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Wednesday, March 14, 2012

कितने सुरक्षित हैं हमारे बांध


केरल और तमिलनाडु में तीखा विवाद उत्पन्न करने वाले मुल्लापेरियार बांध का मुद्दा चाहे अदालती कार्यवाही के दौर में कुछ थम-सा गया है, पर इस बेहद असुरक्षित बांध की छाया में रह रहे संभवत: लाखों लोगों की दहशत में कोई कमी नहीं आई है। 116 वर्ष पहले बना व हाल में आए भूकंपों से क्षतिग्रस्त हुआ यह बांध अब बेहद कमजोर हो चुका है व कई विशेषज्ञ यह राय जाहिर कर चुके हैं कि इस क्षेत्र में संभावित 6.5 रिक्टर के पैमाने के भूकंप को यह कतई सहन नहीं कर सकेगा। यदि यह बांध टूट गया तो इस बांध और पेरियार नदी घाटी में इसके और अगले बांध इडुक्की के बीच रहने वाले 75 हजार लोग गंभीर संकट में आ जाएंगे। यदि आसन्न संकट के वक्त इडुक्की बांध भी क्षतिग्रस्त हुआ तो तीस लाख तक लोगों का जीवन संकटग्रस्त हो सकता है। वास्तव में यह मुद्दा मूलत: दो राज्यों के विवाद का मुद्दा है ही नहीं क्योंकि केरल ने स्पष्ट कहा है कि किसी वैकल्पिक तौर-तरीके से वह तमिलनाडु को उसके निर्धारित हिस्से का पानी उपलब्ध करवाने से पीछे नहीं हटेगा। ऐसे में इस मामले को मूलत: संकटग्रस्त लोगों के जीवन की रक्षा के रूप में ही उठाया जाना चाहिए था और चूंकि जीवन की रक्षा से बड़ा और कोई उद्देश्य नहीं है, इसलिए बहुत पहले ही इस असुरक्षित बांध को हटा कर कोई वैकल्पिक व्यवस्था कर दी जानी चाहिए थी। पर जिस तरह बड़ी संख्या में लोगों को दहशत में रहने को मजबूर किया जा रहा है, उससे एक बार फिर जाहिर हो गया है कि सरकारी स्तर पर बांध सुरक्षा का मुद्दा कितना उपेक्षित रहा है। कुछ समय पहले अगस्त, 2011 में संसद की स्थाई समिति ने संसद को प्रस्तुत अपनी रिपोर्ट में सरकार की इस बात के लिए तीखी आलोचना की थी कि बांध सुरक्षा विधेयक का प्रस्ताव आने के बाद उससे संबंधित बिल को तैयार करने में सरकार ने 25 वर्ष का समय लिया। साथ ही इस रिपोर्ट में यह भी कहा गया है कि इतनी देरी के बाद जो बिल तैयार किया गया है वह बेहद कमजोर व अप्रभावी है। उसमें बांध के विफल होने या सुरक्षा के प्रावधानों की अवहेलना की स्थिति में समुचित दंड की व्यवस्था नहीं की गई है। बिल में प्रतिकूल प्रभावित या क्षतिग्रस्त लोगों के मुआवजे का प्रावधान नहीं है। किसी स्वतंत्र नियमन की व्यवस्था भी बिल में नहीं है। बांध सुरक्षा की अवहेलना विभिन्न परियोजनाओं संबंधी निर्णयों व निर्णय प्रक्रियाओं में भी नजर आती है। टिहरी बांध के संदर्भ में अब शायद कम लोगों को यह याद होगा कि केंद्रीय सरकार द्वारा ही नियुक्त की गई एक विशेषज्ञों की समिति (पर्यावरण मंत्रालय की नदी घाटी परियोजनाओं से संबद्ध समिति) ने कहा था कि इस परियोजना की सुरक्षा संबंधी चिंताएं असहनीय हद तक अधिक हैं और इन्हें ध्यान में रखते हुए इस परियोजना को त्याग देना चाहिए। इतनी स्पष्ट प्रतिकूल संस्तुति के बावजूद भी टिहरी परियोजना के कार्य को तेजी से आगे बढ़ाया गया। आज परियोजना के पूर्ण होने के बाद यह स्पष्ट है कि इसके बड़े खतरे हमारे सामने आते जा रहे हैं जबकि इससे प्राप्त हो रहा वास्तविक लाभ इसके पूर्व प्रचारित लाभ से कहीं कम है। अब ऐसी ही सुरक्षा संबंधी