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Saturday, July 14, 2012

उम्मीद से कम क्यों रह गये मनमोहन


विगत जून माह में अंतरराष्ट्रीय पत्रिका द इकोनॉमिस्ट ने प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह के बारे में कुछ टिप्पणी की थी। अब टाइम पत्रिका ने जुलाई अंक की अपनी कवर स्टोरी में कहा है कि भारतीय प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह अंडर अचीवर यानी उम्मीद से कम साबित हुए हैं। वैसे तो बतौर अर्थशास्त्री और आर्थिक नीति-निर्माता खासी प्रसिद्धि है, लेकिन हाल के घटनाक्रमों खासतौर से आर्थिक हालात प्रधानमंत्री की क्षमताओं पर एक प्रश्न चिह्न जरूर लगाया है। टाइम पत्रिका का कहना है कि प्रधानमंत्री में आगे बढ़कर देश को पुन: आर्थिक वृद्धि के रास्ते पर लाने के लिए इच्छाशक्ति नहीं है। आर्थिक वृद्धि में धीमापन, भारी-भरकम राजकोषीय घाटा और डॉलर के मुकाबले रुपये में गिरावट जैसी भयंकर चुनौतियों के सामने संप्रग सरकार दिशाहीनता का प्रदर्शन कर रही है। घरेलू-विदेशी निवेशक ठंडे पड़ गए हैं। पिछले तीन सालों की अपनी दूसरी पारी में प्रधानमंत्री का आत्मविश्वास डगमगाता हुआ दिखाई दे रहा है। अपने मंत्रियों पर भी उनका कोई नियंत्रण नहीं रहा। टाइम पत्रिका का यह भी कहना है कि लोक लुभावने कार्यक्रमों के प्रति रुझान के कारण सरकार देश को आगे बढ़ाने वाले विधेयकों को पारित करवाने की दिशा में आगे नहीं बढ़ रही। द इकोनॉमिस्ट और टाइम जैसी विदेशी पत्रिकाएं संप्रग सरकार को आर्थिक मोर्चे पर इसलिए लिए भी अक्षम बता रही हैं कि वह लंबित विधेयकों को पारित नहीं करवा पा रही है। खुदरा क्षेत्र में विदेशी निवेश तय नहीं कर पा रही है। इन पत्रिकाओं का कहना है कि इन्हीं सब कारणों से आर्थिक शिथिलता आ रही है। लेकिन वास्तव में इसका कारण अकुशल प्रबंधन और संप्रग सरकार की गलत आर्थिक नीतियां हैं। प्रधानमंत्री खुद भी मानते हैं कि अर्थव्यवस्था की सेहत बिगड़ रही है। केंद्रीय सांख्यिकी संगठन द्वारा हाल ही में प्रकाशित आंकड़ों के अनुसार वर्ष 2011-12 में जीडीपी की वृद्धि दर मात्र 6.5 प्रतिशत ही रह गई है, जो पिछले दो सालों में 8.4 प्रतिशत रही थी। अगर औद्योगिक उत्पादन की बात करें तो इस वर्ष औद्योगिक उत्पादन की वृद्धि दर घटकर मात्र 2.9 प्रतिशत ही रह गई है। हाल की तिमाहियों में तो यह नकारात्मक तक पहुंच गई थी। राजकोषीय घाटा जीडीपी के छह प्रतिशत तक पहुंच रहा है। पिछले 4-5 महीनों में रुपये में लगभग 20 प्रतिशत की गिरावट दर्ज की गई है। खाद्यान्नों और अन्य खाद्य पदार्थो के संतोषजनक उत्पादन के कारण और खाद्य मुद्रास्फीति थमने के बावजूद अन्य पदार्थो की कीमतें थमने का नाम नहीं ले रही। डॉलर के मुकाबले रुपये की गिरावट और कच्चे तेल की कीमतों की वृद्धि के चलते मुद्रास्फीति ने आम आदमी का जीना मुहाल कर दिया है। विकास का गलत पैमाना प्रधानमंत्री हों या अन्य नीति-निर्माता, लगातार विकास का आधार जीडीपी ग्रोथ को मानते हैं। उनका मानना है कि अगर जीडीपी नौ प्रतिशत तक बढ़ जाए तो देश की सारी समस्याओं का समाधान हो जाएगा। इसलिए जीडीपी को विकास का पैमाना मान लिया जाता है। हम देखते हैं कि ग्यारहवीं पंचवर्षीय योजना (2007-12) के दौरान आर्थिक वृद्धि की दर लगभग आठ प्रतिशत रही, लेकिन इसके बावजूद देश में लगभग 30 प्रतिशत लोग अब भी गरीबी रेखा से नीचे हैं। वर्ष 2004-05 और 2009-10 के बीच 20 लाख से भी कम अतिरिक्त रोजगार का सृजन हो पाया। स्वास्थ्य संबंधी आंकड़ों के अनुसार कुपोषण की स्थिति यथावत है यानी जीडीपी ग्रोथ के बावजूद मानव विकास में स्थितियां बेहतर नहीं हो रही हैं। इसका कारण यह है कि एक ओर तो असमानताएं बढ़ रही हैं तो दूसरी ओर अर्थव्यवस्था का वह क्षेत्र जो देशवासियों के लिए खाद्य सुरक्षा दिला सकता है, उपेक्षित पड़ा हुआ है। कृषि क्षेत्र जो अर्थव्यवस्था में 60 प्रतिशत हिस्सा रखता है, विकास की इस तथाकथित प्रक्रिया से पूर्णतया अछूता पड़ा है। 