उत्तर औपनिवेशिक भारत की पहली नदी घाटी परियोजना से विस्थापित लोगों का अब भी पुनर्वास नहीं हुआ है। पिछले 57 साल से पुनर्वास की आस लगाए लगभग चार हज़ार प्रभावित लोगों ने अब 27 फ़रवरी से आमरण अनशन पर जाने का फ़ैसला किया है। इसमें आंदोलन कर रहे लोगों की दूसरी और तीसरी पीढ़ी भी शामिल हो रही है, जो विस्थापित अवस्था में ही पैदा और जवान हुई। दामोदर घाटी परियोजना के समय, 1954 में जब इनकी ज़मीन अधिग्रहीत की गई थी तो पश्चिम बंगाल और मौजूदा झारखंड के 250 से अधिक गांव इसकी जद में थे। इन गांवों से विस्थापित हुए लोगों में से सिफऱ् 340 लोगों को ही सरकार ने अब तक मुआवजा और नौकरी दी है, जबकि एक हज़ार से अधिक विस्थापित परिवार पिछली आधी सदी से सरकारी दफ्तरों में भटक और सड़कों पर आंदोलन कर रहे हैं। इन लोगों ने ‘दामोदर घाटी विस्थापित कल्याण संघ’ के बैनर तले इस संघर्ष को तेज करने का फ़ैसला किया है। बीते साल भी इनमें से लगभग तीन हज़ार लोगों ने तीन दिनों तक भूख हड़ताल की थी, जिस पर हुआ समझौता अभी तक अधर में लटका हुआ है। ’50 के दशक में शुरू हुई दामोदर घाटी निगम और हीराकुंड बांध परियोजना देश की सबसे महत्त्वाकांक्षी परियोजनाओं में से थी। विद्युत उत्पादन और सिंचाई व्यवस्था को लक्ष्य करते हुए 7 जुलाई 1948 को संवैधानिक एक्ट के तहत दामोदर घाटी परियोजना की शुरुआत की गई और 5 सालों के भीतर 1953 में ही तिलैया में दामोदर की एक सहायक नदी बराकर पर पहला बांध बन कर तैयार हो गया। तब से लेकर अब तक इन विस्थापितों के संदर्भ में पुनर्वास की जितनी कवायदें हुई हैं, वे थोथी साबित हुई। दामोदर घाटी निगम का प्रबंधन पुनर्वास की ज़िम्मेदारी से कई दफ़ा इनकार कर चुका है। सम्बंधित राज्यों के राज्यपालों सहित उच्चतम न्यायालय द्वारा विस्थापितों के पक्ष में फ़ैसला सुनाने के बाद भी पीड़ितों को उचित आवास और मुआवजा अब तक नहीं मिला है। देश में बांधों और नदी घाटी परियोजनाओं की ऐतिहासिक समीक्षा करने पर सरकारी नीतियों का लचरपन साफ़ हो जाता है। पर्यावरण क़ानून और ज़मीन अधिग्रहण से लेकर पुनर्वास तक की व्यवस्था के साथ खिलवाड़ हुआ है। 1953 में महानदी पर बने हीराकुंड बांध से विस्थापित हुए लोगों का भी संघर्ष अब तक जारी है। नदी घाटी परियोजनाएं जिन लक्ष्यों को साधने के लिए शुरू हुई थीं, उनके बजाय इन्हें औद्योगिक कामों के लिए इस्तेमाल किया जाने लगा। संभलपुर में ‘हीराकुंड नागरिक परिषद’ ने औद्योगिक क्षेत्र के लिए पानी भेजने के विरोध में राष्ट्रपति से मुलाकात करने के बाद अक्टूबर 2006 में बांध के एक छोर से दूसरे छोर तक 20 किलोमीटर लम्बी मानव श्रृंखला बनाकर लोगों का ध्यान खींचा था। हीराकुंड बांध की दो ऊंची मीनारों का नामकरण नेहरू और गांधी के नाम पर किया गया है, लेकिन इन दो मीनारों को ‘मानव शरीर से जोड़ देने’ के बावज़ूद प्रभावितों को राहत नहीं