श्रीनगर के लाल चौक पर भारत का राष्ट्रीय ध्वज तिरंगा फहराने के लिए भारतीय जनता पार्टी के नेताओं ने जो संघर्ष किया, उसकी काफी आलोचना हुई है। मैं भी इस मत का समर्थक हूं कि कश्मीर की मौजूदा स्थिति में भाजपा को यह जिद नहीं करनी चाहिए थी। यह ठीक है कि भारत के किसी भी नागरिक या संगठन को लाल चौक या कश्मीर में कहीं भी तिरंगा फहराने की आजादी है और यह आजादी सिर्फ संविधान या कानून की किताबों में सैद्धांतिक तौर पर नहीं होनी चाहिए, बल्कि इस आजादी का उपयोग व्यावहारिक तौर पर भी करने की आजादी हमारे देश के सभी नागरिकों को होनी चाहिए। भारतीय जनता पार्टी के नेता अपनी इस आजादी का इस्तेमाल करना चाहते थे, इसलिए इसमें कहीं-कोई दोष नहीं है और न ही इसमें ऐसा कुछ खोजा जाना चाहिए। परंतु वास्तविक समस्या यह है कि क्या हमें संविधान से मिले अपने इस अधिकार के बारे में अमल करने के लिए कोई भी कदम उठाने से पहले इस बात पर भी जरूर सोच-विचार नहीं करना चाहिए कि इससे मुल्क अथवा जनता को फायदा होगा अथव नुकसान। तिरंगा झंडा फहराने की आजादी इसलिए हमें नहीं मिली है कि इसके कारण हमारे ही लोगों में विभाजन अथवा इस तरह की कोई भावना पैदा हो। हमारे राष्ट्रीय गौरव का प्रतीक तिरंगा झंडा तो देश की संप्रभुता और एकता का प्रतीक है। इस संदर्भ में यदि हम देखें तो लाल चौक पर जो श्रीनगर का केंद्रीय स्थल है पर तिरंगा झंडा फहराने से अगर कश्मीर की राजनीतिक और आम जनजीवन की स्थिति बिगड़ती है अथवा भड़कती है तो यह जिद बनाए रखना किसी भी दृष्टि से न्यायसंगत नहीं माना जा सकता है। यहां हमें विचार करना होगा कि राष्ट्रवाद एक गहन और मूल्यवान विचार है और इसके विपरीत उग्र राष्ट्रवाद एक हमारे देश के लिए एक बचकाना मर्ज है। हालांकि इस पूरे प्रकरण का एक दूसरा पक्ष भी है जिसे ईमानदारी से समझने की कोशिश शायद नहीं की गई है। इस पूरे वाकये के दौरान जम्मू और कश्मीर के वर्तमान मुख्यमंत्री उमर अब्दुल्ला के मुंह से एक बार भी यह शब्द सुनने को नहीं मिला अथवा निकला कि कश्मीर भारत का अविच्छिन्न अंग है। इसलिए अगर कोई जनतांत्रिक संगठन गणतंत्र दिवस के अवसर पर कश्मीर के किसी हिस्से में तिरंगा झंडा फहराने आता है तो उसका स्वागत है, क्योंकि हम सब भारतीय नागरिक हैं और यह हमारे लिए गर्व की बात है। इस तरह मुख्यमंत्री उमर अब्दुल्ला को स्वागत का प्रस्ताव ही नहीं देना चाहिए था, बल्कि उन्हें कहना चाहिए था कि इस कार्यक्रम में उनके समेत आम कश्मीरी भी भाग लेंगे। वह कह सकते थे कि चूंकि लाल चौक सुरक्षा की दृष्टि से एक संवेदनशील जगह है, इसलिए हम भाजपा को आमंत्रित करते हैं कि वह श्रीनगर में ही किसी और स्थान पर जहां राज्य सरकार द्वारा सुरक्षा की समुचित व्यवस्था की जा सके, तिरंगा झंडा के ध्वजारोहण का कार्यक्रम आयोजित करे। इसके साथ उमर अब्दुल्ला यह भी कह सकते थे कि लाल चौक पर तिरंगा झंडा फहराने की अनुमति देने के लिए यह उचित समय नहीं है, क्योंकि इससे कानून-व्यवस्था के बिगड़ने की आशंका है। इसके बावजूद हम हम अपनी तरफ से पूरा प्रयत्न