अपने तीस साल के सामाजिक जीवन में मैं महसूस कर रहा हूं कि देश में एक तरफ तो तरक्की की बात की जा रही है पर दूसरी तरफ उसके बड़े हिस्से में स्थायी अकाल की परिस्थितियां व्याप्त हैं। शरीर के वजन और लंबाई के आधार पर ही किसी व्यक्ति का बॉडी मास इंडेक्स तय होता है। जिन व्यक्तियों का बॉडी मास इंडेक्स 18.5 से कम है, इसे वयस्क व्यक्ति में स्थायी कुपोषण का स्वरूप माना जाएगा। हैदराबाद स्थित नेशनल न्यूट्रिशन मॉनिटरिंग ब्यूरो के अनुसार देश के 37 प्रतिशत व्यक्तियों का बॉडी मास इंडेक्स 18.5 से कम है। पांच साल से कम उम्र के 45 प्रतिशत से अधिक बच्चे अपनी उम्र और वजन के हिसाब से कुपोषण का शिकार हैं। हमारे देश में कुपोषित बच्चों की संख्या, दुनिया भर के कुपोषित बच्चों की करीब आधा बैठती है। हमारे देश में प्रति व्यक्ति अनाज की खपत पर जवाहर लाल नेहरू विश्वविद्यालय की एक वरिष्ठ प्रोफेसर उत्सा पटनायक का अध्ययन उल्लेखनीय है। उन्होंने अपने 2005 तक के अध्ययन के आधार पर कहा है कि अपने देश में पिछले दस सालों में प्रति व्यक्ति अनाज की खपत कम हुई है। दस साल पहले पांच लोगों का एक परिवार जो 880 किलोग्राम औसत अनाज साल भर में खर्च करता था उस परिवार में वर्ष 2005 आते-आते यह खपत घटकर 770 किलोग्राम पर आ गई। यह गिरावट 110 किलोग्राम की है। पूरे देश में 37 प्रतिशत लोगों का बॉडी मास इंडेक्स 18.5 से कम है। यदि सिर्फ शिड्यूल ट्राइब्स की बात की जाए तो यह आंकड़ा 50 फीसद से भी अधिक है। 18.5 से कम बॉडी मास इंडेक्स वाले लोगों की संख्या शिड्यूल कास्ट में 60 फीसद से भी अधिक है। सच्चर समिति की रिपोर्ट कुछ इसी तरह की तस्वीर अल्पसंख्यकों की भी बताती है। विश्व स्वास्थ संगठन कहता है कि किसी समुदाय में 40 फीसद से अधिक लोगों का बॉडी मास इंडेक्स 18.5 से कम हो तो उस पूरे समुदाय को अकालग्रस्त माना जाना चाहिए। यदि हम विश्व स्वास्थ संगठन द्वारा तय मानकों को अपने आंकड़े में लागू करें तो यह देखने को मिलेगा कि हमारे यहां कई समुदाय ऐसे हैं जो अकाल की स्थिति में जी रहे हैं। साल दर साल इतिहास का रास्ता तय कर रहे हैं और अकाल उनके जीवन का साथी है। एक अहम मुद्दा है सरकार का। आज सरकार उन्हीं सब चीजों को अपने निशाने पर ले रही है, जिन पर कई समुदाय जी रहे हैं। इनकी पहुंच में जो सामुदायिक संपदा है, उनसे इन्हें महरूम किया जा रहा है। पानी, जंगल, जमीन जिनके आधार पर ये जी रहे हैं, उन्हें योजना के साथ इनसे अलग किया जा रहा है। उन वंचित समुदायों को बताया जा रहा है, जिस जमीन पर तुम रहते हो, जिस नदी का पानी पीते हो, जिस जंगल से जीवन यापन करते हो, वह सब तुम्हारा नहीं, सरकार का है। सरकार गरीब लोगों से सारे संसाधन छीन कर निजी कंपनियों को सौंप रही है। 1991 के बाद शासन के जो भी कार्यक्रम चल रहे हैं, वे सभी प्राइवेट व्यावसायिक हितों में ही हैं। गरीब से जमीन छीन कर बड़ी-बड़ी निजी कंपनियों को देना देश की तरक्की के लिए जरूरी बताया जा रहा है। गरीबों पर अत्याचार पहले भी हुए हैं लेकिन पहले उस अत्याचार के साथ एक शर्म होती थी। लोग अत्याचार को अत्याचार स्वीकार करते थे लेकिन अब इन सभी अत्याचारों को तरक्की की तरकीब के रूप में देखा जा रहा है। (डॉ. सेन जाने-माने चिकित्सक और सामाजिक कार्यकर्ता हैं)
