यह कोई अपमानजनक शब्द नहीं, बल्कि विश्व-विख्यात मुहावरा है। यूजफुल इडियट्स नाम से बीबीसी ने गत वर्ष एक ज्ञानवर्द्धक डॉक्यूमेंट्री भी बनाई है। इस कवित्वमय मुहावरे के जन्मदाता रूसी कम्युनिज्म के संस्थापक लेनिन थे। अर्थ था: वे बुद्धिजीवी, जो अपनी किसी हल्की या भावुक समझ से कम्युनिस्टों की मदद करते थे। ऐसे बुद्धिजीवियों को उपयोगी मूर्ख कहने में लेनिन की कोई चालबाजी नहीं थी। जड़-सिद्धांतवादी लेनिन को अपने विचारों के मामूली नुक्ते पर भी मतभेद नामंजूर था, इसलिए वह निकटतम सहयोगियों को भी नहीं बख्शते थे। तब स्वाभाविक था कि बाहरी बुद्धिजीवियों को लेनिन सचमुच बकवादी/मूर्ख समझते। पर उनमें जो कम्युनिस्टों की मदद करता, उसकी तात्कालिक उपयोगिता मानकर उपयोगी मूर्ख कहा गया। इतिहास गवाह है कि शोषित-पीडि़त पक्षधरता के नाम पर दुनिया में असंख्य लेखकों, कवियों, प्रोफेसरों ने कम्युनिस्टों को सहयोग दिया और बाद में उन्हीं के हाथों लांछित-प्रताडि़त हुए या मारे गए। समय के साथ इस मुहावरे का अर्थ हो गया है: किसी भी कट्टर, उग्रवादी राजनीति या तानाशाही शासक को मदद पहुंचाने वाले नासमझ बुद्धिजीवी। ऐसे बुद्धिजीवी दूसरे देश के भी हो सकते हैं, जो किसी उग्रपंथी संगठन या नेता को प्रगतिशील, साम्राज्यविरोधी आदि मानकर उसके प्रति सहानुभूति रखते हैं। सोवियत संघ और लाल चीन के प्रति पश्चिमी लेखकों, पत्रकारों, बुद्धिजीवियों को इसी श्रेणी में रखा जाता था। क्योंकि सोवियत कम्युनिस्ट उनके प्रति सच्ची मैत्री नहीं, बल्कि उपयोगिता वाले दृष्टिकोण से ही उन्हें सीमित, रंगीन या झूठी जानकारियां दिया करते थे ताकि वे अपने विश्वास में टिकें और कम्युनिस्ट शासन के प्रचारक बने रहें। इस प्रकार वे बुद्धिजीवी सचेत और व्यवस्थित रूप से भी मूर्ख बनाए जाते थे। भारत में नक्सलियों और इस्लामी आतंकवादियों के लिए सहानुभूति रखने वाले बुद्धिजीवियों के लिए यह मुहावरा बिल्कुल सटीक है। कुछ अरसा पहले एक हिंदी कवि ने संसद पर हमला करने वाले आतंकी मोहम्मद अफजल की तुलना भगत सिंह से की। अभी गत दिनों दिल्ली में कुछ बड़े बुद्धिजीवियों ने माओवादी विनायक सेन की तुलना नेल्सन मंडेला से की। ऐसे बुद्धिजीवियों को आतंकियों, नक्सलियों के लिए उपयोगी मूर्ख के सिवा और क्या कहा जा सकता है? जो यह भी नहीं जानते कि जिहादियों की मंजिल निजामे-मुस्तफा या माओवादियों के पीपुल्स रिपब्लिक कायम होते ही उन्हें या तो जान बचा भागना पड़ेगा, नहीं तो ऐसी गुलामी की जिंदगी मिलेगी, जिसकी विभीषिका का उन्हें अनुमान तक नहीं। सारी दुनिया के जिहादी, तालिबानी अपने इलाकों में या यहीं जंगलों में माओवादी अपने नियंत्रण क्षेत्र में जो लोमहर्षक न्याय करते हैं, उससे सभी परिचित है। इसके बावजूद कुछ बुद्धिजीवी जिस उत्साह से उन्हें मदद पहुंचाने में लगे हुए हैं, वह आश्चर्यजनक है। ऐसे बुद्धिजीवियों का इस्लामी या माओवादी राज्य में क्या होगा, इसमें अनुमान की कोई बात नहीं। वह एक घोषित सत्य है। 