मायावती के मामले में सर्वोच्च न्यायालय का फैसला कई सवाल खड़े करता है। केंद्रीय जांच ब्यूरो के अनुसार उसने ताज कॉरीडोर परियोजना में भ्रष्टाचार को लेकर 2003 में मायावती के खिलाफ आय से अधिक संपत्ति रखने का मामला भी दर्ज किया था। नौ साल बाद सर्वोच्च न्यायालय ने यह पाया कि सीबीआइ को ऐसा करने का अधिकार ही नहीं था। शीर्ष अदालत की मानें तो उसने सीबीआइ को कभी भी मायावती के खिलाफ आय से अधिक संपत्ति का मामला दर्ज करने का आदेश नहीं दिया। इसका अर्थ है कि जांच एजेंसी ने अपने अधिकार क्षेत्र से बाहर जाकर काम किया। सीबीआइ की ओर से गफलत किए जाने से इन्कार नहीं, लेकिन आखिर इस भूल को पकड़ने में नौ साल कैसे लग गए? इससे भी महत्वपूर्ण सवाल यह है कि यदि सीबीआइ ने गलत एफआइआर दर्ज कर ली थी तो फिर सुप्रीम कोर्ट उसकी प्रगति रिपोर्टो पर विचार क्यों करता रहा? यह उल्लेखनीय है कि सीबीआइ ने इस मामले की जांच से जुड़ी एक-दो नहीं, छह रिपोर्ट सुप्रीम कोर्ट को दीं। सीबीआइ के मुताबिक इन सभी रिपोर्टो को स्वीकार करते हुए शीर्ष अदालत ने ताज कॉरीडोर और आय से अधिक संपत्ति के केस को अलग-अलग करने का फैसला सुनाया। आखिर यह क्या पहेली है और इसे कौन सुलझाएगा? मायावती ने समय-समय पर खुद ही अपनी आय घोषित की है। इसके अनुसार 2007 में 52 करोड़ की आय 2012 में 111 करोड़ रुपये हो गई। यह कोई नया-अनोखा अथवा इकलौता मामला नहीं। देश में ज्यादातर नेताओं की आय इसी तरह दिन-दूनी रात चौगुनी गति से बढ़ती है। क्या कोई यह बताएगा कि नेताओं के साथ ही ऐसा क्यों होता है? हमारे ज्यादातर नेता न तो किसी लाभ के पद पर होते हैं और न ही किसी व्यवसाय को सीधे संचालित कर रहे होते हैं, लेकिन उनकी आय में इजाफा बाजार के सभी नियमों को मुंह चिढ़ाते हुए होता रहता है। क्या भारत की राजनीति किसी अलग किस्म के अर्थशास्त्र से चलती है? यह ठीक नहीं कि नेतागण अपनी आय में असामान्य वृद्धि दर्शाते रहें और फिर भी हमारे नीति-नियंताओं में कहीं कोई हलचल न हो। यदा-कदा वे तब संकट में आते हैं जब किसी विवाद या घोटाले के चलते उनके खिलाफ आय से अधिक संपत्ति का मामला दर्ज हो जाता है। इसके बावजूद बहुत कुछ सीबीआइ और उसे कठपुतली की तरह नियंत्रित करने वाली केंद्रीय सत्ता पर निर्भर करता है। इसकी ताजा मिसाल आंध्र प्रदेश के सांसद जगनमोहन रेड्डी हैं। जगनमोहन ने कांग्रेस से निकलकर जैसे ही नई पार्टी बनाई, केंद्रीय सत्ता को यह नजर आ गया कि उन्होंने अनुचित तरीके से करोड़ों की संपत्ति बनाई है। वर्तमान में उनके खिलाफ सीबीआइ एवं अन्य केंद्रीय एजेंसियों की सक्रियता देखते ही बनती है। यह किसी से छिपा नहीं कि मायावती के मामले में सीबीआइ ने किस तरह समय-समय पर सक्रियता और निष्कि्रयता दिखाई। मौजूदा राजनीतिक माहौल में यह लगभग तय है कि यदि मायावती के प्रकरण में सीबीआइ चाहेगी तो भी उसे पुनर्विचार याचिका दाखिल करने की अनुमति नहीं मिलने वाली। यदि इस मामले में भाजपा को सफाई देनी पड़ रही है तो इसके लिए एक हद तक वह भी जिम्मेदार है। यदि उसने केंद्रीय सत्ता का नेतृत्व करते समय सीबीआइ को वास्तव में स्वायत्त बनाने के लिए कोई ठोस पहल की होती तो आज दूसरी ही स्थिति होती।
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