Tuesday, June 14, 2011

असमानता से पैदा हिंसा ज्यादा बड़ा खतरा


देश में नव उदारवाद का मॉडल लागू हुए 20 वर्ष हो चुके हैं और इसकी प्रशंसा व उपलिब्धयां गिनाने वाले तमाम राजनेता व अर्थशास्त्री हैं। पर इसकी हजार अच्छाइयां गिनाने वाले भी इस बुनियादी तथ्य को नहीं नकार सकते कि इससे समाज में भयंकर असमानता भी फैली है। पिछले बीस सालों में ढाई लाख किसानों ने आत्महत्या की है। बड़े पैमाने पर लोग जंगल- जमीन से उजाड़े गए हैं और आदिवासियों से लेकर मामूली किसान तक अपनी जमीनें बचाने के लिए सड़कों पर आंदोलन करते रहे हैं। यही नहीं, सात हजार लोग रोज भूख से मर रहे हैं और 20 करोड़ भारतीय रोज रात में भूखे सोते हैं। दूसरी ओर भारतीय लोकतंत्र की परम विडंबना है कि विदेशी कंपिनयों के लिए राज्य व केंद्र सरकारें अपने ही नागरिकों की जमीनें छल-बल से छीन रही हैं। यानी तरक्की की चटख तस्वीरों के अलावा भी मानवीय उदासी व निराशा के कई रंग हैं जो गुलाबी आभा के पीछे छिपे हैं। आंकड़े बताते हैं कि ऊपर की 10 फीसद धनी आबादी के पास 31 फीसद दौलत है, जबकि नीचे की सबसे गरीब दरिद्र 10 प्रतिशत आबादी के पास मात्र 3.6 प्रतिशत दौलत है। इस व्यापक असमानता का संबंध बढ़ती सामाजिक हिंसा से भी है जिसे ठीक से सामने नहीं रखा जाता। सरकारें आतंकवाद, सांप्रदायिक और नक्सलवादी आंदोलन से पैदा हिंसा की बराबर र्चचा करती हैं पर असमानता से जन्मी हिंसा को विमर्श तथा जनसंचार माध्यमों से बाहर रखने की कोशिश की जाती है। कारण, असमानता से पैदा हिंसा किसी सुरक्षाबल या सेना की सहायता से ठीक नहीं हो सकती। उल्टे यह उनकी नीतियों पर ही बुनियादी सवाल खड़ा करती है। यह अस्त्र-शस्त्र नहीं बल्कि सरकारों की नागरिक अधिकारों के प्रति उपेक्षा से उत्पन्न होती है जिसमें मृतक संख्या लाखों में होती है। बताया जाता है कि हिटलर ने 60 लाख यहूदियों को पांच साल के भीतर कत्ल किया पर दुनिया में हर साल एक करोड़ 30 लाख और अकेले भारत में 25 लाख लोग भूख से मरते हैं यानी खुली राजनीतिक व्यवस्था व लोकतंत्र के बीच भी लोग उन परिणामों व हिंसा को भोग रहे हैं जो फासीवादी शासकों की पहचान मानी जाती थी। जाहिर है, भूख व उससे होने वाली मौतों के उपरोक्त आंकड़े नीति व राज्य व्यवस्था के संचालन की दृष्टि से सरकार की बड़ी असफलता पर मुहर लगाते हैं। इससे बचने यानी असमानता या गरीबी ढकने के लिए सरकारों के पास कई उपाय हैं। उदाहरण के लिए योजना आयोग ने हाल में जनहित याचिका में सरकार को बताया कि गरीबी रेखा से किसी को ऊपर रखने के लिए शहरी क्षेत्र में 20 रु पये व ग्रामीण क्षेत्र में 15 रु पये पर्याप्त हैं। दूसरी ओर देश में हजारों परिवार ऐसे हैं जिनकी मासिक आय दो लाख रुपये या इससे अधिक है। वास्तविक गरीबी के बारे में भ्रम फैलाने का संबंध एक ओर संवेदनहीनता से है तो दूसरी ओर राजनीतिक व अंतरराष्ट्रीय दबावों से भी है। अगर भारत की बेइंतिहा गरीबी के बारे में हकीकत सामने आती रहेगी तो विदेशी निवेश व निजीकरण के जिन दो खंभों पर वर्तमान अर्थनीति टिकी है, वह अपनी कृत्रिम लोकप्रियता को भी नहीं बचा सकेगी। इसीलिए सरकार की अलग- अलग एजेंसियां अलग-अलग मूल्यांकन करती हैं। योजना आयोग, जो अब सार्वजिनक योजनाएं बनाने की जगह सरकार के पक्षधर वकील की भूमिका में अधिक रहता है, मानता है कि 33 करोड़ लोग गरीबी रेखा से नीचे हैं। राष्ट्रीय सुरक्षा काउंसिल के मत में 46 करोड़ से अधिक बीपीएल श्रेणी में आते हैं जबकि अर्जुन सेनगुप्त समिति की रिपोर्ट में 77 प्रतिशत लोगों के बारे में कहा गया था कि वे 20 रु पये या इससे कम पर रोजाना गुजारा करते