अवहेलना कोसी बराह क्षेत्र बांध परियोजना के संदर्भ में भी नजर आ रही है। यह सच है कि कोसी नदी की बाढ़ का मामला काफी पेचीदा है, पर इसका अर्थ यह नहीं है कि इसका समाधान ऐसी परियोजना में खोजा जाए जिसकी सुरक्षा पर कई सवालिया निशान पहले ही लग चुके हैं। कुछ समय पहले भारत-नेपाल संयुक्त नदी आयोग की बैठक के बाद कोसी नदी पर बराह क्षेत्र में हाई डैम बनाने के लिए विस्तृत प्रोजेक्ट रिपोर्ट (डीपीआर) तैयार करने की चर्चा ने जोर पकड़ा है। कहा जा रहा है कि प्रोजेक्ट रिपोर्ट अब शीघ्र ही तैयार होगी। इस बारे में मूल प्रस्ताव तो लगभग 65 वर्ष पुराना है जिसमें चतरा घाटी में बराह क्षेत्र (नेपाल) के पास 229 मीटर ऊंचा कंक्रीट बांध बनाने व उसके साथ 1200 मेगावाट क्षमता का पनिबजली घर बनाने की बात कही गई थी। ध्यान देने की बात है कि उस समय भी यह योजना टलने की एक मुख्य वजह यह थी कि बराह क्षेत्र तीव्र भूकंप आशंका वाले इलाके में आता है और डैम के क्षेत्र के नजदीक वर्ष 1934 के समान 8.3 की तीव्रता वाले भूकंप के आने की आशंका से इंकार नहीं किया जा सकता है। इस परियोजना से जुड़े रहे एनबी गाडगिल ने 11 सितम्बर, 1954 को लोकसभा को बताया था, ‘एक समय मुझे भी कोसी प्रोजेक्ट का काम-धाम देखना पड़ा था। वहां जब जमीन के अंदर छेद करने के प्रयोग किए गए तब पता चला कि वह पूरा का पूरा इलाका ऐसा है जिस पर भूकंप के झटके लगते हैं, तब हम लोगों को सोचना पड़ा कि वहां जलाशय बने या कोई दूसरी व्यवस्था की जाए। या फिर जैसा कि पिछले हफ्ते अल्जीयर्स में हुआ, वैसा दुबारा भी होगा। वहां भूकंप की वजह से या तो बांधों में दरार पड़ गई या वह ढह गए और कई बांधों का तो नामोनिशान ही मिट गया।’
इसी समय के आसपास 22 सितम्बर, 1954 को बिहार विधान सभा में वित्त मंत्री अनुग्रह नारायण सिंह ने कहा, ‘अभी 2-3 वर्षो से इसकी जांच ही रही थी कि कोसी नदी पर एक बांध बांधा जाए जो कि 700 फीट ऊंचा हो, लेकिन बाद में इस बात पर विचार किया गया कि अगर वह 700 फीट का बांध फट जाए तो जो पानी उसमें जमा है उससे सारा बिहार और बंगाल बह जाएगा और सारा इलाका तबाह और बरबाद हो जाएगा।’
कोसी नदी में गाद की मात्रा बहुत अधिक होने के कारण प्रस्तावित जलाशय में वह बहुत तेजी से एकत्र होगी और इस कारण बांध की आयु और उसकी जल-संग्रहण क्षमता पर भी प्रतिकूल असर पड़ेगा। यदि बांध से बड़े पैमाने पर अचानक बहुत मात्रा में पानी छोड़ना पड़ा तो इससे नीचे के तटबंधों के बीच फंसे लोग पूरी तरह उजड़ सकते हैं। इतना ही नहीं, तेज वेग से आने वाले इस जल से तटबंध टूट भी सकते हैं और इस तरह एक बड़ा क्षेत्र विनाशकारी बाढ़ की चपेट में आ सकता है। अभी इस ओर अपेक्षाकृत बहुत कम ध्यान गया है कि हमारे देश के अनेक बांध पहले भी टूट चुके हैं व विफल हो चुके हैं। जैसे कि राजस्थान में जुलाई 2007 में जसवंत सागर बांध ऐसे समय टूटा जबकि बड़े बांध सुरक्षा परियोजना के अंतर्गत इसका सुरक्षा आकलन चल रहा था। राजस्थान में गरारदा बांध तो पहली बार ही भरने पर ही टूट गया जिससे दर्जन भर गांवों में पानी भर गया। चंबल नदी की एक सहायक नदी गरारदा पर बने इस बांध के ढहने की जांच की गई तो भ्रष्टाचार और लापरवाही के कारण हुआ घटिया निर्माण इसकी प्रमुख