प्राचीन एथेंस के लोकतंत्र की आलोचना करते हुए प्लेटो ने लिखा था कि लोकतंत्र का सबसे बड़ा दोष यह है कि यह एक आम आदमी को विदेश नीति, अर्थव्यवस्था और इसी तरह के दूसरे गंभीर मुद्दों पर असेंबली में बोलने, अपना मत देने तथा कार्यकारिणी में निर्वाचित होकर कार्यवाही करने की पूरी इजाजत देता है, जबकि ये विषय ऐसे हैं कि केवल विशेषज्ञ ही इनके बारे में सही ढंग से सोच सकते हैं। इसीलिए प्लेटो ने सरकार चलाने वालों में दार्शनिकों और चिंतकों के शामिल किए जाने पर सबसे अधिक जोर देकर एक दार्शनिक राजा की कल्पना की थी। लोकतंत्र का दूसरा बड़ा दोष उन्होंने यह माना कि इस व्यवस्था में नेताओं के चुने जाने में वे कारण प्रभावी हो जाते हैं, जिनका प्रशासन चलाने की कुशलता से कोई लेना-देना नहीं होता, जैसे कि धन का खेल, वंश और परिवार की पृष्ठभूमि तथा जनता को बहकाने वाले लच्छेदार भाषण आदि। तीसरा दोष यह है कि लोकतंत्र अराजकता की दिशा में जा सकता है। जब एथेंस में सुकरात जैसे महान दार्शनिक को मृत्युदंड भुगतना पड़ा, तब प्लेटो निश्चित हो गए कि लोकतंत्र औसत दरजे के लोगों को संरक्षण देता है।
आज प्राचीन एथेंस नहीं है। फिर भी प्लेटो की आज से लगभग ढाई हजार वर्ष पहले की गई टिप्पणी, कम से कम भारत के वर्तमान लोकतंत्र के संदर्भ में, बहुत कुछ सच लगती है। इसका यह अर्थ नहीं कि हम लोकतंत्र को तिलांजलि देकर दूसरा राजनीतिक विकल्प ढूंढें। राजनीति विज्ञान के विचारकों ने तमाम बुराइयों के बावजूद इसे मौजूदा दूसरी व्यवस्थाओं से बेहतर माना है। जहां तक भारत का मामला है, हमने अंगरेजों की गुलामी के कारण जिस लोकतांत्रिक व्यवस्था को अपनाया, वह ब्रिटेन में जन्मी और विकसित हुई थी। शिक्षा और समृद्धि का जो न्यूनतम स्तर इस व्यवस्था को चलाने के लिए आवश्यक है, उसका यहां अभाव था। जातियों के बीच भेद के कारण जो सामंती समाज यहां पनपा, ब्रिटेन उसे पीछे छोड़ चुका था। यानी हमने जिस लोकतंत्र का ब्रिटेन से आयात किया, वह यहां एक सामंती लोकतंत्र में परिवर्तित हो गया।
देश आजाद होने पर जो लोग सत्ता में आए, वे एक स्वस्थ लोकतंत्र की नींव डाल सकते थे। गांधी ने एक रास्ता सुझाया भी था। पर सत्ता में विराजमान लोगों ने इसकी परवाह नहीं की। जवाहरलाल नेहरू जब तक जीवित रहे, प्रधानमंत्री बने रहे। इसी परंपरा का निर्वाह इंदिरा गांधी ने भी किया। पश्चिम बंगाल के ज्योति बसु इन सबसे बढ़कर निकले। दूसरी ओर हमारे सामने नेल्सन मंडेला का उदाहरण है, जिनका त्याग नेहरू से कहीं बढ़कर था। उन्होंने 27-28 वर्षों तक जेल की सजा काटी। वह चाहते, तो आजीवन राष्ट्रपति बने रह सकते थे। मगर लोकतंत्र की स्वस्थ परंपरा स्थापित करने के लिए एक पदावधि के बाद ही उन्होंने पद छोड़ दिया था। ब्राजील के पूर्व