन के ऊपर होता है, उतना ही जमीन के नीचे। आतंकवादी कोई सिरफिरा नहीं होता जो किसी प्रतिशोध की भावना से या किसी व्यक्तिगत जुनून के वश मारकाट मचाता हो। ऐसे अपराध मानव सभ्यता के आरम्भिक दौर से ही होते रहे हैं। आतंकवाद के पीछे एक विचारधारा होती है और जिससे प्रेरित कुछ संगठन सुनियोजित तरीके से आतंकवाद का इस्तेमाल अपने राजनैतिक या साम्प्रदायिक लक्ष्यों को पाने के लिए लिए समर नीति के रूप में करते हैं। हमारे देश में आतंकवाद अलगाववादी लक्ष्य पाने के लिए आरम्भ हुआ लेकिन पूवोर्ंत्तर और कश्मीर के आरम्भिक दौर में आतंकवाद के स्वरूप में अब गुणात्मक अंतर आया है। अब यह देशों की प्रतिरक्षा समरनीति का भी अंग बन गया है। हमारे देश में आतंकवाद पाकिस्तान की भारत विरोधी समरनीति बन चुका है। यानी इसके बाकायदा अंतरराष्ट्रीय आयाम खुल गए हैं। एक चिंताजनक आयाम विभिन्न आतंकवादी गुटों के बीच व्यापक तालमेल के कारण खुल गया है। भारत जैसे विशाल देश में आंचलिक क्षेत्रों में अलगाव की प्रवृत्ति अस्वाभाविक नहीं है। पूवोर्ंत्तर, पंजाब और कश्मीर के आतंकवादी गुटों के लक्ष्यों में समानता न होते हुए भी एक समानता है कि सबका लक्ष्य भारत राष्ट्र को कमजोर करना है क्योंकि कमजोर भारत में ही उनके उद्देश्य पूरे होने की आशा की जा सकती है। इस एक उद्देश्य के लिए इन संगठनों में समरनीतिक तालमेल पैदा हो गया है। इस तालमेल में विदेशी एजेंसियो की भूमिका भी स्पष्ट है। विदेशी सहयोग और आथिर्क सहायतासे लैस संगठित तंत्र के रूप में आज आतंकवाद भारत संघ के सामने बहुत बड़ी चुनौती बन गया है। आतंकवाद राज्यों की सीमाएं नहीं मानता और न ही उसे भारत के संघीय और राज्यों के अधिकारों की चिंता है। ऐसे राष्ट्रव्यापी खतरे का सामना टुकड़ों में नहीं हो सकता है। सवाल उठता है कि क्या ममता बनर्जी, नीतीश कुमार, जयललिता या नरेंद्र मोदी को नहीं मालूम कि आतंकवाद की पहुंच कहां तक है और उससे निबटने के लिए एक अखिल भारतीय पहल कीआवश्यकता है? अगर मालूम है तो क्या यह मान लें कि ये मुख्यमंत्री, जो आतंकवाद विरोधी केंद्र का विरोध कर रहे हैं नहीं चाहते कि राष्ट्र शक्तिशाली रहे? ये सभी राज्य किसी न किसी सीमा तक आतंकवाद के भुक्तभोगी हैं और इन में से कुछ तो आतंकवाद के विरुद्ध शून्य सहनशीलता के पक्षधर हैं। फिर भी अगर वे केंद्र सरकार के इस कदम का विरोध कर रहे हैं तो क्या माना जाए कि केंद्रीय कार्रवाई में ही कोई खोट है? दरअसल राज्यों को केंद्र सरकार की नीयत पर ही शक है। अपनी विसनीयता खोने के लिए केंद्र सरकार स्वयं उत्तरदायी है। केंद्र सरकार स्वयं आतंकवाद के खिलाफ लड़ाई में ईमानदार नहीं दिखती। महत्वपूर्ण मामलों में भी सरकार ने ऐसी धारणा बनाई है कि वह आतंकवादी घटनाओं को दलगत राजनीति के आईने से ही देखती है और कभी- कभी आतंकवादी घटनाओं का राजनीतिक इस्तेमाल भी करती है। बाटला हाउस कांड के बारे में दोमुंही नीति के कारण लोगों का