भारत को न केवल आतंकवादियों से खतरा है बल्कि गुमराह उन कुछ भारतीय मुसलमानों से भी है, जो देश को बर्बाद करने के मकसद पर आमादा हैं। इतना तो कहा ही जा सकता है कि भारत सरकार एक पक्ष है, जो जवाबी कार्रवाई न कर सकने की अपनी निष्क्रियता के कारण उनकी क्रूर साजिश की शिकार है। इसमें कोई दो राय नहीं कि भारतीय संविधान से हरेक को कुछ निश्चित तरह की आजादी हासिल है। लेकिन न तो भारत के और न दूसरे देशों का संविधान किसी समूह को इसकी इजाजत देता है कि वह इन छूटों का लाभ उठा कर अपने देश को बर्बाद कर दे। सऊदी अरब से प्रत्यावर्तित और मुंबई के 26/11 कांड के सरगना सैयद जबीउद्दीन अंसारी उर्फ अबू जंदल ने पूछताछ के दौरान खुलासा किया है कि दुबई में दो साल के अपने प्रवास के दौरान उसने आतंकवादी घटनाओं को अंजाम देने के लिए लश्कर-ए-तय्यबा में 50 युवकों की भर्ती की है। उसने यह भी कबूला कि वह रियाद और दुबई में अपने संपकरे के जरिये हवाला के माध्यम से केरल और महाराष्ट्र में लश्कर के आत्मघाती दस्ते तैयार करने के लिए रकम भेजता था। आतंकवादी संगठन लश्कर में भर्ती के लिए पाकिस्तान, भारत, बांग्लादेश और श्रीलंका से युवक चुने जाते थे। अबू जंदल ने पाकिस्तान के कब्जे वाले कश्मीर में लश्कर में, भर्ती किए गए 250 युवकों को आतंकी वारदातों के लिए ट्रेंड भी किया था। इनमें से आठ लड़के मुंबई के 26/11 की तरह ही 2011 में कहर बरपाने के लिए छांटे गए थे। इस बारे में इंटरपोल की तरफ से सतर्कता सूचना (रेडकॉनर्र नोटिस) जारी होने के बाद बिहार के इंजीनियर फसीह मेहमूद को भारत के विभिन्न ठिकानों पर आतंकी हमले करने और आतंक संबंधी वारदातों को अंजाम देने के लिए सऊदी अरब में गिरफ्तार किया गया है। साफ है कि यह सब हुआ अमेरिकी दबाव या दखल के कारण। दुर्भाग्यवश, टाडा (आतंकवादी और विध्वंसकारी विरोधी अधिनियम) के खात्मे के बाद से भारत सरकार ऐसा कानून बनाने में बुरी तरह विफल रही है, जो इस तरह की संगीन आतंकवादी वारदातों से कारगर तरीके से निबट सके। वास्तव में, सरकार के घुटने कमजोर होने और यहां तक कि दिशाविहीन नीतियों के चलते ही चारों ओर अव्यवस्था फैली हुई है। एक तरफ, केंद्रीय गृह मंत्री पाकिस्तान और उसकी खुफिया एजेंसी आईएसआई को भारत में आतंकवादी घटनाओं के लिए जिम्मेदार मानते हैं और दूसरी ओर तथाकथित अलगाववादियों को, जो वास्तव में आतंकवादी हैं, पाकिस्तान के उच्चायुक्त बातचीत के लिए दिल्ली बुलाते हैं। जाहिर है, यह मुलाकात दुआ-सलाम के लिए तो नहीं होगी। उन्हें इसमें यह बताने के लिए बुलाया जाता है कि किस तरह वह भारत में आतंकवाद और उपद्रव फैलाएं। दरअसल, धारा 124 अ के तहत राजद्रोह का कानून कभी उन अग्रिम मोच्रे के आतंकवादियों के विरुद्ध नहीं किया गया जो अलगाववादियों का मुखौटा लगाए हैं। यही वजह है कि आज जम्मू-कश्मीर के तीन हिस्से में से एक घाटी में इस्लामीकरण का काम लगभग पूरा हो चुका है। एक रिपोर्ट के मुताबिक अनंतनाग शहर का नाम जल्दी ही इस्लामाबाद कर दिया जाएगा। आदि शंकराचार्य नामक पहाड़ का नाम तख्त-ए-सुलेमान रखा गया है। हरि पहाड़ का नाम कोह-ए-मरान रखा जाने वाला है। इसी तरह, 700 गांवों के नाम भी बदले जाने हैं। श्रीनगर हवाई अड्डे का नाम शेख-अल-आलम हवाईअड्डा रखा जाने वाला है। अगर यह रिपोर्ट सच है तो वाकई गंभीर बात है क्योंकि किसी शहर, गांव या राज्य के नाम भारत सरकार की इजाजत के बिना नहीं बदले जा सकते। प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह ने नक्लसवाद या माओवाद को भारतीय सुरक्षा के लिए सबसे बड़ा खतरा बताया है। लेकिन या तो वे भूल गए हैं या जानबूझकर आतंकवाद और कश्मीरी आतंकवादियों को भी देश के लिए समान से रूप से विध्वंसकारी नहीं बता रहे हैं। मैं इस पर भरोसा नहीं