1980-81 में जो क्षेत्र जीडीपी में 38 प्रतिशत योगदान देता था, अब मात्र 13.9 प्रतिशत ही योगदान दे रहा है। द इकॉनोमिस्ट के अनुसार ऐसा लगता है कि भारत की ग्रोथ की कहानी का अंत होने जा रहा है। बता दें कि दुनिया के अर्थशास्त्री भारत की नीची विकास दर को अपमानबोधक हिंदू रेट ऑफ ग्रोथ का नाम दिया करते थे। दुनिया में देश की आर्थिक ताकत का डंका बजाने के लिए जरूरी है कि हमारे नीति निर्माता विकास के पैमाने को सही करें। सिर्फ जीडीपी ग्रोथ नहीं, सभी क्षेत्रों में एक-सा विकास, खाद्य सुरक्षा की गारंटी, गरीबी व बेरोजगारी का निराकरण ही हमारे विकास को स्थाई बना सकते हैं। हमारे रुपये की दुर्गति आर्थिक कुप्रबंधन का जीता जागता उदाहरण है। पिछले कुछ समय से भारतीय रुपया विदेशी मुद्राओं की तुलना में लगातार कमजोर होता जा रहा है। फरवरी 2012 यानी 4-5 महीने पहले एक डॉलर की विनियमय दर 48.7 रुपये थी, वह अब 57-58 रुपये प्रति डॉलर के आस-पास है। माना जाता है कि बढ़ता व्यापार घाटा इसका कारण है और इसके लिए जिम्मेदार है सोने-चांदी का बढ़ता आयात, अंतरराष्ट्रीय बाजार में बढ़ती तेल की कीमतें और चीन से लगातार बढ़ता आयात। रुपये की कमजोरी के लिए विदेशी संस्थागत निवेशकों द्वारा बड़े पैमाने पर विदेशी मुद्रा का अंतरण भी काफी हद तक जिम्मेदार माना जा रहा है। नीतियों में बदलाव की दरकार यह सही है कि अंतरराष्ट्रीय कच्चे तेल की कीमतों पर हमारा ज्यादा नियंत्रण नहीं है, लेकिन हम निश्चित रूप से निर्णय कर सकते हैं कि आयात का स्त्रोत क्या हो। यदि हम ईरान से कच्चे तेल का आयात करें तो हम डॉलर की बजाय 45 प्रतिशत भुगतान रुपये में कर सकते हैं। सोने का आयात 2011-12 में 50 बिलियन डॉलर तक पहुंच गया, जो 2010-11 में 25 बिलियन डॉलर था। सोने का बढ़ता आयात रुपये के लिए मुश्किलें खड़ा कर रहा है। यह बताना ठीक होगा कि 2जी घोटाला और सोने का आयात, दोनों जुड़े हुए हैं। घोटालों के बाद काले धन को सोने के रूप में परिवर्तित किया जा रहा है। सोने के आयात पर प्रभावी नियंत्रण लगाने की जरूरत थी, लेकिन सरकार ने पूरे साल कुछ नहीं किया और देश भयंकर भुगतान संकट में पड़ गया। चीन से आयात पर अंकुश लगाने की जरूरत है, लेकिन सरकार इस दिशा में कोई कदम नहीं उठा रही। यही नहीं, विदेशी निवेशकों की कारगुजारियों के कारण देश को करों के रूप में हर वर्ष कम से कम एक लाख करोड़ रुपये का नुकसान हो रहा है, लेकिन सरकार उन पर अंकुश लगाने के बजाय उन्हें तरह-तरह की रियायतें दे रही है। इस वर्ष के बजट में प्रस्तावित गार कानून में भी ढिलाई के संकेत दिए जा रहे हैं। यदि सरकार इच्छाशक्ति नहीं दिखाती है तो हमारा भुगतान संकट और ज्यादा बढ़ सकता है। अर्थव्यवस्था की इन तमाम बदहालियों के बावजूद सरकार नीतिगत विकल्प सुझाने में असफल दिखाई दे रही है। आर्थिक वृद्धि की दर के घटने का एक बड़ा कारण फैक्ट्री उत्पादन में धीमापन है और यह मुख्यत: दो कारणों से है- एक, कच्चे माल और ईधन की कीमतों में वृद्धि और दूसरा, ब्याज दरों में लगातार वृद्धि। कच्चे माल और ईधन की कीमतों में वृद्धि रुपये की कमजोरी के कारण ज्यादा हुई है और इसके लिए जरूरी है कि रुपये को मजबूत बनाया जाए। ब्याज दरों में वृद्धि मुद्रा स्फीति के कारण है और इसके लिए जरूरी है कि मुद्रास्फीति को काबू में किया जाए। ब्याज दरों में कमी करते हुए ही हम फैक्ट्री उत्पादन, इंफ्रास्ट्रक्चर और अर्थव्यवस्था के अन्य क्षेत्रों में निवेश को प्रोत्साहित करते हुए अर्थव्यवस्था को बचा सकते हैं। (लेखक आर्थिक मामलों के जानकार हैं)