मिली। बांध के मुद्दे पर देश में ऐसे संघर्ष कई रूपों में और कई मामलों को लेकर चल रहे हैं। रेणुका बांध के विरोध में हिमाचल प्रदेश के लोग पिछले एक साल से सड़क पर हैं। इस बांध के डूब क्षेत्र के अंतर्गत सिरमौर ज़िले के 33 गांव आते हैं। दिल्ली को पानी मुहैया कराने के लिए यह बांध बनाया जा रहा है। ऐसा आकलन है कि अभी दिल्ली में सिफऱ् 60 फीसद पानी का ही सही इस्तेमाल हो पा रहा है। दिल्ली के नागरिक अधिकार कार्यकर्ताओं ने मुख्यमंत्री को कुछ तरीके सुझाए हैं जिनमें तकनीकी सुधार के जरिये इसे 90 फीसद के स्तर तक बढ़ाया जा सकता है। इस उपक्रम के जरिये रेणुका से बचा जा सकता है। नर्मदा घाटी में जल-जंगल-ज़मीन के संघर्ष को 25 साल हो गए और यहां से विस्थापित हुए 50 हज़ार से अधिक लोग अब भी सही मुआवजे और पुनर्वास के लिए आंदोलनरत हैं। सरदार सरोवर परियोजना के लिए 50 साल से अधिग्रहीत की गई भूमि का 40 फीसद हिस्सा बिना किसी इस्तेमाल के परती पड़ा हुआ है। ज़मीन के कुछ टुकड़े को सरकार ने कम्पनियों और उद्योगों को किराये पर दे रखा है। ज़मीन अधिग्रहण करने के बाद उसके ग़्ौर-परियोजनाकारी इस्तेमाल का प्रचलन देश में एक मामले तक नहीं सिमटा है। लवासा परियोजना को अभी जहां विकसित किया जा रहा है, उसका कुछ हिस्सा 1975 में बने बारसगांव बांध के नाम पर अधिग्रहीत किया गया था और अगले 25-30 सालों तक वह परती पड़ा रहा। अब इसे लवासा पर खरचा जा रहा है। बांध से मार खाई ज़िंदगियों के चलते कई बार लोगों ने आमरण अनशन को विरोध के तरीके के तौर पर चुना है। ‘दामोदर घाटी विस्थापित कल्याण संघ’ उसी परम्परा की अगली कड़ी है। नर्मदा घाटी में जब 7 जनवरी 1991 को सात लोगों के बलिदानी जत्थे ने अनिश्चितकालीन भूख हड़ताल का ऐलान किया था, तब जाकर सरदार सरोवर परियोजना की स्वतंत्र समीक्षा कराने की स्थिति बन पाई थी। यह निर्णय भूख हड़ताल के 22वें दिन आया। 1993 में नर्मदा बचाओ आंदोलन ने यह घोषणा की थी कि अगर सरकार इस परियोजना का पुनरीक्षण करने को राजी नहीं हुई तो उनके कुछ कार्यकर्ता नर्मदा में जल समाधि ले लेंगे, लेकिन अपनी ताकत के बल पर राज्य ने इसे टाल दिया। पुनर्वास के अधिकतर मामलों में न्यायालय के हस्तक्षेप के बाद सरकारी पहलक़दमी हुई है। कई बार तो बाध्यकारी उपबंधों के तले ऐसे क़दम उठाए गए। ओंकारेश्वर बांध के सिलसिले में विस्थापितों के पक्ष में जब राज्य उच्च न्यायालय ने फ़ैसला सुनाया तो मध्य प्रदेश सरकार और एनएसडीसी ने उच्चतम न्यायालय में अपील कर दी। सरकारी पक्ष यह था कि राज्य के पास पुनर्वास के लिए मात्र 5000 हेक्टेयर ज़मीन ही है। तब जाकर उच्चतम न्यायालय में तत्कालीन न्यायाधीश के. जी. बालाकृष्णन और न्यायमूर्ति आर. वी. रवींद्रन ने सरकार को लगभग फ़टकार लगाते हुए पीड़ितों को सही व्यवस्था देने को कहा था।
Monday, February 21, 2011
बांध परियोजनाओं से उपजे सवाल
