प्रवेश परीक्षा को लेकर देश के आइआइटी और मानव संसाधन विकास मंत्री के बीच चले वाकयुद्ध के बाद पिछले दिनों उसके स्वरूप को लेकर एक सहमति बनी है, जिसे वर्ष 2013 से लागू किया जाएगा। सवाल उठता है कि आइआइटी बोर्ड की इस बैठक में क्या इस बात पर भी कुछ विचार हुआ कि आखिर इन अभिजात संस्थानों में किस तरह संविधान प्रदत्त आरक्षण के नियमों की खुल्लमखुल्ला अनदेखी चल रही है। मालूम हो कि ब्रांड वैल्यू बने आइआइटी जैसे संस्थान शिक्षकों की भर्ती के लिए सरकार द्वारा बनाए गए नियमों का खुल्लमखुल्ला उल्लंघन किस तरह करते रहे हैं, किस तरह वे अति पिछड़ी जाति, अनुसूचित जाति एवं जनजाति के उम्मीदवारों को आरक्षण से वंचित करने के लिए ऐसे नियमों को उद्धृत करते रहे हैं, जो उनके ऊपर लागू ही नहीं होते। यह मसला हाल में सुर्खियां बना है। पिछले दिनों चेन्नई में राष्ट्रीय अनुसूचित जाति आयोग द्वारा आयोजित सुनवाई में आइआइटी मद्रास के प्रतिनिधि की तरफ से जो विस्फोटक स्वीकारोक्ति की गई, उसका अर्थ यही निकलता है। दरअसल, यह मसला आइआइटी मद्रास के पूर्व छात्र ई. मुरलीधरन की याचिका के चलते इस बार नए सिरे से सामने आया है। प्रस्तुत सुनवाई में आइआइटी की तरफ से उपस्थित डीन सी. श्रीराम ने मौखिक तौर पर स्वीकार किया कि आइआइटी में आरक्षण नियमों का पालन नहीं होता रहा है। इस संबंध में उन्होंने रिपोर्ट रखने के लिए छह दिन की मोहलत मांगी है। याद रहे कि आइआइटी में अपने उत्कृष्ट परफार्मेस के लिए पुरस्कृत मुरलीधरन ने वर्ष 1995 में अमेरिका और जापान में अकादमिक कार्यो को पूरा करने के बाद आठ दफा वहां फैकल्टी में स्थान पाने की कोशिश की थी, मगर उन्हें यह कहकर टरका दिया गया कि वहां आरक्षण के कोटा संबंधी नियम लागू नहीं होते हैं। अंतत: जनाब मुरलीधरन ने इस मसले को लेकर आयोग में शिकायत दर्ज की कि किस तरह आइआइटी एवं अन्य संस्थानों में अनुसूचित तबके के उच्च शिक्षा प्राप्त उम्मीदवारों को उनके लिए उचित नौकरियों से वंचित किया जा रहा है, जबकि दूसरी तरफ मानव संसाधन विकास मंत्री संसद में कह रहे हैं कि इन संस्थानों मे तीन हजार से अधिक रिक्तियां हैं और हम विदेशों से शिक्षक लाने की योजना बना रहे हैं। जातिगत भेदभाव आइआइटी द्वारा संविधान प्रदत्त अधिकारों से अनुसूचित तबकों को वंचित करने का यह मसला पहली दफा नहीं उठा है। आज से पांच साल पहले एक अंग्रेजी साप्ताहिक ने इस मसले पर एक लंबी स्टोरी की थी। चेन्नई स्थित आइआइटी पर केंद्रित उपरोक्त स्टोरी में यह प्रश्न उठाने की कोशिश की गई थी कि किस तरह आइआइटी आधुनिक युग का अग्रहरम में रूपांतरित हुई हैं। तमिलनाडु में ऊंची जातियों के आवास को अग्रहरम कहते हैं। लेखक ने आंकड़ों के सहारे बताया था कि उपरोक्त संस्थान में अनुसूचित जाति और जनजाति के छात्रों के लिए आवंटित 22.5 प्रतिशत कोटा इन तबकों से आने वाले छात्रों से भरा नहीं जाता। वर्ष 2005 के आंकड़ों के मुताबिक वहां अनुसूचित जाति के छात्र महज 11.9 फीसद थे, जबकि वांछनीय था 15 फीसद। उच्च शिक्षा में यह अनुपात और कम हो जाता है, रिसर्च में महज 2.3 फीसद और पीएचडी में 5.8 फीसद। वहां मौजूद कुल 4,687 छात्रों में महज 559 अनुसूचित जाति के हैं। शिक्षकों की नियुक्ति में भी इसी किस्म का भेदभाव बरता जाता है, जहां 460 फैकल्टी सदस्यों में महज चार (.86 फीसद) दलित हैं। 