मनरेगा का कामयाब सफर


महात्मा गांधी ने कहा था कि संदेह के क्षणों में हमें सबसे गरीब आदमी के चेहरे का ध्यान करना चाहिए और खुद से पूछना चाहिए कि क्या हमारा यह कदम उसके लिए किसी काम का हो सकता है? फरवरी 2006 में शुरू की गई महात्मा गांधी राष्ट्रीय रोजगार गारंटी अधिनियम (मनरेगा) योजना के पीछे यही भावना काम कर रही थी। यह संभवत: विश्व में सबसे बड़ी और सर्वाधिक महत्वाकांक्षी सार्वजनिक परियोजना है। लागू होने के छह साल बाद मनरेगा का महत्व तथा ग्रामीण भारत के करोड़ों घरों के लिए मजबूत सामाजिक सुरक्षा आज स्वयंसिद्ध है। इस योजना में अब तक 1200 करोड़ रोजगार-दिनों का कार्य हुआ है और ग्रामीण क्षेत्रों के गरीबों को 1,10,000 करोड़ रुपये मजदूरी के तौर पर दिए जा चुके हैं। इसकी जबरदस्त लोकप्रियता इस बात से जाहिर है कि हर साल औसतन एक-चौथाई परिवारों ने इस योजना का लाभ उठाया है। करीब 80 फीसदी परिवारों को धनराशि सीधे बैंक या डाकखाना खाते के माध्यम से दी गई। गरीबों के वित्तीय समावेश की दिशा में यह अभूतपूर्व कदम है। मनरेगा हाशिये पर धकेल दिए गए समाज के सशक्तीकरण का ठोस प्रयास है। मनरेगा में अब तक जितना काम दिया गया है उसका 51 फीसदी अनुसूचित जाति-अनुसूचित जनजाति के लोगों के हिस्से में गया है, जबकि महिलाओं की कुल काम में 47 फीसदी हिस्सेदारी रही। वास्तव में, मनरेगा ने महिलाओं को काम का शानदार अवसर मुहैया कराया है और वे इसका लाभ भी उठा रही हैं। इससे पहले महिलाएं या तो बेरोजगार रहती थीं या फिर उन्हें बहुत कम वेतन पर काम दिया जाता था। स्वतंत्र अध्ययनों से पता चलता है कि मनरेगा से न केवल ग्रामीण क्षेत्र में मजदूरी में वृद्धि हुई है, बल्कि मजदूरी की परंपरागत लैंगिक असमानता भी कम हुई है। मजदूरी सुरक्षा उपलब्ध कराने के साथ-साथ मनरेगा ने टिकाऊ ग्रामीण संरचना के लिए संपदा निर्माण पर जोर दिया है। मनरेगा के तहत अब तक करीब एक करोड़ 46 लाख कार्यो का निष्पादन हो चुका है। इनमें से आधे से अधिक काम जल संचयन, सूखे से बचाव, बाढ़ से सुरक्षा, सिंचाई, भूमि विकास और ग्रामीण संपर्क व्यवस्था बेहतर करने की दिशा में हुए हैं। आम तौर पर अध्ययनों से संकेत मिलता है कि मनरेगा के कामों से भूजलस्तर में बढ़ोतरी हुई है, पानी की उपलब्धता बढ़ी है और मिट्टी की उर्वरता में सुधार हुआ है। मनरेगा के दौरान होने वालों कार्यो की बदोलत जल उपलब्धता बढ़ने से बंजर भूमि के बड़े हिस्से को खेती योग्य बनाया जा सका है। मनरेगा के कारण ही परंपरागत रूप से काम की तलाश में दूसरे प्रांतों में जाने वालों की संख्या में भारी गिरावट आई है। इसके कारण पिछड़े क्षेत्रों के गरीब तबकों के लोगों में पहचान और आत्मविश्वास का भाव तो जाग्रत हुआ ही है, मोलभाव की नई शक्ति भी विकसित हुई है। उपलब्धियों के बीच मनरेगा के क्रियान्वयन के दौरान कुछ समस्याएं भी पैदा हुई हैं, जिनका जल्द समाधान निकाला जाना चाहिए। मनरेगा की कुछ प्रमुख चुनौतियां यह सुनिश्चित करना है कि योजना सार्थक मांग पैदा करे, वेतन के भुगतान में देरी न हो, काम की गुणवत्ता में सुधार हो और शिकायत निवारण तंत्र को मजबूत बनाया जाए। इसके अलावा योजना में सेंध और घपले-घोटालों पर अंकुश लगाया जाए। ग्रामीण विकास मंत्रालय की एक सुधार कार्ययोजना (जिसे मनरेगा 2.0 नाम दिया गया है) मनरेगा