कर रहे हैं कि जल्द ही वह समय आए जब लाल चौक ही नहीं, बल्कि कश्मीर के किसी भी स्थान पर हमारे राष्ट्रीय गौरव का प्रतीक तिरंगा झंडा फहराना सहज हो सके तथा ऐसे कार्यक्रमों में शामिल होने के लिए ज्यादा से ज्यादा लोग उत्सुक हों। यदि ऐसा कुछ संभव नहीं हो पा रहा था तो भी जम्मू-कश्मीर के मुख्यमंत्री उमर अब्दुला भाजपा नेताओं से यह अनुरोध कर सकते थे कि वह कश्मीर समस्या का समाधान निकालने में उनकी सहायता करे ताकि सभी के लिए सहूलियत और शांति का मार्ग प्रशस्त हो तथा घाटी में अमन-चैन की स्थिति में सुधार हो। सवाल यह है कि यदि भाजपा उग्र राष्ट्रवादी है तो क्या उमर अब्दुल्ला उग्र कश्मीरवादी नहीं हैं? इतने संवेदनशील मामले में वे सिर्फ कश्मीरी अवाम की भावनाओं का खयाल रखते हैं और शेष भारत की भावनाओं की उपेक्षा क्यों कर देते हैं अथवा उन्हें भुला क्यों देते हैंक? अनेक दशकों से जब कभी भी शेष भारत का कोई व्यक्ति कश्मीर जाता है तो उससे आखिर यह सवाल क्यों पूछा जाता है क्या आप इंडिया से आ रहे हैं? यह जुमला कश्मीर और भारत की नहीं, कश्मीर बनाम भारत की भावना पैदा करता है। कश्मीर के अलगाववादी और आतंकवादी चाहे जो कहें, लेकिन भारत के संविधान और चुनाव कानून के तहत चुनाव जीतकर आए हुए उमर अब्दुल्ला तथा उनके समर्थकों का कर्तव्य क्या यह नहीं बनता है कि वह कश्मीर बनाम भारत के इस द्वंद्वात्मक विचार को पूरी तरह खत्म भले ही न कर सकें, लेकिन कम से कम कमजोर करने का प्रयास तो अवश्य ही करें। कश्मीर भारत का अंग है तो कश्मीर के मुख्यमंत्री भी भारत के अंग हैं। आखिर ऐसा क्यों है कि वह हर मौके पर कश्मीर के प्रवक्ता की भूमिका में नजर आते हैं। याद नहीं आता कि उन्होंने आज तक एक बार भी भारत के प्रवक्ता की छवि में लोगों को नजर आए हों। इस बारे में सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि उनके पिता और पूर्व मुख्यमंत्री फारुख अब्दुल्ला केंद्रीय सरकार में कैबिनेट मंत्री भी हैं और वह इस तरह के मामलों के लिए काफी सुलझे हुए राजनेता माने जाते हैं। परिवार का एक सदस्य केंद्र की सत्ता में और दूसरा सदस्य राज्य की सत्ता में है, क्या यह महज इत्तेफाक है अथवा और कुछ। पिता और पुत्र के क्या कहने! जम्मू-कश्मीर का श्रीनगर शहर वह संसदीय निर्वाचन क्षेत्र है, जहां से उमर अब्दुल्ला के पिता फारुख अब्दुल्ला चुनाव जीत कर भारत की संसद में पहुंचे हैं। आखिर इतने गंभीर और गुरुत्वपूर्ण मुद्दे पर उनके चुप रहने का क्या कोई औचित्य माना जा सकता है? अपने पुत्र को कश्मीर की राजनीतिक सत्ता सौंपने के बाद कश्मीर और भारत के प्रति फारुख अब्दुल्ला की क्या कोई राजनीतिक या नैतिक जिम्मेदारी नहीं रह गई है? पहले कहा जाता था और अब भी माना जाता है कि कांग्रेस मुलायम सांप्रदायिकता का राजनीतिक खेल खेलती है तो भाजपा उग्र सांप्रदायिकता का। इसी तर्ज पर क्या यह कहा जा सकता है कि कश्मीर में अलगाववादी उग्र अलगाववाद से पीडि़त हैं तो अब्दुल्ला परिवार मुलायम अलगाववाद को पोषण देता आ रहा है। इस मामले में आश्चर्यपूर्ण बात