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Sunday, April 10, 2011

यह जीत आपकी है..


अभी हमें आगे चलना है। बहुत लंबा रस्ता है ये। मैं, ये तय किया है कि मेरा उम्र है 73 साल, लेकिन पूरे देश में मैं घूमता रहूंगा। और, इसलिए घूमता रहूंगा कि लोगों से संपर्क बनाकर रखना जरूरी है। वो संपर्क इसलिए बनाकर रखना है कि जो आज इस आंदोलन से बहुत बड़ी शक्ति मुझे प्राप्त हुई है, और वो शक्ति के आधार पर पूरे देश में संपर्क बनाकर रहूंगा। हर राज्य में और राज्यों से नीचे तक। एक संगठन बन जाए। लेकिन संगठन में स्वच्छ आदमी आना चाहिए। शुद्ध आचार, शुद्ध विचार, निष्कलंक जीवन, जीवन में त्याग, अपमान सहने की शक्ति होनी चाहिए। चरित्रवान लोगों का संगठन। क्योकि चरित्र में बहुत बड़ी शक्ति है।अन्ना हजारेदिल्ली के जंतर मंतर पर अनशन समाप्त करते वक्त अन्ना हजारे का दिया गया भाषण। यह भाषण करीब 15-17 मिनट का था, जो 11 बजे शुरू हुआ। इसी भाषण के साथ अन्ना हजारे ने अपना अनशन समाप्त कर दियाइस अांदोलन में जिन-जिन लोगों ने तन से-मन से-धन से सहयोग किया है, मैं उन सबका धन्यवाद करता हूं। एक बात मैं कहना चाहता हूं कि लोकपाल बिल का काम बन गया। अभी हमारी जिम्मेदारी बढ़ गई है। बहुत बड़ा लम्बा रास्ता ऐसा हमें तय करना है- दूसरी आजादी के लिए। इसमें सरकार ने मसौदा बनाया है, अभी हमें पूरा ड्राफ्ट बनाना है। उसके लिए भी हमें आगे जहां जरूरत पड़े, वहां संघर्ष करना पड़ेगा। पहला संघर्ष है मसौदा पूरा होने तक। दूसरा संघर्ष है मसौदा बनने के बाद। मंत्रिमंडल के सामने ये जो ड्राफ्ट आएगा तो मंत्रिमंडल ने उनको मान्यता देने के लिए जरूरत पड़े तो फिर से हम आंदोलन की तैयारी करें। तीसरी बात ये है कि मंत्रिमंडल ने भी मंजूरी दे दिया तो लोकसभा में जाएगा। अगर लोकसभा में भी कोई अडं़गा आ गया तो जैसा बहन ने बताया कि तिरंगा मेरे कंधे पर होगा और हम संसद को घेरने चलेंगे। लोकसभा पर जाएंगे।

दूसरी बात आप लोगों से मैं कहना चाहता हूं कि प्रश्न बहुत है, अभी देश में। प्रश्न बहुत हैं। सभी प्रश्न हम एक ही साथ में नहीं छुड़ा पाएंगे। लेकिन जैसे किसानों के प्रश्न हैं। शिक्षा क्षेत्र के प्रश्न हैं। मजदूरों के प्रश्न हैं। सही प्रश्न हैं। लेकिन हमें दो-तीन बातों का शुरू-शुरू में ध्यान रखना है। लोकपाल बिल के पास होने के बाद हमें- भ्रष्टाचार को रोकने के लिए सत्ता का विकेद्रीकरण करो, मतदारों के हाथ में जबतक सत्ता नहीं जाएगी, तबतक भ्रष्टाचार को रोक नहीं लगेगा- हमें उस बात को भी सोचना है, आगे के लिए। उसके लिए ग्रामसभा, नगर पालिका नगर परिषद में पालिका सभा बनाना है। जैसे ग्रामसभा में राइट टु रिकाल सरपंच है, वैसे ही पालिका में अगर कोई जनता से पूछे बिना पैसा खर्च करता है तो उसको राइट टु रिकाल कॉरपोरेटर- इन बातों को हमें सोचना है।

