उत्तर प्रदेश के राजकीय संरक्षण गृहों में महज डेढ़ साल के भीतर 24 संवासियों की जान चली गयी। निस्संदेह ये आंकड़े चौंकाने वाले हैं। लगता यही है कि सूबे के संरक्षण गृह काल कोठरी बन गये हैं। हद यह है कि संरक्षण गृहों में इतनी मौतों के बाद भी कार्रवाई के नाम पर सिर्फ राजकीय बाल गृह लखनऊ के एक पर्यवेक्षक के खिलाफ विभागीय कार्रवाई की गई है। तीन मामलों की जांच शासन के सिपुर्द है और बाकी की मजिस्ट्रीयल जांच प्रस्तावित है। यह संवेदनहीनता का ही नतीजा है कि राजकीय बाल गृह (शिशु) लखनऊ में वर्ष 2010 में तीन जनवरी को आशीष और 12 जून को बेबी प्रिया तथा 22 नवंबर को एक विक्षिप्त संवासिनी की पुत्री अन्नू की मौत हो गई। राजकीय बाल गृह (शिशु) में आठ साल से कम उम्र के बालक-बालिका एक साथ रखे जाते हैं। संरक्षण गृहों में संवासिनियों और संवासियों का न तो बीमारी में इलाज होता है और न ही उनके साथ कोई हमदर्दी रहती है। हालांकि निदेशक महिला कल्याण बिहारी स्वरूप इन आरोपों को खारिज करते हुए कहते हैं, अक्सर यहां आने वाले गंभीर परिस्थितियों में ही आते हैं। उनके इलाज का बेहतर प्रबंध किया जाता है। बरेली की रोगग्रस्त संवासिनी आइनूप का इलाज लखनऊ मेडिकल कालेज तक कराया गया, पर उसकी जान नहीं बची। बेहतर इलाज का उदाहरण एक है, लेकिन बाल गृह इलाहाबाद में इस साल 14 फरवरी को अब्बास, 22 अप्रैल 2010 को कमला, 12 मार्च को सविता, 18 दिसंबर को रिंकी और इलाहाबाद के ही बालिका बाल गृह में 25 सितंबर को सरिता की मौत कुप्रबंधन बताने को काफी है। गौर करने वाली बात यह भी है कि अक्सर इन गृहों से संवासी-संवासिनियों के भागने की शिकायत आती है, जो अधिकारियों और कर्मचारियों के उत्पीड़न का शिकार होते हैं। अवकाश प्राप्त एडीजीपी डा. रामलाल राम कहते हैं कि हाथी के खाने और दिखाने के अलग-अलग दांत होते हैं। संरक्षण गृहों का भी हाल कुछ ऐसा ही है। व्यवस्था में खामियां हैं और वाकई वहां रहने वाले बालक-बालिकाओं के साथ अमानवीय व्यवहार होता है.
Wednesday, June 1, 2011
यूपी में कब्रगाह साबित हो रहे संरक्षण गृह
उत्तर प्रदेश के राजकीय संरक्षण गृहों में महज डेढ़ साल के भीतर 24 संवासियों की जान चली गयी। निस्संदेह ये आंकड़े चौंकाने वाले हैं। लगता यही है कि सूबे के संरक्षण गृह काल कोठरी बन गये हैं। हद यह है कि संरक्षण गृहों में इतनी मौतों के बाद भी कार्रवाई के नाम पर सिर्फ राजकीय बाल गृह लखनऊ के एक पर्यवेक्षक के खिलाफ विभागीय कार्रवाई की गई है। तीन मामलों की जांच शासन के सिपुर्द है और बाकी की मजिस्ट्रीयल जांच प्रस्तावित है। यह संवेदनहीनता का ही नतीजा है कि राजकीय बाल गृह (शिशु) लखनऊ में वर्ष 2010 में तीन जनवरी को आशीष और 12 जून को बेबी प्रिया तथा 22 नवंबर को एक विक्षिप्त संवासिनी की पुत्री अन्नू की मौत हो गई। राजकीय बाल गृह (शिशु) में आठ साल से कम उम्र के बालक-बालिका एक साथ रखे जाते हैं। संरक्षण गृहों में संवासिनियों और संवासियों का न तो बीमारी में इलाज होता है और न ही उनके साथ कोई हमदर्दी रहती है। हालांकि निदेशक महिला कल्याण बिहारी स्वरूप इन आरोपों को खारिज करते हुए कहते हैं, अक्सर यहां आने वाले गंभीर परिस्थितियों में ही आते हैं। उनके इलाज का बेहतर प्रबंध किया जाता है। बरेली की रोगग्रस्त संवासिनी आइनूप का इलाज लखनऊ मेडिकल कालेज तक कराया गया, पर उसकी जान नहीं बची। बेहतर इलाज का उदाहरण एक है, लेकिन बाल गृह इलाहाबाद में इस साल 14 फरवरी को अब्बास, 22 अप्रैल 2010 को कमला, 12 मार्च को सविता, 18 दिसंबर को रिंकी और इलाहाबाद के ही बालिका बाल गृह में 25 सितंबर को सरिता की मौत कुप्रबंधन बताने को काफी है। गौर करने वाली बात यह भी है कि अक्सर इन गृहों से संवासी-संवासिनियों के भागने की शिकायत आती है, जो अधिकारियों और कर्मचारियों के उत्पीड़न का शिकार होते हैं। अवकाश प्राप्त एडीजीपी डा. रामलाल राम कहते हैं कि हाथी के खाने और दिखाने के अलग-अलग दांत होते हैं। संरक्षण गृहों का भी हाल कुछ ऐसा ही है। व्यवस्था में खामियां हैं और वाकई वहां रहने वाले बालक-बालिकाओं के साथ अमानवीय व्यवहार होता है.
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