वजह के रूप में सामने आया। आंध्रप्रदेश में हाल के वर्षो में कई बांध टूटे हैं। इनमें पूर्वी गोदावरी में सुब्बारया सागर, खम्माम में पालमवगू बांध व वारंगल जिले में गुंडलावगु बांध शामिल हैं। पिछले 65 वर्षो में देश में लगभग 50 बांध टूट चुके हैं जिसमें गुजरात के मच्छू डैम जैसे उदाहरण भी हैं जिन्होंने बहुत भीषण तबाही मचाई। इसके अतिरिक्त लगभग प्रत्येक वर्ष ही बड़े बांधों से अचानक पानी छोड़ने के कारण जो अधिक पल्रयकारी बाढ़ आती है उसकी विनाशलीला अलग है। कुछ बांधों के बनने के बाद आसपास के क्षेत्र की भूकंपीयता बढ़ गई है, यह भी एक गंभीर समस्या है। चीन के थ्री गार्जिस बांध से तो यह चौंकाने वाला समाचार मिला है कि इसके जलाशय में पानी भरने के बाद यहां की भूकंपीयता 30 गुना बढ़ गई है व लगभग 3 हजार भूकंप दर्ज हुए हैं। इन सब तथ्यों को ध्यान में रखते हुए यह जरूरी है कि बांधों की सुरक्षा को तवज्जो दी जाए और इसके लिए बांध सुरक्षा कानून में जरूरी सुधार किए जाएं। बांध सुरक्षा के सभी पक्षों में पारदर्शिता लानी चाहिए और इसमें सरकारी तंत्र से अलग स्वतंत्र विशेषज्ञों और प्रभावित लोगों के विचारों की सुनवाई की समुचित व्यवस्था होनी चाहिए। खतरनाक नई बांध परियोजनाओं में सुरक्षा पक्ष को समुचित महत्व दिया जाए व यह निर्णय प्रक्रिया निहित स्वाथरे के असर से मुक्त हो, यह भी बहुत जरूरी है।

Monday, December 5, 2011

मजदूर हित पर सरकारी कोताही

वन एवं अन्य निर्माण मजदूर अधिनियम 1996 के तहत कंपनियों से वसूले जाने वाले उपकर को समाप्त कराने के लिए याचिका दाखिल की गई थी। याचिका को खारिज करते हुए माननीय उच्चतम न्यायालय ने कहा है, ‘संसद को मजदूरों के कल्याण के लिए उपकर लगाने का पूरा अधिकार है। समाज में आज भी मजदूरों का शोषण हो रहा है, इसलिए मजदूरों के कल्याण के लिए हर संभव कदम उठाए जाने चाहिए।’ उक्त अधिनियम के तहत सभी राज्यों में श्रमिक कल्याण बोर्ड स्थापित किए जाने हैं लेकिन आधे से अधिक राज्यों ने अभी तक श्रमिक कल्याण बोर्ड स्थापित नहीं किए हैं। जिन राज्यों में बोर्ड हैं, उनमें से अधिकतर में श्रमिक कल्याण कोष का उपयोग सही ढ़ंग से नहीं हो रहा है। विभिन्न राज्यों के श्रमिक बोडरे ने उपकर के रूप में करीब साढ़े पांच हजार करोड़ रुपए इकट्ठा किए। जिनमें से करीब 15 फीसद राशि ही खर्च की गई। दिल्ली में कॉमनवेल्थ गेम के दौरान ठेकेदारों से वसूले गए उपकर की करीब सात सौ करोड़ की राशि में से करीब तीस करोड़ की राशि खर्च की गई। मजदूरों पर खर्च करने के मामले में दक्षिण के दो राज्यों का प्रदर्शन अच्छा रहा। केरल में सबसे ज्यादा 78 फीसद, तमिलनाडु 43, मध्य प्रदेश 22 और आंध्र प्रदेश में 3 फीसद राशि खर्च की गई। बिहार, गुजरात, राजस्थान, एवं उत्तर प्रदेश एक फीसद से भी कम राशि खर्च कर पाए। श्रमिक कल्याण बोडरें के तहत प्रदेश के मजदूरों का पंजीकरण अनिवार्य है। राज्यों की तरफ से पंजीकरण के मामले में भी ढ़िलाई बरती जा रही है। देश के विभिन्न श्रमिक कल्याण बोडरें में असंगठित क्षेत्र के करीब 75 लाख श्रमिक पंजीकृत हैं। देश में सबसे ज्यादा करीब इक्कीस लाख मजदूर तमिलनाडु में पंजीकृत हैं। मध्य प्रदेश 17 लाख, करीब उतने ही केरल में, उत्तर प्रदेश