के जीवन चक्र के अनेक आयामों पर इन समस्याओं का समाधान निकालने का प्रयास करती है। इनमें शामिल हैं लाभार्थियों का समय से नामांकन, खर्च की सही निगरानी और काम के बेहतर मूल्यांकन की व्यवस्था। मार्च 2012 में स्वीकृत कार्यो की सूची में तीस नए काम जोड़ दिए गए। इन कामों से मनरेगा और ग्रामीण जीवन, खासतौर पर कृषि के बीच बेहतर साम्य बनेगा और ग्रामीण भारत में स्वास्थ्य व पारिस्थितिकीय हालात में सुधार आएगा। मनरेगा 2.0 में योजना में पारदर्शिता तथा जवाबदेही संबंधी प्रावधानों का विशेष ध्यान रखा गया है। सामाजिक आडिट की प्रक्रियाओं को मजबूत किया जा रहा है। राज्यों को निर्देश दिए जा रहे हैं कि मनरेगा की ग्राम सभा द्वारा साल में कम से कम दो बार जांच के लिए सामाजिक आडिट इकाइयों का गठन किया जाए। सामाजिक आडिट के लिए नियंत्रण एवं महालेखा परीक्षक (कैग) को तमाम राज्यों में मनरेगा के प्रदर्शन का आकलन करने की जिम्मेदारी सौंपी गई है। इसके अलावा ग्राम सभाओं में मनरेगा के खातों के प्रमाणन की व्यवस्था की गई है। यह व्यवस्था इस साल 20 फीसदी ग्राम पंचायतों में शुरू की जा रही है। सूचना प्रसारण प्रौद्योगिकी से योजना के हर चरण में पारदर्शिता आएगी। मनरेगा संबंधी समस्त सूचना इंटरनेट पर उपलब्ध है। वर्तमान में 12 करोड़ जॉब कार्ड बने हुए हैं। आइसीटी आधारित प्रणाली के माध्यम से उपस्थिति दर्ज कराना, इलेक्ट्रानिक पद्धति से मस्टर रोल तैयार करना और वेतन का भुगतान करना शामिल हैं। ये सूचनाएं पंचायत, विकासखंड, जिला और राज्य स्तर पर भी उपलब्ध रहेंगी। राज्य सरकारों के साथ मिलकर केंद्र सरकार इलेक्ट्रानिक फंड मैनेजमेंट सिस्टम भी लागू करना चाहती है, जिससे मनरेगा राशि की समयबद्ध उपलब्धता और परिचालन संभव हो सकेगा। मनरेगा का आधार प्रणाली के साथ एकीकरण भी किया जा रहा है। मांग संवृद्धि, अधिकार आधारित ढांचा और अभूतपूर्व आकार के कारण मनरेगा ने अब तक के तमाम पुराने श्रम कार्यक्रमों को मीलों पीछे छोड़ दिया है। मनरेगा निश्चित रूप से एक आदर्श योजना के तौर पर उभरी है, जिसका अध्ययन और आकलन विश्व के अनेक देशों में हो रहा है। स्वतंत्र अध्ययनों से यह बात स्पष्ट हो जाती है कि गरीब तबके पर योजना का महत्वपूर्ण सकारात्मक प्रभाव पड़ा है। अभी तक क्रियान्वयन संबंधी कुछ मुद्दों का समाधान नहीं निकल पाया है, अगर हम इन्हें हल कर लें तो गरीबी उन्मूलन, प्राकृतिक संसाधनों का पोषण और ग्रामीण रूपांतरण के औजार के तौर पर मनरेगा की क्षमता और बढ़ जाएगी। मनरेगा 2.0 के रूप में सरकार की नई पहल ग्रामीण विकास की दिशा में बढ़ाया गया एक महत्वपूर्ण कदम है और इससे योजना का पूरा लाभ गरीबों को मिल पाएगा। (लेखक केंद्रीय ग्रामीण विकास मंत्री हैं) 1ी2श्चश्रल्ल2ी@Aंॠ1ंल्ल.Yश्रे

राष्ट्रीय दलों के दरकते दक्षिणी दुर्ग


कर्नाटक इन दिनों सुर्खियों में है। भाजपा शासित इस राज्य की राजनीतिक उलझन सुलझाने की पार्टी हाईकमान की कोशिश परवान नहीं चढ़ पा रही है। पार्टी को टूटने से बचाने के लिए केंद्रीय नेतृत्व पूर्व मुख्यमंत्री येदियुरप्पा के समक्ष कठपुतली बन गया है। बृहस्पतिवार (12 जुलाई) को जगदीश शेट्टर द्वारा मुख्यमंत्री पद की शपथ लेने के साथ लग रहा था कि कर्नाटक का राजनीतिक संकट फिलहाल टल गया है किंतु तेजी से बदले घटनाक्रम ने इस पर पानी फेर दिया है। शेट्टर 250 करोड़ रुपये के जमीन घोटाले में फंस गए हैं। लोकायुक्त 19 जुलाई को उनके खिलाफ मुकदमा चलाने के संबंध में अपना फैसला देंगे। इससे उनके मुख्यमंत्री बने रहने को लेकर अटकलें लगनी शुरू हो गई हैं तो केंद्रीय नेतृत्व हलकान हो उठा है। कुछ इसी