पंचायती राज संस्थाओं में आरक्षण की व्याख्या और उसके कार्यान्वयन में अब भी काफी सारी ख़्ामियां हैं। भारतीय समाज में व्यापक रूप से मौज़ूद जाति, वर्ग और जेंडर संबंधी भेदभाव महज़ आरक्षण के बूते दूर नहीं किया सकता है। इसके लिए ठोस रणनीति की दरकार है
हालांकि राज्यों ने पंचायती राज अधिनियम लागू कर दिया है लेकिन शक्ति/सत्ता का वास्तविक हस्तांतरण तथा स्वशासन की संस्थाओं के रूप में पंचायती राज संस्थाओं के सशक्तीकरण की जि़म्मेदारी अभी पूरी होनी बाक़ी है। लिहाज़ा इस संदर्भ में अब तक असमान विकास ही हुआ है। बहुत से राज्यों में पंचायतें अब तक आर्थिक प्रगति और सामाजिक न्याय का प्रभावी औज़ार नहीं बन सकी हैं, क्योंकि कायरें, कोषों तथा पदाधिकारियों का हस्तांतरण महज़ कागज पर ही सीमित है। स्थानीय स्तरों पर कायरे, शक्तियों तथा संसाधनों का समुचित हस्तांतरण न हो पाने के कारण आजीविका के गम्भीर मसले का हल निकालने के प्रति ध्यान नहीं दिया जा सका है और न समुचित संसाधन की व्यवस्था की जा सकी है। सेवाओं के सफलतापूर्ण निष्पादन के लिए ‘विकास के संवाहक’ के तौर पर उल्लिखित इन संस्थाओं में जाति और राजनीतिक दलों के दबावों के चलते संसाधनों से लेकर विकास के लाभ तक के मामलों में, सभी स्तरों पर वर्चस्वशाली समुदायों का दखल दिखता है। ग्राम सभाओं और पंचायतों में सहभागिता के सवाल पर समुचित ज़ोर नहीं दिया गया है और न ही उन अवरोधों को दूर करने की कोशिशें हुई हैं जो ग्राम सभाओं में वंचित तबक़ों के प्रवेश को अवरुद्ध करती हैं। जबरन थोपे जाने वाले जाति, वर्ग और जेंडर के भेदभावपूर्ण नियम और तौरत रीक़ों के चलते महिलाओं का उनके निर्वाचन-क्षेत्रों में ख़्ाराब प्रदर्शन दिखता है, जिसके चलते उनके लिए ग्राम सभाओं में बराबरी के साथ भागीदारी और विकास कायरें के कार्यान्वयन तथा पंचायत फंड का इस्तेमाल करने में दिक्कत खड़ी होती है। समर्थवान माहौल की कमी और वर्चस्वशाली जाति के सदस्यों द्वारा शक्ति क़ब्ज़ा लेने के चलते दलित महिलाओं और पुरुषों के सामने जाति, वर्ग और जेंडर से जुड़े व्यावहारिक मसलों और ज़रूरतों को उठाने में और उन पर काम करने में अवरोध पैदा होते रहने का सामना करना पड़ता है। पंचायतों में भाग लेने वाली दलित महिलाओं और पुरुषों के अधिकारों पर होने वाले कुठाराघात से निबटने और जिन अवरोधों का उन्हें सामना करना पड़ता है उनसे उन्हें निजात दिलाने में राज्य मशीनरी लगातार असफल रही है। सूचना के लोकतंत्रीकरण को सुनिश्चित करने में सूचना का अधिकार क़ानून सबसे प्रगतिशीत अधिनियमों में से एक रहा है। इस अधिकार का इस्तेमाल करने वाले बहुत से अपीलार्थियों को सूचना मांगने के एवज़ में व्यक्तिगत तौर से लक्ष्य बनाया गया, या फिर जानकारी प्रदान करने में भयानक देरी की गई। रिकॉर्ड की कमी और अपीलार्थियों को विभिन्न जनसूचना अधिकारियों द्वारा बार-बार चक्कर कटवाए जाने के कारण सूचना के अधिकार की प्रक्रिया लालफीताशाही के भार के नीचे कराह रही है। कुछ मूलभूत फायदों को समावेशित करने के छोटे-मोटे प्रयास किए गए। हालांकि पंचायतों में स्वास्थ्य और अन्य मूलभूत सेवाओं के मामले में बहिष्करण और भेदभाव की निरंतरता बनी ही हुई है। इतना ही नहीं, सार्वजनिक सेवाओं की पहुंच के मामले में ग्राम आधारित मॉडल का इस्तेमाल किया जा रहा है न कि टोला आधारित। जब भी इन सेवाओं को प्रदान करने की बात