Thursday, July 12, 2012

बढ़ती आबादी, घटते संसाधन


दुनिया की आबादी आज सात अरब से भी ज्यादा हो चुकी है जो एक बड़ी चुनौती है। संयुक्त राष्ट्र जनसंख्या कोष की मानें तो बढ़ती हुई आबादी की एक बड़ी चुनौती मानव विकास के लिए ठोस बुनियाद तैयार करने की है जिसमें अमीरी और गरीबी के बीच बढ़ती खाई एक बड़ी बाधा है। आबादी की वर्तमान बढ़ती दर के मुताबिक हर साल 7.8 करोड़ लोगों की वृद्धि हो जाती है जिसका दबाव प्राकृतिक संसाधनों पर पड़ता है। 1945 से 2012 तक विश्व जनसंख्या में लगभग तीन गुनी वृद्धि हो चुकी है। विश्व स्वास्थ्य संगठन के आंकड़ों के अनुसार गरीबी के कारण करोड़ों महिलाएं प्रसव के समय काल कवलित हो जाती हैं। यही नहीं विश्व समुदाय के समक्ष शरणार्थियों की समस्या भी एक बड़ी चुनौती है, क्योंकि बढ़ती आबादी के कारण लोग बुनियादी सुख-सुविधाओं के लिए दूसरे देशों में पनाह लेने को मजबूर होते हैं। भारत में बांग्लादेशियों की घुसपैठ इसका प्रत्यक्ष उदाहरण है। विभिन्न प्रजातियों में 30 प्रतिशत तक की गिरावट आई है क्योंकि मानव ने अधिक से अधिक प्राकृतिक संसाधनों का दोहन शुरू कर दिया है। निरंतर वनों की संख्या में कमी हो रही है और पेयजल की समस्या मुंह बाए खड़ी है। विशेषज्ञों की मानें तो अगर भारत की जनसंख्या इसी दर से बढ़ती रही तो 2030 तक भारत आबादी के मामले में चीन को पछाड़ देगा। हाल के जनसंख्या परिणामों के अनुसार भारत की आबादी 120 करोड़ से अधिक है, जो अमेरिका, इंडोनेशिया, ब्राजील, पाकिस्तान और बांग्लादेश की कुल जनंसख्या से ज्यादा है। भारत के कई राज्य विकास में भले ही पीछे हों, परंतु उनकी जनसंख्या विश्व के कई देशों की जनसंख्या से अधिक है। उदाहरणार्थ तमिलनाडु की जनसंख्या फ्रांस से अधिक है तो ओडिशा अर्जेटीना से आगे है। मध्य प्रदेश की जनसंख्या थाईलैंड से ज्यादा है तो महाराष्ट्र मैक्सिको को टक्कर दे रहा है। कह सकते हैं कि भारत में जनसंख्या के आधार पर विश्व के कई देश बसते हैं, परंतु यह भी सच है कि भारत के पास विश्व का मात्र 2.4 प्रतिशत क्षेत्र है, लेकिन संसाधनों के मामले में हम बहुत पीछे हैं। भारत की एक बड़ी आबादी किसानों की है, लेकिन इनकी स्थिति बद से बदतर है। इसे सुधारने के लिए सरकार को और प्रयास करना चाहिए। सीमित संसाधनों के बीच हमारा देश इतनी बड़ी आबादी को किस तरह बुनियादी जरूरतों को उपलब्ध करवाए यह अपने आपमें एक बड़ा सवाल है जिस कारण मनरेगा जैसी विभिन्न सरकारी योजनाएं घोटालों की भेंट चढ़ जाती हैं और भारत सरकार देश से गरीबी खत्म करने के खोखले दावे करती रहती है। इस संदर्भ में यह कहना भी गलत नहीं होगा कि भारत में स्वास्थ्य सेवाएं भगवान भरोसे ही हैं। एक तरफ जहां हमारी सरकार चिकित्सा, पर्यटन को बढ़ावा देने की बात करती है तो वहीं सरकारी अस्पतालों के आगे जमा भीड़ कुछ और ही कहानी बयां करती है। जनसंख्या नियंत्रण के प्रति सरकार कितनी लापरवाह है इस भयावह तस्वीर से इसका अंदाजा लगाया जा सकता है। आज भी ग्रामीण क्षेत्रों में शहरों की अपेक्षा मृत्यु दर ज्यादा है। एक आंकडे़ के मुताबिक आजादी के इतने वर्षो बाद भी इलाज के अभाव में प्रसव के दौरान प्रति एक हजार महिलाओं में से 110 दम तोड़ देती हैं। विश्व स्वास्थ्य संगठन की मानें तो प्रजनन के समय दम तोड़ने वाली महिलाओं में 99 प्रतिशत महिलाएं विकाशसील देशों से संबंधित हैं, जबकि प्राय: उन्हें बचाया