तरह का राजनीतिक रंग कांग्रेस शासित आंध्रप्रदेश का भी है। यहां भी पार्टी के केंद्रीय नेतृत्व की अदूरदर्शिता के कारण उसका मजबूत किला ढहने की ओर है। वह स्वर्गीय वाईएस राजशेखर रेड्डी के पुत्र जगनमोहन की विरासत समझने में नाकाम रही तो तेलंगाना जैसे नाजुक मामले को सुलझाने में लापरवाही के चलते कांग्रेस यहां अपना राजनीतिक आधार गंवाने पर आमादा है। यह दोनों राज्य भाजपा और कांग्रेस के लिए काफी महत्वपूर्ण हैं। कर्नाटक में येदियुरप्पा के नेतृत्व में सरकार बनाकर भाजपा ने अपने राजनीतिक विस्तार का संकेत दिया था तो 2009 के आम चुनाव में कांग्रेस को मिली कुल 207 सीटों में आंध्र से जीते 33 सांसदों का बड़ा योग है। क्या दोनों पार्टियां (भाजपा-कांग्रेस) चुनावों में अपने-अपने इन राज्यों में अपना पूर्व का इतिहास दोहरा पाएंगी? कर्नाटक में चार साल के दौरान शेट्टर भाजपा के तीसरे मुख्यमंत्री हैं। येदियुरप्पा को भ्रष्टाचार के आरोप में लोकायुक्त की रिपोर्ट के चलते अपना पद छोड़ना पड़ा था। उन्होंने सदानंद गौड़ा को अपना उत्तराधिकारी बनाया था। उन्हें उम्मीद थी कि गौड़ा उनके ‘यस मैन’ की तरह काम करेंगे, किंतु हुआ इसके उलट। गौड़ा अपनी साफ-सुथरी छवि बनाने में लग गए। प्रशासन में भ्रष्टाचार खत्म करने के उनके अभियान के चलते येदि खेमे की कमाई के रास्ते बंद हो गए। इतना ही नहीं, उन्होंने येदि के परिवार के खिलाफ अदालतों में दर्ज जमीन हड़पने और रित के मामलों में उन्हें बचाने की कोशिश नहीं की। इससे येदियुरप्पा खफा हो गए और गौड़ा को बेदखल करने में लग गए। इसी क्रम में उन्होंने अपने समर्थक नौ मंत्रियों से इस्तीफा दिलवाकर केंद्रीय नेतृत्व को संकट में डाल दिया। राष्ट्रपति चुनाव में फजीहत से बचने और आसन्न विस चुनाव के चलते पार्टी हाईकमान येदि को नाराज कर कोई खतरा मोल नहीं लेना चाहता था। इसीलिए एक ईमानदार मुख्यमंत्री की बलि चढ़ाने में उसे तनिक गुरेज नहीं हुआ। चूंकि राज्य में लिंगायत समुदाय का 18-21 प्रतिशत मत है और येदि उसके सर्वमान्य नेता हैं। इसी कारण केंद्रीय नेतृत्व येदि के आगे शीष्रासन कर रहा है। राजनीतिक जानकारों का कहना है कि कांग्रेस ने लिंगायत समुदाय के नेता बीमार मुख्यमंत्री वीरेंद्र पाटिल को हटाने की भूल की थी, जिससे समुदाय के लोग कांग्रेस से अलग हो गए थे। यह उदाहरण भी भाजपा नेतृत्व के मन में निश्चित ही रहा होगा। शेट्टर की ताजपोशी को भी दूरगामी राजनीति का हिस्सा माना जा रहा है। शेट्टर भी लिंगायत हैं। ऐसे में येदि उनका विरोध कर अपने समुदाय में ही कमजोर होंगे, उनकी राजनीतिक सौदेबाजी कम होगी। फिर उन्हें उनकी हद बताने में आसानी होगी। यह सच है कि येदि, शेट्टर का पहले विरोध कर चुके हैं। विकल्प के अभाव में उन्होंने शेट्टर को गले लगाया है। इसलिए वे येदि के हाथ की कठपुतली कतई नहीं बनेंगे। किंतु वह सत्ता संभालते ही जमीन घोटाले में फंस गए हैं। मामला लोकायुक्त के समक्ष विचाराधीन है। यदि आरोपों में दम साबित हुआ तो उन पर मुकदमा चलेगा। फिर वह मुख्यमंत्री की कुर्सी पर कितने दिन टिके रह सकेंगे, यह अंदाज लगाना अभी मुश्किल है। इस मामले ने पार्टी नेतृत्व की भी नींद हराम कर दी है। क्योंकि कर्नाटक में अपनाई गई उसकी राजनीतिक शैली की पहले ही जगहंसाई हो रही है। उसके राजनीतिक कौशल पर भी उंगलियां उठ रही हैं। उल्लेखनीय यह है कि 2008 में कर्नाटक में सत्तारोहण के बाद शीर्ष नेतृत्व ने माना था कि इससे देश के दक्षिणी भाग में पार्टी के प्रवेश का द्वार खुला है। इसीलिए येदि की हर सनक के आगे उसे अभी तक झुकना पड़ा है। उसका यह तर्क कितना उचित अथवा अनुचित है