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Tuesday, February 15, 2011

लोकतंत्र में जूती-चप्पल की तूती


मायावती का जूती-प्रकरण चरण वंदना और चमचागीरी का ही प्रतीक है। हमारी लोकतांत्रिक व्यवस्था चरण वंदना और चमचागीरी के फांस कैसे फंसी और लोकतांत्रिक मूल्यों की गरिमा कैसे मुक्त होगी, विचार का असली विषय यही है। इसलिए भी कि एक पुलिस अधिकारी द्वारा मायावती की जूती साफ करना अकेली घटना नहीं है। अगर आपकी स्मृति में यह प्रकरण अकेली घटना है तो आप अपनी स्मृति इन तथ्यों के साथ वापस ला सकते हैं। इसके पूर्व लोकतंत्र में ऐसी कई घटनाएं घटी हैं, जो शर्मशार करने वाली रही हैं। याद किया जा सकता है कि उत्तर प्रदेश के तत्कालीन मुख्यमंत्री नारायण दत्त तिवारी और महाराष्ट्र के तत्कालीन मुख्यमंत्री शंकर राव चव्हाण ने चमचागीरी की हदें पार करते हुए कभी संजय गांधी की चप्पल ढोयी थी। उस काल में संजय गांधी अराजकता और समानांतर सत्ता के केंद्र हुआ करते थे।

अभी पिछले ही वर्ष महाराष्ट्र दौरे पर गए राहुल गांधी की चप्पल महाराष्ट्र के गृहराज्य मंत्री रमेश ने साफ किए थे और उठाकर चला था। इंदिरा गांधी के मंत्रिमंडल में मंत्री भीष्म नारायण सिंह को चप्पल उठाते हुए मैंने चक्रवर्ती नामक जिलाधिकारी को खुद देखा था। जैसे ही मायावती के जूती प्रकरण की लाइव स्टोरी आई और कुख्यात हुई, वैसे ही रिजवान रजा नामक एक राजनीतिक कार्यकर्ता ने जो रहस्योद्घाटन किए, वह और भी विचलित करने वाला था, क्योंकि यह रहस्योद्घाटन एक बड़े और संघषर्शील समाजवादी से संबंधित था। कभी समाजवादी रहे वह शख्स कांग्रेस में शामिल होने के बाद जनार्दन द्विवेदी जैसे नेताओं के पैर छूने लगे। चरण वंदना या फिर जूती-चप्पल उठाकर साफ करके खुश करने और तरक्की पाने की यह प्रवृत्ति क्या रुकेगी? लोकतंत्र के जितने भी स्तंभ हैं, उन सभी स्तंभों में यह बुराई तरक्की के मापदंड के रूप में विकसित हो चुकी है। सत्ता में बैठे हुई शख्सियतों को यह बुराई बेहद आकषिर्त करती है। इसलिए कि ऐसे लोगों से उन्हें न तो कभी चुनौती मिल सकती है और न ही उनके नापाक मंसूबों पर कोई असर पड़ सकता है। भाजपा और वामपंथी पार्टियां भी चमचागीरी और चरण वंदना के बंधन से मुक्त नहीं हैं। लोकतंत्र में विश्वास करने वाले लोगों के बीच चिंता के कारण यही हैं।

लोकतंत्र को चरण वंदना और चमचागीरी का पर्याय बनाया कौन? क्या हमारी लोकतांत्रिक व्यवस्था भविष्य में ऐसी बुराई या प्रवृति से मुक्त होगी? वह भी उस स्थिति में, जब हमारी लोकतांत्रिक व्यवस्था पूरी तरह से धनबल-बाहुबल जैसे खतरनाक कारकों के फांस में फंसी हुई है? क्या मायावती के जूती प्रकरण से भारतीय राजनीतिक संवर्ग अपनी छवि सुधारने और लोकतांत्रिक मूल्यों की समृद्धि जैसी प्रक्रिया को आगे बढ़ाएगा? उम्मीद कोई खास नहीं बनती है। नाउम्मीदी की चादर ही चौड़ी होती हुई दिखती है। आजादी के मूल्यों का ह्रास तेजी के साथ हुआ है। राजनीति में अब समाजसेवा की कल्पना नाममात्र की ही रह गई है। तरक्की और शोहरत पाने का रास्ता जायज और नाजायज में भेद किए बिना बढ़ता है। रीढ़ वाले और लोकतांत्रिक मूल्यों के प्रति अटूट संकल्प रखने वाले लोग हाशिए पर खड़े मिलते हैं। विजय माल्या-मुकेश अंबानी जैसे लोग आदर्श बन रहे हैं। महात्मा गांधी, सरदार भगत सिंह, सुभाष चंद्र बोस और सरदार पटेल जैसे महापुरुषों के आदर्श सिर्फ सिनेमा-नाटकों और राजनीतिक मंचों तक सीमित रह गए हैं।