तीसरा है, ये पॉलिटिकल सिस्टम को बदलना है। इलेक्ट्रिक सिस्टम (इलेक्ट्रॉनिक वोटिंग मशीन) को बदलना है। मैंने सरकार को लेटर लिखा। अभी सरकार इसके लिए राजी हो गई है। लेकिन देखना है। यह वोटिंग के लिए बराबर नहीं है। इसमें गड़बड़ी होती है। गड़बड़ न होनेवाली सिस्टम ले आनी है। लेकिन आगे के लिए आपको-हमको-सबको खड़ा होना है। इसके अलावा एक मतदार संघ में दस लोग खड़े हैं, मतदार कहता है कि दसों लोग चोर हैं तो वोटिंग किसको देना है, तो इसलिए दसवां चिन्ह डाल दो- नापसंदी। और, दस उम्मीदवार से नापसंदी पर ज्यादा वोट डाल दिया तो इलेक्शन कैंसिल। नया इलेक्शन करो। करो बंटवारा, कहां तक करते हो पैसे का? करो। एक इलेक्शन रद्द हुआ और तीन करोड़ रुपया पानी में गया तो इनका दिमाग जगह पर आ जाएगा। वो बात हमें करनी है।

आगे के लिए हमें जो लंबा रास्ता तय करना है, उसमें हमें ये बातें करनी हैं। आज तो हमने एक लड़ाई जीती है। ये जीत मीडिया की है। प्रेस की है। लोगों की है। देश के जो भाई-बहन ने आंदोलन छेड़ा, उन सबकी जीत है। मेरी नहीं, ये सबकी जीत है।

अभी आंदोलन की ये शुरुआत हुई है। आज लोकपाल बिल का निर्णय लेकर लड़ाई की शुरुआत हो गई है। दूसरी आजादी की लड़ाई की शुरुआत हो गई है। अभी हमें आगे चलना है। बहुत लंबा रस्ता है ये। मैं, ये तय किया है कि मेरा उम्र है 73 साल, लेकिन पूरे देश में मैं घूमता रहूंगा। और, इसलिए घूमता रहूंगा कि लोगों से संपर्क बनाकर रखना जरूरी है। वो संपर्क इसलिए बनाकर रखना है कि जो आज इस आंदोलन से बहुत बड़ी शक्ति मुझे प्राप्त हुई है, और वो शक्ति के आधार पर पूरे देश में संपर्क बनाकर रहूंगा। हर राज्य में और राज्यों से नीचे तक। एक संगठन बन जाए। लेकिन संगठन में स्वच्छ आदमी आना चाहिए। शुद्ध आचार, शुद्ध विचार, निष्कलंक जीवन, जीवन में त्याग, अपमान सहने की शक्ति होनी चाहिए। चरित्रवान लोगों का संगठन। क्योकि चरित्र में बहुत बड़ी शक्ति है। 

सब भाई-बहनों को मेरी विनती है। एक रस्ता शुरू हो गया- लोकपाल बिल आने के बाद, हमें कई जगह पर संघर्ष करना पड़ेगा। उसके बाद देश के सामने दो-तीन जो प्रश्न हैं, उसको लेकर आगे बढ़ना है। जैसे आज का आंदोलन हुआ है, वैसे ही इन दो-तीन प्रश्नों पर हम पूरे देश में आंदोलन करेंगे। और, आजादी की दूसरी लड़ाई जीतेंगे। जीतेंगे। 

मैं आप सबके लिए धन्यवाद देता हूं। बधाई देना चाहता हूं और फिर से दोहराना चाहता हूं कि जीत आपकी है। शहीद भगत सिंह, राजगुरू, सुखदेव- इन्होंने हमारे ऊपर जो अहसान करके रखा, वो कभी नहीं चुका सकते हम। इसी रास्ते से जाकर कुछ हद तक हम उनका अहसान चुका पाएंगे। हम सबको मिलकर आगे के लिए आजादी की दूसरी लड़ाई लड़नी है। मैं सबके लिए फिर से धन्यवाद करता हूं।

जय हिन्द! जय भारत!