में 10 लाख और आंध्र प्रदेश में करीब 9 लाख मजदूर पंजीकृत हैं। देश की कुल श्रमशक्ति में करीब 90 फीसद मजदूर असंगठित क्षेत्र में हैं। उद्योगों की अपेक्षा खेतों में मजदूरों खास तौर पर दलित मजदूरों का शोषण अधिक होता है। योजना आयोग की एक रिपोर्ट के अनुसार 2007-08 में कृषि मजदूरों की संख्या 55 फीसद थी, जो वर्ष 2009-10 में घटकर 45.5 फीसद रह गई। श्रम मंत्रालय के आंकड़ों के अनुसार प्रत्येक वर्ष करीब 12 करोड़ लोग रोजगार की तलाश में गांवों से शहरों की ओर पलायन करते हैं। अनेकों श्रम कानूनों के बावजूद ग्रामीण क्ष़ेत्रों में करीब 85 फीसद और शहरी क्षेत्रों में करीब 60 फीसद दिहाड़ी मजदूरों को न्यूनतम मजदूरी से भी कम मजदूरी दी जाती है। महिला मजदूरों को पुरुष मजदूरों से कम मजदूरी दी जाती है। गांवों में पर्याप्त संख्या में मजदूर नहीं मिलते और शहरों में मजदूरों को पर्याप्त काम नहीं मिलता। असंगठित क्षेत्र के मजदूरों के काम करने का कोई स्थायी ठिकाना न होने के कारण, अधिकतर मजदूर संबंधित योजनाओं के लाभ से वंचित रह जाते हैं। खुदरा क्षेत्र में प्रत्यक्ष विदेशी निवेश के लिए तर्क दिया जा रहा है कि इससे अगले तीन साल में एक करोड़ रोजगारों का सृजन होगा। रोजगार सृजन के नाम पर पहले भी ऐसे फैसले लिए जाते रहे हैं। रोजगार का यह कैसा सृजनीकरण है, जिसमें रोजगार की दर के बजाय बेरोजगारी की दर बढ़ रही है। श्रम मंत्रालय की एक सव्रेक्षण रिपोर्ट के अनुसार 2005 में बेरोजगारी दर करीब 8 फीसद थी, जो 2010 में बढ़कर करीब 9.5 फीसद हो गई। भारत मजदूरों के खून-पसीने की कीमत पर ही शोहरत और समृद्धि हासिल कर रहा है। एक तरफ देश के नगरों-महानगरों में ऊंची इमारतें हैं, चिकनी-चौड़ी सड़कें हैं जिनमें असंगठित क्षेत्र के मजदूरों का श्रम लगा है। दूसरी तरफ इन्हीं शहरों के चौराहों पर रोज सुबह असंगठित मजदूर काम मिलने की उम्मीद में, कभी-कभी तो शाम तक बैठे रहते हैं, फिर भी उन्हें काम नहीं मिलता। काम मिलने की उम्मीद की सुबह बेबसी की शाम में बदल जाती है। कहीं-कहीं तो इन चौराहों पर मजदूरों की संख्या इतनी ज्यादा होती है, कि ऐसे चौराहों को ‘मजदूर चौक’ का नाम दे दिया जाता है। लोगों को किसी सड़क, कॉलोनी आदि का नाम बदलवाने के लिए लंबे आंदोलन चलाने पड़ते हैं, पर किसी चौक का नाम मजदूर चौक रखवाने के लिए कभी आंदोलन चलाने की जरूरत शायद ही पड़ी हो। कार्य विशेष में कौशल प्राप्त मजदूर इंजीनियर की तरह होता है। फर्क सिर्फ इतना है कि मजदूर करके सीखता है और एक इंजीनियर पढ़कर सीखता है। ज्ञानार्जन का सिद्धांत है कि करके सीखा हुआ ज्ञान, पढ़कर सीखे हुए ज्ञान से बेहतर होता है। अंतरराष्टीय संस्था ‘गैलप’ ने दुनिया के 124 देशों में लोगों के जीवनस्तर से संबंधित एक सव्रेक्षण कराया था। सव्रेक्षण रिपोर्ट के अनुसार बेहतर जीवन जीने के मामले में भारत 71 वें स्थान पर रहा। भारत के करीब 17 फीसद लोग ही अपने जीवद से खुश हैं। 