यह है कि कांग्रेस और भाजपा के बीच यह फर्क करने वाले अनेक विचारक और राजनीतिक विश्लेषक कश्मीर में अलगाववाद की इन दो किस्मों अथवा धाराओं के बारे में नोटिस लेना जरूरी नहीं समझते। बेशक कश्मीर की समस्या बेहद नाजुक है और अलगाववाद की भावना कश्मीर के अवाम में भी देखी जा सकती है। परंतु इसका लोकतांत्रिक समाधान कुछ ऐसा भी हो सकता है जिसमें कश्मीरी अवाम की भावनाओं का ध्यान रखा जाए और भारत की संप्रभुता और एकता पर भी आंच न आने पाए। हमारे पूर्वज कश्मीर के लिए अलग संविधान और अलग झंडे को स्वीकृति दे कर पहले ही हिमालयी भूल कर चुके हैं। दुनिया का कोई भी देश ऐसा नहीं होगा और होना भी नहीं चाहिए-जहां एक ही देश के अलग-अलग दो झंडे और दो संविधान हों। यह तो राष्ट्र के भीतर राष्ट्र की बात हुई, लेकिन कश्मीर समस्या का इलाज खोजने वाला कोई भी वैद्य इस पहलू की चर्चा करना जरूरी नहीं समझता। केंद्र सरकार की ओर से बड़ी-बड़ी नादानियां और गड़बडि़यां हुई हैं। पर वर्तमान स्थिति के लिए क्या कश्मीर का स्थानीय लोकतांत्रिक नेतृत्व थोड़ा भी जिम्मेदार नहीं है? कश्मीर समस्या पर जो लोग एकतरफा विचार कर रहे हैं वह कश्मीर को शेष भारत से दूर धकेल रहे हैं। कश्मीर का लोकतांत्रिक नेतृत्व जरूरत से ज्यादा कश्मीरवादी होकर शेष भारत को कश्मीर से दूर ठेल रहा है। हमें याद रखना चाहिए कि ताली तभी बजेगी जब दोनों हथेलियां आपस में मिलेंगी। (लेखक स्वतंत्र टिप्पणीकार हैं)
Wednesday, February 2, 2011
कैसे सुलझेगी कश्मीर की गुत्थी
श्रीनगर के लाल चौक पर भारत का राष्ट्रीय ध्वज तिरंगा फहराने के लिए भारतीय जनता पार्टी के नेताओं ने जो संघर्ष किया, उसकी काफी आलोचना हुई है। मैं भी इस मत का समर्थक हूं कि कश्मीर की मौजूदा स्थिति में भाजपा को यह जिद नहीं करनी चाहिए थी। यह ठीक है कि भारत के किसी भी नागरिक या संगठन को लाल चौक या कश्मीर में कहीं भी तिरंगा फहराने की आजादी है और यह आजादी सिर्फ संविधान या कानून की किताबों में सैद्धांतिक तौर पर नहीं होनी चाहिए, बल्कि इस आजादी का उपयोग व्यावहारिक तौर पर भी करने की आजादी हमारे देश के सभी नागरिकों को होनी चाहिए। भारतीय जनता पार्टी के नेता अपनी इस आजादी का इस्तेमाल करना चाहते थे, इसलिए इसमें कहीं-कोई दोष नहीं है और न ही इसमें ऐसा कुछ खोजा जाना चाहिए। परंतु वास्तविक समस्या यह है कि क्या हमें संविधान से मिले अपने इस अधिकार के बारे में अमल करने के लिए कोई भी कदम उठाने से पहले इस बात पर भी जरूर सोच-विचार नहीं करना चाहिए कि इससे मुल्क अथवा जनता को फायदा होगा अथव नुकसान। तिरंगा झंडा फहराने की आजादी इसलिए हमें नहीं मिली है कि इसके कारण हमारे ही लोगों में विभाजन अथवा इस तरह की कोई भावना पैदा हो। हमारे राष्ट्रीय गौरव का प्रतीक तिरंगा झंडा तो देश की संप्रभुता और एकता का प्रतीक है। इस संदर्भ में यदि हम देखें तो लाल चौक पर जो श्रीनगर का केंद्रीय स्थल है पर तिरंगा झंडा फहराने से अगर कश्मीर की राजनीतिक और आम जनजीवन की स्थिति बिगड़ती है अथवा भड़कती है तो यह जिद बनाए