यह तो आने वाले समय तय करेगा, किंतु प्रश्न यह है कि गौड़ा को जिस तरह हटाया गया है, क्या उससे वोक्कलिंगा समुदाय के लोग नाराज नहीं होंगे? क्या भाजपा यहां अकेले लिंगायत समुदाय के बदौलत सत्ता में आ सकेगी? यह कमजोर फैसला भाजपा पर भारी पड़ सकता है। साथ ही भ्रष्टाचार के विरुद्ध भाजपा की आवाज कुंद करने में कर्नाटक की यह राजनीतिक पटकथा महत्वपूर्ण भूमिका निभा रही है। ऐसा नहीं है कि कर्नाटक में ही प्रांतीय नेतृत्व, राष्ट्रीय नेतृत्व पर भारी पड़ा है। गुजरात, राजस्थान और हिमाचल प्रदेश के प्रांतीय क्षत्रपों के समक्ष भी केंद्रीय नेतृत्व बेबस और लाचार साबित हुआ है। यह स्थिति भाजपा के भविष्य के लिए कतई ठीक नहीं है। कर्नाटक की ही तरह वर्ष 2009 में आंध्र में मिली यादगार जीत से कांग्रेस की बांछे खिल गई थीं। किंतु सितम्बर, 2009 में वाईएसआर की दुर्घटना में मौत के बाद पार्टी के केंद्रीय नेतृत्व ने वहां की जमीनी हकीकत समझने में चूक कर दी। उनके पुत्र जगनमोहन रेड्डी की यात्रा को लेकर पार्टी में विवाद खड़ा हो गया। यह यात्रा जगन ने उन परिवारों के प्रति संवेदना जाहिर करने के लिए निकाली थी, जिनके सदस्यों ने वाईएसआर की मौत के बाद आत्महत्या कर ली थी। इसी के बाद जगन के पर करतने के लिए पार्टी नेतृत्व ने रोसैया की जगह किरन कुमार रेड्डी को मुख्यमंत्री की गद्दी पर बैठा दिया। फलत: नवम्बर, 2010 में जगन कांग्रेस से अलग हो गए और मार्च, 2011 में उन्होंने नई पार्टी बनाई। अभी 12 जून को 18 विधानसभा तथा एक लोकसभा सीट के उपचुनाव में उनकी वाईएसआर कांग्रेस को मिली जीत ने राज्य में कांग्रेस को बुरी तरह हिला दिया है। आंध्र में जगन का यह राजनीतिक प्रभाव कांग्रेस की गलतियों के कारण हुआ है। आय से अधिक सम्पत्ति मामले में यद्यपि जगन जेल में हैं, किंतु जिस तरह उनके प्रतिष्ठानों पर छापे डाले गए, परिवारजनों को प्रताड़ित किया गया, उसे आंध्र की जनता कांग्रेस की उत्पीड़नात्मक कार्रवाई मान रही है और उसकी सहानुमूति जगन के प्रति बढ़ती जा रही है। अभी कुछ दिनों पहले ही जगन की मां विजयलक्ष्मी ने प्रधानमंत्री से एक जांच अधिकारी द्वारा परेशान किए जाने की शिकायत की है। ऐसे में कांग्रेस का यह मजबूत किला ढहता नजर आ रहा है। पार्टी के केंद्रीय नेतृत्व की बेचैनी का अंदाजा इसी से लगाया जा सकता है कि आंध्रप्रदेश के केंद्रीय प्रभारी को चार बार बदला जा चुका है। इसके अलावा तेलंगाना मामले के कुप्रबंधन ने रही-सही कसर पूरी कर दी है। यहां तक कि बजट सत्र के दौरान इस सवाल को लेकर कांग्रेस के सांसद भी बेकाबू हो उठे थे। उन्हें संसद की कार्यवाही में गतिरोध उत्पन्न करने के लिए निलंबित तक किया जा चुका है। उधर तेलंगाना की मांग दिनोंदिन और मुखर हो रही है तथा कांग्रेस आंदोलनकारियों के निशाने पर है। किंतु कांग्रेस की असल मुसीबत यह है कि यदि वह तेलंगाना की मांग मानती है तो गोरखालैंड, विदर्भ और हरित प्रदेश के तूफानों को रोक पाना उसके लिए मुश्किल होगा। ऐसे में कांग्रेस के समक्ष यहां दोहरी चुनौती है और इस मुसीबत का अहसास भी है। किंतु केंद्रीय नेतृत्व अपनी पिछली गलतियों से सबक लेने को तैयार नहीं है। कुल मिलाकर कर्नाटक में भाजपा और आंध्र में कांग्रेस की अपनी राजनीतिक उलझन सुलझाने की हर कोशिश और उलझती जा रही है। इससे क्षेत्रीय दलों की बांछे खिल गई हैं। यह परिदृश्य इन दोनों बड़ी राष्ट्रीय पार्टियों के सिकुड़ते राजनीतिक आधार का संकेत नहीं तो क्या है? इसका सीधा असर 2014 के चुनाव पर पड़ने से रोका न जा सकेगा। क्या इन दोनों पार्टियों का केंद्रीय नेतृत्व अपनी गलतियों से कोई सबक लेगा?