65 फीसद लोग गरीबी एवं बेरोजगारी जैसी समस्याओं से जूझ रहे हैं, इनमें से करीब 20 फीसद गरीबी लोग ऐसे हैं, जो अधिक दुखी हैं। एक अन्य सव्रेक्षण रिपोर्ट में मजदूरों से काम कराने के मामले में भारत को दुनिया का दूसरा सबसे खराब देश माना गया है। करीब 60 फीसद मजदूरों को तनाव की स्थिति में काम करना पड़ता है। असंगठित मजदूरों में दलितों, आदिवासियों की संख्या अधिक है। उन्हें दलित होने की सामाजिक और मजदूर होने की दोहरी कुंठा से जूझना पड़ता है। डॉ. अंबेडकर ने मजदूरों को राजनीतिक आवाज देने के लिए 15 अगस्त 1936 को ‘स्वतंत्र मजदूर पार्टी’ की स्थापना की थी। उन्होंने कहा था,‘मजदूरों के जीवन की संपूर्णता एवं स्वतंत्रता के विरुद्ध काम करने वाली अर्थव्यवस्था को बदल देना या फिर नष्ट कर देना चाहिए।’ देश के नीति-नियंताओं ने अंबेडकर के विचारों से कोई सबक नहीं लिया। मुक्त व्यापार की नीतियों के जश्न में मजदूरों की आर्थिक मुक्ति के मुद्दों को भुला दिया गया है। एक तरफ आर्थिक उदारीकरण के दौर में देश में प्रतिवर्ष करोड़पतियों-अरबपतियों की नई फौज खड़ी हो रही है, तो वहीं दूसरी तरफ उदारीकरण में पनपी आर्थिक क्रूरताएं मजदूर हितों को रौंद रही हैं। आर्थिक उदारीकरण मजदूरों के लिए सख्तीकरण साबित हो रहा है। जब उद्योग डूबने लगते हैं, तो उन्हें आर्थिक पैकेज देकर उबार लिया जाता हैं और जब मजदूरों के हित डूबते हैं, तो उन्हें अधिकांशत: कोरे आासन मिलते हैं। केंद्र सरकार मजदूरों के लिए राष्ट्रीय सामाजिक सुरक्षा योजना लाने के शुभ संकेत तो दे रही है पर यह देखना बाकी है कि यह संकेत जमीनी हकीकत में कब बदलेगा।

Tuesday, November 29, 2011

विकास पर भारी भूख और कुपोषण


योजना आयोग से जुड़े ‘इंस्टीट्यूट ऑफ एप्लायड मैनपावर रिसर्च’ की हाल में जारी मानव विकास रिपोर्ट के मुताबिक देश में मानव विकास सूचकांक 2011 में 1999-2008 के बीच 21 फीसद की वृद्धि हुई है। यह अच्छी खबर है। पर रिपोर्ट में सबसे ज्यादा चौंकाने वाली बात गुजरात के बारे में कही गयी है कि औद्योगिक रूप से विकसित इस राज्य में भूख और कुपोषण की समस्या सबसे अधिक है। उसमें भी अनुसूचित जाति और जनजाति की महिलाएं सबसे ज्यादा कुपोषित हैं। सूचकांक में गुजरात की स्थिति देश के कई छोटे राज्यों से भी खराब है। केरल, हिमाचल प्रदेश, गोवा, जम्मू-कश्मीर और पूवोत्तर राज्यों की स्थिति गुजरात से बेहतर बतायी गई है। यह हमारे देश के उस राज्य की तस्वीर है, जिसका डंका विकास के नाम पर दुनिया भर में बज रहा है कि निवेश के लिए इससे बेहतर कोई दूसरा राज्य नहीं है। अमेरिकी कांग्रेस ने हाल में जारी एक रिपोर्ट में गुजरात के आर्थिक विकास के मॉडल की खूब सराहना की थी। ऐसे में यह जमीनी हकीकत नरेन्द्र मोदी शायद ही सुनना पंसद करें कि उनके विकसित गुजरात में कुपोषितों की तादाद यूपी और ओडिशा जैसे पिछड़े माने जाने वाले राज्यों से ज्यादा है। भूख सूचकांक में भी उसकी हालत यूपी, बंगाल और ओडिशा से खराब है। भूख को लेकर 17 राज्यों में हुए सव्रेक्षण में गुजरात 13वें स्थान पर रहा। कहने का आशय यही है कि केवल आर्थिक विकास से कोई राज्य खुशहाल नहीं हो सकता। भलें ही आज गुजरात औद्योगिक रूप से सम्पन्न राज्य है, पर गरीबों के पेट भरने का इंतजाम करने में व ह यूपी और ओडिशा से भी पीछे है। योजना आयोग की मानव विकास रिपोर्ट ने जाहिर कर दिया है कि गुजरात के विकास का लाभ केवल उद्योग को ही हो रहा है। राज्य में पांच साल की उम्र के 63.7 फीसद बच्चे रक्ताल्पता का शिकार हैं और 