पुलिस कार्यपण्राली प्रजातांत्रिक मूल्यों, वैधानिक अधिकारों के प्रति उदार, खरी तथा जवाबदेह हो, इस नजरिये से सुप्रीम कोर्ट ने कोई पांच साल पहले राज्य सरकारों को पुलिस व्यवस्था में फेरबदल के लिए सुझाव दिए थे। इन पर अमल के लिए कुछ राज्यों ने आयोग व समितियों गठित कीं लेकिन किसी नतीजे पर पहुंचने से पहले कोशिशें आईएएस बनाम आईपीएस के बीच उठे वर्चस्व के सवाल और अहं के टकराव में उलझकर रह गई। लिहाजा पांच साल बाद एक बार फिर उच्चतम न्यायालय को पुलिस व्यवस्था में जरूरी सुधार के लिए हिदायत देने को मजबूर होना पड़ा है। किन्तु ब्रितानी हुकूमत के दौरान 1861 बने ‘पुलिस एक्ट’ में बदलाव लाकर कोई ऐसा कानून अस्तित्व में आए जो पुलिस को कानून के दायरे में काम करने को बाध्य करे और पुलिस की भूमिका जनसेवक के रूप में चिह्नित हो, क्या ऐसा नैतिकता और ईमानदारी के बिना सम्भव है? पुलिस राजनीतिज्ञों के दखल के साथ पहुंच वाले लोगों के अनावश्यक दबाव से भी मुक्त रहते हुए जनता के प्रति संवेदनशील बने ऐसे फलित तब सामने आएंगे जब कानून निर्माता व नियंता ‘अपनी पुलिस के बजाय अच्छी पुलिस’ बनाने की कवायद करें। पुलिस को समर्थ व जवाबदेह बनाने के लिए उत्तर प्रदेश के पूर्व डीजीपी ‘प्रकाश सिंह बनाम भारत संघ’ मामले में सुप्रीम कोर्ट ने पुलिस व्यवस्था को व्यावहारिक बनाने की दृष्टि से सोराबजी समिति की सिफारिशें लागू करने की हिदायत राज्यों को दी थी। पर पुलिस की कार्यपण्राली को जनतांत्रिक मूल्यों के अनुरूप बनाने की पहल किसी भी राज्य सरकार ने नहीं की। न्यायालय ने पुन: पांच साल पुराने निर्देशों को दोहरा कर सुसुप्त राज्य सरकारों को चेताया है। चूंकि ‘पुलिस’ राजनीतिज्ञों के पास एक ऐसे संवैधानिक औजार की तरह है जो विपक्षियों को कानूनन फंसाने या उन्हें जलील व उत्पीड़ित करने के आसान तरीके के रूप में पेश आता है लिहाजा इसको विपक्षी दल सत्ताधारियों के हाथ का खिलौना कहते नहीं अघाते। पर जब इसे जनहितकारी बनाने की हिदायत सुप्रीम कोर्ट दे रहा है तब कांग्रेस व साम्यवादी राज्य सरकारों की बात छोड़िए, ‘कथित राष्ट्रवादी दलों’ की सरकारें तक ‘ब्रिटिश कालीन एक्ट’ को पलटने की उदारता नहीं दिखा रहीं, जो पानी पी-पीकर फिरंगी हुकूमत को कोसती रहती हैं। इससे जाहिर है सभी राजनीतिक दलों की फितरत कमोबेश एक जैसी है। नौकरशाही की तो डेढ़ सौ साल पुराने इस कानून के बने रहने में बल्ले-बल्ले है ही। सो पूरे देश में ‘यथा राजा, तथा प्रजा’ की कहावत फलीभूत हो रही है। इसे दुर्भाग्य कहा जाएगा कि आजादी के 63 साल बाद भी पुलिस की कानूनी संरचना, संस्थागत ढांचा और काम करने का तरीका औपनिवेशिक नीतियों का पिछलग्गू है। अलबत्ता, इसमें परिवर्तन की मांग न सिर्फ लम्बी बल्कि लाजिमी है। लिहाजा इस क्रम में कई समितियां व आयेग बने और उन्होंने सिफारिशें भी कीं परन्तु कोर्ट के बार-बार निर्देशरे के बावजूद राज्य सरकारें सिफारिशें लागू करने की राजनीतिक इच्छाशक्ति का परिचय देने के बजाय इन्हें टालती रही हैं। कुछ सरकारें तो न्यायालय के आदेश को विधायिका व कार्यपालिका में दखल के रूप में देखती हैं। सोराबजी समिति ने पुलिस विधेयक का जो आदर्श प्रारूप तैयार किया है, वह ठंडे बस्ते में है। पुलिस की स्वच्छ छवि के लिए जरूरी है कि उसे दबावमुक्त बनाया जाए क्योंकि पुलिस काम तो सत्ताधारियों के दबाव में करती है, लेकिन जलील खुद उसे होना पड़ता है। झूठे मामलों में कोर्ट की फटकार का सामना पुलिस को करना होता है। पुलिस के आला अधिकारियों की निश्चित अवधि के लिए तैनाती भी जरूरी है क्योंकि सिर पर तबादले की तलवार लटकी हो तो पुलिस भयमुक्त या भयनिरपेक्ष कानूनी कार्रवाई नहीं कर सकती है। पुलिस को एफआईआर दर्ज करने के लिए बाध्यकारी बनाए जाने की कवायद भी सिफारिशों में है। वजह यह है कि पुलिस कमजोर और पहुंच विहीन व्यक्ति के खिलाफ तुरंत एफआईआर लिख लेती है, लेकिन ताकतवर के खिलाफ ऐसा नहीं करती। नाइंसाफी का शिकार बने लोग मामलों को अदालत के संज्ञान में ला रहे हैं और ऐसे मामलों की संख्या बढ़ रही है। इस वजह से पहली नजर में जो जिम्मा पुलिस का है उसका निर्वहन अदालतों को करना पड़ रहा है। उन पर यह अतिरिक्त बोझ है। ऐसे मामले अपवाद रूप में ही पेश होने चाहिए। कोर्ट ने निर्देशित भी किया है कि पुलिस किसी का एफआईआर दर्ज करने से मना नहीं कर सकती। दिल्ली हाईकोर्ट ने तो एफआईआर की प्रति भी अनिवार्यत: फरियादी को देने और उसे फौरन वेबसाइट पर डालने की हिदायत दी है। राष्ट्रीय पुलिस आयोग भी पुलिस की कार्यपण्राली से संतुष्ट नहीं है। उसकी रिपोर्ट के मुताबिक देश में 60 फीसद ऐसे लोगों को हिरासत में लिया जाता है, जिन पर लगे आरोप सही नहीं होते। कारागारों में बंद 42 फीसद कैदी इसी श्रेणी के हैं। इन्हीं कैदियों के रखरखाव और भोजन पानी पर सबसे ज्यादा धनराशि खर्च होती है। आरुषि हत्याकाण्ड, असीमानंद की गिरफ्तारी और बांदा में बसपा विधायक द्वारा बलात्कार की शिकार नाबालिग किशोरी की हिरासत कुछ ऐसे ताजा मामले हैं जिनमें सीबीआई और पुलिस की नाकामी जाहिर तो हुई ही, निदरेषों को प्रताड़ना भी झेलनी पड़ी है। इसलिए राज्य सरकारों को पुलिस व्यवस्था में सुधार की जरूरत को नागरिक हितों की सुरक्षा के तईं देखने की जरूरत है, न कि पुलिस को राजनीतिक हित-साध्य के लिए खिलौना बनाने की।
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