Monday, February 7, 2011

साथ सिर्फ विनायक सेन का या जनतंत्र का


तीस जनवरी को इस बार भी गांधीजी की शहादत को छोड़कर, बाकी सब कुछ याद किया गया। बहरहाल, इस बार खासतौर पर सिविल सोसाइटी कहलाने वाले तबके ने गांधीजी को दो संदभरे में याद किया। पहला, आम तौर पर भ्रष्टाचार तथा खासतौर पर काले धन के विरोध के संदर्भ में। दूसरा, डॉ. विनायक सेन को छत्तीसगढ़ में एक निचली अदालत द्वारा राजद्रोह के आरोप में सुनायी गयी सजा के विरोध के संदर्भ में। इनमें पहला संदर्भ, गांधी की शहादत के संदर्भ को छोड़कर, इस मौके पर भी गांधी को नशा मुक्ति, स्वच्छता आदि के लिए ही याद करने की परम्परा की ही एक और कड़ी है। लेकिन, दूसरा संदर्भ विडम्बना का बहुत अर्थपूर्ण उदाहरण है। आखिरकार, गांधीजी की जान विचार-संचालित हिंसा ने ली थी। अब गांधी की दुहाई का उपयोग विनायक सेन के लिए न्याय तथा मानवीय अधिकारों की लड़ाई में किया जा रहा था, जबकि उन पर सच हो या झूठ, विचार-संचालित हिंसा से जुड़े माओवादियों का साथ देने का ही आरोप है। विनायक सेन के मामले में देश भर में ही नहीं, दूसरे देशों से भी जिस तरह से आवाज उठी है, उससे एक बात तो बिल्कुल साफ हो ही जाती है। पहली तो यही कि अगर छत्तीसगढ़ की निचली अदालत ने उन्हें संदिग्ध आधार पर कड़ी सजा देकर माओवादियों के समर्थन पर अंकुश लगाना चाहा था, तो उसकी यह कोशिश उल्टी पड़ी है। उसकी इस कड़ी कार्रवाईने ठीक उल्टा ही काम किया है और माओवादियों की मदद ही की है। बेशक, इसमें विनायक सेन के व्यक्तित्व और काम की अपनी भूमिका भी है। फिर भी इससे, बहुत बार भुला दिये जाने वाले इस सच की भी पुष्टि होती है कि अगर हमारे मुख्यत: संविधान व कानून से संचालित समाज के लिए विचारधारा- संचालित हिंसा के खतरे को शिकस्त देनी है, तो यह काम हिंसा के मुकाबले कथित रूप से कड़े कदमउठाने भर से नहीं हो सकता। उल्टे इसके लिए हिंसा का मुकाबला करने के कदमों का, पूरी मुस्तैदी से संविधान व कानून के दायरे में होना सुनिश्चित करना होगा। ऐसी जनतांत्रिक वैधता के बिना, शासन की कार्रवाई अपने लक्ष्य से दूर से दूर ही होती जाती है। लेकिन, ऐसी जनतांत्रिक वैधता की जरूरत क्या सिर्फ शासन को ही है? क्या शासन से बाहर, कथित सिविल सोसाइटी को और खासतौर पर खुद को जनतंत्र तथा मानवाधिकारों का संरक्षक मानने वालों को, ऐसी जनतांत्रिक वैधता की कोई जरूरत नहीं है? आमतौर पर इन ताकतों के व्यवहार को देखकर तो ऐसा ही लगता है कि नहीं। या शायद यह कहना ज्यादा सही होगा कि यहां यह मानकर चला जाता है कि शासन के बाहुबल के विरोध में, जनतांत्रिक वैधता अपने आप ही समायी हुई है। हमारे देश में, जहां सत्तर के दशक के उत्तरार्ध में इमज्रेसी के अनुभव के बीच से ही किसी ध्यान देने लायक पैमाने पर मानवाधिकार व नागरिक अधिकार के सवालों ने सिविल सोसाइटी के बीच जगह बनायी थी, कुछ समय तक यह स्थिति आसानी से चलती रही। लेकिन, जल्द ही व्यापक नागरिक अधिकार गोलबंदी के पीयूसीएल तथा पीयूडीआर में विभाजन ने इस मोर्चे पर दक्षिण व वामपंथी राजनीतिक रुझानों के अंतर को सामने ला दिया। और इन दोनों के ही सिविल सोसाइटी में हाशिये पर ही पड़े रहने ने, जनतांत्रिक वैधता के अभाव में इन चिंताओं के ही बहुत सीमित दायरे में बने रहने को सामने ला दिया। जनतांत्रिक व नागरिक अधिकार संगठनों व ग्रुपों का यह संकट तब और खुलकर सामने आ गया, जब शासन-इतर संगठित हिंसा एक वास्तविकता बनकर सामने आ गयी। अस्सी