पंजाब के मुख्यमंत्री प्रकाश सिंह बादल ने हाल ही में जालंधर में एक जनसभा को संबोधित करते हुए कहा है कि पंजाब में अगले विधानसभा सत्र में अधिकारियों की जिम्मेदारी तय करने वाला विधेयक पेश कर दिया जाएगा। अगर वास्तव में ऐसा हुआ तो यह वास्तव में एक क्रांतिकारी कदम होगा। यह न केवल पंजाब के विकास, बल्कि भारत में लोकतांत्रिक प्रणाली के विकास के लिए ही बेहद जरूरी है। इससे देश और राज्य में चल रही विभिन्न विकास योजनाओं को तो गति मिलेगी ही, बेकाबू हो चुकी नौकरशाही को नियंत्रित करना भी थोड़ा आसान हो जाएगा। इससे कुछ और हो या न हो, पर इतना तो होगा ही कि सभी अधिकारी अपने-अपने विभागों द्वारा चलाई जा रही विकास योजनाओं एवं लोक कल्याण से जुड़े अन्य कार्यक्रमों के समय से क्रियान्वयन के लिए जवाबदेह हो जाएंगे। ऐसी स्थिति में उनके लिए बाध्यता होगी कि वे समय से अपने कार्य पूरे करें और साथ ही उनका क्रियान्वयन सुचारू रूप से करें। यही वजह है कि न केवल पंजाब, बल्कि पूरे देश के हर राज्य में इसकी जरूरत लंबे समय और बड़ी शिद्दत से महसूस की जा रही है। अब पंजाब के मुख्यमंत्री श्री बादल की बात और उनके तेवरों से ऐसा लगता है कि वे वास्तव में इस विधेयक को ले आने के प्रति गंभीर हैं। उनके पहले उप-मुख्यमंत्री सुखबीर सिंह बादल भी यह बात कह चुके हैं और इस विधेयक के संबंध में अपनी प्रतिबद्धता जता चुके हैं। इससे जाहिर है कि न केवल श्री बादल, बल्कि सूबे की पूरी सरकार इस संबंध में गंभीर है। योजनाओं और कार्यक्रमों के संबंध में समय की प्रतिबद्धता और अधिकारियों की जवाबदेही तय करने के मामले में सरकार की गंभीरता से स्पष्ट है कि सूबे के विकास और आम जनता के सुख-दुख के प्रति वह कितनी सचेत है। जनता के संबंध में सरकार की चिंता केवल वादों और दावों तक ही सीमित नहीं है, बल्कि इसे वह मूर्त रूप लेते हुए देखना चाहती है। इसमें कोई दो राय नहीं है कि सरकार अगर इस मामले में गंभीर हो तो विभिन्न विकास योजनाओं का लाभ आम जनता तक पहुंचना आसान और सुनिश्चित हो जाएगा। यह एक सर्वविदित तथ्य है कि भारत में केवल योजनाओं का क्ति्रयान्वयन समय से न हो पाने के कारण ही कई तरह की गड़बडि़यां होती रहती हैं। योजनाओं के सही समय पर मूर्त रूप न ले पाने से सबसे बड़ी दिक्कत तो यह होती है कि उनकी लागत बढ़ जाती है। ऐसी स्थिति में उन्हें ठीक तरीके से लागू कराने के लिए अतिरिक्त बजट जरूरी हो जाता है। भारत में सरकारी विभागों एवं संस्थानों की जो कार्यप्रणाली है, उसमें किसी कार्य के लिए एक बार ही बजट की स्वीकृति करा पाना कितना मुश्किल कार्य है, यह किसी से छिपा नहीं है। ऐसी स्थिति में अतिरिक्त बजट स्वीकृत कराना और उसके अनुरूप धन हासिल करना अपने आपमें एक अत्यंत टेढ़ा कार्य है। इस पूरी प्रक्रिया में फिर से इतना ज्यादा समय खप जाता है कि योजना की लागत कई गुना बढ़ चुकी होती है। सही बात तो यह है भारत की नौकरशाही पहले से इतनी निष्कि्त्रय है कि वह ऐसे कार्यो में कोई रुचि भी नहीं लेती है। आम तौर पर जैसे तैसे केवल काम को टालने या खानापूरी कर देने के लिए ही जानी ही जाती है। क्या ऐसी नौकरशाही से यह उम्म्मीद की जा सकती है कि वह योजना की तात्कालिक लागत के अनुरूप नए सिरे से धन स्वीकृत कराने और उसे पूरी तरह सही ढंग से क्रियान्वित करने में कोई रुचि लेगी? ऐसा बहुत कम ही हो पाता है। अकसर अफसर जैसे-तैसे बजट खत्म कर अपना पल्ला झाड़ने में ही लगे रहत हैं। जो कुछ भी बजट