असमंजस बढ़ गया है कि कांग्रेस पार्टी के प्रवक्ता सही हैं कि सरकार के गृहमंत्री। अफजल गुरु की याचिका पर जिस तरह सरकार टालमटोल करती रही है, उससे आतंकवाद के प्रति सरकारी गंभीरता पर संदेह स्वाभाविक है। राज्यों के साथ भी केंद्र का रवैया राजनीति प्रेरित रहा है। गुजरात के मुख्यमंत्री नरेंद्र मोदी ने सरकारी कदम का विरोध करते हुए कहा कि आतंकवाद हमारे लिए बहुत अहम मुद्दा है, लेकिन जब हमने राज्य में आतंकवाद विरोधी विधेयक पारित करवाना चाहा तो केंद्र के इशारे पर कई बार राज्यपाल ने उसे अस्वीकार कर दिया । अगर राज्य भरोसे लायक नहीं है तो राज्य केंद्र पर कैसे भरोसा कर सकते हैं। बात अगर केवल नरेंद्र मोदी की ही होती तो गोधरा कांड के बाद दंगों में राज्य सरकार के संदेह के घेरे में आने के कारण केंद्र के व्यवहार को तर्कसंगत ठहराया जा सकता था लेकिन केंद्र की कार्रवाई पर सबसे पहले तो बगावत का झंडा उन ममता बनर्जी ने उठाया जिनकी पार्टी केंद्र सरकार में सहयोगी पार्टी है। उनका साथ दिया ओडिशा के नवीन पटनायक ने, जिन्होंने पिछले चुनाव में ही भाजपा से नाता तोड़ दिया था। नीतीश कुमार, मोदी और जयललिता तो बाद में शामिल हो गए। सबका कहना है कि यह राज्यों के अधिकार क्षेत्र में दखल है और इसका केंद्र दुरुपयोग कर सकता है। सवाल है कि क्या नई व्यवस्था का राजनीतिक दुरुपयोग हो सकता है? इस केंद्र के गठन का उद्देश्य आतंकवाद के बारे में सारी जानकारियां एक स्थान पर केंद्रित करना है ताकि उचित समय पर इसका उपयोग हो सके। कुछ विदेशी जासूस संगठनों की तरह यह ऐसा संगठन है जिसके पास न केवल जानकारियां हों, अपितु जो आने वाले खतरे को समय रहते भांप भी सके। लेकिन जानकारी संकलन का माध्यम केंद्रीय खुफिया ब्यूरो है। फिर इस संगठन को बिना किसी से पूछे गिरफ्तारी की भी छूट है। इस व्यवस्था के विरोधियों का कहना है कि दुनिया में जानकारी संग्रह करने वाला ऐसा कोई जासूसी संगठन नहीं जिसे अपने आप गिरफ्तारी का अधिकार भी हासिल हो। इस व्यवस्था का बेजा इस्तेमाल हो सकता है। इस मामले में जयललिता का आरोप है कि अनुभव बताता है कि इस संगठन का भी उसी तरह इस्तेमाल हो सकता है जिस तरह केंद्रीय खुफिया ब्यूरो का किया जा रहा है। जयललिता तो इसके खिलाफ अदालत तक पहुंच गई हैं। केंद्र और केंद्रीय सरकार चलाने वाली पार्टी में भरोसे का यह अभाव वर्तमान व्यवस्था लागू करने के बारे में दिखाई देता है। जिस कदम से राज्यों के अधिकार क्षेत्र में दखल का संदेह पैदा होता हो, उसमें भी राज्यों से बातचीत किए बिना घोषणा करने के पीछे उसी एकतरफा कार्रवाई की प्रवृत्ति दिखाई देती है जिसके कारण राज्य और केंद्र सरकार में विास की इतनी बड़ी खाई पैदा हो गई है। आश्चर्य है कि केंद्र अक्सर विवाद पैदा होने के बाद ही बातचीत आरम्भ करता है। लेकिन देर से ही सही, वार्ता सहभगिता के आधार पर होनी चाहिए ताकि आतंकवाद से लड़ाई दलगत राजनीति का विवाद न बने।
