गंगा रक्षा की मांग को लेकर लंबे समय तक अनशन करने वाले संत स्वामी निगमानंद की जीवनलीला समाप्त हो गई। मात्र 34 वर्ष के निगमानंद 19 फरवरी से अनशन पर थे। वह मातृसदन से जुड़े थे। अनशन के 68 वें दिन 27 अप्रैल को उनकी तबीयत बिगड़ने पर प्रशासन ने उन्हें जिला अस्पताल में भर्ती कराया। स्थिति गंभीर होने पर उन्हें दो मई को हिमालयन इंस्टीटयूट जौलीग्रांट अस्पताल रेफर कर दिया गया। यह वही अस्पताल है जहां बाबा रामदेव भर्ती किए गए और उस दौरान देश भर का मीडिया उनकी सेहत का हाल जानने में जुटा रहा, लेकिन कोमा की हालत में जीवन-मृत्यु से जूझ रहे निगमानंद की किसी ने खबर नहीं ली और रविवार की रात उनकी मौत हो गई। इसके कुछ ही घंटे पहले बाबा रामदेव ने अपना अनशन तोड़ा था। स्वामी निगमानंद का अनशन न्यायालय के उस फैसले के खिलाफ था, जिसमें एक स्टोन क्रेशर की याचिका का संज्ञान लेते हुए खनन और क्रशिंग कार्य पर स्टे आर्डर दिया गया था। वेद-पुराणों के ज्ञाता निगमानंद ने इसके पहले 2001 में देहरादून के गांधी पार्क में भ्रष्टाचार को लेकर 73 दिन का अनशन किया। उन्होंने 2008 में भी 68 दिन का अनशन किया था। लोहारीनागपाला जल विद्युत परियोजना को रद करने की मांग को लेकर प्रो.जीडी अग्रवाल के अनशन के दौरान भी वह सक्रिय रहे। हरिद्वार के संतों ने निगमानंद के निधन को अपूरणीय क्षति बताया है। निगमानंद का शव तीन दिन तक दर्शनार्थ मातृसदन में रहेगा। निगमानंद के अवसान से व्यथित मातृसदन के अध्यक्ष स्वामी शिवानंद सरस्वती ने तप के बल पर प्राण त्यागने का ऐलान किया है। उन्होंने कहा कि सरकार, प्रशासन और न्यायिक व्यवस्था भ्रष्ट हो चुकी है। गंगा बलिदान मांग रही है और मैं यह बलिदान दूंगा। उन्होंने निगमानंद का पोस्टमार्टम एम्स के डाक्टरों से कराने की मांग की है और आरोप लगाया कि राज्य सरकार में उच्च पदों पर बैठे लोगों के इशारे पर इस युवा संन्यासी को जहर देकर मारा गया।
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