Saturday, July 14, 2012

उम्मीद से कम क्यों रह गये मनमोहन


विगत जून माह में अंतरराष्ट्रीय पत्रिका द इकोनॉमिस्ट ने प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह के बारे में कुछ टिप्पणी की थी। अब टाइम पत्रिका ने जुलाई अंक की अपनी कवर स्टोरी में कहा है कि भारतीय प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह अंडर अचीवर यानी उम्मीद से कम साबित हुए हैं। वैसे तो बतौर अर्थशास्त्री और आर्थिक नीति-निर्माता खासी प्रसिद्धि है, लेकिन हाल के घटनाक्रमों खासतौर से आर्थिक हालात प्रधानमंत्री की क्षमताओं पर एक प्रश्न चिह्न जरूर लगाया है। टाइम पत्रिका का कहना है कि प्रधानमंत्री में आगे बढ़कर देश को पुन: आर्थिक वृद्धि के रास्ते पर लाने के लिए इच्छाशक्ति नहीं है। आर्थिक वृद्धि में धीमापन, भारी-भरकम राजकोषीय घाटा और डॉलर के मुकाबले रुपये में गिरावट जैसी भयंकर चुनौतियों के सामने संप्रग सरकार दिशाहीनता का प्रदर्शन कर रही है। घरेलू-विदेशी निवेशक ठंडे पड़ गए हैं। पिछले तीन सालों की अपनी दूसरी पारी में प्रधानमंत्री का आत्मविश्वास डगमगाता हुआ दिखाई दे रहा है। अपने मंत्रियों पर भी उनका कोई नियंत्रण नहीं रहा। टाइम पत्रिका का यह भी कहना है कि लोक लुभावने कार्यक्रमों के प्रति रुझान के कारण सरकार देश को आगे बढ़ाने वाले विधेयकों को पारित करवाने की दिशा में आगे नहीं बढ़ रही। द इकोनॉमिस्ट और टाइम जैसी विदेशी पत्रिकाएं संप्रग सरकार को आर्थिक मोर्चे पर इसलिए लिए भी अक्षम बता रही हैं कि वह लंबित विधेयकों को पारित नहीं करवा पा रही है। खुदरा क्षेत्र में विदेशी निवेश तय नहीं कर पा रही है। इन पत्रिकाओं का कहना है कि इन्हीं सब कारणों से आर्थिक शिथिलता आ रही है। लेकिन वास्तव में इसका कारण अकुशल प्रबंधन और संप्रग सरकार की गलत आर्थिक नीतियां हैं। प्रधानमंत्री खुद भी मानते हैं कि अर्थव्यवस्था की सेहत बिगड़ रही है। केंद्रीय सांख्यिकी संगठन द्वारा हाल ही में प्रकाशित आंकड़ों के अनुसार वर्ष 2011-12 में जीडीपी की वृद्धि दर मात्र 6.5 प्रतिशत ही रह गई है, जो पिछले दो सालों में 8.4 प्रतिशत रही थी। अगर औद्योगिक उत्पादन की बात करें तो इस वर्ष औद्योगिक उत्पादन की वृद्धि दर घटकर मात्र 2.9 प्रतिशत ही रह गई है। हाल की तिमाहियों में तो यह नकारात्मक तक पहुंच गई थी। राजकोषीय घाटा जीडीपी के छह प्रतिशत तक पहुंच रहा है। पिछले 4-5 महीनों में रुपये में लगभग 20 प्रतिशत की गिरावट दर्ज की गई है। खाद्यान्नों और अन्य खाद्य पदार्थो के संतोषजनक उत्पादन के कारण और खाद्य मुद्रास्फीति थमने के बावजूद अन्य पदार्थो की कीमतें थमने का नाम नहीं ले रही। डॉलर के मुकाबले रुपये की गिरावट और कच्चे तेल की कीमतों की वृद्धि के चलते मुद्रास्फीति ने आम आदमी का जीना मुहाल कर दिया है। विकास का गलत पैमाना प्रधानमंत्री हों या अन्य नीति-निर्माता, लगातार विकास का आधार जीडीपी ग्रोथ को मानते हैं। उनका मानना है कि अगर जीडीपी नौ प्रतिशत तक बढ़ जाए तो देश की सारी समस्याओं का समाधान हो जाएगा। इसलिए जीडीपी को विकास का पैमाना मान लिया जाता है। हम देखते हैं कि ग्यारहवीं पंचवर्षीय योजना (2007-12) के दौरान आर्थिक वृद्धि की दर लगभग आठ प्रतिशत रही, लेकिन इसके बावजूद देश में लगभग 30 प्रतिशत लोग अब भी गरीबी रेखा से नीचे हैं। वर्ष 2004-05 और 2009-10 के बीच 20 लाख से भी कम अतिरिक्त रोजगार का सृजन हो पाया। स्वास्थ्य संबंधी आंकड़ों के अनुसार कुपोषण की स्थिति यथावत है यानी जीडीपी ग्रोथ के बावजूद मानव विकास में स्थितियां बेहतर नहीं हो रही हैं। इसका कारण यह है कि एक ओर तो असमानताएं बढ़ रही हैं तो दूसरी ओर अर्थव्यवस्था का वह क्षेत्र जो देशवासियों के लिए खाद्य सुरक्षा दिला सकता है, उपेक्षित पड़ा हुआ है। कृषि क्षेत्र जो अर्थव्यवस्था में 60 प्रतिशत हिस्सा रखता है, विकास की इस तथाकथित प्रक्रिया से पूर्णतया अछूता पड़ा है। 