यह हमारे ही देश में संभव है कि शिक्षा में बुनियादी सुधारों की बजाय आरक्षण को हथियार बनाकर उसके दोहन के प्रयास किए जाते हैं। मानव संसाधन विकास मंत्री कपिल सिब्बल प्राथमिक शिक्षा से लेकर उच्च शिक्षा तक बदलाव में जो उत्साह दिखा रहे हैं, उनकी पृष्ठभूमि में शिक्षा में गुणवत्ता की दृष्टि से सुधार लाना कम, शिक्षा का अंग्रेजीकरण और शिक्षा को निजी शिक्षा केंद्रों के टापुओं में बदलने की कवायद ज्यादा है। जबकि हमारे उद्देश्य ये होने चाहिए कि शिक्षा क्षेत्र से एक तो असमानता दूर हो, दूसरे वह केवल पूंजी से हासिल करने का आधार न रह जाए। इस नजरिये से आइआइटी परिषद ने आइआइटी में प्रवेश का जो पैमाना तय किया है, उसे सहमति से स्वीकार लेना चाहिए। परिषद के निर्णय के अनुसार छात्रों की योग्यता का मापदंड परीक्षा से उत्तीर्ण हुए शीर्ष 20 फीसद छात्रों को आइआइटी में प्रवेश के काबिल माना जाएगा। इससे एक तो अंग्रेजी और हिंदी दोनों ही माध्यमों से पास होने वाले छात्रों को प्रवेश मिलेगा। दूसरे ग्रामीण अंचलों में सरकारी पाठशाओं में पढ़ रहे छात्रों को भी सीधे आइआइटी में सरलता से प्रवेश कर लेने की सुविधा हासिल होगी। यह पैमाना आरक्षण और जातीय मसले से छुटकारे का कालांतर में एक उत्तम उपाय सबित हो सकता है। यह हल आइआइटी चेन्नई के संचालक मंडल के अध्यक्ष एएन शर्मा के सुझाव पर सर्वसम्मति से निकाला गया है। इस समझौते के मुताबिक 2013 में आइआइटी में दाखिला बोर्ड परीक्षा में प्राप्त प्राप्तांकों या रैंक के आधार पर होगा। साथ ही यह शर्त भी लागू होगी कि चयनित छात्र अपने राज्य या केंद्रीय बोर्ड के शीर्ष 20 फीसद छात्रों में ंसे हों। इससे पहले मानव संसाधन विकास मंत्रालय द्वारा जिस साझा प्रवेश परीक्षा का प्रस्ताव रखा था, उसे आइआइटी दिल्ली और कानपुर के संचालक मंडलों ने प्रस्ताव लाकर निरस्त कर दिया। बोर्ड परीक्षा में शीर्ष 20 फीसद आने वाले छात्रों को आइआइटी की एक और परीक्षा से गुजरना होगा। इस एडवांस परीक्षा में केवल शीर्ष डेढ़ लाख सफल छात्रों को परीक्षा देने की इजाजत दी जाएगी। इस फैसले से अब अलग-अलग आइआइटी के लिए अलग-अलग प्रवेश परीक्षा आयोजित करने की जरूरत नहीं रह जाएगी। छात्रों को भी अलग-अलग आइआइटी के प्रवेश-पत्र भरने और फिर अलग-अलग स्थानों पर परीक्षा देने जाने के झंझट से मुक्ति मिलेगी। चूंकि इस पैमाने में सभी राज्यों के और केंद्रीय मंडलों के शीर्ष 20 फीसदी छात्रों को मुख्य परीक्षा में बैठने का अवसर मिलेगा, जाहिर है इससे सरकारी शिक्षा संस्थानों में पढ़कर आने वाले छात्रों को भी आइआइटी में प्रवेश का स्वर्णिम मौका हाथ लगेगा। वर्तमान परिदृश्य में सरकारी स्कूलों में पढ़ने वाले ज्यादातर छात्र मध्यम और निम्न आय वर्ग से तो हैं ही, पिछड़ी और अनुसूचित व अनुसूचित जनजाति के छात्रों की संख्या भी इन्हीं स्कूलों में ज्यादा है। आइआइटी में प्रवेश के इस नए आधार पर जब परिणाम की अंतिम सूची जारी होगी तो विश्वास है कि हम पाएंगे कि आरक्षित वर्ग के छात्रों की संख्या आरक्षण के तय प्रावधानों से कहीं अधिक होगी। यदि ऐसा होता है तो यह पैमाना आरक्षण मुक्त समान शिक्षा की दिशा में एक ऐतिहासिक कदम होगा? हालांकि केंद्र सरकार जिस एकतरफा सोच के चलते शिक्षा में निजी क्षेत्र की भागीदारी और प्रतिस्पर्धा परीक्षाओं को कोचिंग-कक्षाओं से जोड़कर पूंजी आधारित प्रतिभा-विकास को प्रोत्साहित कर रही है, उस पर भी अंकुश लगाने की जरूरत है। क्योंकि यह सुविधा सिर्फ वे छात्र हासिल कर पा रहे हैं, जो जाति, पद और पूंजी के आधार पर आभिजात्य श्रेणी में आ गए हैं। निजी विद्यालय इस कुरीति को प्रोत्साहित कर शिक्षा को जबरदस्त मुनाफे का बाजार बनाने में लगे हैं। दोहरी पढ़ाई करने वाले ऐसे छात्रों को यदि प्रतिस्पर्धा परीक्षाओं से रोक दिया जाए तो अभावग्रस्त छात्रों का दाखिला इंजीनियरिंग और मेडिकल कॉलेजों में एकाएक बढ़ जाएगा। आरक्षण मुक्त शिक्षा में समानता की दृष्टि से यह भी एक अच्छी पहल होगी। आरक्षण को बढ़ावा देना ही है तो अब कोशिश यह होनी चाहिए कि सरकारी स्कूलों में पढ़ने वाले छात्रों को प्रतिस्पर्धा परीक्षाओं में प्रात्रता हासिल करने के लिए आरक्षण दिया जाए। इस उपाय से वंचित और आर्थिक रूप से अभावग्रस्त तबके को महत्व तो मिलेगा ही, देश की हिंदी समेत सभी राजभाषाओं के महत्व को अंगीकार भी कर लेने का सिलसिला शुरू हो सकता है। (लेखक स्वतंत्र टिप्पणीकार हैं)
No comments:
Post a Comment