उत्तर औपनिवेशिक भारत की पहली नदी घाटी परियोजना से विस्थापित लोगों का अब भी पुनर्वास नहीं हुआ है। पिछले 57 साल से पुनर्वास की आस लगाए लगभग चार हज़ार प्रभावित लोगों ने अब 27 फ़रवरी से आमरण अनशन पर जाने का फ़ैसला किया है। इसमें आंदोलन कर रहे लोगों की दूसरी और तीसरी पीढ़ी भी शामिल हो रही है, जो विस्थापित अवस्था में ही पैदा और जवान हुई। दामोदर घाटी परियोजना के समय, 1954 में जब इनकी ज़मीन अधिग्रहीत की गई थी तो पश्चिम बंगाल और मौजूदा झारखंड के 250 से अधिक गांव इसकी जद में थे। इन गांवों से विस्थापित हुए लोगों में से सिफऱ् 340 लोगों को ही सरकार ने अब तक मुआवजा और नौकरी दी है, जबकि एक हज़ार से अधिक विस्थापित परिवार पिछली आधी सदी से सरकारी दफ्तरों में भटक और सड़कों पर आंदोलन कर रहे हैं। इन लोगों ने ‘दामोदर घाटी विस्थापित कल्याण संघ’ के बैनर तले इस संघर्ष को तेज करने का फ़ैसला किया है। बीते साल भी इनमें से लगभग तीन हज़ार लोगों ने तीन दिनों तक भूख हड़ताल की थी, जिस पर हुआ समझौता अभी तक अधर में लटका हुआ है। ’50 के दशक में शुरू हुई दामोदर घाटी निगम और हीराकुंड बांध परियोजना देश की सबसे महत्त्वाकांक्षी परियोजनाओं में से थी। विद्युत उत्पादन और सिंचाई व्यवस्था को लक्ष्य करते हुए 7 जुलाई 1948 को संवैधानिक एक्ट के तहत दामोदर घाटी परियोजना की शुरुआत की गई और 5 सालों के भीतर 1953 में ही तिलैया में दामोदर की एक सहायक नदी बराकर पर पहला बांध बन कर तैयार हो गया। तब से लेकर अब तक इन विस्थापितों के संदर्भ में पुनर्वास की जितनी कवायदें हुई हैं, वे थोथी साबित हुई। दामोदर घाटी निगम का प्रबंधन पुनर्वास की ज़िम्मेदारी से कई दफ़ा इनकार कर चुका है। सम्बंधित राज्यों के राज्यपालों सहित उच्चतम न्यायालय द्वारा विस्थापितों के पक्ष में फ़ैसला सुनाने के बाद भी पीड़ितों को उचित आवास और मुआवजा अब तक नहीं मिला है। देश में बांधों और नदी घाटी परियोजनाओं की ऐतिहासिक समीक्षा करने पर सरकारी नीतियों का लचरपन साफ़ हो जाता है। पर्यावरण क़ानून और ज़मीन अधिग्रहण से लेकर पुनर्वास तक की व्यवस्था के साथ खिलवाड़ हुआ है। 1953 में महानदी पर बने हीराकुंड बांध से विस्थापित हुए लोगों का भी संघर्ष अब तक जारी है। नदी घाटी परियोजनाएं जिन लक्ष्यों को साधने के लिए शुरू हुई थीं, उनके बजाय इन्हें औद्योगिक कामों के लिए इस्तेमाल किया जाने लगा। संभलपुर में ‘हीराकुंड नागरिक परिषद’ ने औद्योगिक क्षेत्र के लिए पानी भेजने के विरोध में राष्ट्रपति से मुलाकात करने के बाद अक्टूबर 2006 में बांध के एक छोर से दूसरे छोर तक 20 किलोमीटर लम्बी मानव श्रृंखला बनाकर लोगों का ध्यान खींचा था। हीराकुंड बांध की दो ऊंची मीनारों का नामकरण नेहरू और गांधी के नाम पर किया गया है, लेकिन इन दो मीनारों को ‘मानव शरीर से जोड़ देने’ के बावज़ूद प्रभावितों को राहत नहीं