प्रसिद्ध समाजवादी विचारक राममनोहर लोहिया की वह उक्ति भारतीय राजनीति में आज भी प्रांसागिक है, जिसमें उन्होंने साफतौर पर कहा था कि देश की सभी समस्याओं और नकारात्मक प्रवृत्तियों के लिए कांग्रेस दोषी है। भारतीय राजनीति और लोकतांत्रिक व्यवस्था को चमचागीरी और चरण वंदना का प्रतीक बनाने का पाप भी कांग्रेस पर है। जहां तक मायावती की बात है तो वह दलित हैं और दलित-मनोदशाएं ऐसी प्रवृत्तियों से संतुष्ट होती हैं। मायावती प्रारंभ से ही ऐसी प्रवृत्तियों से राजनीतिक दूरियां तय की है। वह जानती हैं कि ऐसी प्रवृत्तियों से उनका कोई राजनीतिक नुकसान नहीं होगा। उनका जो समर्थन संवर्ग है, वह ऐसी प्रवृत्तियों से चमत्कृत ही होता है। लेकिन मायावती को लोकतांत्रिक मूल्यों का भान होना चाहिए। चरण वंदना और चमचागीरी से इतिहास नहीं बनता और न ही बनाया जा सकता है। मायावती की यह प्रवृत्ति उनकी सत्ता का भी संहार कर सकती है। ऐसी प्रवृत्तियों से नुकसान आखिर अच्छे, संघषर्शील और ईमानदार लोगों को ही होता है। रीढ़विहीन लोग आगे बढ़ जाते हैं। मूल्यों का जो तेजी से ह्रास हो रहा है, उसके पीछे भी ऐसी ही प्रवृत्तियां नकारात्मक प्रभाव डालती हैं। कमजोर और रीढ़विहीन लोग ऊंचे पदों पर बैठ जाते हैं और अपने नापाक मंसूबों से लोकतंत्र के मूल्यों को हाशिए पर खड़े कर दलीय और स्वहित साधते हैं। यही कारण है कि आज हम भ्रष्टाचार और नैतिक मूल्यों के संकट से घिरे हुए हैं। अगर शुचिता लानी है और लोकतंत्र के मूल्यों की समृद्धि चाहते हैं तो ऐसी प्रवृत्तियों के खिलाफ जनजागरूकता लानी ही होगी। राजनीतिक दलों को भी ऐसी प्रवृत्तियों से शर्म करनी चाहिए। क्या मायावती ऐसी प्रवृत्तियों को बढ़ावा नहीं देंगी? ऐसी उम्मीद भी तो नहीं बनती है।


Thursday, February 10, 2011

विकास के विनाश का टापू


.. साहब, इंदिरा गांधी के कहने पर बसे थे जहां पर! अब आप ही बताओ कि देश का प्रधानमंत्री आपसे कहे कि ऊंची जगह पर बस जाओ तो बताओ कि आप मानते कि नहीं! हमने हां में जवाब दिया। जो उन्होंने कहा कि हमने भी तो यही किया। उनकी बात मान ली तो आज यहां पड़े हैं। इंदिरा जी बरगीनगर आई थीं और उन्होंने खुद आमसभा में कहा था। श्रीमती गांधी ने यह भी कहा था कि सभी परिवारों को पांच-पांच एकड़ जमीन और एक-एक जन को नौकरी भी देंगे। अब वे तो गईं ऊपरे और उनकी फोटो लटकी है, अब समझ में नहीं आए कि कौन से सवाल करें? का उनसे, का उनकी फोटो से, का जा सरकार से? सरकार भी सरकार है, वोट लेवे की दान (बारी) तो भैया-दादा करती है और बाद में सब भूल जाते हैं। फिर थोड़ा रुककर कहते हैं- पंजा और फूल, सबई तो गए भूल।.. यह व्यथा है जबलपुर जिले की मगरधा पंचायत के बढ़ैयाखेड़ा गांव के दशरू और मिट्ठू आदिवासी की। बढ़ैयाखेड़ा को नाववाला गांव कहना शायद ठीक होगा। किसी जमाने में यह गांव भी देश के दूसरे गांवों की तरह था, लेकिन देखते ही देखते यह गांव दूसरे गांवों से अलग हो गया। आज की तारीख में यह गांव तीन ओर से बरगी बांध के पानी से घिरा है और बचा हुआ एकमात्र रास्ता जंगल की ओर जाता है। मतलब यह कि अगर इस गांव से किसी को कहीं जाना है तो उसे पानीवाले रास्ते से ही नाव में बैठकर जाना होता है और वह भी कम से कम 10 किलोमीटर तक।