हैं। इतनी त्रासद स्थिति गंभीर सामाजिक परिणामों को जन्म देने वाली है। शहरी क्षेत्रों में बढ़ते अपराध, अमानवीयता तथा मानसिक अवसाद इसके स्पष्ट लक्षणों के रूप में सामने आ रहे हैं। हाल में एक पुलिस अधिकारी ने स्वीकारा कि लोग अब असहिष्णु हो रहे हैं और छोटी-छोटी बातों पर उत्तेजित होकर पुलिस पर पथराव, सड़क जाम तथा हिंसा को उद्यत रहते हैं। हाल में भट्टा पारसौल में जमीन अधिग्रहण, जैतपुर में परमाणु प्लांट के खिलाफ रोष-प्रदशर्न, छत्तीसगढ़-झारखंड में पुलिस बलों पर नक्सली हमलों में वृद्धि इत्यादि असमानताजनित हिंसा का रूप हैं। विरोध-प्रदशर्न की बढ़ती घटनाएं दिखाती हैं कि विकास संबंधी सरकारी दावों तथा वास्तविकता में बड़ा फर्क सिद्ध करने के लिए किसी समाजशास्त्री की जरूरत नहीं। बुनियादी सुविधा व रोजगार की समस्या से जूझ रहा आम इंसान इसे रोज महसूस कर रहा है। असमानता का सबसे साफ दिखने वाला परिणाम यह होता है कि लोग विभिन्न उपभोक्ता वस्तुओं व आमदनी के मामले में अलग-अलग समूहों में बंटे दिखाई दें। पर अधिक घातक व एक किस्म का समाज विरोधी आचरण इस रूप में दिख सकता है कि जो जीवन की सबसे अनिवार्य तथा बुनियादी सुविधाएं हैं, उन्हें भी सामाजिक असमानता के कारण एक बड़ी जनसंख्या से वंचित कर दिया जाए। जैसे पानी व बिजली की कारपोरेट संस्थाओं में भयंकर बर्बादी होती है, उच्च मध्यवर्गीय परिवारों की आय ध्यान में रखकर दवाओं की कीमतें निर्धारित होती हैं और शहरी आवास व उद्योग योजनाओं के लिए गांवों को उजाड़ा जाए।15 साल पहले तक उत्तरप्रदेश के छोटे शहरों में बिजली की हालत ठीक थी, पर अब बदतर हुई है, जबकि बिजली उत्पादन लगातार बढ़ रहा है। इसका सीधा अर्थ है कि बिजली उत्पादन की बढ़ोतरी का लाभ आम लोगों को नहीं बल्कि महानगरों व बड़े उद्योगों तक सीमित होकर रह गया है। गांवों का विकास करने के स्थान पर गांवों में बिल्डरों की सहायता से महानगरीय संस्कृति को बढ़ावा दिया गया है जिससे गांव तो उजड़ गए पर उनके स्थान पर कंक्रीट के जंगल खड़े होते जा रहे हैं जो पर्यावरण व सामाजिक मूल्यों की दृष्टि से खतरनाक विकास है। यानी अगर हम असमानता को रोकते नहीं और प्राकृतिक तथा औद्योगिक संसाधनों का ठीक से वितरण करने में नाकाम हो जाते हैं तो लोकतंत्र व विकासोन्मुखता के सारे दावे खोखले नजर आने लगते हैं। हमें कागज पर तो जीडीपी में 8-9 फीसद की दर से विकास होता दिखता रहेगा पर बुनियादी सुविधाएं जैसे स्वास्थ्य, पानी, बिजली आदि से लोगों की दूरी नहीं घटेगी। सामाजिक विषमता के शिकार लोग ही नहीं बल्कि उसका लाभ उठाने वाला तबका भी कई तरह की हिंसाओं में सक्रिय भागीदारी करता है। समाज में बालश्रम, जुआ, ड्रग्स, वेश्यावृत्ति जैसी बुराइयां बढ़ रही हैं जो पूरी तरह हिंसा आधारित हैं। पर्यावरण के साथ हिंसा जैसे वृक्षों की अंधाधुंध कटाई, जानवरों की हत्याएं व नदियों व भूजल का अति दोहन भी केवल एक शक्तिशाली तबके व शहरी मध्यवर्ग तक सीमित रखने के कारण हो रहा है। दुनिया भर में आज इतना अनाज पैदा हो रहा है कि लोगों को भरपेट भोजन मिल सके पर व्यवस्था का हित खाली पेट काम करने वाले मजदूरों से जुड़ा है, इसलिए गरीबी मिटाने के पाखंड के बावजूद उसे एक हद तक बनाए भी रखा जाता है। भारत में हर साल आतंकवाद, नक्सलवाद, सांप्रदायिक हिंसा या एड्स से इतनी मौतें नहीं होतीं जितनी भूख से होती हैं। जिस देश में हर साल 25 लाख लोग भूख से मर जाएं, वहां अन्य हिंसा की तुलना में असमानता प्रायोजित हिंसा पर सबसे बड़ी बहस होनी चाहिए जो दुर्भाग्य से नहीं होती है।



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