Thursday, July 12, 2012

मायावती के काम आई सीबीआइ की सुस्ती


शीर्ष अदालत ने उत्तर प्रदेश की पूर्व मुख्यमंत्री और बसपा सुप्रीमो मायावती को ताज कॉरिडोर घोटाले में बड़ी राहत देते हुए सीबीआइ पर उंगली उठाई है। साथ ही उनके खिलाफ नौ साल पुराने आय से अधिक संपत्ति मामले को खारिज कर दिया है। उत्तर प्रदेश में सत्ता से बेदखल होने के बाद माया के लिए यह फैसला काफी अहम है। बसपा ने कोर्ट के इस फैसले का स्वागत किया है। न्यायमूर्ति पी. सदाशिवम की अध्यक्षता वाली सर्वोच्च न्यायालय की खंडपीठ ने कहा सीबीआइ को मायावती के खिलाफ केस दर्ज करने का आदेश ही नहीं दिया गया था। ऐसे में दूसरी एफआइआर अनुचित थी। पर सीबीआइ ने मामले में एक और एफआइआर दर्ज कर अपने अधिकार क्षेत्र का उल्लंघन किया है। ऐसा करना गैरकानूनी था और जांच एजेंसी ने ताज कॉरिडोर घोटाले में अदालत के आदेशों को सही ढंग से समझे बिना ही उनके खिलाफ कार्रवाई की। सुप्रीम कोर्ट ने यह भी कहा कि जांच एजेंसी ने उत्तर प्रदेश की पूर्व मुख्यमंत्री के खिलाफ आय से अधिक संपत्ति मामला दर्ज करके अपने क्षेत्राधिकार को बढ़ाया, जबकि न्यायालय की ओर से इस तरह का कोई निर्देश नहीं दिया गया था। पीठ ने कहा सीबीआइ को केवल एक प्राथमिकी ताज कॉरिडोर मामले में दर्ज करनी चाहिए थी। उच्चतम न्यायालय ने मायावती के खिलाफ दूसरी प्राथमिकी दर्ज करने का कोई निर्देश नहीं दिया था। शीर्ष अदालत ने मायावती की उस याचिका पर फैसला सुनाया है, जिसमें सीबीआइ द्वारा दर्ज आय से अधिक संपत्ति मामले में उनके खिलाफ कार्रवाई खारिज करने की मांग की गई थी यानी बीते 9 वर्षो से चल रहे इस मामले में कोर्ट के इस रुख ने सीबीआइ की कार्यशैली पर भी प्रश्न खड़ा कर दिया। कठपुतली सीबीआइ शीर्ष अदालत ने कहा कि सीबीआइ की सितंबर 2008 की स्थिति रिपोर्ट में इस तरह का कोई निष्कर्ष नहीं है कि मायावती ने 1995 से 2003 के दौरान आय से कथित रूप से अधिक संपत्ति अर्जित की। जाहिर है, इससे सीबीआइ को बड़ा झटका लगा है। उसकी कार्य प्रणाली और निर्णयों के साथ-साथ जांच के तौर तरीकों पर भी गंभीर सवाल खड़े हुए है, जिसके जवाब सीबीआइ को देने होंगे। इतालवी व्यापारी क्वात्रोक्की से लेकर तमाम ऐसे मामले गिनाए जा सकते हैं, जिनमें इस एजेंसी की भूमिका को लेकर समय-समय पर सवाल खड़े किए गए हैं। पर अहम सवाल यह है कि मायावती की संपत्ति एकाएक इतनी कैसे बढ़ गई? वर्ष 2003 में मायावती की संपत्ति एक करोड़ थी और 2007 में उनकी संपत्ति 52 करोड़ हो गई, जबकि इस साल राज्यसभा चुनाव के लिए पर्चा भरते वक्त मायावती ने 111.64 करोड़ रुपये की संपत्ति घोषित की है। सीबीआइ ने 1995 से लेकर 2003 तक मायावती के खिलाफ आय से अधिक संपत्ति मामले में जांच कर एफआइआर दर्ज की थी। सितंबर, 2003 में सुप्रीम कोर्ट ने ताज कॉरिडोर मामले में माया के खिलाफ कार्रवाई के निर्देश दिए थे, जिसके बाद 18 सितंबर 2003 को सीबीआइ ने मायावती के खिलाफ दो एफआइआर दर्ज कर दी थी। एक ताज कॉरिडोर प्रोजेक्ट में अनियमितता से जुड़ी थी और दूसरी आय से अधिक संपत्ति मामले से। मायावती ने आय से अधिक संपत्ति मामले में चार्जशीट के खिलाफ 2008 में सुप्रीम कोर्ट में अर्जी दी थी। बसपा सुप्रीमो ने यह गुजारिश भी की थी कि सुप्रीम कोर्ट सीबीआइ को निर्देश दे कि वह आयकर विभाग ट्रिब्यूनल की ओर से संपत्ति को जायज ठहराने संबंधी आदेश पर गौर करे, जिसे दिल्ली हाईकोर्ट ने भी बरकरार रखा था। पर सीबीआइ ने आरोप लगाया था कि यह साबित करने के पर्याप्त सबूत हैं कि उन्होंने अपनी आय के ज्ञात स्त्रोतों से अधिक संपत्ति अर्जित की थी। सीबीआइ ने सुप्रीम कोर्ट में कहा था कि आयकर अथॉरिटी के निष्कर्ष के आधार पर