उनके पास मौजूद होता है, उसी में वह कार्य करवा लेते हैं। नतीजा यह होता है कि किसी भी योजना का क्रियान्वयन आमतौर पर आधे अधूरे रूप में ही हो पाता है। योजनाओं का जो लाभ आम जन को मिलना चाहिए, वह अधिकतर नहीं मिल पाता है। कई कार्यक्रमों का क्रियान्वयन आनन-फानन होने के कारण लाभार्थियों का चयन भी सही तरीके से नहीं हो पाता है। चयन की प्रक्रिया में कई जगहों पर दलाल और छुटभैये नेता शामिल हो जाते हैं, जिनका उद्देश्य केवल तथाकथित अपने लोगों को उपकृत करना और धौंस जमाना ही होता है। सांसदों और विधायकों को तो इस अफरा-तफरी में सही प्रक्रिया तक की वास्तविक जानकारी नहीं होने पाती है। आखिरकार होता यह है कि जो लोग वास्तव में जरूरतमंद और लाभ पाने के हकदार होते हैं, वे तो लाभ से वंचित ही रह जाते हैं तथा नकली जरूरतमंद असली लाभार्थी बन जाते हैं। हमारे देश में कोई योजना अपने वास्तविक उद्देश्यों की प्राप्ति जो नहीं कर पाती है, उसके पीछे यह एक बड़ा कारण है। अगर केवल इस लेट-लतीफी को ही हल कर लिया जाए तो विकास प्रक्रिया से जुड़ी कई समस्याओं का समाधान तो अपने-आप ही हो जाएगा। अगर चरणबद्ध तरीके से योजनाओं के क्रियान्वयन पर जोर दिया जाए और सूचना अधिकार के साथ इस प्रक्ति्रया में पूरी पारदर्शिता बरती जाए तो भ्रष्टाचार को नियंत्रित करना भी आसान हो जाएगा, लेकिन यह कहना बिल्कुल सही नहीं होगा कि जवाबदेही की बात केवल अधिकारियों के लिए ही पर्याप्त होगी। सच तो यह है कि सिर्फ अधिकारियों को जवाबदेह बना देने से व्यवस्था में किसी बहुत बड़े बदलाव की उम्मीद करना ही बेमानी है। बात चाहे केवल पंजाब की हो या पूरे भारतवर्ष की, सरकारी कार्यप्रणाली में लापरवाही और भ्रष्टाचार पूरी व्यवस्था में एक आदत की तरह व्याप्त हो गई है। जहां सरकारी नौकरी मिलने का मतलब ही केवल मौज-मस्ती समझा जाने लगा हो और जहां कुछ चढ़ावा चढ़ाए बगैर कोई फाइल अपनी जगह से टरकना ही अपनी शान के खिलाफ समझती हो, वहां किसी से भी समय से अपना काम निपटाने की उम्मीद कैसे की जा सकती है? यह बात सिर्फ अधिकारियों और कर्मचारियों मे मामले में ही नहीं, राजनेताओं के मामले में भी उतनी ही सही है। ऐसे उदाहरणों की कमी नहीं है जब मंत्रियों-जनप्रतिनिधियों की बेजा अपेक्षाओं पर खरे न उतरने का खमियाजा ईमानदार अधिकारियों को भुगतना पड़ा है। आखिर उस स्थिति में क्या होगा? क्या पूरी व्यवस्था के भ्रष्ट रहते सिर्फ एक अधिकारी के ईमानदार होने या उसे जिम्मेदार ठहरा देने भर से विकास योजनाओं का क्ति्रयान्वयन सही ढंग से हो जाएगा? जाहिर है यह दिवास्वप्न देखने जैसी बात होगी। इसलिए यह जरूरी है कि इस विधेयक के दायरे में न केवल अधिकारियों, बल्कि पूरी व्यवस्था को लाया जाए। छोटे कर्मचारियों से लेकर मंत्रियों तक सभी को जवाबदेह बनाया जाना चाहिए। यह कहना भी सिर्फ अपनी जिम्मेदारी से बचने जैसी बात होगी कि ऐसा चरणबद्ध तरीके से किया जाएगा, क्योंकि अगर यह काम चरणबद्ध तरीके से किया जाएगा तो जब तक दूसरे वर्ग को इसके दायरे में लाया जाएगा, तब तक पहला वर्ग खुद अपने बचने के उपाय तलाश चुका होगा। अत: बेहतर यही होगा कि इस विधेयक के दायरे में सभी वर्गो को ले आने का प्रावधान एक साथ किया जाए। भले ही इसे पेश करने में थोड़ी देर हो जाए, लेकिन लाया पुख्ता और प्रभावी रूप में जाए। तभी यह अपने उद्देश्य में सफल हो सकेगा। (लेखक हरियाणा, पंजाब व हिमाचल प्रदेश के स्थानीय संपादक हैं)
No comments:
Post a Comment