44.6 फीसद कुपोषण की मार झेल रहे हैं। यानी पर्याप्त आर्थिक तरक्की के बावजूद पोषण के मामले में वह पीछे छूट गया हैं। सव्रेक्षण के मुताबिक गुजरात, तमिलनाडु, महाराष्ट्र और कर्नाटक में गरीबों की हालत बेहद खराब है। वैिक स्तर पर देखें तो भारत में कुपोषण उससे अधिक गरीब और कम विकसित बांग्लादेश और नेपाल से भी अधिक है। बांग्लादेश में शिशु मृत्युदर 48 प्रति हजार है जबकि भारत में यह 67 प्रति हजार है। यह आंकड़ा उप सहारा अफ्रीकी देशों से भी अधिक है। भारत में कुपोषण दर लगभग 55 प्रतिशत है जबकि अफ्रीका में यह 27 फीसद है। सेव द चिल्ड्रेन रिपोर्ट के अनुसार भारत में रोजना पांच हजार से अधिक बच्चे कुपोषण के चलते मर जाते हैं। देश में हर साल 25 लाख शिशुओं की अकाल मृत्यु होती है तथा 42 फीसद गंभीर कुपोषण का शिकार होते हैं। एक अनुमान के मुताबिक दुनिया में 14,600 बच्चे रोज मर जाते हैं। मतलब वि में कुल मरने वाले बच्चों में एक तिहाई भारत के हैं। यह अलग बात है कि यहां अनाज गोदामों में सड़ जाता है या उसके भंडारण की उचित व्यवस्था नहीं है। बहरहाल 2001 में उच्चतम न्यायालय ने भूख और कुपोषण से लड़ाई के लिए 60 दिशा-निर्देश दिए थे। एक दशक होने वाला है, पर सरकार न्यायालय के दिशा निर्देशों के पालन में नाकाम रही है। नेशनल फैमिली हेल्थ यानी राष्ट्रीय परिवार स्वास्थ्य सव्रेक्षण के तीसरे दौर के आकलन के अनुसार आवश्यक पौष्टिक खुराक न मिलने के कारण भारत में 50 लाख बच्चे प्रति वर्ष मर जाते हैं यानी प्रति छह सेकेंड में एक बच्चा इस कारण दम तोड़ देता है। वि बैंक की रिपोर्ट भी कहती है कि बच्चों की कुल मृत्यु में से आधी केवल आवश्यक न्यूनतम भोजन न मिलने के कारण होती है। मलेरिया, डायरिया, और निमोनिया से होने वाली बाल मृत्यु की घटनाओं के लिए कुपोषण की स्थिति 50 फीसद से भी ज्यादा जिम्मेदार है। वहीं दूसरी तरफ, बच्चों को मिलने वाले भोजन और पोषण को लेकर भी गंभीर चिंता व्यक्त की गई है। इस निमित्त सरकार द्वारा जारी एकीकृत बाल विकास कार्यक्रम व मिड डे मील जैसी योजनाओं के भी संतोषजनक परिणाम नहीं आ रहे हैं। इसीलिए रिपोर्ट में आईसीडीएस को नया रूप देने की सिफारिश की गई है। क्योंकि कुपोषण के कारण दुनिया में भारत की छवि खराब होती जा रही है। कुपोषण के निदान हेतु घरेलू खाद्य सुरक्षा सुनिश्चित करनी होगी। हम ब्राजील से सीख ले सकते हैं जहां भूख और कुपोषण ‘राष्ट्रीय लज्जा’ माना जाता है। इसके लिए एक मजबूत जन समर्पण और पहल जरूरी है।

Saturday, October 15, 2011

भूखे गरीबों का बढ़ता आंकड़ा

सरकार के तथाकथित गंभीर प्रयासों के बावजूद खाद्य पदाथरे की कीमतें लगातार बढ़ रही हैं। कई महीनों से इसकी महंगाई दर नौ प्रतिशत से ऊपर बनी हुई है। उम्मीद थी कि बढ़िया मानसून और भारतीय रिजर्व बैंक के आर्थिक उपायों से कीमतें काबू में आएंगी, पर ऐसा नहीं हुआ। 