Friday, February 11, 2011

लोकतंत्र की ताकत दिखा रही है रंग


संसद की कार्यवाही अनिश्चितकाल तक न चले, यह लोकतंत्र के हित में नहीं है। इसलिए अगर इस मुद्दे पर सरकार झुकती है, तो इसे विपक्ष की जीत के बजाय भारतीय लोकतंत्र में आई नई ताकत की मिसाल माना जाना चाहिए। सत्ताधारी गठबंधन अगर जांच को स्वाभाविक परिणति की तरफ बढ़ने में बाधक बनने से बाज आ रहा है और आखिरकार संसदीय जवाबदेही एवं विपक्ष की अहमियत का सम्मान करने को तैयार हो रहा है, तो यह भारतीय लोकतंत्र के लिए शुभ संकेत है
दूरसंचार के टू-जी स्पेक्ट्रम घोटाले की जांच फिलहाल ठोस अंजाम की तरफ बढ़ती दिख रही है और इससे शुरू हुई हलचल के झटके दूर तक पहुंच रहे हैं। इस घोटाले से बड़ा फायदा पाने वाली कंपनी स्वान टेलीकॉम के प्रोमोटर शाहिद बालवा की गिरफ्तारी का असर शेयरों के भाव में भारी गिरावट के रूप में सामने आया है। स्वान टेलीकॉम पर शिंकजा कसने के बाद अब खबर है कि सीबीआई यूनिटेक टेलीकॉम को घेरे में लेने वाली है। इसके पहले वह पूर्व दूरसंचार मंत्री ए राजा, उनके पूर्व निजी सचिव आरके चंदोलिया और पूर्व दूरसंचार सचिव सिद्धार्थ बेहुरा को गिरफ्तार कर चुकी है। यह तो निर्विवाद है कि अगर इस जांच की साख बन रही है तो उसका सीधा श्रेय यूपीए सरकार को नहीं दिया जा सकता। यूपीए सरकार पर यह आरोप अब भी कायम है कि उसने शुरु आत में घोटाले पर परदा डालने की कोशिश की और सत्ताधारी जमात के नेता आखिरी वक्त तक ए राजा का न सिर्फ बचाव, बल्कि सार्वजनिक मंचों पर उनकी वकालत भी करते रहे। बहरहाल, इसे भारतीय व्यवस्था में मजबूत हो रहे अवरोध एवं संतुलन की व्यवस्था की मिसाल जरूर माना जा सकता है कि सत्ताधारी जमात के ऐसे रवैए के बावजूद आखिरकार कानून के हाथ उन लोगों तक पहुंच रहे हैं, जिन पर एक महत्वपूर्ण एवं बहुमूल्य सार्वजनिक संसाधन के आवंटन में निष्पक्षता एवं वैध तौर- तरीकों को ताक पर रखने तथा देश के खजाने को भारी नुकसान पहुंचाने का इल्जाम है। यहां यह ध्यान में रखने की बात है कि ये तमाम लोग बड़े रसूख वाले हैं। कुछ ही हफ्ते पहले ए राजा की जगह दूरसंचार मंत्री बने कपिल सिब्बल ने प्रेस कांफ्रेंस कर नियंत्रक एवं महालेखा परीक्षक (सीएजी) के इस अनुमान को चुनौती दी थी कि स्पेक्ट्रम आवंटन में घोटाले की वजह से देश के खजाने को एक लाख 76 हजार करोड़ रु पए का चूना लगा। लेकिन अब खुद सरकारी जांच एजेंसी सीबीआई के सूत्र मीडिया से कह रहे हैं कि स्वान और यूनिटेक टेलीकॉम जैसी कंपनियों ने मिले स्पेक्ट्रम के आधार पर अपने शेयर विदेशी कंपनियों को जिस भाव पर बेचे, उससे देश को 22 हजार करोड़ रु पए से भी ज्यादा का नुकसान होने की बात साफ होती है। सीबीआई की निष्पक्षता या उसके पेशेवर ढंग से काम करने को लेकर आज किसी को भी भरोसा नहीं है, इसके बावजूद फिलहाल सामने आ रही हकीकत बताती है कि सीबीआई की जांच सरकार के दावों को काट रही है। गौरतलब है कि जब से यह मामला सामने आया है, विपक्षी दल, अदालत, मीडिया, एवं आम जन के स्तर पर चल रही र्चचाओं से सरकार लगातार घिरती गई है। और आखिरकार एक तस्वीर ऐसी उभर रही है, जिसमें सरकार इस घटनाक्रम को प्रभावित करने की स्थिति में नहीं दिखती या वह अपनी साख वापस