पाक-साफ नहीं चीन के मंसूबे

यह बहुत ही दुर्भाग्यपूर्ण है कि भारत पिछले साढ़े छह दशकों से चीन से दोस्ती की पहल कर रहा है और वह दोस्ती की आड़ में अपने खतरनाक मंसूबों को अंजाम दे रहा है। पिछले दिनों चीनी कम्युनिस्ट पार्टी के अखबार ‘ग्लोबल टाइम्स’ में छपे एक लेख में उसने अपनी खतरनाक मंशा फिर जाहिर की है। उसने भारत को आगाह करते हुए कहा है कि उसे 1962 के युद्ध से सबक लेना चाहिए। तत्कालीन युद्ध के कारणों को स्पष्ट करते हुए कहा गया है कि उसका मकसद तत्कालीन प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू को अमेरिका और पूर्व सोवियत संघ के प्रभाव में आने से रोकना था। उसका दावा है कि उस वक्त चीन के नेता माओत्से तुंग के गुस्से का असली निशाना वाशिंगटन और मास्को थे न कि भारत। चीन के इस रहस्योद्घाटन में कितनी सच्चाई है यह तो वही जाने लेकिन लेख की भाषा बौखलाहट भरी और भारत को धमकाने के अंदाज वाली लगती है। सवाल है कि उसकी इस बौखलाहट की वजह क्या है? क्या वह घरेलू मोच्रे पर अपनी मुश्किलों से उबर नहीं पा रहा है? या वैिक जगत में भारत की बढ़ती ताकत और आर्थिक चुनौतियों से घबरा रहा है? कारण जो भी हो लेकिन दक्षिण एशिया में भारत के बढ़ते प्रभाव और अमेरिका से नजदीकियों ने उसकी चिंता बढ़ा दी है। नेपाल, बांग्लादेश, म्यांमार, ताइवान और वियतनाम आदि पड़ोसी देशों से सुधरते भारत के रिश्ते भी उसे रास नहीं आ रहे हैं। म्यांमार में लोकतंत्र बहाली की संभावना और वहां उसकी घटती ताकत ने भी उसे बेचैन किया है। उधर उसके मित्र पाकिस्तान की वैिक स्तर पर धूमिल होती छवि ने उसे नए राजनीतिक समीकरण पर सोचने को मजबूर कर दिया है। इन परिस्थितियों में चीन का खुद को असहज महसूस करना और चिढ़ बढ़ना स्वाभाविक है। दूसरी ओर दक्षिणी चीन सागर में वियतनाम के साथ मिलकर भारत द्वारा तेल और गैस निकालने की योजना से वह और आशंकित है। उसने धमकी भरे अंदाज में कहा है कि यहां बिना इजाजत के किसी भी प्रकार की गतिविधि को वह अपनी संप्रभुता पर हमला मानेगा और उसका करारा जवाब देगा। उसका दावा है कि दक्षिणी चीन सागर और उसके द्वीपों पर सिर्फ उसका अधिकार है। लेकिन भारत ने चीन के दावे को खारिज कर स्पष्ट कर दिया है कि वियतनाम के साथ भारतीय कंपनी ओएनजीसी के तेल निकालने का कार्यक्रम अंतरराष्ट्रीय कानूनों के मुताबिक है और वह इससे पीछे नहीं हटेगा। बहरहाल, ग्लोबल टाइम्स के लेख में 1962 के युद्ध परिणामों की चर्चा कर उसने यह संकेत जरूर दे दिया है कि वह दक्षिणी चीन सागर में भारत की दखलांदाजी को चुपचाप सहन करने वाला नहीं है। लेख में उसने कहा भी है कि चीनी लोग शांतिप्रिय हैं लेकिन अपनी जमीन की रक्षा करने में समर्थ हैं। तो क्या यह माना जाए कि दक्षिणी चीन सागर को मुद्दा बनाकर चीन भारत पर हमला कर सकता है और क्या इस हमले का ठीकरा भी भारत के ही सिर फोड़ेगा? ग्लोबल टाइम्स में प्रकाशित लेख में कहा गया है कि पचास साल पहले भारत सरकार चाहती थी कि चीन कॉलोनियल