Saturday, July 14, 2012

राष्ट्रीय दलों के दरकते दक्षिणी दुर्ग


कर्नाटक इन दिनों सुर्खियों में है। भाजपा शासित इस राज्य की राजनीतिक उलझन सुलझाने की पार्टी हाईकमान की कोशिश परवान नहीं चढ़ पा रही है। पार्टी को टूटने से बचाने के लिए केंद्रीय नेतृत्व पूर्व मुख्यमंत्री येदियुरप्पा के समक्ष कठपुतली बन गया है। बृहस्पतिवार (12 जुलाई) को जगदीश शेट्टर द्वारा मुख्यमंत्री पद की शपथ लेने के साथ लग रहा था कि कर्नाटक का राजनीतिक संकट फिलहाल टल गया है किंतु तेजी से बदले घटनाक्रम ने इस पर पानी फेर दिया है। शेट्टर 250 करोड़ रुपये के जमीन घोटाले में फंस गए हैं। लोकायुक्त 19 जुलाई को उनके खिलाफ मुकदमा चलाने के संबंध में अपना फैसला देंगे। इससे उनके मुख्यमंत्री बने रहने को लेकर अटकलें लगनी शुरू हो गई हैं तो केंद्रीय नेतृत्व हलकान हो उठा है। कुछ इसी तरह का राजनीतिक रंग कांग्रेस शासित आंध्रप्रदेश का भी है। यहां भी पार्टी के केंद्रीय नेतृत्व की अदूरदर्शिता के कारण उसका मजबूत किला ढहने की ओर है। वह स्वर्गीय वाईएस राजशेखर रेड्डी के पुत्र जगनमोहन की विरासत समझने में नाकाम रही तो तेलंगाना जैसे नाजुक मामले को सुलझाने में लापरवाही के चलते कांग्रेस यहां अपना राजनीतिक आधार गंवाने पर आमादा है। यह दोनों राज्य भाजपा और कांग्रेस के लिए काफी महत्वपूर्ण हैं। कर्नाटक में येदियुरप्पा के नेतृत्व में सरकार बनाकर भाजपा ने अपने राजनीतिक विस्तार का संकेत दिया था तो 2009 के आम चुनाव में कांग्रेस को मिली कुल 207 सीटों में आंध्र से जीते 33 सांसदों का बड़ा योग है। क्या दोनों पार्टियां (भाजपा-कांग्रेस) चुनावों में अपने-अपने इन राज्यों में अपना पूर्व का इतिहास दोहरा पाएंगी? कर्नाटक में चार साल के दौरान शेट्टर भाजपा के तीसरे मुख्यमंत्री हैं। येदियुरप्पा को भ्रष्टाचार के आरोप में लोकायुक्त की रिपोर्ट के चलते अपना पद छोड़ना पड़ा था। उन्होंने सदानंद गौड़ा को अपना उत्तराधिकारी बनाया था। उन्हें उम्मीद थी कि गौड़ा उनके ‘यस मैन’ की तरह काम करेंगे, किंतु हुआ इसके उलट। गौड़ा अपनी साफ-सुथरी छवि बनाने में लग गए। प्रशासन में भ्रष्टाचार खत्म करने के उनके अभियान के चलते येदि खेमे की कमाई के रास्ते बंद हो गए। इतना ही नहीं, उन्होंने येदि के परिवार के खिलाफ अदालतों में दर्ज जमीन हड़पने और रित के मामलों में उन्हें बचाने की कोशिश नहीं की। इससे येदियुरप्पा खफा हो गए और गौड़ा को बेदखल करने में लग गए। इसी क्रम में उन्होंने अपने समर्थक नौ मंत्रियों से इस्तीफा दिलवाकर केंद्रीय नेतृत्व को संकट में डाल दिया। राष्ट्रपति चुनाव में फजीहत से बचने और आसन्न विस चुनाव के चलते पार्टी हाईकमान येदि को नाराज कर कोई खतरा मोल नहीं