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Monday, February 27, 2012
Tuesday, February 14, 2012
नव उदारवादी नीतियों के लिए सबक
टूजी स्पेक्ट्रम मामले में जस्टिस जी. एस. सिंघवी और ए.के. गांगुली ने अपने फैसले से दूर संचार कंपनियों के उन 122 लाइसेंसों को, जो उनको 2008 में दिए गए थे रद्द करके संयुक्त प्रगतिशील गठबंधन सरकार को बहुत कुछ सोचने पर विवश किया है। ये लाइसेंस 2000 के शुरुआती सालों में शुरू उस भ्रष्ट प्रक्रिया की देन थे जिसे सर्वोच्च न्यायालय ने सार्वजनिक हितों के विरुद्ध और संवैधानिक सिद्धांतों का उल्लंघन माना है। संप्रग का यह कहना कि फैसले में गृहमंत्री पी. चिदंबरम को बेकसूर करार कर दिया गया है और संप्रग की नीतियों से इसका कोई लेना-देना नहीं है कहीं न कहीं गलत जरूर है। दरअसल फैसले में निजी जिम्म्ेादारियों पर बात ही नहीं की गई है। उसने तो लाइसेंस देने की पहले-आओ पहले-पाओ की नीति और लाइसेंस अर्जियों के लिए अंतिम तिथियों तथा चुनिंदा कंपनियों को लाइन से बाहर आवंटन करने के प्रभावों की छानबीन की है। सर्वोच्च न्यायालय का फैसला मंत्रिमंडल की सामूहिक जिम्मेदारी के स्वीकृत सिद्धांत के अधीन गुनाह का हिस्सा होने के लिए मौजूदा सरकार के खिलाफ एक जबरदस्त आरोप है। फैसले में रेखांकित इस तथ्य से सरकार बरी नहीं हो जाती कि दूरसंचार मंत्री ए. राजा ने प्रधानमंत्री या गृहमंत्री की सलाह पर ध्यान नहीं दिया। इससे यही सवाल खड़ा होता है कि उन्हें मंत्री पद पर बने ही क्यों रहने दिया गया। सरकार की मंत्रिमंडलीय व्यवस्था में अंतिम शब्द प्रधानमंत्री का होता है। फैसले में इलेक्ट्रोमेगनेटिक स्पेक्ट्रम सरीखे दुर्लभ संसाधन के इस्तेमाल का लाइसेंस देने के लिए पहले आओ पाले पाओ के केंद्रीय पक्ष को गलत ठहराया गया है और अपने सत्ताकाल में राजग ने भी इसी नीति का पालन किया था। इसने भी लाइसेंस देने की प्रक्रिया के साथ हेरफेर किया। इसलिए इस मामले में राजग को ज्यादा खुश होने की जरूरत नहीं। बहरहाल, उक्त फैसला पांच कारणों से महत्वपूर्ण है। सबसे अहम इस रूप में कि सरकार के पास राष्ट्र के प्राकृतिक संसाधन इसकी अमानत के तौर पर होते हैं और उसका खास दायित्व होता है कि वह उनके किसी भाग को निजी उद्यमियों को सौंपते समय न्यायपूर्ण और पारदर्शी ढंग से काम करे। वायु तंरंगो के अलावा इन दुर्लभ संसाधनों में भूमि, खनिज, तेल, गैस और पानी आदि भी आते हैं। सही मूल्य तय करने के लिए नीलामी की पद्धति को लगभग सर्वजनीन बनाने की सिफारिश कर अदालत मामले का अति सरलीकरण कर देती है। लेकिन बोली लगाने या नीलामी का तरीका सिर्फ विकसित बाजारों के मामलों में कामयाब हो सकता है और यह भूमि अथवा पानी में कहीं नहीं है। सार्वजनिक जमीन को अस्पतालों, स्कूलों अथवा कम कीमत के मकानों जैसे कामों के लिए आवंटित करने के मामलों में नीलामियां करना सही नहीं है। इसके बावजूद सार्वजनिक अमानत सिद्धांत तय कर दिया गया है। इसका अर्थ कि रसूख, असर, रित सिफारिश ओर अनेक अन्य क्षेत्रों में पट्टेधारी के आधार ‘चहेते सौदों’
