Thursday, July 12, 2012

रचना का आधार भगवान या विज्ञान!



मजे की बात यह कि विवादों का यह खेल विज्ञान नहीं, बल्कि मीडिया के आंगन में खेला जा रहा है और यह बखेड़ा सिर्फ इसलिए कि व्यावसायिक मजबूरियों के चलते एक प्रकाशक ने इन पहेलीनुमा कणों को गॉड पार्टिकलका नाम दे दिया। सन् 1993 में नोबेल पुरस्कार विजेता भौतिक विज्ञानी लियोन लेडरमैन ने ब्रह्मांड के जन्म की गुत्थी पर एक किताब लिखी। इसके शीषर्क में इन कणों पिछले हफ्ते जब से तथाकथित गॉड पार्टिकलकी खोज की घोषणा हुई है, ‘विज्ञान बनाम भगवानकी बहस तेज हो गई है। को गॉडडैम पार्टिकलके नाम से पुकारा गया था। संपादक को यह यह नाम कुछ ज्यादा नहीं जंचा, इसलिए उसने इन्हें गॉड पार्टिकलका नाम दे दिया। नतीजा सबके सामने है, किताब भी खूब लोकप्रिय हुई और यह सनसनीखेज नाम भी। लेकिन वैज्ञानिक हमेशा इस नाम से परहेज करते रहे और आज भी कर रहे हैं। वैज्ञानिक हलकों में इन अबूझ कणों को हिग्स कणया हिग्स-बोसोन कण
कहा जाता है और यही सही भी है। दरअसल इन कणों की पहेली सीधे ब्रह्मांड के जन्म और इसके मौजूदा स्वरूप को लेकर है। ब्रह्मांड की उत्पत्ति लगभग साढ़े तेरह अरब वर्ष पूर्व शून्य में हुए एक महाविस्फोट से मानी जाती है जो बिग-बैंगके नाम से प्रसिद्ध है। पिन की घुंडी जैसे सूक्ष्म आकार में समायी अनंत सघनता से शुरू हुए इस विस्फोट ने चंद सेकंड्स के भीतर हमारे सूरज से भी दो हजार गुना बड़ा आकार धारण कर लिया। इस अति गर्म स्वरूप में सृष्टि के कुछ प्रारंभिक कण विचर रहे थे। लगभग पांच लाख वर्ष बाद इसका मिजाज थोड़ा ठंडा हुआ तो इलेक्ट्रॉन, प्रोटॉन और न्यूट्रॉन जैसे प्रारंभिक कणों ने मिलकर ब्रह्मांड के पहले अणुओं हाइड्रोजन और हीलियम की रचना की। फिर ब्रह्मांड आकार लेने लगा जिसके परिणामस्वरूप गैलेक्सी, सौर-मंडल, तारे-सितारे और ढेर सारे अन्य ब्रह्मांडीय पिंडों की रचना हुई। इतना कुछ जानने के बाद एक सवाल यह भी खड़ा हो गया कि ब्रह्मांड का संचालन कैसे हो रहा है। इसके सबसे पुख्ता जबाब को ब्रह्मांड का स्टैंर्डड मॉडलकहा जाता है। इसके अनुसार ब्रह्मांड की रचना बारह बुनियादी कणों से हुई है जो सृष्टि के चर-अचर, चेतन-अचेतन सभी पदाथरें में मौजूद हैं। साथ ही इस सृष्टि का संचालन चार बल करते हैं, जो हमें दिखाई नहीं देते, पर जिनका असर स्पष्ट रूप से अनुभव किया जा सकता है। गुरुत्वाकषर्ण ऐसा ही एक अहम बल है। बुनियादी कणों की बात करें तो ये वो कण हैं जो परमाणु से भी छोटे होते हैं या कह सकते हैं कि परमाणु के टूटने से ये कण अस्तित्व में आते हैं जैसे इलैक्ट्रॉन, प्रोटॉन और न्यूट्रॉन आदि। ये कण सृष्टि के हर पदार्थ में मौजूद हैं। स्टैंर्डड मॉडल का जब गहराई से अध्ययन किया गया तो इसमें एक कमी दिखी। कुछ बुनियादी कणों में मास यानी द्रव्यमान या वजन मौजूद होता है जबकि कुछ में नहीं। उदाहरण के तौर पर रोशनी की सबसे छोटी इकाई फोटॉन द्रव्यमान के मामले में