| .. साहब, इंदिरा गांधी के कहने पर बसे थे जहां पर! अब आप ही बताओ कि देश का प्रधानमंत्री आपसे कहे कि ऊंची जगह पर बस जाओ तो बताओ कि आप मानते कि नहीं! हमने हां में जवाब दिया। जो उन्होंने कहा कि हमने भी तो यही किया। उनकी बात मान ली तो आज यहां पड़े हैं। इंदिरा जी बरगीनगर आई थीं और उन्होंने खुद आमसभा में कहा था। श्रीमती गांधी ने यह भी कहा था कि सभी परिवारों को पांच-पांच एकड़ जमीन और एक-एक जन को नौकरी भी देंगे। अब वे तो गईं ऊपरे और उनकी फोटो लटकी है, अब समझ में नहीं आए कि कौन से सवाल करें? का उनसे, का उनकी फोटो से, का जा सरकार से? सरकार भी सरकार है, वोट लेवे की दान (बारी) तो भैया-दादा करती है और बाद में सब भूल जाते हैं। फिर थोड़ा रुककर कहते हैं- पंजा और फूल, सबई तो गए भूल।.. यह व्यथा है जबलपुर जिले की मगरधा पंचायत के बढ़ैयाखेड़ा गांव के दशरू और मिट्ठू आदिवासी की। बढ़ैयाखेड़ा को नाववाला गांव कहना शायद ठीक होगा। किसी जमाने में यह गांव भी देश के दूसरे गांवों की तरह था, लेकिन देखते ही देखते यह गांव दूसरे गांवों से अलग हो गया। आज की तारीख में यह गांव तीन ओर से बरगी बांध के पानी से घिरा है और बचा हुआ एकमात्र रास्ता जंगल की ओर जाता है। मतलब यह कि अगर इस गांव से किसी को कहीं जाना है तो उसे पानीवाले रास्ते से ही नाव में बैठकर जाना होता है और वह भी कम से कम 10 किलोमीटर तक। अगर किसी को दिल को दौरा भी पड़ जाए और यदि उसे जीना है तो उसे अपने दिल को कम से कम तीन घंटे तो धड़काना ही होगा, तब कहीं जाकर उसे बरगीनगर में न्यूनतम स्वास्थ्य सुविधा नसीब हो पाएगी। और, वह भी तत्काल किश्ती मिल जाए तभी यह संभव है। सुसाइटी यानी राशन दुकान से राशन लाना है तो भी किश्ती और हाट-बाजार करना है तो भी किश्ती। यानी किश्ती के सहारे चल रहा है जीवन इनका। कहीं भी जाओ, एक तरफ का 10 रुपया। दशरू कहते हैं- पहले अपनी खेती थी तो ठाठ से रहते थे। क्या नहीं था हमारे पास। मेरी 10 एकड़ जमीन थी, मकान था, महुए के 15 पेड़, आम के 2 पेड़, सागौन के 5 पेड़, 18 मवेशी थे। दो फसल लेते थे। जुवार, बाजरा, मक्का, तिल्ली, कोदो, कुटकी, धान, समा, उड़द, मूंग, रहर, अलसी, गेहूं, चना, सरसों, बटरा और सब्जी-भाजी जैसी कई चीजें। नमक और गुड़ के अलावा कभी कुछ नहीं लिया बाजार से हमने। तेल तक अपना पिरवा लेते थे हम। अब इससे बड़ा दुर्भाग्य क्या होगा कि शिवरात्रि पर भोले को चढ़ने वाली गेहूं की बाली भी दूसरे गांव से लाते हैं। पहले चना-महुआ का तो भोजन था, साहब। पर आज तो सुसाइटी से 20 किलो लात हैं और आधो दूधो (आधे पेट) खात हैं। उसमें भी आने-जाने के किश्ती से 20 रुपए लगते हैं और कहीं उस दिन दुकान नहीं खुली तो राम-राम।.. मालूम हो कि रानी अवंतीबाई परियोजना अंतर्गत नर्मदा नदी पर बने सबसे पहले विशाल बांध बरगी से मंडला, सिवनी व जबलपुर जिले के 162 गांव प्रभावित हुए हैं और जिनमें से 82 गांव पूर्णत: डूबे हुए हैं। सरकारी आंकड़ों के मुताबिक लगभग 7000 विस्थापित परिवार हैं, इनमें से 43 प्रतिशत आदिवासी, 12 प्रतिशत दलित, 38 प्रतिशत पिछड़ी जाति व 7 प्रतिशत अन्य हैं। जबकि बरगी बांध विस्थापित व प्रभावित संघ की मानें तो इस बांध से इलाके के 10 से 12 हजार परिवार विस्थापित हैं। इस बांध के कारण इलाके की जो 20 हजार एकड़ जमीन और घने जंगल पूरे या आधे डूबे, उनमें दशरू का बढै़याखेड़ा गांव भी एक है। जबलपुर जिले के इस पूर्ण डूब वाले गांव में सरकारी आंकड़ों के अनुसार 25 परिवार रहते हैं। लेकिन सरकारी झूठ की हकीकत यह है कि यहां आज भी 42 परिवार रहते हैं। माहू ढीमर, जो अपने आपको गांव का कोटवार मानते हैं, बताते हैं- हमारे गांव का खेती की जमीन का रकबा 1600 एकड़ का था और अब तो चारों तरफ मैया ही मैया है यानी पानी ही पानी है। हमारे जंगल कहां गए? माहू पानी की ओर इशारा करते हुए कहते हैं- यहीं नीचे ही हैं। हम तो वो दवाई भी भूल ही गए, जो जंगल से मिलती थी। अपना इलाज खुद करना जानते हैं। पहले नीचे पांचवीं तक का स्कूल था। हम 1986 में यहां आए और उसके बाद 10 साल यहां कोई स्कूल नहीं था। 1997 से यहां पर स्कूल बना, लेकिन इस 10 साल में तो हमारी एक पीढ़ी का भविष्य दांव पर लग गया। माहू के अनुसार, गांव में आंगनबाड़ी भी बहुत बाद में बनी और वह भी ना के बराबर ही है। कभी खुलती है तो कभी नहीं। आवागमन के साधन के अभाव में जननी सुरक्षा योजना से लाभ मिलने का सवाल ही गैर-वाजिब है। लेकिन लोगों से पूछने पर वो बताते हैं कि यहां सभी प्रसव घरों में ही होते हैं और दाई के ना होने के कारण स्थानीय महिलाएं ही कराती हैं। ऐसे में राष्ट्रीय मातृत्व सहायता योजना का नाम आता है तो इससे लाभ लेने का प्रतिशत भी शून्य ही है। सरकारी रिपोर्ट की ही मानें तो विस्थापन के बाद से परिवारों का मुख्य व्यवसाय कृषि के स्थान पर मजदूरी रह गया है। कृषि, बांस के सामान, किराना, लुहारगीरी जैसे व्यवसायों में गिरावट आई है, जबकि मजदूरी, मछली मारने, सब्जी-भाजी, पशुपालन आदि में लोग संलग्न हैं। मजदूरी में अप्रत्याशित रूप से बढ़ोतरी हुई है। इसका असर इस गांव में भी देखने को मिलता है। इस गांव के 80 प्रतिशत लोग पलायन पर गए हैं। कोई जबलपुर में निर्माण मजदूरी कर रहा है तो कोई नरसिंहपुर में खेती की मजूरी करने गया है। इस गांव के नवयुवक अभी बाणसागर, खुडिया डैम में मछली मारने गए हैं। तीन-चार महीने मारेंगे। |
Thursday, February 10, 2011
विकास के विनाश का टापू
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