क्या है जनप्रियता की कसौटी


Thursday, February 10, 2011

विकास के विनाश का टापू


.. साहब, इंदिरा गांधी के कहने पर बसे थे जहां पर! अब आप ही बताओ कि देश का प्रधानमंत्री आपसे कहे कि ऊंची जगह पर बस जाओ तो बताओ कि आप मानते कि नहीं! हमने हां में जवाब दिया। जो उन्होंने कहा कि हमने भी तो यही किया। उनकी बात मान ली तो आज यहां पड़े हैं। इंदिरा जी बरगीनगर आई थीं और उन्होंने खुद आमसभा में कहा था। श्रीमती गांधी ने यह भी कहा था कि सभी परिवारों को पांच-पांच एकड़ जमीन और एक-एक जन को नौकरी भी देंगे। अब वे तो गईं ऊपरे और उनकी फोटो लटकी है, अब समझ में नहीं आए कि कौन से सवाल करें? का उनसे, का उनकी फोटो से, का जा सरकार से? सरकार भी सरकार है, वोट लेवे की दान (बारी) तो भैया-दादा करती है और बाद में सब भूल जाते हैं। फिर थोड़ा रुककर कहते हैं- पंजा और फूल, सबई तो गए भूल।.. यह व्यथा है जबलपुर जिले की मगरधा पंचायत के बढ़ैयाखेड़ा गांव के दशरू और मिट्ठू आदिवासी की। बढ़ैयाखेड़ा को नाववाला गांव कहना शायद ठीक होगा। किसी जमाने में यह गांव भी देश के दूसरे गांवों की तरह था, लेकिन देखते ही देखते यह गांव दूसरे गांवों से अलग हो गया। आज की तारीख में यह गांव तीन ओर से बरगी बांध के पानी से घिरा है और बचा हुआ एकमात्र रास्ता जंगल की ओर जाता है। मतलब यह कि अगर इस गांव से किसी को कहीं जाना है तो उसे पानीवाले रास्ते से ही नाव में बैठकर जाना होता है और वह भी कम से कम 10 किलोमीटर तक।