लेना चाहता था। इसीलिए एक ईमानदार मुख्यमंत्री की बलि चढ़ाने में उसे तनिक गुरेज नहीं हुआ। चूंकि राज्य में लिंगायत समुदाय का 18-21 प्रतिशत मत है और येदि उसके सर्वमान्य नेता हैं। इसी कारण केंद्रीय नेतृत्व येदि के आगे शीष्रासन कर रहा है। राजनीतिक जानकारों का कहना है कि कांग्रेस ने लिंगायत समुदाय के नेता बीमार मुख्यमंत्री वीरेंद्र पाटिल को हटाने की भूल की थी, जिससे समुदाय के लोग कांग्रेस से अलग हो गए थे। यह उदाहरण भी भाजपा नेतृत्व के मन में निश्चित ही रहा होगा। शेट्टर की ताजपोशी को भी दूरगामी राजनीति का हिस्सा माना जा रहा है। शेट्टर भी लिंगायत हैं। ऐसे में येदि उनका विरोध कर अपने समुदाय में ही कमजोर होंगे, उनकी राजनीतिक सौदेबाजी कम होगी। फिर उन्हें उनकी हद बताने में आसानी होगी। यह सच है कि येदि, शेट्टर का पहले विरोध कर चुके हैं। विकल्प के अभाव में उन्होंने शेट्टर को गले लगाया है। इसलिए वे येदि के हाथ की कठपुतली कतई नहीं बनेंगे। किंतु वह सत्ता संभालते ही जमीन घोटाले में फंस गए हैं। मामला लोकायुक्त के समक्ष विचाराधीन है। यदि आरोपों में दम साबित हुआ तो उन पर मुकदमा चलेगा। फिर वह मुख्यमंत्री की कुर्सी पर कितने दिन टिके रह सकेंगे, यह अंदाज लगाना अभी मुश्किल है। इस मामले ने पार्टी नेतृत्व की भी नींद हराम कर दी है। क्योंकि कर्नाटक में अपनाई गई उसकी राजनीतिक शैली की पहले ही जगहंसाई हो रही है। उसके राजनीतिक कौशल पर भी उंगलियां उठ रही हैं। उल्लेखनीय यह है कि 2008 में कर्नाटक में सत्तारोहण के बाद शीर्ष नेतृत्व ने माना था कि इससे देश के दक्षिणी भाग में पार्टी के प्रवेश का द्वार खुला है। इसीलिए येदि की हर सनक के आगे उसे अभी तक झुकना पड़ा है। उसका यह तर्क कितना उचित अथवा अनुचित है यह तो आने वाले समय तय करेगा, किंतु प्रश्न यह है कि गौड़ा को जिस तरह हटाया गया है, क्या उससे वोक्कलिंगा समुदाय के लोग नाराज नहीं होंगे? क्या भाजपा यहां अकेले लिंगायत समुदाय के बदौलत सत्ता में आ सकेगी? यह कमजोर फैसला भाजपा पर भारी पड़ सकता है। साथ ही भ्रष्टाचार के विरुद्ध भाजपा की आवाज कुंद करने में कर्नाटक की यह राजनीतिक पटकथा महत्वपूर्ण भूमिका निभा रही है। ऐसा नहीं है कि कर्नाटक में ही प्रांतीय नेतृत्व, राष्ट्रीय नेतृत्व पर भारी पड़ा है। गुजरात, राजस्थान और हिमाचल प्रदेश के प्रांतीय क्षत्रपों के समक्ष भी केंद्रीय नेतृत्व बेबस और लाचार साबित हुआ है। यह स्थिति भाजपा के भविष्य के लिए कतई ठीक नहीं है। कर्नाटक की ही तरह वर्ष 2009 में आंध्र में मिली यादगार जीत से कांग्रेस की बांछे खिल गई थीं। किंतु सितम्बर, 2009 में वाईएसआर की दुर्घटना में मौत के बाद पार्टी के केंद्रीय नेतृत्व ने वहां की जमीनी