उत्तर प्रदेश की मुख्यमंत्री मायावती के खिलाफ आय से अधिक संपत्ति का मामला बंद नहीं किया जा सकता, क्योंकि मायावती के खिलाफ जांच पुख्ता सुबूतों पर आधारित है। इसमें धारा 164 के बयान और दस्तावेजी सबूत शामिल है। इस मामले में बसपा सुप्रीमो मायावती ने 2008 में सुप्रीम कोर्ट में अर्जी दाखिल कर कहा था कि राजनीतिक हथकंडों का इस्तेमाल कर बेवजह उन्हें फंसाया जा रहा है। ऐसे में उनके खिलाफ आय से अधिक संपत्ति का मामला चलाने की अनुमति न दी जाए। साथ ही सीबीआइ अपनी जांच में उनके खिलाफ तथ्य नहीं जुटा पाई है। लिहाजा, अब इस मामले को बंद कर दिया जाना चाहिए। अदालत ने दोनों पक्षों को सुनने के बाद इस साल एक मई को अपना आदेश सुरक्षित रखा था। यह सच है कि अगर मायावती सबसे ज्यादा किसी मामले को लेकर परेशान थीं तो वह है आय से अधिक संपत्ति का मामला। इसका उनके पास महज एक ही जवाब है कि यह पैसा उन्हें पार्टी के कार्यकर्ताओं ने चंदे के रूप में दिया है। खैर, मायावती पर ताज कॉरिडोर मामले में करीब 17 करोड़ की धांधली का मामला लंबित है और मायावती के खिलाफ ताज कॉरिडोर का मामला चलता रहेगा। मायावती का दांव बहरहाल, बसपा सुप्रीमो ने इस फैसले पर सुप्रीम कोर्ट का आभार प्रकट किया, क्योंकि यह फैसला खुद मायावती और बसपा के लिए बड़ी राहत लेकर आया है। बेशक इस फैसले के बाद बसपा खेमे में राजनीतिक गरमी आनी तय थी, क्योंकि बसपा अब प्रदेश में अपनी राजनीतिक गतिविधियां तेज कर सकती है। वह अब सुप्रीम कोर्ट के फैसले को आधार बनाकर यह आरोप लगाएंगी कि दलित आंदोलन को रोकने के लिए मायावती को फंसाया गया था। यही नहीं, पूर्ववर्ती बसपा सरकार के कथित भ्रष्टाचार को लेकर हो रहे हमलों पर अब बसपा नेता और आक्रामक होंगे यानी लोकसभा चुनाव में सियासी घमासान और तेज होगा। इसका उत्तर प्रदेश की राजनीति पर भी असर पड़ना तय है। साथ ही बसपा ने साफ तौर पर तत्कालीन राजग सरकार को कठघरे में खड़ा करते हुए कहा कि यह मुकदमा राजनीति से प्रेरित था। मामला कुछ और था, बना कुछ और दिया गया, जिसे आज कोर्ट ने न्याय देकर उन लोगों को गलत साबित कर दिया। दूसरी तरफ इस फैसले पर राजनीतिक गलियारों में बयानबाजी शुरू हो गई। भाजपा ने आरोप लगाया कि सुप्रीम कोर्ट द्वारा बसपा सुप्रीमो मायावती के खिलाफ आय से अधिक संपत्ति मामले को खारिज किया जाना केंद्र सरकार अक्षमता है, जो राजनीतिक कारणों से जांच एजेंसियों का कथित तौर पर दुरुपयोग करती है। वहीं कानून मंत्री सलमान खुर्शीद ने कहा कि हम सभी को सुप्रीम कोर्ट के फैसले का सम्मान करना चाहिए। यह कहना बेहद गलत है कि इसका देश की राजनीति से कोई लेना-देना है। इस तरह एक बार फिर केंद्र पर सीबीआइ के इस्तेमाल का आरोप लग रहा है। आंध्र प्रदेश में कांग्रेस से बगावत करने वाले जगन मोहन रेड्डी पर आय से अधिक संपत्ति का मामला सालभर में निबट जाता है और वह जेल भी चले जाते हैं। एक साल में ही संपत्ति की जांच, केस दर्ज, चार्जशीट और जेल हो जाती है, लेकिन स्पेक्ट्रम मामले में डीएमके के कलैगनार टीवी के खातों को लेकर सीबीआइ आगे नहीं बढ़ती है। यही नहीं, समाजवादी पार्टी के मुलायम सिंह यादव और परिवार पर आय से अधिक संपत्ति का मामला 12 सालों से चला आ रहा है, लेकिन जब-जब केंद्र सरकार को पार्टी के सांसदों की जरूरत पड़ती है, लिहाजा मुलायम के मामले में सीबीआइ हाथ भी नहीं लगा पाती। वास्तव में देश की सर्वोच्च अदालत के इस फैसले से केंद्र सरकार की किरकिरी हुई है। अब एक बार फिर राजनीति में भ्रष्टाचार, चुनाव सुधार और सीबीआइ की स्वायत्तता पर गौर करने की जरूरत है। (लेखक स्वतंत्र टिप्पणीकार हैं)

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