1999 में पोप के वेटिकन में एक अंतरराष्ट्रीय ईसाई-इस्लामी संवाद आयोजित हुआ था। उसमें एक बड़े इस्लामी आलिम ने साफ कहा, तुम्हारे लोकतंत्र के सहारे हम तुम पर हमला करेंगे और अपने मजहब के सहारे तुम पर अधिकार करेंगे। यह घटना संवाद में भागीदार एक ईसाई महामहिम गिसेप बर्नार्डीनी ने बताई थी। ऐसी बेधड़क घोषणाओं के पीछे लेनिन वाला जड़ विश्वास ही है, जो दूसरों का इस्तेमाल करते हुए भी उन्हें हीन समझने में संकोच नहीं करता। किंतु दूसरों को तो सोचना चाहिए कि ऐसे क्रांतिवादी, जिहादी अगर सफल हुए तो क्या होगा? मुहम्मद अफजल या विनायक सेन को भगत सिंह और नेल्सन मंडेला बताने वाले बुद्धिजीवी किसी के हितैषी नहीं। वे नादान या धूर्त हैं, जो लोकतंत्र की स्वतंत्रता का दुरुपयोग कर लोकतंत्र को ही खत्म करने की तैयारी में लगे गिरोहों की मदद कर रहे हैं। यह छिपी बात भी नहीं। जिहादी और माओवादी बयानों, दस्तावेजों में जगह-जगह डंके की चोट पर लिखा है कि उन्हें वर्तमान राजनीतिक व्यवस्था का अंत कर अपनी मजहबी या माओवादी तानाशाही स्थापित करनी है। जिसके बाद यह स्वतंत्र प्रेस, स्वतंत्र न्यायालय, स्वतंत्र चुनाव आदि का पूर्ण खात्मा हो जाएगा। जंतर-मंतर या मंडी हाउस की खुशनुमा धूप में प्रसिद्धि का सुख लेते हुए वक्तव्य देने की आजादी खत्म हो जाएगी। सरकारी संस्थानों के निदेशक, चेयरमैन रहते हुए सरकारी, न्यायिक निर्णयों का खुला विरोध करने की दुर्लभ छूट तो अकल्पनीय ही होगी! ऐसी अतिशय उदार छूट का लाभ उठाने वाले बुद्धिजीवी भारत को नकली लोकतंत्र कहते हैं और माओवादियों को गांधावादी बताते हैं। लेनिन ने इन्हें गलत नाम नहीं दिया था। ऐसे बुद्धिजीवी यह सब अनजाने कर रहे हों या जान-बूझकर, हर हाल में वे समाज के लिए घातक कार्य कर रहे हैं। यदि वे माओवादियों का सिद्धांत-व्यवहार जानते हुए उनका बचाव करते हैं, जैसा अरुंधति राय करती हैं तो उनकी स्वतंत्रता की समझ दूषित है। स्वतंत्रता की धारणा सबकी समानता और न्याय भावना के साथ ही कोई अर्थ रखती है। जो स्वतंत्रता किसी माओवादी को मिलनी चाहिए, वही उस आदिवासी या शिक्षक या सरकारी कर्मचारी को भी है, जो माओवादियों की दादागिरी पसंद नहीं करता। उनकी स्वतंत्रता का क्या हो रहा है? विनायक सेन के समर्थक उन सैकड़ों नागरिकों की कभी चिंता नहीं करते, जिनकी मुखबिर कहकर माओवादी