अगर किसी को दिल को दौरा भी पड़ जाए और यदि उसे जीना है तो उसे अपने दिल को कम से कम तीन घंटे तो धड़काना ही होगा, तब कहीं जाकर उसे बरगीनगर में न्यूनतम स्वास्थ्य सुविधा नसीब हो पाएगी। और, वह भी तत्काल किश्ती मिल जाए तभी यह संभव है। सुसाइटी यानी राशन दुकान से राशन लाना है तो भी किश्ती और हाट-बाजार करना है तो भी किश्ती। यानी किश्ती के सहारे चल रहा है जीवन इनका। कहीं भी जाओ, एक तरफ का 10 रुपया। दशरू कहते हैं- पहले अपनी खेती थी तो ठाठ से रहते थे। क्या नहीं था हमारे पास। मेरी 10 एकड़ जमीन थी, मकान था, महुए के 15 पेड़, आम के 2 पेड़, सागौन के 5 पेड़, 18 मवेशी थे। दो फसल लेते थे। जुवार, बाजरा, मक्का, तिल्ली, कोदो, कुटकी, धान, समा, उड़द, मूंग, रहर, अलसी, गेहूं, चना, सरसों, बटरा और सब्जी-भाजी जैसी कई चीजें। नमक और गुड़ के अलावा कभी कुछ नहीं लिया बाजार से हमने। तेल तक अपना पिरवा लेते थे हम। अब इससे बड़ा दुर्भाग्य क्या होगा कि शिवरात्रि पर भोले को चढ़ने वाली गेहूं की बाली भी दूसरे गांव से लाते हैं। पहले चना-महुआ का तो भोजन था, साहब। पर आज तो सुसाइटी से 20 किलो लात हैं और आधो दूधो (आधे पेट) खात हैं। उसमें भी आने-जाने के किश्ती से 20 रुपए लगते हैं और कहीं उस दिन दुकान नहीं खुली तो राम-राम।.. मालूम हो कि रानी अवंतीबाई परियोजना अंतर्गत नर्मदा नदी पर बने सबसे पहले विशाल बांध बरगी से मंडला, सिवनी व जबलपुर जिले के 162 गांव प्रभावित हुए हैं और जिनमें से 82 गांव पूर्णत: डूबे हुए हैं। सरकारी आंकड़ों के मुताबिक लगभग 7000 विस्थापित परिवार हैं, इनमें से 43 प्रतिशत आदिवासी, 12 प्रतिशत दलित, 38 प्रतिशत पिछड़ी जाति व 7 प्रतिशत अन्य हैं। जबकि बरगी बांध विस्थापित व प्रभावित संघ की मानें तो इस बांध से इलाके के 10 से 12 हजार परिवार विस्थापित हैं। इस बांध के कारण इलाके की जो 20 हजार एकड़ जमीन और घने जंगल पूरे या आधे डूबे, उनमें दशरू का बढै़याखेड़ा गांव भी एक है। जबलपुर जिले के इस पूर्ण डूब वाले गांव में सरकारी आंकड़ों के अनुसार 25 परिवार रहते हैं। लेकिन सरकारी झूठ की हकीकत यह है कि यहां आज भी 42 परिवार रहते हैं। माहू ढीमर, जो अपने आपको गांव का कोटवार मानते हैं, बताते हैं- हमारे गांव का खेती की जमीन का रकबा 1600 एकड़ का था और अब तो चारों तरफ मैया ही मैया है यानी पानी ही पानी है। हमारे जंगल कहां गए?

माहू पानी की ओर इशारा करते हुए कहते हैं- यहीं नीचे ही हैं। हम तो वो दवाई भी भूल ही गए, जो जंगल से मिलती थी। अपना इलाज खुद करना जानते हैं। पहले नीचे पांचवीं तक का स्कूल था। हम 1986 में यहां आए और उसके बाद 10 साल यहां कोई स्कूल नहीं था। 1997 से यहां पर स्कूल बना, लेकिन इस 10 साल में तो हमारी एक पीढ़ी का भविष्य दांव पर लग गया। माहू के अनुसार, गांव में आंगनबाड़ी भी बहुत बाद में बनी और वह भी ना के बराबर ही है। कभी खुलती है तो कभी नहीं। आवागमन के साधन के अभाव में जननी सुरक्षा योजना से लाभ मिलने का सवाल ही गैर-वाजिब है। लेकिन लोगों से पूछने पर वो बताते हैं कि यहां सभी प्रसव घरों में ही होते हैं और दाई के ना होने के कारण स्थानीय महिलाएं ही कराती हैं। ऐसे में राष्ट्रीय मातृत्व सहायता योजना का नाम आता है तो इससे लाभ लेने का प्रतिशत भी शून्य ही है।

सरकारी रिपोर्ट की ही मानें तो विस्थापन के बाद से परिवारों का मुख्य व्यवसाय कृषि के स्थान पर मजदूरी रह गया है। कृषि, बांस के सामान, किराना, लुहारगीरी जैसे व्यवसायों में गिरावट आई है, जबकि मजदूरी, मछली मारने, सब्जी-भाजी, पशुपालन आदि में लोग संलग्न हैं। मजदूरी में अप्रत्याशित रूप से बढ़ोतरी हुई है। इसका असर इस गांव में भी देखने को मिलता है। इस गांव के 80 प्रतिशत लोग पलायन पर गए हैं। कोई जबलपुर में निर्माण मजदूरी कर रहा है तो कोई नरसिंहपुर में खेती की मजूरी करने गया है। इस गांव के नवयुवक अभी बाणसागर, खुडिया डैम में मछली मारने गए हैं। तीन-चार महीने मारेंगे।