के अधीन जारी लाइसेसों को जांच के लिए खोला जा सकता है। इसकी चपेट में सैकड़ों लाइसेंस आ जाएंगे जिनमें ऐसे प्रोजेक्टों के विशाल बहुमत का प्रतिनिधित्व करने वाले निहित स्वाथरे ने सार्वजनिक संपत्ति को कौड़ियों के मोल हथिया लिया है। इसके उन अनेकानेक परियोजनाओं के लिए स्पष्ट निहितार्थ हैं, जिनमें बिजली उत्पादन कंपनियों को कोयला खदानों के अधिकार बिना सोचे-समझे दे दिए गए हैं। दूसरे, फैसले में नागरिकों की भ्रष्टाचार संबधी शिकायतें करने के अधिकार को मान्यता देकर जनहित याचिका को वह ऊंचा दर्जा फिर दे दिया गया है जो इसे पहले प्राप्त था। इससे शिकायतों के समाधान का वैकल्पिक मंच मिल सकता है। यह अदालती फैसला सर्वोच्च न्यायालय के उस फैसले के विपरीत है जो उसने एक दशक पहले एनरॉन मामले में सेंटर ऑफ ट्रेड यूनियंस के पिटीशन को खारिज करते हुए दिया था। परंतु फैसला इस पर चर्चा नहीं करता कि संप्रग सरकार 2जी स्पेक्ट्रम आवंटन के मामले में नियंत्रक एवं महालेखाकार की उस रिपोर्ट के आने के लंबे समय बाद तक सरकारी खजाने को हुए नुकसान से इंकार क्यों करती रही जिसके आकलन के अनुसार यह नुकसान 56,000 करोड़ से 1.76,000 करोड़ रुपये तक था। इसने उन कंपनियों पर कोई जुर्माना भी नहीं लगाया जिन्होंने पूरी प्रक्रिया में हेराफरी की थी। फैसले में इसका आधार बताए बगैर केवल मुकदमे की लागत की बात थी। चौथे, न्यायिक पुनरीक्षण को लेकर फैसला कुछ पेचीदा रास्ता लेता है। यह इस तर्क को अस्वीकार करता है कि वाणिज्यिक और वित्तीय मामलों में न्यायिक पुनरीक्षण बड़े सार्वजनिक हित में सीमित होना चाहिए। लेकिन इसमें यह नहीं बताया गया है कि इस सार्वजनिक हित का निर्धारण संबद्ध जज की अपनी समझ के अतिरिक्त किस तरह होना चाहिए। जब तक कड़े मापदंड तय नहीं किए जाते, यह न्यायिक अति-सक्रियता की ओर ले जा सकता है। फिर भी यह तो मानना ही चाहिए कि जजों ने नियंतण्रऔर धैर्य से काम लिया और अपने को उन राजनीतिक बखेड़ों से प्रभावित नहीं होने दिया जो घोटाले के सामने आने के साथ पैदा हुए थे। और अंत में फैसले में 2जी घोटाले में निष्क्रिय भूमिका अदा करने और इसका रास्ता साफ करने के लिए टेलीकोम रेगुलेटरी अथोरिटी ऑफ इंडिया (ट्राई ) को फटकार लगाई गई है। परंतु विडंबना यह है कि 2जी लाइसेसों की नई नीलामी के तौर-तरीको को तय करने के लिए इसी एजेंसी को नामजद किया गया है और घोटाले की चल रही सीबीआई जांच का मूल्यांकन और उस पर रिपोर्ट करने के लिए किसी विशेष जांच एजेंसी को नियुक्त करने के स्थान पर इस काम को वो केंद्रीय सर्तकता आयोग को सौंपता है, जो बड़ी हद तक एक अक्षम एजेंसी है। बहरहाल, व्यापक परिप्रेक्ष्य में यह फैसला नवउदारवादी आर्थिक नीतियों की कमजोरियां रेखांकित करता है और राष्ट्रीय संसाधनों का गलत इस्तेमाल किए जाने