Saturday, July 14, 2012

पाक-साफ नहीं चीन के मंसूबे

यह बहुत ही दुर्भाग्यपूर्ण है कि भारत पिछले साढ़े छह दशकों से चीन से दोस्ती की पहल कर रहा है और वह दोस्ती की आड़ में अपने खतरनाक मंसूबों को अंजाम दे रहा है। पिछले दिनों चीनी कम्युनिस्ट पार्टी के अखबार ‘ग्लोबल टाइम्स’ में छपे एक लेख में उसने अपनी खतरनाक मंशा फिर जाहिर की है। उसने भारत को आगाह करते हुए कहा है कि उसे 1962 के युद्ध से सबक लेना चाहिए। तत्कालीन युद्ध के कारणों को स्पष्ट करते हुए कहा गया है कि उसका मकसद तत्कालीन प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू को अमेरिका और पूर्व सोवियत संघ के प्रभाव में आने से रोकना था। उसका दावा है कि उस वक्त चीन के नेता माओत्से तुंग के गुस्से का असली निशाना वाशिंगटन और मास्को थे न कि भारत। चीन के इस रहस्योद्घाटन में कितनी सच्चाई है यह तो वही जाने लेकिन लेख की भाषा बौखलाहट भरी और भारत को धमकाने के अंदाज वाली लगती है। सवाल है कि उसकी इस बौखलाहट की वजह क्या है? क्या वह घरेलू मोच्रे पर अपनी मुश्किलों से उबर नहीं पा रहा है? या वैिक जगत में भारत की बढ़ती ताकत और आर्थिक चुनौतियों से घबरा रहा है? कारण जो भी हो लेकिन दक्षिण एशिया में भारत के बढ़ते प्रभाव और अमेरिका से नजदीकियों ने उसकी चिंता बढ़ा दी है। नेपाल, बांग्लादेश, म्यांमार, ताइवान और वियतनाम आदि पड़ोसी देशों से सुधरते भारत के रिश्ते भी उसे रास नहीं आ रहे हैं। म्यांमार में लोकतंत्र बहाली की संभावना और वहां उसकी घटती ताकत ने भी उसे बेचैन किया है। उधर उसके मित्र पाकिस्तान की वैिक स्तर पर धूमिल होती छवि ने उसे नए राजनीतिक समीकरण पर सोचने को मजबूर कर दिया है। इन परिस्थितियों में चीन का खुद को असहज महसूस करना और चिढ़ बढ़ना स्वाभाविक है। दूसरी ओर दक्षिणी चीन सागर में वियतनाम के साथ मिलकर भारत द्वारा तेल और गैस निकालने की योजना से वह और आशंकित है। उसने धमकी भरे अंदाज में कहा है कि यहां बिना इजाजत के किसी भी प्रकार की गतिविधि को वह अपनी संप्रभुता पर हमला मानेगा और उसका करारा जवाब देगा। उसका दावा है कि दक्षिणी चीन सागर और उसके द्वीपों पर सिर्फ उसका अधिकार है। लेकिन भारत ने चीन के दावे को खारिज कर स्पष्ट कर दिया है कि वियतनाम के साथ भारतीय कंपनी ओएनजीसी के तेल निकालने का कार्यक्रम अंतरराष्ट्रीय कानूनों के मुताबिक है और वह इससे पीछे नहीं हटेगा। बहरहाल, ग्लोबल टाइम्स के लेख में 1962 के युद्ध परिणामों की चर्चा कर उसने यह संकेत जरूर दे दिया है कि वह दक्षिणी चीन सागर में भारत की दखलांदाजी को चुपचाप सहन करने वाला नहीं है। लेख में उसने कहा भी है कि चीनी लोग शांतिप्रिय हैं लेकिन अपनी जमीन की रक्षा करने में समर्थ हैं। तो क्या यह माना जाए कि दक्षिणी चीन सागर को मुद्दा बनाकर चीन भारत पर हमला कर सकता है और क्या इस हमले का ठीकरा भी भारत के ही सिर फोड़ेगा? ग्लोबल टाइम्स में प्रकाशित लेख में कहा गया है कि पचास साल पहले भारत सरकार चाहती थी कि चीन कॉलोनियल शक्तियों की