शून्य है, लेकिन प्रत्येक परमाणु का अभिन्न घटक प्रोटॉन द्रव्यमान का पुलिंदा है। बुनियादी कणों के बीच यह फर्क कैसे आया? स्टैंर्डड मॉडल इस सवाल का जबाब नहीं दे पा रहा था। सन् 1964 में ब्रिटेन के वैज्ञानिक पीटर हिग्स और उनके सहयोगियों ने एक ऐसे कण की परिकल्पना की जो अपने गिर्द एक शक्तिशाली बल-क्षेत्र या फील्ड का निर्माण करता है। जब भी कोई बुनियादी कण इस फील्ड से गुजरता है तो वह इससे द्रव्यमान ग्रहण कर आकार प्राप्त कर लेता है। वैज्ञानिक कहते हैं कि सारी सृष्टि इसी तरह बनी है और हिग्स कण पूरी सृष्टि में व्याप्त हैं। कुछ ऐसी ही परिकल्पना आइंस्टीन और भारतीय वैज्ञानिक सत्येन्द्रनाथ बोस ने भी की थी। इसलिए द्रव्यमान प्रदान करने वाले इन कणों को हिग्स-बोसोन कण भी कहा जाता है। भौतिक विज्ञान में परिकल्पना करना अलग बात है और उस परिकल्पना को प्रयोगों के आधार पर प्रमाणित कर देना अलग बात। लेकिन अगर चाह है तो राह निकल ही आती है। यूरोपियन ऑर्गनाइजेशन फॉर न्यूक्लियर रिसर्च (सीईआरएन) के तहत दुनिया के लगभग 3000 वैज्ञानिकों ने जेनेवा में धरती के भीतर 300 फुट लंबी सुरंग बनाकर एक महाप्रयोग किया जिसमें बेहद उच्च ऊर्जा वाले प्रोटॉनों की टक्कर से इन कणों की मौजूदगी का संकेत मिला। इसके लिए दस अरब डॉलर की लागत से लार्ज हैड्रॉन कोलाइडर नामक विशाल मशीन बनाई गई जो उच्च ऊर्जा के प्रहार को अपने तक सीमित रखने में समर्थ थी। कुछ लोगों को शक था कि मशीन इतनी अधिक ऊर्जा को नहीं सह पाएगी और दुनिया में पल्रय जैसी घटना घट सकती है, परन्तु ऐसा कुछ नहीं हुआ। इस महामशीन में प्रोटॉन्स को प्रकाश के वेग से दौड़ाकर आपस में टकराया गया। इससे उत्पन्न ऊर्जा के विश्लेषण से हिग्स-बोसोन कण की मौजूदगी का संकेत मिला। दरअसल विश्लेषण के दौरान ऊर्जा की जो उछाल दिखाई दे रही है वह हिग्स-बोसोन कण की खूबियों से मिलती-जुलती है, इसलिए इसे अभी केवल एक संकेत माना जा रहा है, ना कि इन कणों की मौजूदगी की पुष्टि। माना जा रहा है कि ये कण पूरी सृष्टि में हर जगह हर तरफ बिखरे हुए हैं और इनकी वजह से ही अन्य कणों को आकार मिल रहा है। यदि हिग्स-बोसोन कण न होते तो सभी बुनियादी कण प्रकाश के वेग से लगातार भागते रहते। उनमें न ठहराव होता और न द्रव्यमान। यानी सृष्टि की रचना ही न हुई होती। अपनी इसी खूबी के कारण इन कणों को ईर के समकक्ष या ईर जैसा मानने की सोच उत्पन्न हुई और इन कणों की खोज को भगवान की तलाश पूरी होने जैसी घटना मान लिया गया। जबकि विज्ञान की नजर में यह ठोस भौतिक विज्ञानी खोज है जो सृष्टि की उत्पत्ति व संचालन समझने की दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम है। ब्रह्मांड की उत्पत्ति को लेकर समाज का एक वर्ग इसे दैवी या ईरीय शक्ति की महिमा बताकर वैज्ञानिक खोजों को निर्थक साबित करने की कोशिश करता है। अनेक धर्मो में सृष्टि की रचना का श्रेय एक महाशक्ति को दिया जाता है जो इसे संचालित