करता कि भारत की समस्या के लिए आईएसआई या पाकिस्तान पर तोहमत लगाना वास्तविक समस्या है। दरअसल, समस्या इससे निबटने में हमारी दयनीय और पीलियाग्रस्त कार्रवाई के चलते है। जम्मू-कश्मीर सरकार का फरमान श्रीनगर के कुछ हिस्सों के आगे नहीं चलता। सरकार ने श्रीनगर से विशेष सशस्त्र सैन्य बल अधिनियम जैसे ही हटाया, उसके अगले ही दिन आधे से ज्यादा पुलिसकर्मी हलाक कर दिए गए थे। संसद पर 2001 के 13 दिसम्बर को हुए हमले में गिरफ्तार आतंकवादी की सर्वोच्च न्यायालय से भी फांसी की सजा बरकरार रखी गई है लेकिन सरकार एक वाहियात बिना पर उस आदेश पर अमल करने में ढीला-ढाला रवैया अपनाती है कि अभी दया याचिका पर विचार होना बाकी है। यह होते-होते सात साल बीत गए हैं। यही स्थिति, पाकिस्तान के उस आतंकवादी की है, जिसकी मुंबई हमले में फांसी की सजा के ऐलान हुए चार साल बीत चुके हैं। वास्तव में, भारत इन लचर तकरे की आड़ में कि वह कानून की लंबित प्रक्रियाओं का पालन कर रहा है, अपने को धोखा दे रहा है। इससे उसकी स्थिति पूरी दुनिया में हास्यास्पद हो गई है जबकि उसकी सर्वोच्च अदालत तक इन आतंकियों को फांसी की सजा सुना चुकी है। इस रवैये ने भारत को धर्मशाला या सराय बना दिया है, जहां आतंकवादी आ सकते हैं, ठहर सकते हैं; जो चाहें कर सकते हैं और फिर छूट भी सकते हैं। यह स्थिति इसलिए है कि हम अब भी देश को 1863 में ब्रिटिश सरकार के बनाए कानूनों- भारतीय दंड संहिता, भारतीय साक्ष्य अधिनियम और अपराध प्रक्रिया संहिता से चला रहे हैं। तब इज्जत के लिए हत्या और आतंकवाद जैसे संगीन जुर्म सामने नहीं थे। आपराधिक न्याय पण्राली को मजबूत करने के आड़े-तिरछे प्रयासों के कारण अदालतों में लंबित मुकदमों के निबटारे में दशकों का समय लगता है। सीबीआई में 20-20 सालों से मुकदमें लंबित हैं। तिस पर भी आप मांग करें कि जब सुरक्षा बल के साथ मुठभेड़ हो रही हो गवाह पेड़ के पीछे छिपे हों या आधी रात को जब आतंकवादी सीमा पार कर भारत में दाखिल हो रहे हों तो उस समय भी किसी प्रत्यक्षदर्शी को मौजूद रहना जरूरी है। इसी तरह, जब नक्सली मारे जा रहे या छत्तीसगढ़ में जब नक्सलियों ने सीआरपीएफ के 76 जवानों को भून दिया तब भी गवाह को मौजूद रहना चाहिए था। हालांकि पूरी दुनिया अपराध और अपराधियों के बारे में जानती है, फिर भी हत्यारे और आतंकवादी कानूनी छेदों और सरकार की न्यायिक व आपराधिक न्यायिक पण्राली की उदासीनता के चलते छूट जाते हैं। यही वह वजह है कि जब कोई भी ट्रैफिक नियमों का पालन नहीं करता। ऐसे परिदृश्य में मीडिया ने 26/11 में भारतीय मुस्लिम अबू जंदल की संलिप्तता का खुलासा कर सही किया है। दरअसल, ऐसे ही लोग उस मुसलमान समुदाय को बदनाम करते हैं जबकि 99.9 फीसद आबादी देशभक्त है। लेकिन मौजूदा भारतीय कानून के तहत इस मामले का कोई नतीजा नहीं निकलेगा क्योंकि पुलिस को दिया गया बयान कानून की अदालत में मान्य नहीं है, जब तक उसका समर्थन करता कोई साक्ष्य न हो। जब तक हम आतंकियों के देश में दाखिल होने के बिंदु से ही वैसी सख्ती नहीं दिखाएंगे जैसी वे सुरक्षा बलों और निदरेष नागरिकों के प्रति दिखाते हैं, समस्या जस की तस रहेगी। तथाकथित जेहादियों का विास है कि आतंक बरपाते समय मौत होने पर उन्हें जन्नत नसीब होती है; जहां हूर उनका इंतजार कर रही हैं और अल्लाह से भी मुलाकात हो जाती है। आतंकवादियों की मन्नत पूरी करने में अपनी सरकार विफल हो जाती है। होना यह चाहिए कि आतंकवादी जब भी देश पर हमला करें तो अल्लाह से मिलने की उनकी इच्छा जितनी जल्दी हो, जन्नत भेज कर पूरी कर दी जाए। यह काम जितनी जल्दी हो जाए, उतना ही अच्छा। (लेखक सीबीआई के पूर्व निदेशक हैं। उनकेआलेख में व्यक्त विचार निजी हैं)
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