के दशक के उत्तरार्ध से साम्प्रदायिक आक्रामकता व हिंसा, फिर अतिवादी व आतंकवादी हिंसा और अंतत: माओवादी हिंसा ने, इसकी गुंजाइश खत्म कर दी कि शासन के बल प्रयोग की अवैधता को या शासन के विरोध में बल प्रयोग की वैधता स्वयंसिद्ध मानकर चला जाए। बेशक, ऐसा मानने पर भी कोई रोक नहीं है। सच तो यह है कि साम्प्रदायिक आक्रामकता, अतिवादी व आतंकवादी कार्रवाइयों और इसी तरह माओवादी गतिविधियों के पक्ष में और उसी ठिकाने से शासन की कार्रवाइयों के विरोध में, नागरिक व मानव-अधिकारों की दुहाइयां आये दिन सुनने को मिलती भी हैं। लेकिन, इन दुहाइयों को सम्बंधित राजनीतिक धाराओं का विस्तार ही माना जाता है, जिनका आमतौर पर सिविल सोसाइटी पर शायद ही कोई खास असर होगा। यह बात माओवादियों से जुड़ी धारा के मामले में भी सच है, हालांकि उसका दायरा कहीं बड़ा है, उसका नैतिक आभामंडल कहीं ज्यादा चौंधियानेवाला है और उसमें अरुंधती राय तथा महाश्वेता देवी जैसे चमकीले बौद्धिक सितारे भी शामिल हैं। दुर्भाग्य से यह ठीक उस मुकाम पर, जहां नागरिक व मानव-अधिकारों के पक्ष में आवाज की कारगर मौजूदगी सबसे ज्यादा जरूरी है, उस आवाज के एक तरह से गायब हो जाने जैसा है। इस आवाज की जगह आज हमें जनतांत्रिक वैधता से निरपेक्ष, शासन की पक्षधर बल्कि उसके ज्यादा से ज्यादा दमनकारी रूप की मांग करने वाली आवाजें और जवाब में, उसके खुल्लमखुल्ला हिंसक विरोध की लड़ाकू आवाजें ही ज्यादा सुनने को मिलती हैं। वास्तव में इन आवाजों की तेज से तेज होती टक्कर में, नागरिक व मानवाधिकारों की उस आवाज की जगह सिकुड़ती ही जा रही है, जो जनतांत्रिक वैधता के बल पर सिविल सोसाइटी के बड़े हिस्से को अपने साथ जोड़ सकती है। ठीक इसी के बल पर यह आवाज, एक ओर शासन का जनतांत्रिक व्यवस्था की लक्ष्मण रेखाओं को न लांघना सुनिश्चित कर सकती और दूसरी ओर, विचार-संचालित ¨हसा की वैधता पर गम्भीर सवाल खड़े कर, उसे हाशिये पर डाल सकती है। आज के हालात में, ये दोनों ही काम समान रूप से जरूरी हैं। दुर्भाग्य से इसके बावजूद, शासन बनाम अन्य के बढ़ते धुवीकरण के बीच, इस आवाज की कद्र करने वाले कम ही दिखाई देते हैं। डॉ. विनायक सेन के साथ हुए अन्याय का मुद्दा उठाने के लिए, गांधी की शहादत का सहारा लेने की उपयोगिता संदेह से परे है। लेकिन, यह तब तक गांधी की शहादत के इस्तेमाल का ही मामला रहेगा, जब तक अन्याय की इस पहचान को शासन तक ही सीमित रखा जाएगा और माओवादियों की हिंसा तथा जोर-जब्र के शिकार होने वालों के लिए न्याय के सवालों को या तो अनदेखा ही किया जाता रहेगा या गैर-महत्वपूर्ण मानकर टरकाया ही जाता रहेगा। याद रहे कि ऐसा पक्षपात, अंतत: विनायक सेनों के पक्ष को भी कमजोर करता है; देश के तथा आम जनता के वास्तविक हितों को तो खैर कमजोर करता ही है। विनायक सेन के साथ हुए अन्याय का मुद्दा उठाने के लिए, गांधी की शहादत का सहारा लेने की उपयोगिता संदेह से परे है। यह तब तक गांधी की शहादत के इस्तेमाल का ही मामला रहेगा, जब तक अन्याय की इस पहचान को शासन तक ही सीमित रखा जाएगा और माओवादियों की हिंसा तथा जोर- जब्र के शिकार होने वालों के लिए न्याय के सवालों को अनदेखा ही किया जाता रहेगा या गैर-अहम मानकर टरकाया जाता रहेगा। याद रहे कि ऐसा पक्षपात, अंतत: विनायक सेन जैसों के पक्ष को भी कमजोर करता है; देश के तथा आम जनता के वास्तविक हितों को तो खैर कमजोर करता ही है



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