50 अन्य पिछड़ी जाति के हैं और बाकी सब ब्राह्मण हैं। दलित अध्यापक भी मेरिट के आधार पर भर्ती किए गए हैं यानी संकाय में भर्ती के लिए अनुसूचित जाति के स्थान बिल्कुल रिक्त थे। यह अकारण नहीं कि चेन्नई आइआइटी में भर्ती संबंधी कई मुकदमे अदालत में लंबित पड़े हैं। चेन्नई आइआइटी की चर्चा में सबसे मर्मस्पर्शी कहानी दलित तबके से संबंधित सुजी टेप्पल नामक छात्रा की थी, जिसने नब्बे के दशक के उत्तरार्द्ध में वहां एडमिशन लिया था। सुजी ने इंटरमीडिएट की परीक्षा में गणित, भौतिकी और रसायन में 94 फीसदी नंबर प्राप्त किए थे। दलित-आदिवासी तबके से आने वाले छात्रों के लिए आइआइटी में प्रीपरेटरी कोर्स चलाए जाते हंै। हालांकि सुजी के लिए ऐसे कोर्स की आवश्यकता नहीं थी। इसके बावजूद उसे यह प्रीपरेटरी कोर्स लेने के लिए मजबूर किया गया और एक साल बाद उसे फेल घोषित कर संस्थान से निकाल दिया गया। एक प्रतिभाशाली छात्रा के साथ हुए इस अन्याय के खिलाफ राष्ट्रीय अनुसूचित जाति आयोग भी सक्रिय हुआ और राज्य के तत्कालीन अनुसूचित जाति/जनजाति के मंत्री ने भी कोशिश की, लेकिन उसे वापस नहीं लिया गया। यह अकारण नहीं था कि तमिलनाडु के सामाजिक कार्यकर्ताओं ने मांग की थी कि आइआइटी चेन्नई अनुसूचित जाति-जनजाति की स्थिति पर एक श्वेतपत्र जारी करे। स्पष्ट है कि तमाम कोशिशों के बावजूद यह श्वेत पत्र जारी नहीं हुआ। तंत्र की खामोशी जातिगत भेदभाव और उत्पीड़न की शिकायतों के मामले में आइआइटी चेन्नई ही नहीं, सभी आइआइटी में एक जैसी ही स्थितियां हैं। और यह भेदभाव अध्यापक-कर्मचारी पदों पर संविधान प्रदत्त आरक्षण की अवहेलना करने से लेकर आए दिन उनके साथ होने वाली प्रत्यक्ष-परोक्ष उत्पीड़न की घटनाओं से संबंधित है। पिछले दिनों आइआइटी मुंबई में भी दलित छात्रों ने उनके साथ किए जा रहे दुर्व्यवहार को लेकर विरोध दर्ज किया था। विडंबना यही कही जाएगी कि इन तबकों से आने वाले छात्रों को संविधान प्रदत्त आरक्षण प्रदान करने से वंचित करने से लेकर कर्मचारी तथा अध्यापक समुदाय में भी आरक्षित तबके से आने वाले लोगों को कम से कम रखने के बावजूद इन अग्रणी संस्थानों के खिलाफ कोई कार्रवाई नहीं होती। कुछ समय पहले सुप्रीम कोर्ट ने आइआइटी दिल्ली के प्रशासन को यह निर्देश दिया कि वह कमजोर प्रदर्शन के नाम पर अनुसूचित जाति और जनजाति के विद्यार्थियों को संस्थान से निष्कासित नहीं कर सकती। देश की शीर्ष अदालत का साफ कहना था कि जो छात्र-छात्राएं एक लंबी प्रवेश प्रक्रिया से संस्थान में दाखिला ले सके हैं, उनके बारे में आनन-फानन फैसला लेकर उन्हें बाहर करना प्राकृतिक न्याय के सिद्धांत के खिलाफ है। दरअसल, सर्वोच्च न्यायालय अविनाश बागड़ी और अनुसूचित श्रेणी के पांच अन्य छात्रों द्वारा दायर उस याचिका पर विचार कर रहा था, जिसके अंतर्गत याचिकाकर्ताओं ने कहा था कि किस तरह कमजोर प्रदर्शन के नाम पर आइआइटी प्रशासन अनुसूचित श्रेणी के छात्रों को आगे की पढ़ाई करने से रोकता है। इसमें यह भी बताया गया कि प्रशासन की लापरवाही के चलते आरक्षण की व्यवस्था बेकार हो चली है, क्योंकि अपनी पढ़ाई पूरी करने के लिए न अनुसूचित श्रेणी के छात्रों को बेहतर अवरचना प्रदान की गई, न विशेष कोचिंग का इंतजाम किया गया, जिसका नतीजा था कि अनुसूचित श्रेणी के 90 फीसद छात्र या तो प्रथम वर्ष या द्वितीय वर्ष में फेल हो गए और संस्थान के बाहर हो गए या उन्हें निष्कासित किया गया। क्या ऐसी तमाम घटनाओं को मानवीय भूल कहा जा सकता है? निश्चित ही नहीं। दरअसल, यह एक सचेत कोशिश प्रतीत होती है ताकि इन तबकों से आने वाले लोगों को इन अहम अवसरों से वंचित किया जाए। सवाल उठता है कि द्रोणाचार्य का महिमामंडन करने वाले समाज में एकलव्यों को कब तक अपनी परीक्षा देती रहनी पड़ेगी? (लेखक स्वतंत्र टिप्पणीकार हैं)
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