शक्तियों की तय सीमा स्वीकार करे किंतु चीन ने उसे खारिज कर दिया। उसने आरोप लगाया है कि नेहरू सरकार ने अमेरिका और सोवियत संघ के उकसावे में आकर 1959 से 1962 के बीच भारत-चीन सीमा पर समस्याएं खड़ी कीं। चीन ने सफाई दी है कि 1962 के युद्ध का उद्देश्य भारत की जमीन कब्जाना नहीं बल्कि शांति-स्थापना था। क्या इसका अर्थ यह निकाला जाए कि चीन फिर शांति स्थापना के नाम पर भारत पर हमले की योजना बना रहा है? कुछ समय पहले न्यूयार्क टाइम्स ने खुलासा किया था कि चीन पाक अधिकृत कश्मीर में सामरिक रूप से महत्वपूर्ण गिलगित-बल्तिस्तान क्षेत्र में हाईस्पीड सड़कें और रेल संर्पकों का जाल बिछा रहा है ताकि युद्धकाल में भारत तक उसकी पहुंच आसान हो सके। पूर्व सेना प्रमुख वीके सिंह ने भी दावा किया था कि पाकिस्तान अधिकृत कश्मीर में चीन की कई कंस्ट्रक्शन टीमें काम कर रही हैं। इनमें चीनी इंजीनियरों की टुकड़ियां भी मौजूद हैं। प्रख्यात पत्रिका फोर्ब्स ने भी भविष्यवाणी की है कि 2020 तक भारत-चीन आमने-सामने हो सकते हैं। चीन कभी भी सीमा विवाद को बहाना बनाकर भारत पर हमला बोल सकता है। चीन सीमा विवाद सुलझाने को लेकर कभी भी गंभीर नहीं रहा है, जबकि भारत कई बार ठोस पहल कर चुका है। सीमा विवाद से जुड़े दस्तावेजों के आदान-प्रदान में उसने कोई अभिरुचि जाहिर नहीं की है और न वह अपने दावे का नक्शा उपलब्ध कराने को तैयार दिखता है। विडंबना यह भी है कि भारत के जिन क्षेत्रों पर उसका एक इंच का भी दावा है, उससे हटने का कहीं कोई संकेत नहीं है। 15 मई, 1954 को पं. नेहरू ने चीन से मधुर संबंध बनाए रखने के लिए चीनी प्रमुख एन लाई के साथ द्विपक्षीय व्यापार समझौते पर हस्ताक्षर किए थे। दोनों देशों के बीच व्यापारिक गतिविधियां बढ़ाने और मधुर रिश्ते के उद्देश्य से उन्होंने 19 अप्रैल, 1960 को दिल्ली में चाऊ एन लाई के साथ सीमा विवाद सुलझाने की कोशिश भी की लेकिन नतीजा ढाक के तीन पात रहा। 1987 में तत्कालीन प्रधानमंत्री राजीव गांधी ने आार्थिक, व्यापार, विज्ञान और तकनीक से जुड़े मसलों पर मध्य साझा कार्यसमूह बनाने पर समझौता किया लेकिन चीन एक कदम भी आगे नहीं बढ़ा। 11 मार्च, 2005 को फिर भारतीय पहल पर रिश्तों को नया आयाम देने की कोशिश हुई लेकिन चीन का रवैया निराशाजनक ही रहा। आज भी वह तवांग और अरुणाचल प्रदेश पर अपना दावा छोड़ने को तैयार नहीं है। भारत-चीन के बीच सर्वाधिक विवाद पश्चिमी (लद्दाख) और पूर्वी (अरुणाचल प्रदेश) सेक्टर को लेकर है। पश्चिमी सेक्टर में भारत का चीन के कब्जे वाले अक्साई चीन पर लगभग 3800 वर्ग किमी का दावा है जबकि पूर्वी सेक्टर में अरुणाचल प्रदेश के लगभग 90 हजार वर्ग किमी पर उसका दावा है। त्रासदी यह भी है कि वह अरुणाचल प्रदेश से चुने गए किसी भी भारतीय सांसद को वीजा नहीं देता है और भारत की मनाही के बावजूद कश्मीर के लोगों को स्टेपल वीजा जारी करता है। ऐसे में इतना तो स्पष्ट है कि चीन भारत से मधुर संबंध बनाने को लेकर संजीदा नहीं है।