दिशाहीन का कोई भविष्य नहीं। सही दिशा में गति प्रगति है और गलत दिशा में गति दुर्गति। कांग्रेस दिशाहीन हो गई है। यह बात कांग्रेस के ही वरिष्ठ नेता और केंद्रीय मंत्री सलमान खुर्शीद ने स्वाभाविक रूप में कही है। उन्होंने कांग्रेस के लिए नई विचारधारा की जरूरत भी बताई है। हालांकि हाईकमान के दबाव में उन्होंने अपने वक्तव्य की नई व्याख्या भी की है, पर नली से निकली गोली और जबान से निकली बोली वापस नहीं होती। खुर्शीद के मूल बयान और बाद के स्पष्टीकरण का सारांश एक जैसा है। वह राहुल गांधी से जिम्मेदारी संभालने की अपील कर रहे हैं। कांग्रेस और सरकार में जिम्मेदारी लेने वाले नेतृत्व का अभाव है। प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह सरकार के मुखिया हैं। संविधान के अनुसार सरकार के सारे अच्छे-बुरे नतीजों की जिम्मेदारी उनकी ही है, पर डॉ. सिंह वास्तविक प्राधिकार से वंचित हैं। सत्ता संचालन का मुख्य केंद्र सोनिया गांधी हैं। वह जो कहती हैं, मनमोहन सिंह वही करते हैं, वही दोहरा देते हैं। सोनिया शासन करती हैं, जिम्मेदारी नहीं लेतीं। मनमोहन सिंह वास्तविक शासक नहीं हैं तो भी तमाम आलोचनाओं के शिकार होते हैं। कांग्रेस राजनीतिक दल की तरह नहीं चलती। सरकार और उसके मुखिया व्यावहारिक सत्ता संचालन नहीं करते। दोनों दिशाहीन हैं। खुर्शीद की जुबान नहीं फिसली। उनके मुंह से सच्चाई ही निकली है। खुर्शीद ने कोई नया रहस्योद्घाटन नहीं किया। केंद्र सरकार सभी मोर्चो पर असफल हुई है। भारत के प्रतिष्ठित समाचार माध्यमों द्वारा भी केंद्र और कांग्रेसी नेतृत्व वाले सत्तारूढ़ संप्रग पर तमाम टिप्पणियां की गई हैं। विपक्ष ने भी संसद से सड़क तक केंद्र और कांग्रेस को दिशाहीन बताया है, लेकिन अमेरिकी पत्रिका टाइम के आकलन से हड़कंप मचा है। हम भारत के लोग विदेशी आवाज पर ज्यादा ध्यान देते हैं और स्वदेशी की उपेक्षा करते हैं। कांग्रेसी दिशाहीनता और विचारहीनता के चलते ही संप्रग बेमेल अवसरवादी जमावड़ा है। कांग्रेस अपने सत्ता साझीदार तृणमूल कांग्रेस को भी साथ नहीं रख पाती। वह सरकारी प्रलोभनों और बेजा दबावों के जरिये सपा, बसपा जैसे कट्टर विरोधियों को साधकर संसदीय बहुमत का गणित ठीक रखती है। आर्थिक विकास दर 9 प्रतिशत से घटकर 5 प्रतिशत हो गई है। औद्योगिक विकास दर घटी है। रुपये का अवमूल्यन लगातार जारी है। भ्रष्टाचार संस्थागत हुआ है। कांग्रेस व केंद्र की कोई कश्मीर नीति नहीं है। केंद्र द्वारा मनोनीत वार्ताकारों ने अलगाववादी रिपोर्ट बनाई है। आतंकवाद से लड़ने के प्रश्न पर भी कांग्रेस व केंद्र दिशाहीन हैं। यहां कड़े आतंकवाद निरोधक कानून का अभाव है। यही स्थिति माओवादी हिंसा की भी है। भारत विश्व का सबसे बड़ा जनतंत्र है। कांग्रेस इस देश की सबसे पुरानी पार्टी है। यही सत्तारूढ़ गठबंधन का नेतृत्व कर रही है। कांग्रेस का दिशाहीन और विचारहीन होना खतरनाक है। कांग्रेस पार्टी नहीं सोनिया गांधी की प्रापर्टी की तरह शेष बची है। सोनिया गांधी ही इसकी वर्तमान हैं और राहुल गांधी इसके भविष्य। यही दोनों कांग्रेस के स्वामी हैं। राजनीतिक दल विचार से चलते हैं। जनोन्मुखी दिशा में गतिशील हों तो लोकप्रिय होते हैं। कांग्रेस के पास कोई राष्ट्रीय नेता नहीं। न संगठन में और न सरकार में। प्रधानमंत्री भी जननेता नहीं हैं। वह अपनी निष्ठा के चलते ही दोबारा प्रधानमंत्री हैं। उन्हें कामकाजी प्रधानमंत्री होने का अवसर भी नहीं