24 सितम्बर को खत्म हुए सप्ताह में खाद्यों की मंहगाई दर 9.41 प्रतिशत के रिकार्ड स्तर पर पहुंच गई। हालांकि ताजा आकड़ें मामूली गिरावट दर्शा रहे हैं। इस मुसीबत को बढ़ाने में ज्यादा योगदान सब्जियों और फलों का रहा। जैसे-जैसे खाद्यों की कीमतों में इजाफा होता जाता है, वैसे- वैसे गरीब की थाली सिकुड़ती जाती है। यह सिलसिला बहुत नया और केवल अपने देश तक सीमित नहीं है। यह आंच पूरी दुनिया में गरीबों को झुलसा रही है। इसीलिए यह मुद्दा वैिक स्तर पर गंभीर चिंता और बहस का विषय बन गया है। इस साल संयुक्त राष्ट्र के खाद्य एवं कृषि संगठन (एफएओ) की पहल पर दुनिया भर में वि खाद्य दिवस के मौके पर बढ़ती खाद्य कीमतों को मुख्य विषय बनाया गया है। एफएओ की रिपोर्ट कहती है कि 1975 से 2000 के बीच अनाज की कीमतों में ज्यादा उछाल या उलट-फेर नहीं देखा गया। आबादी बढ़ने के बावजूद गरीबों की अनाज तक पहुंच बनी रही क्योंकि उत्पादन बढ़ता रहा। देश में हरित क्रांति के असर के कारण अनाज के गोदाम भरे रहे और कीमतें स्वाभाविक महंगाई के साथ लगभग अनुकूल स्तर पर बनी रहीं। परंतु, 2004 से खाद्य पदाथरे की कीमतें भारत समेत पूरी दुनिया में तेजी से बढ़ने लगीं। इस दौरान कीमतों में लगभग 240 प्रतिशत की बढ़ोतरी हुई जो किसी पैमाने से तर्कसंगत नहीं कही जा सकती। इस उछाल से दुनिया की आबादी का एक बड़ा हिस्सा भुखमरी की गिरफ्त में आ गया। लगभग 20 देशों में अनाज की कमी ने कलह की स्थिति बना दी। वि बैंक के अनुसार 2010-11 में खाद्य कीमतों में बढ़ोतरी के कारण दुनिया के सात करोड़ से ज्यादा लोग भयंकर गरीबी का शिकार हो गये। दरअसल, किसी भी देश में अनाज उपलब्ध होना और अनाज तक गरीबों की पहुंच होना, दो अलग-अलग बातें हैं। अंतरराष्ट्रीय अनुमान है कि अगर किसी व्यक्ति की आय 1.25 अमेरिकी डॉलर (लगभग 60 रुपये) प्रतिदिन से कम हो तो अनाज की कीमतें बढ़ने पर उसे केवल एक समय का भोजन नसीब होगा। एक अनुमान है कि दुनिया के एक अरब से ज्यादा लोगों की आमदनी एक डॉलर प्रतिदिन से कम है और 80 करोड़ लोग भूख का शिकार हैं। दूसरी ओर अपने देश में कुछ दिन पहले ही सरकारी स्तर पर कहा गया कि 32 रुपये हर रोज कमाने वाला व्यक्ति गरीब नहीं है। हालांकि, इसका विरोध होने पर इस परिभाषा को वापस ले लिया गया। बहरहाल, देश में भुखमरी बढ़ती जा रही है। कृषि निवेशों की कीमत बढ़ने के कारण कृषि उत्पादों की लागत अपने-आप बढ़ जाती है। यही वजह है कि सरकार हर साल अनाज के समर्थन मूल्य में बढ़ोतरी कर देती है। इससे भी अनाज की कीमतें बढ़ती हैं और गरीब की थाली कुछ और सिकुड़ जाती है। अंतरराष्ट्रीय खाद्य नीति अनुसंधान संस्थान (इफप्री) द्वारा जारी ताजा रिपोर्ट में बताया गया है कि भारत में खाद्य सुरक्षा खतरनाक स्तर पर है। संस्थान ने दुनिया के 81 विकासशील और गरीब देशों में अध्ययन कर वैिक भूख सूचकांक (ग्लोबल हंगर इंडैक्स) का आकलन किया जिसमें हमारा देश 67वें स्थान पर रहा, दुनिया के केवल 14 देश ही हमसे पीछे हैं। पाकिस्तान, नेपाल, रवांडा और सूडान जैसे देश भी इस कतार में हमसे आगे नजर आते हैं। रिपोर्ट कहती है कि पिछले दस सालों में देश में खाद्य सुरक्षा की स्थिति में विशेष सुधार नहीं हुआ। देश में गरीबी और अनाज की बढ़ती कीमतों के मद्देनजर खाद्य सुरक्षा कानून लागू किये जाने की योजना है। इसके तहत प्रत्येक परिवार को 35 किलोग्राम अनाज देने का प्रस्ताव है। इस कानून में गरीबी की रेखा से नीचे और ऊपर गुजर करने वाले लोगों के लिए अलग-अलग प्रावधान हैं। सरकार कहती है कि इसे शीत सत्र में प्रस्तुत किया जाएगा। गरीब की भूख से