1980-81 में जो क्षेत्र जीडीपी में 38 प्रतिशत योगदान देता था, अब मात्र 13.9 प्रतिशत ही योगदान दे रहा है। द इकॉनोमिस्ट के अनुसार ऐसा लगता है कि भारत की ग्रोथ की कहानी का अंत होने जा रहा है। बता दें कि दुनिया के अर्थशास्त्री भारत की नीची विकास दर को अपमानबोधक हिंदू रेट ऑफ ग्रोथ का नाम दिया करते थे। दुनिया में देश की आर्थिक ताकत का डंका बजाने के लिए जरूरी है कि हमारे नीति निर्माता विकास के पैमाने को सही करें। सिर्फ जीडीपी ग्रोथ नहीं, सभी क्षेत्रों में एक-सा विकास, खाद्य सुरक्षा की गारंटी, गरीबी व बेरोजगारी का निराकरण ही हमारे विकास को स्थाई बना सकते हैं। हमारे रुपये की दुर्गति आर्थिक कुप्रबंधन का जीता जागता उदाहरण है। पिछले कुछ समय से भारतीय रुपया विदेशी मुद्राओं की तुलना में लगातार कमजोर होता जा रहा है। फरवरी 2012 यानी 4-5 महीने पहले एक डॉलर की विनियमय दर 48.7 रुपये थी, वह अब 57-58 रुपये प्रति डॉलर के आस-पास है। माना जाता है कि बढ़ता व्यापार घाटा इसका कारण है और इसके लिए जिम्मेदार है सोने-चांदी का बढ़ता आयात, अंतरराष्ट्रीय बाजार में बढ़ती तेल की कीमतें और चीन से लगातार बढ़ता आयात। रुपये की कमजोरी के लिए विदेशी संस्थागत निवेशकों द्वारा बड़े पैमाने पर विदेशी मुद्रा का अंतरण भी काफी हद तक जिम्मेदार माना जा रहा है। नीतियों में बदलाव की दरकार यह सही है कि अंतरराष्ट्रीय कच्चे तेल की कीमतों पर हमारा ज्यादा नियंत्रण नहीं है, लेकिन हम निश्चित रूप से निर्णय कर सकते हैं कि आयात का स्त्रोत क्या हो। यदि हम ईरान से कच्चे तेल का आयात करें तो हम डॉलर की बजाय 45 प्रतिशत भुगतान रुपये में कर सकते हैं। सोने का आयात 2011-12 में 50 बिलियन डॉलर तक पहुंच गया, जो 2010-11 में 25 बिलियन डॉलर था। सोने का बढ़ता आयात रुपये के लिए मुश्किलें खड़ा कर रहा है। यह बताना ठीक होगा कि 2जी घोटाला और सोने का आयात, दोनों जुड़े हुए हैं। घोटालों के बाद काले धन को सोने के रूप में परिवर्तित किया जा रहा है। सोने के आयात पर प्रभावी नियंत्रण लगाने की जरूरत थी, लेकिन सरकार ने पूरे साल कुछ नहीं किया और देश भयंकर भुगतान संकट में पड़ गया। चीन से आयात पर अंकुश लगाने की जरूरत है, लेकिन सरकार इस दिशा में कोई कदम नहीं उठा रही। यही नहीं, विदेशी निवेशकों की कारगुजारियों के कारण देश को करों के रूप में हर वर्ष कम से कम एक लाख करोड़ रुपये का नुकसान हो रहा है, लेकिन सरकार उन पर अंकुश लगाने के बजाय उन्हें तरह-तरह की रियायतें दे रही है। इस वर्ष के बजट में प्रस्तावित गार कानून में भी ढिलाई के संकेत दिए जा रहे हैं। यदि सरकार इच्छाशक्ति नहीं दिखाती है तो हमारा भुगतान संकट और ज्यादा बढ़ सकता है। अर्थव्यवस्था की इन तमाम बदहालियों के बावजूद सरकार नीतिगत विकल्प सुझाने में असफल दिखाई दे रही है। आर्थिक वृद्धि की दर के घटने का एक बड़ा कारण फैक्ट्री उत्पादन में धीमापन है और यह मुख्यत: दो कारणों से है- एक, कच्चे माल और ईधन की कीमतों में वृद्धि और दूसरा, ब्याज दरों में लगातार वृद्धि। कच्चे माल और ईधन की कीमतों में वृद्धि रुपये की कमजोरी के कारण ज्यादा हुई है और इसके लिए जरूरी है कि रुपये को मजबूत बनाया जाए। ब्याज दरों में वृद्धि मुद्रा स्फीति के कारण है और इसके लिए जरूरी है कि मुद्रास्फीति को काबू में किया जाए। ब्याज दरों में कमी करते हुए ही हम फैक्ट्री उत्पादन, इंफ्रास्ट्रक्चर और अर्थव्यवस्था के अन्य क्षेत्रों में निवेश को प्रोत्साहित करते हुए अर्थव्यवस्था को बचा सकते हैं। (लेखक आर्थिक मामलों के जानकार हैं)

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