पाने की कोशिश में जांच में दखल देने से बचने लगी है। यह एक सकारात्मक घटना-विकास है। अब से पहले भी देश में बड़े-बड़े घोटाले हुए हैं। तब वे बड़े राजनीतिक मुद्दे भी बने। लेकिन कभी भ्रष्टाचार या घोटालों को रोकने की ठोस व्यवस्था उभरती नजर नहीं आई। वास्तविक परिदृश्य यह है कि आज राजनीतिक जमात से लेकर शासन तंत्र के विभिन्न अंगों में भी कोई भ्रष्टाचार के आरोपों के साये से बाहर नहीं है। निजी क्षेत्र का दामन भी उतना ही दागदार है। इसीलिए यह उम्मीद किसी को नहीं है कि किसी सरकार को बदल देना इस गहरे लगे घुन का इलाज है। बल्कि आज जागरूक जनमत के भीतर इस बात पर सहमति है कि अगर इस बुराई पर काबू पाना है, तो उसके लिए अवरोध एवं संतुलन की कारगर व्यवस्था करनी होगी। यह अच्छी बात है कि अदालत की फटकार, मीडिया के दबाव और आम जन की जागरूकता की वजह से भ्रष्टाचार के बड़े मामलों में कार्रवाई विश्वसनीय होती दिखने लगी है। जाहिर है, आज अगर टू-जी स्पेक्ट्रम मामले में जारी संसदीय गतिरोध टूटने के संकेत मिल रहे हैं तो उसके पीछे भी इस पृष्ठभूमि का योगदान है। गौरतलब है कि संसद का शीतकालीन सत्र टू-जी स्पेक्ट्रम घोटाले की जांच संयुक्त संसदीय समिति (जेपीसी) से कराने की मांग पर सरकार और विपक्ष में टकराव की भेंट चढ़ गया था। तब से बजट सत्र को लेकर भी आशंका रही है, क्योंकि जेपीसी के मुद्दे पर दोनों पक्षों के बीच गतिरोध बना रहा है। इसको तोड़ने के लिए सरकार की तरफ से गंभीर प्रयास किए गए हैं और विपक्ष भी सरकारी प्रस्ताव पर राजी होता दिख रहा है। विपक्षी नेताओं के साथ इस मुद्दे पर हुई बैठक में वित्त मंत्री एवं सरकार के प्रतिनिधि प्रणब मुखर्जी ने कहा कि संसद चल सके, इसके लिए कोई भी कीमत ज्यादा नहीं है। इस टिप्पणी को इस बात का संकेत माना जा रहा है कि सरकार आखिरकार जेपीसी के गठन के लिए तैयार हो गई है और वह इसके लिए कोई सम्मानजनक राह निकालने की कोशिश में है। एक फॉर्मूला यह उभरता दिख रहा है कि विपक्ष पहले टू-जी स्पेक्ट्रम घोटाले पर संसद में बहस के लिए तैयार हो जाए और बहस में व्यक्त विचारों को आधार बनाकर सरकार जेपीसी के गठन पर सहमत हो जाए। अगर घटनाएं इसी दिशा में आगे बढ़ती हैं तो फिर बजट सत्र की कार्यवाही ठीक ढंग से चल सकेगी और जनहित से जुड़े जरूरी मुद्दों पर लोकतंत्र के सर्वोच्च मंच पर बहस होने का रास्ता साफ हो जाएगा। इस बात की पूरी संभावना है कि विपक्षी दल इसे अपनी जीत के रूप में पेश करें। मगर राजनीति से ऊपर उठकर देखा जाए, तो यहां किसी की हार या जीत से ज्यादा बड़ा सवाल सरकारी कामकाज में पारदर्शिता और लोकतंत्र के कारगर ढंग से चलने का है। संसद की कार्यवाही अनिश्चितकाल तक न चले, यह लोकतंत्र के हित में नहीं है। इसलिए अगर इस मुद्दे पर सरकार झुकती है, तो इसे विपक्ष की जीत के बजाय भारतीय लोकतंत्र में आई नई ताकत की मिसाल माना जाना चाहिए। सत्ताधारी गठबंधन अगर आज जांच को स्वाभाविक परिणति की तरफ बढ़ने में बाधक बनने से बाज आ रहा है और वह संसदीय जवाबदेही एवं विपक्ष की अहमियत का आखिरकार सम्मान करने को तैयार हो रहा है, तो यह भारतीय लोकतंत्र के लिए एक शुभ संकेत है।


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