जुड़े मसलों का राजनीतिकरण गंभीर चिंता उत्पन्न कर रहा है, क्योंकि भूख तुरंत निदान चाहती है। दुनिया में जहां भी सरकार ने गंभीरता से भुखमरी खत्म करना चाही, वहां कामयाबी मिली। मैक्सिको में 2008 में खाद्य कीमतों में उछाल आया तो सरकार ने गरीबों को नकद सहायता देनी शुरू कर दी। लेकिन शर्त थी कि बच्चे स्कूल जाएं और परिवार के सदस्य स्वास्थ्य केंद्रों में नियमित जांच करायें। इससे खाद्य सुरक्षा के साथ ही पोषण और स्वास्थ्य सुरक्षा भी हुई और शिक्षा का स्तर भी सुधरा। अपने यहां ऐसा कदम उठाने से पहले हमें तमाम मुश्किल और अप्रिय सवालों से जूझना होगा। खाद्य कीमतें बढ़ाने का दोष आमतौर पर बढ़ती आबादी के सिर मढ़ दिया जाता है, परन्तु अपने देश के संदर्भ में इसमें ज्यादा सचाई नहीं दिखाई नहीं देती क्योंकि आबादी के साथ खाद्यान्न उत्पादन में लगातार बढ़ोतरी दर्ज की गई। 1950-51 में महज पांच करोड़ टन से शुरू हुई यह यात्रा अब लगभग 24 करोड़ टन का आंकड़ा पार कर चुकी है। 2020 में देश को 28 करोड़ टन अनाज की जरूरत पड़ेगी जिसे पूरा करने के लिए देश के किसानों और कृषि वैज्ञानिकों, दोनों ने ही पूरी तैयारी कर रखी है। हमारे अनाज के गोदाम भरे पड़े हैं पर समस्या यह है कि अनाज के सुरक्षित भंडारण के लिए जगह की कमी है। आये दिन अनाज सड़ने की खबरें आती हैं। उच्चतम न्यायालय ने दखल देते हुए निर्देश दिया था कि अनाज को सड़ने के लिए छोड़ देने की बजाय गरीबों में बांट दिया जाए। दरअसल समस्या आबादी बढ़ने की नहीं बल्कि अनाज खरीदने की आर्थिक सामथ्र्य न होने की है। गरीबी और भुखमरी के बीच चोली-दामन का रिश्ता है। इस सिलसिले में मनरेगा से काफी आशाएं बंधी हैं क्योंकि इससे ग्रामीणों की आमदनी में इजाफा हुआ है और शहरी पलायन में कुछ हद तक कमी देखने में आई है। परंतु व्यापक गरीबी और अधिनियम की सीमाओं के मद्देनजर इस कार्यक्रम का अपेक्षित असर कम ही दिखाई दे रहा है। आज जरूरत इस बात की है कि खासतौर से ग्रामीण क्षेत्रों में आमदनी बढ़ाने के लिए समग्र कार्यक्रम विकसित कर लागू किये जाए। दरअसल, खेती से होने वाली आमदनी में गिरावट आती जा रही है जिससे गांवों में गरीबी और भुखमरी का जोर बढ़ता जा रहा है। जोत का आकार घटने के साथ आमदनी भी घटती गई है। यही वजह है कि खेती में खुद किसानों की दिलचस्पी कम होती जा रही है। राष्ट्रीय स्तर पर किया गया सव्रेक्षण बताता है कि देश के 40 प्रतिशत किसान खेती का ‘धंधा’ छोड़ने के लिए तैयार बैठे हैं। हाल में गांवों में भूमि अधिग्रहण के मामले को लेकर उठे विवाद में भी ज्यादातर किसानों की दिलचस्पी कृषि भूमि अधिग्रहण से मिलने वाले आकषर्क मुआवजे में थी। कृषि में घटती दिलचस्पी के कारण ही देश के सकल घरेलू उत्पाद में कृषि का योगदान घटकर लगभग 15 प्रतिशत के आसपास रह गया है, जो 1990-91 में 30 प्रतिशत था। ग्रामीण क्षेत्रों में आमदनी बढ़ाकर गरीबों को भुखमरी से बचाने का एक ही रास्ता है- कृषि के साथ कुछ ऐसे घटकों को भी जोड़ा जाए कि कुल आमदनी में इजाफा हो। अपने देश में गरीबी और भुखमरी पर अंकुश लगाने के लिए हमें कृषि क्षेत्र को और अधिक मजबूत तथा आर्थिक रूप से आकषर्क बनाने की जरूरत है। वि खाद्य दिवस इस संकल्प को दोहराने का अवसर है।