भी करती है। धर्म और विज्ञान के बीच का यह अंर्तद्वंद्व आदिकाल से चला आ रहा है परन्तु आज विज्ञान अधिक मजबूती के साथ ऐसी मान्यताओं को मानने से इनकार कर रहा है। दुनिया के जाने-माने भौतिक विज्ञानी स्टीफेन हॉकिंग ने 2010 में प्रकाशित अपनी पुस्तक द ग्रैंड डिजाइनमें माना है कि ब्रह्मांड की रचना किसी एक शक्ति द्वारा नहीं हुई है। उन्होंने बताया कि विभिन्न पदाथरें का व्यवहार और गुण भौतिक विज्ञान की शाखा क्वांटम मैकेनिक्ससे संचालित होते हैं, जबकि ब्रह्मांड और सृष्टि के पिंड गुरुत्वाकषर्ण से बंधे हैं और सापेक्षता के नियमों के तहत गति करते हैं। हॉकिंग ने यह भी बताया कि ब्रह्मांड अनंत है और अरबों ब्रह्मांड नियमों के अनुसार अपनी-अपनी गति और विकास की राह पर चल रहे हैं। ऐसे में ब्रह्मांड की उत्पत्ति को भौतिक विज्ञान का डिजाइन मानना उचित होगा, किसी दैवी शक्ति का नहीं। यह भी कहा जाता है कि वह कौन-सा कारण है जिससे केवल पृथ्वी पर ही जीवन की उत्पत्ति हुई। यदि पृथ्वी थोड़ा-सा सूरज की ओर खिसक जाती तो यहां इतना ज्यादा तापमान होता कि जीवन नहीं पनप पाता। इसी तरह यदि यह सूरज से थोड़ा दूर हट जाती तो भी कम तापमान के कारण जीवन उद्भव या विकास नहीं हो पाता। सही तापमान और रसायनों की मौजूदगी के कारण ही यहां डीएनए बना, जिससे जीवन की उत्पत्ति मुमकिन हुई। प्रतिष्ठित भौतिक विज्ञानी मार्टिन रीस ने छह बुनियादी बलों को सृष्टि का सूत्रधार माना है। उनके मुताबिक यदि इनमें कोई बदलाव होता तो आज हम इस सृष्टि में मौजूद नहीं होते। प्रसिद्ध विज्ञान लेखक र्रिचड डॉकिंस ने अपनी किताब द गॉड डिल्यूजनमें अनेक ऐसे वैज्ञानिक साक्ष्य प्रस्तुत किए हैं जो विज्ञान को सृष्टि का रचयिता मानते हैं। वैज्ञानिक कहते है कि हिग्स-बोसोन कण की खोज अंतिम सच्चाई नहीं है। अभी सृष्टि के अनेक रहस्यों से पर्दा उठना बाकी है और इस कोशिश में हिग्स-बोसोन कण बहुत काम आएंगे। बिग-बैंग के बाद से ब्रह्मांड लगातार फैल रहा है। इसके साथ पदार्थ यानी मैटर का बिखराव भी हो रहा है। परन्तु, हिसाब लगाने पर पता चलता है कि बहुत मैटर गायब है या कहें दिख नहीं रहा है। इसे वैज्ञानिक डार्क मैटर कहते हैं जिसके बारे में बहुत कुछ जानना बाकी है। इसी तरह पदार्थ के उलट व्यवहार करने वाले एंटी-मैटर की तलाश भी जारी है। कहत हैं डार्क मैटर की तरह ब्रह्मांड में डार्क एनर्जी भी है जिसके बारे में ज्यादा पता नहीं है। सुपर सिमिट्री के नाम से मशहूर सिद्धांत कहता है कि ब्रह्मांड के हर कण का एक जोड़ीदार है जो द्रव्यमान में इससे भारी है। इसका पता लगाना भी एक चुनौती है। दूसरी ओर हिग्स- बोसोन कण के व्यावहारिक उपयोगों को तलाशने की कवायद भी शुरू हो गई है। कुल मिलाकर हिग्स-बोसोन कणों की खोज ब्रह्मांड को समझने की ओर बड़ा कदम है, परन्तु यह विशुद्ध विज्ञान है, भगवान से इसका कोई लेना-देना नहीं।

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