हकीकत समझने में चूक कर दी। उनके पुत्र जगनमोहन रेड्डी की यात्रा को लेकर पार्टी में विवाद खड़ा हो गया। यह यात्रा जगन ने उन परिवारों के प्रति संवेदना जाहिर करने के लिए निकाली थी, जिनके सदस्यों ने वाईएसआर की मौत के बाद आत्महत्या कर ली थी। इसी के बाद जगन के पर करतने के लिए पार्टी नेतृत्व ने रोसैया की जगह किरन कुमार रेड्डी को मुख्यमंत्री की गद्दी पर बैठा दिया। फलत: नवम्बर, 2010 में जगन कांग्रेस से अलग हो गए और मार्च, 2011 में उन्होंने नई पार्टी बनाई। अभी 12 जून को 18 विधानसभा तथा एक लोकसभा सीट के उपचुनाव में उनकी वाईएसआर कांग्रेस को मिली जीत ने राज्य में कांग्रेस को बुरी तरह हिला दिया है। आंध्र में जगन का यह राजनीतिक प्रभाव कांग्रेस की गलतियों के कारण हुआ है। आय से अधिक सम्पत्ति मामले में यद्यपि जगन जेल में हैं, किंतु जिस तरह उनके प्रतिष्ठानों पर छापे डाले गए, परिवारजनों को प्रताड़ित किया गया, उसे आंध्र की जनता कांग्रेस की उत्पीड़नात्मक कार्रवाई मान रही है और उसकी सहानुमूति जगन के प्रति बढ़ती जा रही है। अभी कुछ दिनों पहले ही जगन की मां विजयलक्ष्मी ने प्रधानमंत्री से एक जांच अधिकारी द्वारा परेशान किए जाने की शिकायत की है। ऐसे में कांग्रेस का यह मजबूत किला ढहता नजर आ रहा है। पार्टी के केंद्रीय नेतृत्व की बेचैनी का अंदाजा इसी से लगाया जा सकता है कि आंध्रप्रदेश के केंद्रीय प्रभारी को चार बार बदला जा चुका है। इसके अलावा तेलंगाना मामले के कुप्रबंधन ने रही-सही कसर पूरी कर दी है। यहां तक कि बजट सत्र के दौरान इस सवाल को लेकर कांग्रेस के सांसद भी बेकाबू हो उठे थे। उन्हें संसद की कार्यवाही में गतिरोध उत्पन्न करने के लिए निलंबित तक किया जा चुका है। उधर तेलंगाना की मांग दिनोंदिन और मुखर हो रही है तथा कांग्रेस आंदोलनकारियों के निशाने पर है। किंतु कांग्रेस की असल मुसीबत यह है कि यदि वह तेलंगाना की मांग मानती है तो गोरखालैंड, विदर्भ और हरित प्रदेश के तूफानों को रोक पाना उसके लिए मुश्किल होगा। ऐसे में कांग्रेस के समक्ष यहां दोहरी चुनौती है और इस मुसीबत का अहसास भी है। किंतु केंद्रीय नेतृत्व अपनी पिछली गलतियों से सबक लेने को तैयार नहीं है। कुल मिलाकर कर्नाटक में भाजपा और आंध्र में कांग्रेस की अपनी राजनीतिक उलझन सुलझाने की हर कोशिश और उलझती जा रही है। इससे क्षेत्रीय दलों की बांछे खिल गई हैं। यह परिदृश्य इन दोनों बड़ी राष्ट्रीय पार्टियों के सिकुड़ते राजनीतिक आधार का संकेत नहीं तो क्या है? इसका सीधा असर 2014 के चुनाव पर पड़ने से रोका न जा सकेगा। क्या इन दोनों पार्टियों का केंद्रीय नेतृत्व अपनी गलतियों से कोई सबक लेगा?

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