आती है तो आवासीय पृथकत्व के कारण अनुसूचित जाति के बहुत से टोले- मोहल्ले नज़रअंदाज़ कर दिए जाते हैं। प्रवासी कामगारों की दलित बसावटों में न स्वच्छता की व्यवस्था है, न पेयजल और बिज़ली की। उन बसावटों में खेल का मैदान नहीं है, स्कूल, सामुदायिक केंद्र नहीं हैं और न कोई तालाब वग़ैरह ही है। सूचना के अपर्याप्त प्रवाह तथा एससी/एसटी समुदायों से संबंधित परियोजनाओं वाले विभागों में उत्तरदायित्व तंत्र के ढुलमुल रवैये के चलते अनुसूचित जातियों तथा जनजातियों के मद की एससीपी तथा टीएसपी जैसी योजनाओं का ठीक से कार्यान्वयन नहीं हो पाता है। परिणामस्वरूप दलितों और आदिवासियों के हित में एससीपी/टीएसपी को साकार करने में भारी रुकावटें आएंगी। हालांकि, व्यय देखने पर इस बात के पर्याप्त प्रमाण मिलते हैं कि दलित समुदायों के पक्ष में एससीपी/टीसीपी के फंड का व्यय करने के बजाय उसे अन्य ढांचागत परियोजनाओं पर ख़्ार्च कर दिया गया है। कॉमनवेल्थ खेलों के दौरान दिल्ली में ही एससीपी के पैसे अन्य मदों में खर्च करने की मिसाल हमारे सामने है। दलितों में विकलांगता की स्थिति काफी ज्यादा है। दलितों की कल्याणकारी सेवाओं तक पहुंच न हो पाने और स्वास्थ्य पण्राली तथा स्कूलों में उनके साथ होने वाले भेदभाव के चलते विकलांग आबादी का एक बड़ा हिस्सा किसी भी प्रकार की मदद या अनुदान से वंचित रह जाता है। आर्थिक संवृद्धि का मतलब यह भी है एक बहुत बड़ी प्रवासी आबादी आर्थिक ज़रूरतों को पूरा करने के लिए काम करे। जबकि हक़ीक़त यह है कि उनके लिए सार्वजनिक सेवाएं उपलब्ध कराने के लिए समुचित संरचनाएं और संस्थान न तो उपलब्ध कराए गए हैं और न ही उनका निर्माण किया गया है। पंचायती राज संस्थाओं में आरक्षण की व्याख्या और उसके कार्यान्वयन में अब भी काफी सारी ख़्ामियां हैं। भारतीय समाज में व्यापक रूप से मौज़ूद जाति, वर्ग और जेंडर संबंधी भेदभाव महज़ आरक्षण के बूते दूर नहीं किया सकता है। इसके लिए ठोस रणनीति की दरकार है। लिहाजा यह जरूरी है कि चुनावों में दलितों के भयमुक्त मदतान और उम्मीदवारी के अधिकार को सुनिश्चित करने और आरक्षित सीटों से चुनाव जीत जाने के बाद निर्भय होकर जनादेश पर काम करने के लिए प्रभावपूर्ण ढंग से आरक्षण की नीति लागू की जाए। इसके लिए समुचित नीतियों और आधिकारिक सरकारी निगरानी की ज़रूरत पड़ेगी तथा दलित उम्मीदवारों और प्रतिनिधियों को सुरक्षा भी मुहैया करानी होगी। सत्ता का वास्तविक हस्तांतरण तभी मुमकि़न हो सकेगा जब बजटीय आवंटन, सम्बंधित कायरे और पदाधिकारियों के अधिकार पंचायतों को दिए जाएंगे ताकि उनके पास प्रभावी राजनीतिक शक्ति आए और वे अपने कर्त्तव्यों का निर्वहन कर सकें। यह भी ज़रूरी है कि पंचायत के कार्यक्रमों पर नौकरशाही का नियंतण्रन्यूनतम हो तथा वे पंचायतों के प्रति उत्तरदायी बनें। यह भी ज़रूरी है पंचायत के तीनों स्तरों के बीच तथा पंचायतों और ग्रामीण विकास परियोजनाओं के लिए जि़म्मेदार सरकारी विभागों के बीच संयोजन और समन्वय स्थापित हो और इन सबके बीच नियमित बैठकें हों और उनमें आपसी तालमेल ठीक-ठाक रहे। निचले स्तर की नौकरशाही में एससी/एसटी महिलाओं और पुरुषों के लिए पंचायत के कोटे के अनुरूप कोटा निर्धरित किया जाए ताकि यह सुनिश्चित किया जा सके कि बीडीओ अपनी आबादी के इस हिस्से के प्रतिनिधि ही हों।
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