Thursday, February 17, 2011

इस भविष्य निधि का भविष्य क्या है


कर्मचारी भविष्य निधि पर 9.5 फीसदी ब्याज देने का फैसला वित्त और श्रम मंत्रालयों के बीच उलझकर रह गया है। दोनों मंत्रालय कागजी लड़ाई में लगे हुए हैं और बजट सत्र नजदीक आने के बावजूद कोई फैसला नहीं लिया जा सका है। इस बात पर विवाद गहराता जा रहा है कि चालू वित्त वर्ष में कर्मचारी भविष्य निधि पर किस ब्याज दर से भुगतान किया जाए। अब कहा जा रहा है कि मंगलवार यानी 15 फरवरी को होने वाली कर्मचारी भविष्य निधि संगठन (ईपीएफओ) और केंद्रीय न्यासी बोर्ड (सीबीटी) की बैठक में इस मसले को सुलझाया जाएगा। ऐसा लगता है कि वित्त मंत्रालय और श्रम मंत्रालय के बीच विवाद का सबब बना यह मामला अब प्रधानमंत्री के हस्तक्षेप से ही सुलझ सकता है। पिछले साल 15 सितंबर को सीबीटी की बैठक में चालू वित्त वर्ष के लिए ईपीएफ पर 9.5 फीसदी ब्याज दर देने की घोषणा की गई थी। ब्याज दर को 8.5 फीसदी से 9.5 फीसदी करने के पीछे कहा गया कि ईपीएफओ के पास अतिरिक्त पैसा (सरप्लस) है और इस रकम को कर्मचारियों के बीच बांटा जा सकता है। ब्याज दर बढोतरी के इस फैसले पर वित्त मंत्रालय की अनुमति लेने का प्रयास किया गया तो वित्त मंत्रालय ने सीबीटी के फैसले पर विरोध जताया। इसके बाद दोनों मंत्रालयों के बीच पत्रों के आदान-प्रदान का सिलसिला शुरू हुआ, लेकिन किसी अंतिम फैसले पर नहीं पहुंचा जा सका है। 11जनवरी को तत्कालीन वित्त सचिव अशोक चावला ने श्रम मंत्रालय को लिखे पत्र में कहा कि ब्याज दर बढ़ाने के निर्णय से कोई बेहतर परिणाम नहीं निकलेंगे। चावला ने ईपीएफओ के खातों की अकाउंटिंग पर भी सवाल उठाए। श्रम सचिव प्रभाव चंद्र चतुर्वेदी ने वित्त मंत्रालय की आपत्तियों को खारिज करते हुए जवाबी पत्र भेजा था। श्रम मंत्रालय ने कहा कि कर्मचारियों को 9.5 फीसदी ब्याज दर के हिसाब से भुगतान करने के लिए पर्याप्त रकम ईपीएफओ के पास है। कर्मचारियों का बेहतर भविष्य सुनिश्चित करने के लिए 1952 में कर्मचारी भविष्य निधि संगठन की स्थापना की गई थी और फिलहाल इसके सदस्यों की संख्या 4.72 करोड़ है। प्रोविडेंट फंड विभाग ने 1952 से ईपीएफओ के खातों की पड़ताल की और इसकी आमदनी व देनदारियों की गणना से पता चला कि इसके पास 1,731 करोड़ रुपये की अतिरिक्त राशि है। अगर पीएफ की मौजूदा ब्याज दर को 8.5 फीसदी से बढ़ाकर 9.5 फीसदी किया जाता है तो चालू वित्त वर्ष की अनुमानित आमदनी के अलावा 1,700 करोड़ रुपये की जरूरत होगी। जाहिर है कि 1,731 करोड़ रुपये की अतिरिक्त राशि से पीएफ की ब्याज दर में एक फीसदी की बढ़ोतरी आसानी से की जा सकती है। श्रम मंत्रालय का कहना है कि ईपीएफओ की अकाउंटिंग में किसी भी तरह की गड़बड़ नहीं है। अतिरिक्त राशि (सरप्लस) की गणना के तरीके से ईपीएफओ और श्रम मंत्रालय ने सहमति जताते हुए कहा है कि इसमें कुछ भी गलत नहीं है। दरअसल वित्त मंत्रालय का कहना है कि 1,731 करोड़ रुपये की अतिरिक्त राशि छिपा हुआ खजाना है। ईपीएफओ के 4.72 करोड़ कर्मचारियों के खातों को मार्च 2010 के बाद से अपडेट नहीं किया गया है। कैग के हवाले से वित्त मंत्रालय का दावा है कि अगर सभी पीएफ खातों को अपडेट कर दिया जाता है तो कथित सरप्लस खातों में ही जुड़ जाएगा और इसके बाद किसी भी तरह की अतिरिक्त रकम नहीं बचेगी। उल्लेखनीय है कि मार्च 2010 तक कर्मचारी भविष्य निधि के इंटरेस्ट सस्पेंस अकाउंट यानी आईएसए में 4,672 करोड़ रुपये थे। हर साल होने वाली आमदनी को आईएसए में