Wednesday, June 15, 2011

यह राजनीतिक जंग नहीं


बाबा रामदेव के समर्थकों पर आधी रात में बरपाए कहर पर सुप्रीमकोर्ट और राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग का ध्यान जाना अच्छी बात है। रामलीला मैदान पर आधी रात जो सुनियोजित आपाधापी मचाई गई उसकी गवाह वहां मौजूद मीडिया और दर्जनों कैमरों की आंखों से सारी दुनिया बन गई। देश के दूरदराज इलाकों से आए लोग जिनमें वरिष्ठ नागरिकों, महिलाओं और बच्चों की अच्छी खासी तादात थी, जो रात की गहरी नींद में गाफिल थे और साधारण तबके से ताल्लुक रखते थे- उन पर अपराधियों की तरह टूट पड़ना, लाठियां बरसाना और आंसू गैस के गोले छोड़ना- लोकतंत्र में यह आचरण नाकाबिले बर्दाश्त है। भ्रष्टाचार और कालेधन के खिलाफ शुरू नागरिक समाज की पहल अब आक्रामक राजनीतिक जंग में बदल गई है और रामलीला मैदान में जो कुछ हुआ वह शायद जंग में सब कुछ जायज है का संदेश देने के लिए हुआ। कांग्रेस ने बाबा रामदेव को निशाना बनाते हुए अन्ना हजारे और उनके नागरिक समाज को अपने प्रतिद्वंद्वी भारतीय जनता पार्टी का मुखौटा बता कर इस राजनीतिक जंग की हदबंदी भी कर दी है। अब अन्ना जब जंतर मंतर पर अनशन करने पहुंचेंगे तो वहां उनका स्वागत प्रशंसकों और समर्थकों की जगह शायद हथकड़ियां लेकर इंतजार करते सुरक्षाकर्मी करें! अगर ऐसा हुआ तो अफसोस। बड़ी मुश्किलों और महाघोटालों का दंश झेलने के बाद देश में भ्रष्टाचार के खिलाफ जनमत की आवाज जगनी शुरू हुई है। राजनीति के शोर में यदि हमने इसे खो दिया तो यह देश का असल नुकसान होगा जिसकी भरपाई फिर पीढ़ियों तक नहीं हो पाएगी। अब तक उदार और समझौतावादी चेहरा दिखा रही कांग्रेस का अचानक आक्रामक हो जाना कहीं हाल में मिले विधानसभा नतीजों की ताकत तो नहीं है? लेकिन, याद रहे कि इन नतीजों में भ्रष्टाचार के खिलाफ संदेश भी दो टूक शब्दों में था। तमिलनाडु में डीएमके का सफाया संदेश नहीं भ्रष्टाचार के खिलाफ जनघोषणा थी। इसलिए देश की सबसे पुरानी और बड़ी पार्टी होने के नाते भ्रष्टाचार के समूल नाश की व्यवस्था बनाना कांग्रेस की पहली जिम्मेदारी बनती है। उसी प्रकार देश की दूसरी प्रमुख पार्टी होने के नाते यही जिम्मेदारी बीजेपी की भी बनती है। भ्रष्टाचार कोई हथियार नहीं जिससे दोनों पार्टियां एक-दूसरे को लहूलुहान करें, बल्कि यह ऐसा दानव है जिसका वध दोनों का कर्तव्य है। उसी प्रकार देश में नागरिक समाज की बढ़ती आवाज लोकतांत्रिक व्यवस्था में आ रही प्रौढ़ता की पहचान है। राजनीतिक दल और नागरिक समाज आपस में प्रतिद्वंद्वी नहीं एक-दूसरे के पूरक हैं। दोनों की अपनी विशेषताएं हैं तो कमजोरियां भी। लोकपाल मसले पर सरकार और नागरिक समाज का मिल बैठना स्वस्थ लोकतांत्रिक भविष्य का संकेत था। लेकिन, देखा गया कि यह मिलन मजबूरियों और तनाव की पहचान बन गया। अन्ना और उनकी टीम ने लोकपाल बिल कमेटी बैठक का बहिष्कार कर दिया। लेकिन, बहिष्कार से बेहतर बैठक का तनाव झेलना रहता क्योंकि इससे सरकार पर भ्रष्टाचार के खिलाफ दबाव उस जगह पर बना रहता जहां व्यवस्था बनती है। यह नहीं भूलना चाहिए कि भ्रष्टाचारियों से अधिक खतरनाक वह व्यवस्था है जहां इसके बीज पनपते हैं। इसलिए व्यवस्था बदलने के लिए उसमें घुसपैठ बनाना भी गलत नहीं है।

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