अगर किसी को दिल को दौरा भी पड़ जाए और यदि उसे जीना है तो उसे अपने दिल को कम से कम तीन घंटे तो धड़काना ही होगा, तब कहीं जाकर उसे बरगीनगर में न्यूनतम स्वास्थ्य सुविधा नसीब हो पाएगी। और, वह भी तत्काल किश्ती मिल जाए तभी यह संभव है। सुसाइटी यानी राशन दुकान से राशन लाना है तो भी किश्ती और हाट-बाजार करना है तो भी किश्ती। यानी किश्ती के सहारे चल रहा है जीवन इनका। कहीं भी जाओ, एक तरफ का 10 रुपया। दशरू कहते हैं- पहले अपनी खेती थी तो ठाठ से रहते थे। क्या नहीं था हमारे पास। मेरी 10 एकड़ जमीन थी, मकान था, महुए के 15 पेड़, आम के 2 पेड़, सागौन के 5 पेड़, 18 मवेशी थे। दो फसल लेते थे। जुवार, बाजरा, मक्का, तिल्ली, कोदो, कुटकी, धान, समा, उड़द, मूंग, रहर, अलसी, गेहूं, चना, सरसों, बटरा और सब्जी-भाजी जैसी कई चीजें। नमक और गुड़ के अलावा कभी कुछ नहीं लिया बाजार से हमने। तेल तक अपना पिरवा लेते थे हम। अब इससे बड़ा दुर्भाग्य क्या होगा कि शिवरात्रि पर भोले को चढ़ने वाली गेहूं की बाली भी दूसरे गांव से लाते हैं। पहले चना-महुआ का तो भोजन था, साहब। पर आज तो सुसाइटी से 20 किलो लात हैं और आधो दूधो (आधे पेट) खात हैं। उसमें भी आने-जाने के किश्ती से 20 रुपए लगते हैं और कहीं उस दिन दुकान नहीं खुली तो राम-राम।.. मालूम हो कि रानी अवंतीबाई परियोजना अंतर्गत नर्मदा नदी पर बने सबसे पहले विशाल बांध बरगी से मंडला, सिवनी व जबलपुर जिले के 162 गांव प्रभावित हुए हैं और जिनमें से 82 गांव पूर्णत: डूबे हुए हैं। सरकारी आंकड़ों के मुताबिक लगभग 7000 विस्थापित परिवार हैं, इनमें से 43 प्रतिशत आदिवासी, 12 प्रतिशत दलित, 38 प्रतिशत पिछड़ी जाति व 7 प्रतिशत अन्य हैं। जबकि बरगी बांध विस्थापित व प्रभावित संघ की मानें तो इस बांध से इलाके के 10 से 12 हजार परिवार विस्थापित हैं। इस बांध के कारण इलाके की जो 20 हजार एकड़ जमीन और घने जंगल पूरे या आधे डूबे, उनमें दशरू का बढै़याखेड़ा गांव भी एक है। जबलपुर जिले के इस पूर्ण डूब वाले गांव में सरकारी आंकड़ों के अनुसार 25 परिवार रहते हैं। लेकिन सरकारी झूठ की हकीकत यह है कि यहां आज भी 42 परिवार रहते हैं। माहू ढीमर, जो अपने आपको गांव का कोटवार मानते हैं, बताते हैं- हमारे गांव का खेती की जमीन का रकबा 1600 एकड़ का था और अब तो चारों तरफ मैया ही मैया है यानी पानी ही पानी है। हमारे जंगल कहां गए?

माहू पानी की ओर इशारा करते हुए कहते हैं- यहीं नीचे ही हैं। हम तो वो दवाई भी भूल ही गए, जो जंगल से मिलती थी। अपना इलाज खुद करना जानते हैं। पहले नीचे पांचवीं तक का स्कूल था। हम 1986 में यहां आए और उसके बाद 10 साल यहां कोई स्कूल नहीं था। 1997 से यहां पर स्कूल बना, लेकिन इस 10 साल में तो हमारी एक पीढ़ी का भविष्य दांव पर लग गया। माहू के अनुसार, गांव में आंगनबाड़ी भी बहुत बाद में बनी और वह भी ना के बराबर ही है। कभी खुलती है तो कभी नहीं। आवागमन के साधन के अभाव में जननी सुरक्षा योजना से लाभ मिलने का सवाल ही गैर-वाजिब है। लेकिन लोगों से पूछने पर वो बताते हैं कि यहां सभी प्रसव घरों में ही होते हैं और दाई के ना होने के कारण स्थानीय महिलाएं ही कराती हैं। ऐसे में राष्ट्रीय मातृत्व सहायता योजना का नाम आता है तो इससे लाभ लेने का प्रतिशत भी शून्य ही है।

सरकारी रिपोर्ट की ही मानें तो विस्थापन के बाद से परिवारों का मुख्य व्यवसाय कृषि के स्थान पर मजदूरी रह गया है। कृषि, बांस के सामान, किराना, लुहारगीरी जैसे व्यवसायों में गिरावट आई है, जबकि मजदूरी, मछली मारने, सब्जी-भाजी, पशुपालन आदि में लोग संलग्न हैं। मजदूरी में अप्रत्याशित रूप से बढ़ोतरी हुई है। इसका असर इस गांव में भी देखने को मिलता है। इस गांव के 80 प्रतिशत लोग पलायन पर गए हैं। कोई जबलपुर में निर्माण मजदूरी कर रहा है तो कोई नरसिंहपुर में खेती की मजूरी करने गया है। इस गांव के नवयुवक अभी बाणसागर, खुडिया डैम में मछली मारने गए हैं। तीन-चार महीने मारेंगे।