जमा किया जाता है, लेकिन ऑडिट के जरिये भी यह पता लगाना मुश्किल है कि 9.5 फीसदी ब्याज दर के लिए यह रकम पर्याप्त है या नहीं। कैग का कहना है कि पहले ईपीएफओ वृद्धिपरक व्यवस्था से खातों की ऑडिट करके ब्याज की रकम का भुगतान करे और उसके बाद बचने वाली रकम को सरप्लस घोषित किया जाए। दूसरी ओर श्रम मंत्रालय का कहना है कि ईपीएफो को सस्पेंस एकाउंट में जमा 4,672 करोड़ रुपये में से सभी पीएफ खाताधारकों को ब्याज देने के लिए 2,940 करोड़ रुपये की व्यवस्था की गई है। बीते वर्षो के सभी पीएफ खाताधारकों को ब्याज देने के बाद भी 1,731 करोड़ रुपये बचते हैं। यह ब्याज पीएफ खाताधारकों के खातों में जमा नहीं करवाया जा सका है, इस कारण इसे सस्पेंस एकाउंट में छोड़ा गया है और इसी सरप्लस से ब्याज दर में एक फीसदी की बढोतरी करने में कोई बुराई नहीं है। श्रम मंत्रालय का कहना है कि ब्याज बाद में दिए जाने पर भी ईपीएफओ के वित्तीय बोझ में इजाफा होने की संभावन नगण्य है, इसलिए सरप्लस की रकम पर संदेह जताना गलत है। ईपीएफओ ने जितनी लंबी चादर उतने पैर वाली कहावत का अनुसरण करते हुए अपनी आमदनी के हिसाब से ही ब्याज दर बढाई है, लिहाजा उसे आय कम और खर्च ज्यादा वाली स्थिति का सामना नहीं करना पड़ेगा। श्रम मंत्रालय का कहना है कि अनुमति मिलने के बाद ईपीएफओ की पूंजी का थोड़ा भाग शेयर बाजार में भी लगाया जा सकता है और इस निवेश से मिलने वाला प्रतिफल कर्मचारियों में वितरित किया जा सकता है। कर्मचारियों को वित्त वर्ष 2005-06 से पीएफ 8.5 फीसदी ब्याज दर के हिसाब से ब्याज दिया जा रहा है और इस बात में कोई दोराय नहीं है कि इसमें बढ़ोतरी की जानी चाहिए। वित्त वर्ष 2004-05 में यह ब्याज दर 9.5 फीसदी थी, लेकिन घटती मुद्रास्फीति दर का हवाला देकर इसे 8.5 फीसदी कर दिया गया। पिछले कई महीनों से मुद्रास्फीति की दर दहाई में चल रही है, लेकिन पीएफ पर मिलने वाली ब्याज दर को यथावत रखा गया है। विडंबना यह है कि लंबी अवधि वाले फिक्सड डिपॉजिट (एफडी) पर बैंक भी दस फीसदी की दर से ब्याज देते हैं, लेकिन पीएफ पर कर्मचारियों को मिलने वाली कम ब्याज दर की बात समझ से परे है। एक औसत कर्मचारी 30 साल तक आरडी (रिकरिंग डिपॉजिट) अकाउंट चलाता है और हर माह एक तय रकम उसकी तनख्वाह से काट ली जाती है। सवाल उठता है कि आखिर कर्मचारियों को अपने पैसे का फायदा उठाने से क्यों रोका जा रहा है। पीएफ ब्याज दर के मामले को लेकर श्रम मंत्री मल्लिकार्जुन खड़के और वित्त मंत्री प्रणव मुºर्जी आमने-सामने आ गए हैं और दोनों ने इसे मूंछ का सवाल बना लिया है। मंत्रालयों की इस आपसी खींचतान में कर्मचारियों का भविष्य उलझ गया है और प्रधानमंत्री मूकदर्शक बने समस्या के और गहराने का इंतजार कर रहे हैं। हिंद मजदूर सभा और ऑल इंडिया ट्रेड यूनियन कांग्रेस (एटक) समेत दूसरे श्रम संगठनों के इस लड़ाई में कूदने के बाद सरकार के लिए इस मुद्दे पर पीछे हटना बेहद मुश्किल हो गया है। पीएफ और बीमा जैसी बुनियादी आवश्यकताओं से महरूम अंसगठित क्षेत्र के करोड़ों मजदूरों के कल्याण की बात तो दूर है, यूपीए सरकार महज पौने पांच करोड़ सरकारी कर्मचारियों को भी पीएफ की बढी ब्याज दर का फायदा देने से कतरा रही है। यदि समय पर कर्मचारियों की इस समस्या पर ध्यान नहीं दिया गया तो यूपीए सरकार का नेतृत्व कर रही कांग्रेस को इसका सियासी खामियाजा भुगतना पड़ सकता है। (लेखक स्वतंत्र टिप्पणीकार हैं)

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