मिला। उनके पास पद है, पर प्राधिकार नहीं। वह मंत्रिपरिषद गठन के अधिकार से लैस हैं, लेकिन यह काम सोनिया गांधी करती हैं। वह सरकारी रिकॉर्ड में केंद्र सरकार के नीति नियंता हैं, लेकिन नीति निर्माण में उनका कोई हाथ नहीं। राहुल गांधी भी संगठनकर्ता या अनुभवी राजनेता नहीं हैं। वह सोनिया के पुत्र होने के कारण कांग्रेस में नंबर दो हैं। प्रधानमंत्री ने भी उन्हें प्रधानमंत्री पद का सुयोग्य दावेदार बताया था। खुर्शीद ने भी राहुल से आगे आने की अपील की है। कांग्रेसजन अपने भविष्य को लेकर चिंतित हैं। सोनिया गांधी और उनकी कांग्रेस ने नया इतिहास बनाया है। अब तक के सारे प्रधानमंत्री जननेता या राजनीतिक गठबंधनों की उपज थे। सोनिया ने देश को मनोनीत प्रधानमंत्री दिया है। मनमोहन सिंह ने भी नया इतिहास गढ़ा है। वह प्रख्यात अर्थशास्त्री हैं, लेकिन आर्थिक विकास दर, औद्योगिक विकास दर और रुपये के अवमूल्यन जैसे आर्थिक हादसे उन्हीं के राज में घटे। महंगाई पंख फैलाकर उड़ी, वह बस देखते रहे। सिंगापुर के प्रधानमंत्री ने फिक्की एसोचैम व सीआइआइ की बैठक में निवेश नीति की आलोचना की है। प्रधानमंत्री जो चाहते थे, नहीं कर पाए। वह जो नहीं चाहते थे, रोज वही करते रहे, कर रहे हैं। नेहरू, इंदिरा गांधी और अटल बिहारी वाजपेयी इसी पद पर रहकर प्रतिष्ठित हुए। इंदिरा गांधी ने 1971 में पाकिस्तानी सेना के लगभग 90 हजार सैनिकों से हथियार डलवाए, पाकिस्तान का इतिहास और भूगोल बदल गया। वाजपेयी ने परमाणु विस्फोट किया। आर्थिक प्रतिबंध लगे, लेकिन वह नहीं झुके। अब चीन आंख दिखा रहा है, पाकिस्तान प्रायोजित आतंकी भीतर तक घुस आए हैं। वह कभी उचित प्रतिकार नहीं कर पाए। वरिष्ठ कांग्रेसजन भी उन्हें महत्व नहीं देते। सब जानते हैं कि वह सत्ता के असली चेहरे नहीं, बल्कि मनोनीत मोहरे हैं। दलों के गठन में विचार की केंद्रीय भूमिका होती है। नेता या दल प्रबंधक विचार का विकल्प नहीं होते। विचार का विकल्प दूसरा विचार ही हो सकता है। राष्ट्रवाद पुष्ट विचार है। स्वाधीनता पूर्व की कांग्रेस भी राष्ट्रवादी थी, लेकिन अब विचारहीन है। वह अमेरिकी पूंजीवादी नीतियों के कारण दक्षिणपंथी है, लेकिन घोर सांप्रदायिक राजनीति केचलते अल्पसंख्यकवादी है। विचारविहीनता के चलते ही कांग्रेस में दिशाहीनता है। भाजपा और वामदल छोड़ अधिकांश दल विचारधारा को बेकार समझते हैं और दलों को प्राइवेट लिमिटेड कंपनी की तरह चलाते हैं। कांग्रेस ऐसे ही व्यक्तिवादी दलों की सूची में पहले स्थान पर है। सीताराम केसरी को हटाकर सोनिया गांधी का अध्यक्ष बनने का ढंग इतिहास का एक दुखद अध्याय है। फिर कांग्रेस का राष्ट्रवादी चरित्र खत्म हो गया। पहले की कांग्रेस राष्ट्रवादी विचारधारा की संगम थी। आज विचारहीनता का आलम यह है कि कांग्रेस मुस्लिम लीग से बढ़कर सांप्रदायिक है। दिशाहीनता का आलम यह है कि कांग्रेसजन अवसरवादी राजनीति के मेले में खो गए बच्चों जैसे अनाथ हैं। सोनिया गांधी जिम्मेदारी लेती नहीं। जो शुभ है उसका श्रेय सोनिया और राहुल को जाता है और पापकर्मो की जिम्मेदारी प्रधानमंत्री या उनकी सरकार की, लेकिन सारा देश और अब अंतरराष्ट्रीय समुदाय भी बोल रहा है कि सोनिया ही सत्ता संचालक हैं। वह ही दिशाहीनता और विचारहीनता का केंद्र हैं। खुर्शीद ने गलत क्या कहा है? (लेखक उ.प्र. विधानपरिषद के सदस्य हैं) 1ी2श्चश्रल्ल2ी@Aंॠ1ंल्ल.Yश्रे
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