तय सीमा स्वीकार करे किंतु चीन ने उसे खारिज कर दिया। उसने आरोप लगाया है कि नेहरू सरकार ने अमेरिका और सोवियत संघ के उकसावे में आकर 1959 से 1962 के बीच भारत-चीन सीमा पर समस्याएं खड़ी कीं। चीन ने सफाई दी है कि 1962 के युद्ध का उद्देश्य भारत की जमीन कब्जाना नहीं बल्कि शांति-स्थापना था। क्या इसका अर्थ यह निकाला जाए कि चीन फिर शांति स्थापना के नाम पर भारत पर हमले की योजना बना रहा है? कुछ समय पहले न्यूयार्क टाइम्स ने खुलासा किया था कि चीन पाक अधिकृत कश्मीर में सामरिक रूप से महत्वपूर्ण गिलगित-बल्तिस्तान क्षेत्र में हाईस्पीड सड़कें और रेल संर्पकों का जाल बिछा रहा है ताकि युद्धकाल में भारत तक उसकी पहुंच आसान हो सके। पूर्व सेना प्रमुख वीके सिंह ने भी दावा किया था कि पाकिस्तान अधिकृत कश्मीर में चीन की कई कंस्ट्रक्शन टीमें काम कर रही हैं। इनमें चीनी इंजीनियरों की टुकड़ियां भी मौजूद हैं। प्रख्यात पत्रिका फोर्ब्स ने भी भविष्यवाणी की है कि 2020 तक भारत-चीन आमने-सामने हो सकते हैं। चीन कभी भी सीमा विवाद को बहाना बनाकर भारत पर हमला बोल सकता है। चीन सीमा विवाद सुलझाने को लेकर कभी भी गंभीर नहीं रहा है, जबकि भारत कई बार ठोस पहल कर चुका है। सीमा विवाद से जुड़े दस्तावेजों के आदान-प्रदान में उसने कोई अभिरुचि जाहिर नहीं की है और न वह अपने दावे का नक्शा उपलब्ध कराने को तैयार दिखता है। विडंबना यह भी है कि भारत के जिन क्षेत्रों पर उसका एक इंच का भी दावा है, उससे हटने का कहीं कोई संकेत नहीं है। 15 मई, 1954 को पं. नेहरू ने चीन से मधुर संबंध बनाए रखने के लिए चीनी प्रमुख एन लाई के साथ द्विपक्षीय व्यापार समझौते पर हस्ताक्षर किए थे। दोनों देशों के बीच व्यापारिक गतिविधियां बढ़ाने और मधुर रिश्ते के उद्देश्य से उन्होंने 19 अप्रैल, 1960 को दिल्ली में चाऊ एन लाई के साथ सीमा विवाद सुलझाने की कोशिश भी की लेकिन नतीजा ढाक के तीन पात रहा। 1987 में तत्कालीन प्रधानमंत्री राजीव गांधी ने आार्थिक, व्यापार, विज्ञान और तकनीक से जुड़े मसलों पर मध्य साझा कार्यसमूह बनाने पर समझौता किया लेकिन चीन एक कदम भी आगे नहीं बढ़ा। 11 मार्च, 2005 को फिर भारतीय पहल पर रिश्तों को नया आयाम देने की कोशिश हुई लेकिन चीन का रवैया निराशाजनक ही रहा। आज भी वह तवांग और अरुणाचल प्रदेश पर अपना दावा छोड़ने को तैयार नहीं है। भारत-चीन के बीच सर्वाधिक विवाद पश्चिमी (लद्दाख) और पूर्वी (अरुणाचल प्रदेश) सेक्टर को लेकर है। पश्चिमी सेक्टर में भारत का चीन के कब्जे वाले अक्साई चीन पर लगभग 3800 वर्ग किमी का दावा है जबकि पूर्वी सेक्टर में अरुणाचल प्रदेश के लगभग 90 हजार वर्ग किमी पर उसका दावा है। त्रासदी यह भी है कि वह अरुणाचल प्रदेश से चुने गए किसी भी भारतीय सांसद को वीजा नहीं देता है और भारत की मनाही के बावजूद कश्मीर के लोगों को स्टेपल वीजा जारी करता है। ऐसे में इतना तो स्पष्ट है कि चीन भारत से मधुर संबंध बनाने को लेकर संजीदा नहीं है।

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