राष्ट्रपति लुला डिसिल्वा जनता में अत्यंत लोकप्रिय थे। ओबामा उन्हें विश्व का सर्वाधिक लोकप्रिय नेता कहते हैं। दो बार वह राष्ट्रपति रहे। जनता उन्हें तीसरी बार भी चाहती थी। पर लुला ने लोकतंत्र की मर्यादा बनाए रखने के लिए तीसरी बार चुनाव लड़ने से इनकार कर दिया। नेहरू को भी उनकी जनता लुला की तरह प्यार करती थी। पर नेहरू ने लुला की तरह महानता नहीं दिखाई।
भारतीय लोकतंत्र में अनेक खामियां हैं। 30 प्रतिशत से भी कम मत पानेवाली पार्टी केंद्र में अपनी सत्ता बना लेती है। अपने मंत्रालयों के बारे में अधिकांश मंत्रियों को समझ नहीं होती। क्या अमेरिका के समान भारत में भी विशेषज्ञों की मंत्री पद पर नियुक्ति नहीं की जा सकती? देश में तीन करोड़ मुकदमे लंबित हैं। जेलों में 70 प्रतिशत ऐसे कैदी हैं जिनके मामले विचाराधीन हैं। इनमें से तमाम ऐसे हैं, जिन्हें अभियोग साबित होने पर जो सजा मिलेगी, उससे कहीं अधिक सजा अब तक वे काट चुके हैं। जब-जब भ्रष्टाचार की चर्चा होती है, लोकपाल बिल सबको याद आ जाता है। पर राजनीतिक इच्छाशक्ति के अभाव के कारण बात बन नहीं पाती।
राममनोहर लोहिया और जयप्रकाश नारायण ने भी ब्रिटिश मॉडल के लोकतंत्र को अपनाने से पैदा खमियों की ओर ध्यान आकर्षित किया था। जयप्रकाश ने जिस संपूर्ण क्रांति का नारा दिया था, उसमें आमूलचूल परिवर्तन की बात थी। मुख्य प्रहार वर्तमान चुनावी व्यवस्था पर था। विभिन्न बुराइयों की जड़ में उन्होंने उस व्यवस्था को देखा, जो महंगे चुनाव और अयोग्य तथा अपराधी छवि वाले जनप्रतिनिधियों को संरक्षण देती है। जेपी अपने आंदोलन को लंबे समय तक चलाना चाहते थे। किंतु आपातकाल के कारण संपूर्ण क्रांति का लक्ष्य पीछे रह गया। आंदोलन का एकमात्र लक्ष्य तब केवल इंदिरा हटाओ ही रह गया था। नतीजतन आपातकाल तो समाप्त हुआ, पर व्यवस्था में परिवर्तन नहीं हुआ।
आज फिर भ्रष्टाचार और महंगाई के खिलाफ आंदोलन का वातावरण बन रहा है। यद्यपि जयप्रकाश नारायण जैसी कोई शख्सीयत नहीं है, जिसके पीछे जनता खड़ी हो सके, फिर भी जन आंदोलन का वातावरण बनाने का प्रयास किया जा रहा है। मसलन, विगत 30 जनवरी को दिल्ली में भ्रष्टाचार के विरुद्ध बाबा रामदेव की अगुआई में जो रैली हुई थी, उसमें लगभग 30,000 लोगों ने भाग लिया था। वर्तमान जन आंदोलन को जेपी आंदोलन से सीख लेनी चाहिए। आंदोलन का लाभ विरोधी राजनीतिक दल ले सकते हैं। लिहाजा आंदोलन व्यवस्था परिवर्तन के लिए होना चाहिए। जेपी ने वास्तविक लोकतंत्र का ब्लू प्रिंट तैयार करने के लिए समाज विज्ञानियों को अपने साथ जोड़ा था। आज भी ऐसा होना चाहिए। जरूरी यह भी है कि जन आंदोलन एक बड़ी राजनीतिक ताकत बनकर खड़ा हो। क्या हम इसके लिए तैयार हैं?
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