नृशंस हत्या करते हैं। जो माओवादी स्वयं कानून नहीं मानते, उन्हें न्यायालय से कानूनी छूट दिलाने के आंदोलन का क्या अर्थ है? दूसरी ओर, जो बुद्धिजीवी माओवादियों, जिहादियों का सिद्धांत-व्यवहार जाने बिना उन्हें मंडेला या भगत सिंह कहते फिरते हैं, वे और भी घातक हैं। ऐसे बुद्धिजीवी बुद्धि शब्द को लज्जित कर रहे हैं। बिना जाने वे मंच पर वही कुछ बोलने लगते हैं, जो उन्हें किसी ने बताया है। जैसे, पिछले दिनों एक अभिनेत्री ने कहा, कोर्ट ने विनायक सेन पर एक-तरफा फैसला दिया है। उस अभिनेत्री को इतना भी पता नहीं कि पिछले तीन वर्ष से हर अदालत में सेन के लिए अच्छे से अच्छे वकीलों ने पैरवी की है। सुप्रीम कोर्ट समेत सभी अदालतों ने उसे अपना पक्ष रखने का पूरा अवसर दिया। वहां सेन और सरकार, दोनों पक्ष की खुली सुनवाई हुई, जहां मीडिया ही नहीं, दूसरे नागरिक भी सब कुछ देख सुन सकते थे। अभी तक किसी ने (सेन के वकीलों ने भी) कहीं यह आरोप नहीं लगाया कि किसी कोर्ट ने एकतरफा काम किया। तब यह अभिनेत्री ऐसा निपट मूढ़ बयान दे रही हैं! मानो पृष्ठभूमि में खड़े किसी निर्देशक ने उन्हें बना-बनाया संवाद बोलने के लिए कहा हो, जिसे पूरी अदा से उन्होंने दोहरा दिया! उनकी प्रसिद्धि के नाम पर यह झूठी बात दुनिया भर में प्रसारित हो गई और हमारी स्वतंत्र, निष्पक्ष न्यायपालिका तथा देश की छवि पर कालिख पोती गई। ऐसे लेखक, अभिनेता, पत्रकार, समाजसेवी आदि को ओरियाना फलासी ने अभिजात फाहशाओं की संज्ञा ठीक ही दी थी, जो किसी भाड़े, पुरस्कार या प्रसिद्धि की चाह में उनके लिए भी खड़े होने को तैयार बैठे रहते हैं, जिन्हें वे जानते तक नहीं। भारत के निष्पक्ष, खुले न्यायालय जहां अभियुक्त का अच्छे वकीलों द्वारा बचाव किया गया, उस पर लांछन लगाना, कानून की रक्षा करने वाले सुरक्षा-बलों को निंदित करना और घोषित रूप से विध्वंस को अपना सिद्धांत बताने वाले नक्सली या आतंकवादी का बचाव करने की नियमित प्रवृत्ति को और क्या कहा जाए! ऐसे बुद्धिजीवियों से समाज को बचना जरूरी है। वे उस अंधे जैसे हैं, जिसके हाथ में आग है। वे अपने उच्च पदों और प्रसिद्धि का वजन देश का नाश करने में तुले जिहादियों, नक्सलियों के पक्ष में लगा रहे हैं। यह कड़वा सत्य समझने की आवश्यकता है कि ऐसे पैरोकार बुद्धिजीवियों से जिहादियों, माओवादियों को अतिरिक्त प्रोत्साहन मिलता है। वस्तुत:, इसीलिए विनायक सेन जैसे लोगों को और कड़ी सजा मिलनी चाहिए ताकि देशद्रोह के लिए लोकतंत्र की स्वतंत्रता का दुरुपयोग करने वाले सभी लोगों को कठोर संदेश मिले। (लेखक स्वतंत्र टिप्पणीकार हैं)
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