पिछले दिनों एक जनहित याचिका के संबंध में सुनवाई करते हुए सर्वोच्च न्यायालय ने इस बात पर चिंता व्यक्त की है कि दुनिया की महाशक्ति बन रहे भारत जैसे देश में यह एक विडंबना है कि अब भी देश के कई हिस्सों में भुखमरी से मौतें हो रही हैं। सर्वोच्च न्यायालय ने यह सवाल खड़ा किया है कि देश में दो भारत कैसे हो सकते हैं- एक भुखमरी से त्रस्त और दूसरा अमीरी में मस्त। देश में गरीबी के आंकड़ों के बारे में लगातार भिन्न-भिन्न आंकड़े सरकार द्वारा प्रस्तुत किए जाते हैं। ऐसे में समझ ही नहीं आता कि भारत में कितने लोग गरीब हैं। समय-समय पर गरीबी की रेखा की बदलती परिभाषाएं इस विषय को और अधिक उलझा देती हैं। स्वाभाविक है कि सर्वमान्य आंकड़ों के अभाव में गरीबी उन्मूलन के उपाय सार्थक नहीं हो सकते। पूर्व में सरकार द्वारा गरीबी उन्मूलन के विभिन्न उपाय अपनाए जाते रहे हैं। सार्वजनिक वितरण प्रणाली के जरिए सस्ता अनाज एवं अन्य खाद्य पदार्थ व केरोसिन उपलब्ध कराया जाना, ग्रामीण और शहरी रोजगार कार्यक्रम, मुफ्त स्वास्थ्य सुविधाएं आदि इस दिशा में कुछ प्रमुख सरकारी कार्यक्रम रहे हैं। सरकार द्वारा खाद्य सुरक्षा कानून बनाने की बात भी की जा रही है, जिसके अनुसार गरीबी रेखा से नीचे रहने वाले सभी लोगों को आवश्यक खाद्यान्न उपलब्ध कराने का प्रावधान होगा। सर्वोच्च न्यायालय ने योजना आयोग के उपाध्यक्ष मोंटेक सिंह अहलूवालिया से यह प्रश्न पूछा है कि योजना आयोग किस प्रकार से आज गरीबी की रेखा से नीचे रहने वाले लोगों को कुल जनसंख्या का मात्र 36 प्रतिशत ही मानता है। ध्यान देने वाली बात है कि कुछ समय पहले योजना आयोग द्वारा प्रो. सुरेश तेंदुलकर की अध्यक्षता में एक विशेषज्ञ समिति का गठन भी किया गया था, जिसने गरीबी के मापन हेतु एक अलग परिभाषा सुझाई थी, जिसके आधार पर गरीबी की रेखा को पुन: परिभाषित भी किया गया। तेंदुलकर रिपोर्ट से पहले तो सरकार यह कह रही थी कि देश में 2004-05 में केवल 28 प्रतिशत लोग ही गरीब थे और उनका यह प्रतिशत 2007 तक घटकर मात्र 20 प्रतिशत ही रह गया। प्रो. तेंदुलकर ने गरीबी की जो नई परिभाषा सुझाई (जिसे भारत सरकार ने स्वीकार भी किया), उसमें उन्होंने गरीबी का आकलन करते हुए शिक्षा और स्वास्थ्य पर आवश्यक खर्च को शामिल किया है, लेकिन प्रो. तेंदुलकर की परिभाषा के अनुसार भी गरीबी की रेखा से नीचे रहने वाले लोगों की जांच करने का जो तरीका बनाया गया, उसके अनुसार भी जिस व्यक्ति की मासिक आय ग्रामीण क्षेत्र में 446.68 रुपये और शहरी क्षेत्र में 578.8 रुपये से अधिक है, वह गरीबी की रेखा से ऊपर माना गया। सर्वोच्च न्यायालय के समक्ष योजना आयोग ने ये आंकड़े प्रस्तुत किए हैं। यदि इसके इतिहास में जाएं तो देखते हैं कि सैद्धांतिक रूप में ग्रामीण क्षेत्र में उन लोगों को गरीबी की रेखा से नीचे माना जाता था, जिनका कैलोरी उपभोग 2400 कैलोरी से कम और शहरी क्षेत्र में 2100 कैलोरी से कम होता था। उसके अनुसार आवश्यक उपभोग को आधार बनाकर गरीबी की रेखा से नीचे रहने वालों की संख्या का आकलन होता था। इसके आधार पर योजना आयोग के आंकड़ों के अनुसार, 1973-74 में 56 प्रतिशत लोग गरीबी की रेखा से नीचे रहते थे। 