रखना किसी भी दृष्टि से न्यायसंगत नहीं माना जा सकता है। यहां हमें विचार करना होगा कि राष्ट्रवाद एक गहन और मूल्यवान विचार है और इसके विपरीत उग्र राष्ट्रवाद एक हमारे देश के लिए एक बचकाना मर्ज है। हालांकि इस पूरे प्रकरण का एक दूसरा पक्ष भी है जिसे ईमानदारी से समझने की कोशिश शायद नहीं की गई है। इस पूरे वाकये के दौरान जम्मू और कश्मीर के वर्तमान मुख्यमंत्री उमर अब्दुल्ला के मुंह से एक बार भी यह शब्द सुनने को नहीं मिला अथवा निकला कि कश्मीर भारत का अविच्छिन्न अंग है। इसलिए अगर कोई जनतांत्रिक संगठन गणतंत्र दिवस के अवसर पर कश्मीर के किसी हिस्से में तिरंगा झंडा फहराने आता है तो उसका स्वागत है, क्योंकि हम सब भारतीय नागरिक हैं और यह हमारे लिए गर्व की बात है। इस तरह मुख्यमंत्री उमर अब्दुल्ला को स्वागत का प्रस्ताव ही नहीं देना चाहिए था, बल्कि उन्हें कहना चाहिए था कि इस कार्यक्रम में उनके समेत आम कश्मीरी भी भाग लेंगे। वह कह सकते थे कि चूंकि लाल चौक सुरक्षा की दृष्टि से एक संवेदनशील जगह है, इसलिए हम भाजपा को आमंत्रित करते हैं कि वह श्रीनगर में ही किसी और स्थान पर जहां राज्य सरकार द्वारा सुरक्षा की समुचित व्यवस्था की जा सके, तिरंगा झंडा के ध्वजारोहण का कार्यक्रम आयोजित करे। इसके साथ उमर अब्दुल्ला यह भी कह सकते थे कि लाल चौक पर तिरंगा झंडा फहराने की अनुमति देने के लिए यह उचित समय नहीं है, क्योंकि इससे कानून-व्यवस्था के बिगड़ने की आशंका है। इसके बावजूद हम हम अपनी तरफ से पूरा प्रयत्न कर रहे हैं कि जल्द ही वह समय आए जब लाल चौक ही नहीं, बल्कि कश्मीर के किसी भी स्थान पर हमारे राष्ट्रीय गौरव का प्रतीक तिरंगा झंडा फहराना सहज हो सके तथा ऐसे कार्यक्रमों में शामिल होने के लिए ज्यादा से ज्यादा लोग उत्सुक हों। यदि ऐसा कुछ संभव नहीं हो पा रहा था तो भी जम्मू-कश्मीर के मुख्यमंत्री उमर अब्दुला भाजपा नेताओं से यह अनुरोध कर सकते थे कि वह कश्मीर समस्या का समाधान निकालने में उनकी सहायता करे ताकि सभी के लिए सहूलियत और शांति का मार्ग प्रशस्त हो तथा घाटी में अमन-चैन की स्थिति में सुधार हो। सवाल यह है कि यदि भाजपा उग्र राष्ट्रवादी है तो क्या उमर अब्दुल्ला उग्र कश्मीरवादी नहीं हैं? इतने संवेदनशील मामले में वे सिर्फ कश्मीरी अवाम की भावनाओं का खयाल रखते हैं और शेष भारत की भावनाओं की उपेक्षा क्यों कर देते हैं अथवा उन्हें भुला क्यों देते हैंक? अनेक दशकों से जब कभी भी शेष भारत का कोई व्यक्ति कश्मीर जाता है तो उससे आखिर यह सवाल क्यों पूछा जाता है क्या आप इंडिया से आ रहे हैं? यह जुमला कश्मीर और भारत की नहीं, कश्मीर बनाम भारत की भावना पैदा करता है। कश्मीर के अलगाववादी और आतंकवादी चाहे जो कहें, लेकिन भारत के संविधान और चुनाव कानून के तहत चुनाव जीतकर आए हुए उमर अब्दुल्ला तथा उनके समर्थकों का कर्तव्य क्या यह नहीं बनता है कि वह कश्मीर बनाम भारत के इस द्वंद्वात्मक विचार को पूरी तरह खत्म भले ही न कर सकें, लेकिन कम से कम कमजोर करने का प्रयास तो अवश्य ही करें। कश्मीर भारत का