की आशंका के प्रति चेताता है। नवउदारवाद का लक्ष्य निजी स्वाथरें द्वारा सार्वजनिक संसाधनों को हड़पना और आम लोगों को उनकी पहुंच से वंचित करना है। इस कारण पूंजी अनिवार्यत: अधिकाधिक प्राकृतिक संसाधनों पर कब्जा करती जाएगी जिनमें भूमि, खनिज और वायु शामिल है। इसको बेहतर नियामकों अथवा बाजार आधारित अधिक पारदर्शी क्रियाविधि द्वारा नहीं रोका जा सकता है जो इसी प्रक्रिया को बनाए रखने का काम करेंगी। पिछले सात दशकों के सबसे खराब वैिक आर्थिक संकट, महामंदी का एक बड़ा सबक यह है कि नव उदारवाद इसके केंद्र में ही दिवालिया साबित हो चुका है। नवउदारवाद ने न केवल निवेश और संवृद्धि की दर धीमी की है, बल्कि इसने वैिक पर्यावरण संकट और खास तौर जलवायु परिवर्तन तथा सामाजिकता को बुरी तरह प्रभावित किया है। यूरोप में कल्याणकारी राज्य की स्थापना के माध्यम से हासिल सामाजिक उपलब्धि को नष्ट किया जा रहा है। आय में असमानता ने अपूर्व विस्तार लिया है और कल तक के संपन्न समाजों में बेरोजगारी महामंदी के स्तर को छू रही है। भारत को नवउदारवाद को पूरी तरह छोड़ देना चाहिए लेकिन यह आसानी से होने वाला नहीं क्योंकि सरकार नवउदारवाद की इस हद तक पक्षधर दिख रही है कि स्थाई गरीबी बढ़ती जा रही है। असमानताओं सहित इसके सबसे बुरे नतीजे नहीं देखे जा रहे हैं और सरकार ‘दूसरी पीढ़ी’ के नवउदारवादी सुधार लागू करने पर अड़ी है।Friday, November 25, 2011
कब बहुरेंगे दिन बुंदेलखंड के
| उत्तर प्रदेश विधानसभा में पारित चार राज्यों के प्रस्ताव ने बुंदेलखंड इलाके के लोगों में दशकों पुरानी मांग पूरा होने की उम्मीद जगा दी है। हालांकि महज छह जिलों, 22 विधानसभा सीटों और एक करोड़ से भी कम आबादी के उत्तर प्रदेश के बुदेलखंड का अलग राज्य बनना तब तक संभव नहीं होगा, जब तक मध्यप्रदेश के बुंदेलखंड को भी इसमें मिलाने की प्रक्रिया प्रारंभ न हो। प्राकृतिक संपदा के मामले में संपन्न बुंदेलखंड क्षेत्र में बारिश बहुत कम होती है और यह सरकारी उपेक्षा का शिकार रहा है। यहां दो साल में एक बार जब भी सूखा पड़ता है, सरकारें राहत का मलहम लगाने लगती हैं, लेकिन बुद्धिजीवियों, राजनीतिज्ञों और आम लोगों का बड़ा वर्ग मान चुका है कि अलग राज्य के अलावा कोई विकल्प नहीं है। दो साल पहले कांग्रेस महासचिव राहुल गांधी और उसके बाद उप्र की मुख्यमंत्री मायावती सूखाग्रस्त बुंदेलखंड का दर्द जानने गए और दोनों ने ही अलग राज्य की मांग का समर्थन किया था। इससे पहले गंगाचरण राजपूत, राजा बुंदेला, सत्यव्रत चतुव्रेदी सहित कई कांग्रेसी आंदोलन की अगुवाई करते रहे हैं। अटलबिहारी वाजपेयी के प्रधानमंत्रित्व काल में बुंदेलखंड की सभी लोकसभा सीटों पर भाजपा काबिज थी। अपने घोषणा पत्र और जन सभाओं में भाजपा नेता पृथक राज्य की मांग उठाते रहे लेकिन सत्ता संभालने के बाद सब भूल गए। बहरहाल इतने व्यापक राजनीतिक समर्थन के बावजूद अलग राज्य की मांग में कोई प्रगति न