1973-74 तक आवश्यक खर्च के आंकड़े सही रूप से लागू किए गए और इस प्रकार गरीबी का आकलन भी ठीक होता था, लेकिन 1993-94 और 1990-2000 में इस संबंध में सरकार द्वारा प्रयुक्त उपभोक्ता खर्च के आंकड़े काफी कम दिखाए गए। आलोचकों का कहना है कि सरकार द्वारा प्रयुक्त आंकड़ों के कारण गरीबी रातोंरात कम होती दिखाई दी। यदि सही आंकड़े प्रयुक्त किए जाएं तो 2400 कैलोरी से कम उपभोग करने वाले ग्रामीण क्षेत्र के लोगों की संख्या 80 प्रतिशत और शहरी क्षेत्र में 2100 से कम कैलोरी प्राप्त करने वालों की संख्या 50 प्रतिशत बैठती है यानी कहा जा सकता है कि सरकार द्वारा आंकड़ों की बाजीगरी के माध्यम से गरीबी की रेखा से नीचे रहने वालों की संख्या जान-बूझकर कम दिखाई जाती रही है। योजना आयोग की परिभाषा के अनुसार गरीबी का आकलन करें तो देखते हैं कि शहरी क्षेत्रों में प्रतिदिन 20 रुपये पाने वाले को भी सरकारी मापदंडों के अनुसार गरीब नहीं माना जाएगा। यहां सवाल यह उठता है कि जब दुनिया भर में गरीबी की जो परिभाषा इस्तेमाल की जाती हैं, उसके अनुसार न्यूनतम 1.25 अमेरिकी डॉलर से कम आमदनी वाले को गरीब माना जाएगा। रुपयों में यह राशि 58 रुपये बनती है। हालांकि यह राशि भी न्यूनतम गुजारे के लिए आवश्यक आमदनी से कहीं कम है, फिर भी इससे एक तिहाई आमदनी की परिभाषा वास्तव में हास्यास्पद ही मानी जाएगी। योजना आयोग की स्वयं की परिभाषा, जिसके अनुसार शहरी क्षेत्रों में जो 2100 कैलोरी का उपभोग न्यूनतम है, मात्र 19 रुपये में और ग्रामीण क्षेत्रों में 2400 कैलोरी मात्र 15 रुपये प्रतिदिन, यह कैसे संभव है? वास्तव में यह सरकार की संवेदनहीनता का भी परिचायक कहा जा सकता है, जिसके अनुसार गरीबी की रेखा की परिभाषा न्यूनतम जीवन लागत का भी प्रावधान नहीं कर पाती। कुछ समय पहले असंगठित क्षेत्र के लिए गठित अर्जुन सेन गुप्ता समिति द्वारा यह खुलासा किया गया था कि देश में 77 प्रतिशत से भी अधिक लोग प्रतिदिन 20 रुपये या उससे कम पर गुजर करते हैं। एक आदमी की न्यूनतम आवश्यकता भोजन, आवास और कपड़े की होती है। आसानी से समझ में आता है कि इतने कम में इन सभी जरूरतों की पूर्ति करना संभव नहीं होता यानी कह सकते हैं कि देश में 77 प्रतिशत से भी अधिक लोग अपनी मूलभूत आवश्यकताओं की पूर्ति भी नहीं कर पाते हैं। यदि हम अर्जुन सेन गुप्ता समिति की रपट मानें तो देश के तीन-चौथाई से भी अधिक लोग गरीब हैं। अगर सरकार द्वारा अंक गणितीय तरीके से मापी गई गरीबी देखें तो मात्र 36 प्रतिशत लोग ही देश में गरीब हैं। अब प्रश्न उठता है कि एक ही सरकार द्वारा गरीबी की रेखा से नीचे रहने वाले लोगों की संख्या में इतना भारी अंतर कैसे हो जाता है? एक ब्रिटिश शोध संस्था ने यह पाया है कि भारत में तीन वर्ष की आयु वर्ग के 3,000 बच्चे प्रतिदिन पोषक आहार की कमी के कारण दम तोड़ देते हैं। ये आंकड़े संयुक्त राष्ट्र के आंकड़ों के अनुसार ही हैं, जिसके अनुसार भारत में 22 करोड़ लोग भुखमरी के शिकार हैं। चूंकि केवल कैलोरी के आधार पर गरीबी की रेखा का आकलन किया जाता रहा है, वह भी पूरा सही नहीं है, इसलिए यह वास्तव में गरीबी की रेखा नहीं, बल्कि भुखमरी की रेखा है। वास्तव में एक व्यक्ति के जीवन में केवल भोजन ही नहीं, बल्कि स्वास्थ्य, शिक्षा, आवास सहित विविध प्रकार के खर्च करने पड़ते हैं। यदि इन सबका हिसाब जोड़ा जाए तो गरीबी की रेखा से नीचे रहने वालों की संख्या कहीं ज्यादा बैठेगी। यदि सरकार नेक-नीयत से खाद्य सुरक्षा अधिनियम लाना और लागू करना चाहती है तो उसे गरीबी की रेखा की अवधारणा को न्यायोचित बनाना होगा। (लेखक आर्थिक मामलों के जानकार हैं)
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