अंग है तो कश्मीर के मुख्यमंत्री भी भारत के अंग हैं। आखिर ऐसा क्यों है कि वह हर मौके पर कश्मीर के प्रवक्ता की भूमिका में नजर आते हैं। याद नहीं आता कि उन्होंने आज तक एक बार भी भारत के प्रवक्ता की छवि में लोगों को नजर आए हों। इस बारे में सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि उनके पिता और पूर्व मुख्यमंत्री फारुख अब्दुल्ला केंद्रीय सरकार में कैबिनेट मंत्री भी हैं और वह इस तरह के मामलों के लिए काफी सुलझे हुए राजनेता माने जाते हैं। परिवार का एक सदस्य केंद्र की सत्ता में और दूसरा सदस्य राज्य की सत्ता में है, क्या यह महज इत्तेफाक है अथवा और कुछ। पिता और पुत्र के क्या कहने! जम्मू-कश्मीर का श्रीनगर शहर वह संसदीय निर्वाचन क्षेत्र है, जहां से उमर अब्दुल्ला के पिता फारुख अब्दुल्ला चुनाव जीत कर भारत की संसद में पहुंचे हैं। आखिर इतने गंभीर और गुरुत्वपूर्ण मुद्दे पर उनके चुप रहने का क्या कोई औचित्य माना जा सकता है? अपने पुत्र को कश्मीर की राजनीतिक सत्ता सौंपने के बाद कश्मीर और भारत के प्रति फारुख अब्दुल्ला की क्या कोई राजनीतिक या नैतिक जिम्मेदारी नहीं रह गई है? पहले कहा जाता था और अब भी माना जाता है कि कांग्रेस मुलायम सांप्रदायिकता का राजनीतिक खेल खेलती है तो भाजपा उग्र सांप्रदायिकता का। इसी तर्ज पर क्या यह कहा जा सकता है कि कश्मीर में अलगाववादी उग्र अलगाववाद से पीडि़त हैं तो अब्दुल्ला परिवार मुलायम अलगाववाद को पोषण देता आ रहा है। इस मामले में आश्चर्यपूर्ण बात यह है कि कांग्रेस और भाजपा के बीच यह फर्क करने वाले अनेक विचारक और राजनीतिक विश्लेषक कश्मीर में अलगाववाद की इन दो किस्मों अथवा धाराओं के बारे में नोटिस लेना जरूरी नहीं समझते। बेशक कश्मीर की समस्या बेहद नाजुक है और अलगाववाद की भावना कश्मीर के अवाम में भी देखी जा सकती है। परंतु इसका लोकतांत्रिक समाधान कुछ ऐसा भी हो सकता है जिसमें कश्मीरी अवाम की भावनाओं का ध्यान रखा जाए और भारत की संप्रभुता और एकता पर भी आंच न आने पाए। हमारे पूर्वज कश्मीर के लिए अलग संविधान और अलग झंडे को स्वीकृति दे कर पहले ही हिमालयी भूल कर चुके हैं। दुनिया का कोई भी देश ऐसा नहीं होगा और होना भी नहीं चाहिए-जहां एक ही देश के अलग-अलग दो झंडे और दो संविधान हों। यह तो राष्ट्र के भीतर राष्ट्र की बात हुई, लेकिन कश्मीर समस्या का इलाज खोजने वाला कोई भी वैद्य इस पहलू की चर्चा करना जरूरी नहीं समझता। केंद्र सरकार की ओर से बड़ी-बड़ी नादानियां और गड़बडि़यां हुई हैं। पर वर्तमान स्थिति के लिए क्या कश्मीर का स्थानीय लोकतांत्रिक नेतृत्व थोड़ा भी जिम्मेदार नहीं है? कश्मीर समस्या पर जो लोग एकतरफा विचार कर रहे हैं वह कश्मीर को शेष भारत से दूर धकेल रहे हैं। कश्मीर का लोकतांत्रिक नेतृत्व जरूरत से ज्यादा कश्मीरवादी होकर शेष भारत को कश्मीर से दूर ठेल रहा है। हमें याद रखना चाहिए कि ताली तभी बजेगी जब दोनों हथेलियां आपस में मिलेंगी। (लेखक स्वतंत्र टिप्पणीकार हैं)
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