होना स्पष्ट दर्शाता है कि राजनीतिज्ञों का असल मकसद बुंदेलखंड के नाम पर महज सियासत करना है। अलग राज्य की मांग को लेकर 1942 से चल रहा आंदोलन कुछ साल पहले उग्र हो गया था और बुंदेलखंड मुक्ति मोर्चा के संयोजक शंकरलाल मेहरोत्रा और अन्य चार लोग राष्ट्रीय सुरक्षा कानून के तहत महीनों जेल में रहे। मेहरोत्रा के असामयिक निधन के बाद अभिनेता व कांग्रेसी नेता राजा बुंदेला आंदोलन की कमान संभाले हैं। मौदहा के विधायक बादशाह सिंह का संगठन भी अलग राज्य की राजनीति करता है। भारत के नक्शे के ठीक मध्य में स्थित बुंदेलखंड का क्षेत्र यमुना, नर्मदा, चंबल और टौंस नदियों के बीच लगभग 400 किलोमीटर पूर्व से पश्चिम और इतना ही उत्तर से दक्षिण वर्गाकार फैला है । लगभग 1.60 लाख वर्ग किमी क्षेत्रफल वाले इस भू-भाग की भाषा, संस्कृति, आचार-विचार में एकरूपता के बावजूद यह दो राज्यों (उप्र और मप्र) में विभाजित हैं। ऐतिहासिक साक्ष्यों के अनुसार सन 200-500 ईस्वी में इस क्षेत्र की पहचान अलग राज्य के रूप में रही है और यह स्वरूप चंदेलों (सन 831- 1203 ई) और उसके बाद बुंदेलों, व अंग्रेजों के शासनकाल तक बरकरार रहा। बुंदेला शासकों के दौरान यह बुंदेलखंड कहलाया। स्वतंत्रता से पहले बुंदेलखंड राज्य बनाया गया और उसकी राजधानी नौगांव बनी लेकिन दो महीने बाद ही इसका विभाजन विंध्यप्रदेश के रूप में हो गया था । 1942 में प्रसिद्ध साहित्कार व संपादक पं. बनारसीदास चतुव्रेदी ने टीकमगढ़ रियासत के महाराज वीर सिंह देव के सहयोग से पृथक राज्य का आंदोलन शुरू किया था। देश के पहले गृह मंत्री सरदार वल्लभभाई पटेल ने अनेक रियासतें मिला अलग बुंदेलखंड राज्य की परिकल्पना प्रस्तुत की थी, लेकिन तत्कालीन केंद्र सरकार नहीं मानी। 1948 में जवाहरलाल नेहरू, विट्ठल भाई पटेल व पट्टाभि सीतारामैय्या की अगुआई में गठित जेवीपी आयोग ने बुंदेलखंड का पृथक अस्तित्व नहीं स्वीकारा लेकिन 1955 में राज्य पुनर्गठन आयोग के प्रमुख केएम पणिक्कर ने इसके औचित्य का समर्थन किया। बुंदेलखंड के पन्ना में हीरे की खदानें हैं, यहां का ग्रेनाइट जग विख्यात है। यहां गोरा पत्थर, सीमेंट पत्थर, रेत-बजरी के भंडार हैं। तालाबों की मछलियां कोलकाता के बाजार में बिकती हैं। जंगलों में मिलने वाला तेंदू पत्ता हरा सोना कहा जाता है। खजुराहो, झांसी, ओरछा जैसे स्थल सालभर पर्यटकों को आकषिर्त करते हैं। अनुमान है कि दोनों राज्यों के बुंदेलखंड मिला कर कोई एक हजार करोड़ की आय सरकार के खाते में जमा कराते हैं, लेकिन इलाके के विकास पर इसका दस फीसद भी खर्च नहीं होता। सवाल उठ रहा है कि नए राज्यों के गठन का आधार क्या हो? पुरानी मांग या भौगोलिक संरचना या क्षेत्रों का पिछड़ापन या छोटे राज्यों का सिद्धांत। देखा जाए तो इस रूप में बुंदेलखंड राज्य की मांग का आधार सशक्त है। बहरहाल मध्यप्रदेश सरकार की चुप्पी बुंदेलखंड को सुलगा रही है। |
आबादी के संकट का मिथक टूटेगा!