मिली। बांध के मुद्दे पर देश में ऐसे संघर्ष कई रूपों में और कई मामलों को लेकर चल रहे हैं। रेणुका बांध के विरोध में हिमाचल प्रदेश के लोग पिछले एक साल से सड़क पर हैं। इस बांध के डूब क्षेत्र के अंतर्गत सिरमौर ज़िले के 33 गांव आते हैं। दिल्ली को पानी मुहैया कराने के लिए यह बांध बनाया जा रहा है। ऐसा आकलन है कि अभी दिल्ली में सिफऱ् 60 फीसद पानी का ही सही इस्तेमाल हो पा रहा है। दिल्ली के नागरिक अधिकार कार्यकर्ताओं ने मुख्यमंत्री को कुछ तरीके सुझाए हैं जिनमें तकनीकी सुधार के जरिये इसे 90 फीसद के स्तर तक बढ़ाया जा सकता है। इस उपक्रम के जरिये रेणुका से बचा जा सकता है। नर्मदा घाटी में जल-जंगल-ज़मीन के संघर्ष को 25 साल हो गए और यहां से विस्थापित हुए 50 हज़ार से अधिक लोग अब भी सही मुआवजे और पुनर्वास के लिए आंदोलनरत हैं। सरदार सरोवर परियोजना के लिए 50 साल से अधिग्रहीत की गई भूमि का 40 फीसद हिस्सा बिना किसी इस्तेमाल के परती पड़ा हुआ है। ज़मीन के कुछ टुकड़े को सरकार ने कम्पनियों और उद्योगों को किराये पर दे रखा है। ज़मीन अधिग्रहण करने के बाद उसके ग़्ौर-परियोजनाकारी इस्तेमाल का प्रचलन देश में एक मामले तक नहीं सिमटा है। लवासा परियोजना को अभी जहां विकसित किया जा रहा है, उसका कुछ हिस्सा 1975 में बने बारसगांव बांध के नाम पर अधिग्रहीत किया गया था और अगले 25-30 सालों तक वह परती पड़ा रहा। अब इसे लवासा पर खरचा जा रहा है। बांध से मार खाई ज़िंदगियों के चलते कई बार लोगों ने आमरण अनशन को विरोध के तरीके के तौर पर चुना है। ‘दामोदर घाटी विस्थापित कल्याण संघ’ उसी परम्परा की अगली कड़ी है। नर्मदा घाटी में जब 7 जनवरी 1991 को सात लोगों के बलिदानी जत्थे ने अनिश्चितकालीन भूख हड़ताल का ऐलान किया था, तब जाकर सरदार सरोवर परियोजना की स्वतंत्र समीक्षा कराने की स्थिति बन पाई थी। यह निर्णय भूख हड़ताल के 22वें दिन आया। 1993 में नर्मदा बचाओ आंदोलन ने यह घोषणा की थी कि अगर सरकार इस परियोजना का पुनरीक्षण करने को राजी नहीं हुई तो उनके कुछ कार्यकर्ता नर्मदा में जल समाधि ले लेंगे, लेकिन अपनी ताकत के बल पर राज्य ने इसे टाल दिया। पुनर्वास के अधिकतर मामलों में न्यायालय के हस्तक्षेप के बाद सरकारी पहलक़दमी हुई है। कई बार तो बाध्यकारी उपबंधों के तले ऐसे क़दम उठाए गए। ओंकारेश्वर बांध के सिलसिले में विस्थापितों के पक्ष में जब राज्य उच्च न्यायालय ने फ़ैसला सुनाया तो मध्य प्रदेश सरकार और एनएसडीसी ने उच्चतम न्यायालय में अपील कर दी। सरकारी पक्ष यह था कि राज्य के पास पुनर्वास के लिए मात्र 5000 हेक्टेयर ज़मीन ही है। तब जाकर उच्चतम न्यायालय में तत्कालीन न्यायाधीश के. जी. बालाकृष्णन और न्यायमूर्ति आर. वी. रवींद्रन ने सरकार को लगभग फ़टकार लगाते हुए पीड़ितों को सही व्यवस्था देने को कहा था।
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