जा सकता है। इसी तरह आंकड़ों से पता चलता है कि शिशु मृत्यु दर सबसे कम मोनैको देश में है जहां 1.8 बच्चे ही काल-कवलित होते हैं तो वहीं भारत में स्थिति बिल्कुल उलटी है। भारत में आज भी एक हजार बच्चों में से 46 बच्चे काल के शिकार हो जाते हैं और 40 प्रतिशत से अधिक बच्चे कुपोषण के शिकार हो जाते हैं। यहां एक और प्रश्न पर विचार करना आवश्यक है। जन्म दर को कम करके जनसंख्या वृद्धि में कटौती करने को ही आमतौर पर जनसंख्या नियंत्रण माना जाता है, परंतु महत्वपूर्ण सवाल यह है कि जनसख्या वृद्धि की बढ़ती समस्या को रोकने की जिम्मेदारी किस पर छोड़ी जाए। संजय गांधी ने इस दिशा में जिम्मेदारी तय करने की कोशिश की तो उन्हें अतिवादी की संज्ञा दे दी गई। जनसंख्या रोकने के लिए सरकार के पास कोई ठोस नीति नहीं है एवं उसमें जनसंख्या रोकने की दृढ़ इच्छाशक्ति भी नहीं है। अगर ऐसा माना जाए तो कुछ भी अतिशयोक्ति नहीं होगी। साथ ही जनसंख्या वृद्धि को लोग धार्मिकता से जोड़ते हुए इसे भगवान का आशीर्वाद मानते हैं। मुसलमानों में तो नसबंदी के खिलाफ फतवा तक जारी कर दिया गया है। इस विषम परिस्थिति में इस समस्या पर नियंत्रण कैसे पाया जाए यह एक गंभीर प्रश्न है? संसद में देशहित को ध्यान में रखते हुए इस समस्या को लेकर बहस होनी चाहिए, लेकिन सभी मौन हैं। हमारी सरकार पांच सितारा होटलों में एक-दूसरे की पीठ थपथपा कर अपनी जिम्मेदारी से मुक्त होना चाहती है, जबकि जनसंख्या विस्फोट की चर्चा ग्रामीण एवं अशिक्षित समाज के बीच होनी चाहिए। इतना ही नहीं ऐसे सुझावों पर सरकार को गंभीरता से विचार करना चाहिए। अनिवार्य जनसंख्या नियंत्रण की नीति का एक उदाहरण चीन है जहां एक बच्चे की सरकारी नीति है। चीन ने अपने यहां ऐसे लोगों के सरकारी नौकरियों में प्रवेश पर प्रतिबंध लगा दिया है जिन्हें एक से अधिक बच्चे हैं, परंतु भारत सरकार के लिए यह सुझाव बेतुका है, क्योंकि यह मुद्दा सीधे-सीधे वोट की राजनीति जुड़ा हुआ है। परिणामत: परिवार नियोजन की बात करते ही सरकार के हाथ-पैर फूलने लगते हैं। ऐसे में बिल्ली के गले में घंटी कौन बांधे यह एक बड़ा सवाल है। वोट की राजनीति से ऊपर उठकर सरकार को कुछ ठोस कदम उठाने ही होंगे। भारत की बढ़ती हुई जनसंख्या चिंता की बजाय आने वाले समय में वरदान भी बन सकती है। अगर हम पूंजीपतियों की मानें तो आने वाले समय में खपत की बहुलता के चलते भारत विश्व का सबसे बड़ा बाजार होगा जिस कारण विश्व के बड़े-बड़े उद्योगपतियों की नजर भारत पर होगी। इसकी शुरुआत वैश्वीकरण के नाम पर हो भी चुकी है। आर्थिक सुधार के नाम पर प्रत्यक्ष विदेशी निवेश की नीति इसी दिशा में बढ़ता कदम है। इतना ही नहीं दुनिया के बड़े-बड़े व्यापारी भारत में आना चाहते है। आने वाले समय में भारत में युवा आबादी की बहुलता होगी जिसके चलते भारत वैश्विक बाजार का केंद्रबिंदु होगा और इसे ध्यान में रखकर वस्तुओं का निर्माण किया जाएगा। भारत में सेवा क्षेत्र सस्ता होने के कारण लाखों लोगों को रोजगार मिला हुआ है। भारत में इस साल तक ई-कॉमर्स का बाजार 50 फीसद बढ़कर 46 हजार करोड़ रुपये का हो जाएगा। इसी तरह ऑनलाइन ट्रैवल इंडस्ट्री का तेजी से विस्तार होने की वजह से ई-कॉमर्स का बाजार बढ़ता जा रहा है। यह ऐसी बातें हैं जो जनसंख्या का सकारात्मक पक्ष है। (लेखक स्वतंत्र टिप्पणीकार हैं)

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