इकतीस अक्टूबर, 2011 को प्रात: सात बजकर बीस मिनट पर लखनऊ में नरगिस नामक बच्ची के जन्म पर परिवार में उत्सव का सा माहौल था। यह उत्सव ऐसे क्षेत्र में मनाया जा रहा था जहां सामान्यत: बच्ची के जन्म लेने पर मातम न भी हो परंतु खुशी का माहौल भी नहीं होता। पर नरगिस के जन्म पर उत्सव इसलिए हो रहा था क्योंकि उसने वि के सात अरबवें इंसान के रूप में जन्म लिया। वि में जनसंख्या के इन आंकड़ों को लेकर अलग तरह की तस्वीर प्रस्तुत की जा रही है। माना जा रहा है कि जनसंख्या वृद्धि ही, गरीबी, बेरोजगारी, सीमित संसाधनों का संकट और आर्थिक पिछड़ेपन के लिए जिम्मेदार है। इसके लिए विकासशील व अविकसित देशों को उत्तरदायी ठहराने का प्रयास हो रहा है। आंकड़ों पर नजर डालें तो वि की सात अरब जनसंख्या के पांच सबसे बड़े भागीदार देश, चीन (19.4 प्रतिशत), भारत (17.5 प्रतिशत), अमेरिका (4.5 प्रतिशत), इंडोनेशिया (3.4 प्रतिशत) और ब्राजील (2.8 प्रतिशत) हैं। केवल भारत और चीन मिलकर दुनिया की कुल आबादी का 37 प्रतिशत हैं। एक अनुमान के मुताबिक वर्ष 2050 तक यह जनसंख्या दस अरब तक पहुंच सकती है। यदि इसे भारत के संदर्भ में देखें तो भारत की जनसंख्या 1.21 अरब के आसपास है। यानी दुनिया का प्रत्येक सातवां व्यक्ति भारतीय है। इसमें पांच सर्वाधिक आबादी वाले राज्य उत्तर प्रदेश, महाराष्ट्र, बिहार, बंगाल और आंध्र प्रदेश में भारत की कुल आबादी का लगभग 50 प्रतिशत हिस्सा है। वैिक स्तर पर चीन दुनिया का सर्वाधिक आबादी वाला देश है परंतु उसने अपनी जनसंख्या बढ़ोतरी दर नियंत्रित करने में सफलता पाई है। पश्चिमी देशों का मानना था कि जब तक चीन अपनी जनसंख्या नियंत्रित नहीं करता तब तक वह आर्थिक प्रगति नहीं कर सकता। इस तर्क को मुंह चिढ़ाते हुए माओ ने कहा था कि हर चीनी बालक केवल मुंह ही नहीं बल्कि दो हाथ लेकर भी पैदा होता है। वह चीन पर बोझ नहीं होता, बल्कि चीनी प्रगति में पूरा योगदान देता है। माओ के इस तर्क को चीन ने काफी हद तक सच साबित भी कर दिखाया। उसने सभी मिथकों को तोड़ते हुए विकास के नये कीर्तिमान स्थापित किये। जनसंख्या को लेकर पश्चिमी देश इसलिए दुनिया पर दबाव बनाते रहे हैं क्योंकि उन्होंने वर्ष 1950 तक अपनी जनसंख्या इतनी कर ली थी कि दुनिया में यूरोपीय जाति की प्रधानता हो चुकी थी। 1000 ईस्वी तक यूरोपीय जाति के लोग दुनिया की आबादी का केवल आठवां भाग थे। 1500 ईस्वी के आसपास उन्होंने यूरोप से बाहर निकल कर वि के दूसरे हिस्सों को हथियाना आरंभ किया और अमेरिका तक पर कब्जा कर डाला। 1750 तक दुनिया की आबादी में यूरोपीय लोगों का हिस्सा पांचवां हो चुका था और 1900 तक आते-आते यूरोपीय जनसंख्या दुनिया की कुल आबादी का एक तिहाई भाग हो चुकी थी। गौरतलब है कि इस दौरान यूरोपीय देशों में जनसंख्या वृद्धि और प्रगति साथ-साथ हो रही थी। कालांतर में अपनी प्रधानता स्थापित करने के बाद उन्होंने कहना शुरू कर दिया कि जनसंख्या बढ़ोतरी पर रोक लगनी चाहिए। साथ ही तर्क दिये जाने लगे कि जनसंख्या में बढ़ोतरी के लिए विकासशील और अविकसित देश जिम्मेदार हैं। यह चिंता भी जाहिर की जा रही है कि जनसंख्या बढ़ोतरी से संसाधनों का संकट पैदा हो जाएगा परंतु दुनिया में अमेरिका के बाद सबसे अधिक कृषि योग्य भूमि भारत के ही पास है। चीन के पास भी खेती योग्य भूमि हमसे कम है। आज भी 4.5 प्रतिशत जनसंख्या वाला अमेरिका, वि के कुल उपलब्ध संसाधनों का 25 प्रतिशत अकेले दोहन करता है। यानी अमेरिका का एक व्यक्ति भारत के 12 व्यक्तियों के बराबर संसाधनों का उपभोग कर रहा है। वि के उपलब्ध सीमित संसाधनों का 86 प्रतिशत भाग केवल 20 प्रतिशत सर्वाधिक सुविधा संपन्न व अमीर लोगों द्वारा उपभोग हो रहा है। जबकि सर्वाधिक 20 प्रतिशत गरीब केवल 1.3 प्रतिशत ही उपभोग कर पाते हैं। इस प्रकार, संसाधनों का संकट उपभोग से नहीं अपितु अति-उपभोग अथवा दुरुपयोग से पैदा होता है। जनसंख्या वृद्धि बेरोजगारी से भी जोड़ी जा रही है। यूरोप और अमेरिका में जहां एक ओर जनसंख्या में गिरावट दर्ज की गयी, वहीं रोजगार के अवसर बढ़े हों, ऐसा देखने को नहीं मिला। भारतीय जनगणना 2011 के आंकड़ों पर नजर डालें तो केरल सबसे कम जनसंख्या वृद्धि दर वाला राज्य है, लेकिन वहां बेरोजगारी सर्वाधिक है। रोजगार या बेरोजगारी को जनसंख्या घटने या बढ़ने से नहीं जोड़ा जा सकता बल्कि यह सरकार की नीतियों पर निर्भर करता है। चिंता जाहिर की जा रही है कि जनसंख्या वृद्धि आर्थिक विकास को प्रभावित करती है। यदि जनसंख्या घटने या बढ़ने का संबंध वास्तव में अमीरी या गरीबी से होता तो अमेरिका में इस समय एक भी व्यक्ति बेरोजगार न होता। भारत से तीन गुना अधिक क्षेत्रफल वाले अमेरिका की (जिसकी आबादी हमसे करीब चार गुना कम है), 12 प्रतिशत कार्यशक्ति बेरोजगार घूम रही है। करोड़ों अमेरिकी बेघर हैं। यही हाल उस रूस का है जो क्षेत्रफल के हिसाब से हमसे पांच गुना अधिक बड़ा और आबादी में आठ गुना कम है। वहां दो करोड़ से अधिक लोग बेरोजगारी की मार झेल रहे हैं। ये दुनिया के औद्योगिक रूप से विकसित वे दो राष्ट्र हैं, जहां न जनसंख्या की समस्या है न संसाधनों की, फिर भी वे बेरोजगारी का दंश झेल रहे हैं। भारत को भविष्य की आर्थिक महाशक्ति के रूप में देखा जा रहा है। ऐसे में जरूरी है यहां मानव संसाधन की कार्यकुशलता व दक्षता बढ़ाने की। जहां तक जनसंख्या वृद्धि नियंत्रित करने का प्रश्न है तो 2011 की जनगणना के आंकड़ों के अनुसार इस वृद्धि दर में कमी आई है। लेकिन यह पर्याप्त नहीं है। अर्मत्य सेन जैसे अर्थशास्त्री जनसंख्या नियंतण्रहेतु कठोर कदम उठाने के पक्ष में नहीं है। उनका मानना है कि शिक्षा एवं स्वास्थ्य सुविधाएं उपलब्ध करा जनसंख्या वृद्धि दर पर रोक लग सकती है। शिक्षा से सोचने-समझने का दायरा बढ़ता है और परिवार नियोजन की जानकारी के प्रचार-प्रसार में मदद मिलती है। महिलाओं की सक्रिय भागीदारी से केरल में जन्मदर में कमी का उदाहरण उल्लेखनीय है। दूसरे, बाल श्रम पर सख्त पाबंदी लगनी चाहिए क्योंकि गरीबों की सोच है कि जितने बच्चे होंगे उतने कुछ कमाकर लाएंगे। वृद्धावस्था व सामाजिक सुरक्षा के उचित प्रबंधन से यह मिथक तोड़ना होगा कि बेटा बुढ़ापे का सहारा होता है। इन प्रयासों से भी जनसंख्या पर काफी हद तक नियंतण्रकिया जा सकता है। चीन ही नहीं जब जर्मनी जैसा देश शून्य जनसंख्या वृद्धि दर हासिल कर सकता है, ईरान जैसा मजहबी देश जनसंख्या पर नियंतण्रस्थापित करने में सफल हो सकता है तो भारत के लिए यह असंभव चुनौती नहीं होनी चहिए।
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