Wednesday, June 1, 2011
तरक्की के नाम पर हो रहा अत्याचार
अपने तीस साल के सामाजिक जीवन में मैं महसूस कर रहा हूं कि देश में एक तरफ तो तरक्की की बात की जा रही है पर दूसरी तरफ उसके बड़े हिस्से में स्थायी अकाल की परिस्थितियां व्याप्त हैं। शरीर के वजन और लंबाई के आधार पर ही किसी व्यक्ति का बॉडी मास इंडेक्स तय होता है। जिन व्यक्तियों का बॉडी मास इंडेक्स 18.5 से कम है, इसे वयस्क व्यक्ति में स्थायी कुपोषण का स्वरूप माना जाएगा। हैदराबाद स्थित नेशनल न्यूट्रिशन मॉनिटरिंग ब्यूरो के अनुसार देश के 37 प्रतिशत व्यक्तियों का बॉडी मास इंडेक्स 18.5 से कम है। पांच साल से कम उम्र के 45 प्रतिशत से अधिक बच्चे अपनी उम्र और वजन के हिसाब से कुपोषण का शिकार हैं। हमारे देश में कुपोषित बच्चों की संख्या, दुनिया भर के कुपोषित बच्चों की करीब आधा बैठती है। हमारे देश में प्रति व्यक्ति अनाज की खपत पर जवाहर लाल नेहरू विश्वविद्यालय की एक वरिष्ठ प्रोफेसर उत्सा पटनायक का अध्ययन उल्लेखनीय है। उन्होंने अपने 2005 तक के अध्ययन के आधार पर कहा है कि अपने देश में पिछले दस सालों में प्रति व्यक्ति अनाज की खपत कम हुई है। दस साल पहले पांच लोगों का एक परिवार जो 880 किलोग्राम औसत अनाज साल भर में खर्च करता था उस परिवार में वर्ष 2005 आते-आते यह खपत घटकर 770 किलोग्राम पर आ गई। यह गिरावट 110 किलोग्राम की है। पूरे देश में 37 प्रतिशत लोगों का बॉडी मास इंडेक्स 18.5 से कम है। यदि सिर्फ शिड्यूल ट्राइब्स की बात की जाए तो यह आंकड़ा 50 फीसद से भी अधिक है। 18.5 से कम बॉडी मास इंडेक्स वाले लोगों की संख्या शिड्यूल कास्ट में 60 फीसद से भी अधिक है। सच्चर समिति की रिपोर्ट कुछ इसी तरह की तस्वीर अल्पसंख्यकों की भी बताती है। विश्व स्वास्थ संगठन कहता है कि किसी समुदाय में 40 फीसद से अधिक लोगों का बॉडी मास इंडेक्स 18.5 से कम हो तो उस पूरे समुदाय को अकालग्रस्त माना जाना चाहिए। यदि हम विश्व स्वास्थ संगठन द्वारा तय मानकों को अपने आंकड़े में लागू करें तो यह देखने को मिलेगा कि हमारे यहां कई समुदाय ऐसे हैं जो अकाल की स्थिति में जी रहे हैं। साल दर साल इतिहास का रास्ता तय कर रहे हैं और अकाल उनके जीवन का साथी है। एक अहम मुद्दा है सरकार का। आज सरकार उन्हीं सब चीजों को अपने निशाने पर ले रही है, जिन पर कई समुदाय जी रहे हैं। इनकी पहुंच में जो सामुदायिक संपदा है, उनसे इन्हें महरूम किया जा रहा है। पानी, जंगल, जमीन जिनके आधार पर ये जी रहे हैं, उन्हें योजना के साथ इनसे अलग किया जा रहा है। उन वंचित समुदायों को बताया जा रहा है, जिस जमीन पर तुम रहते हो, जिस नदी का पानी पीते हो, जिस जंगल से जीवन यापन करते हो, वह सब तुम्हारा नहीं, सरकार का है। सरकार गरीब लोगों से सारे संसाधन छीन कर निजी कंपनियों को सौंप रही है। 1991 के बाद शासन के जो भी कार्यक्रम चल रहे हैं, वे सभी प्राइवेट व्यावसायिक हितों में ही हैं। गरीब से जमीन छीन कर बड़ी-बड़ी निजी कंपनियों को देना देश की तरक्की के लिए जरूरी बताया जा रहा है। गरीबों पर अत्याचार पहले भी हुए हैं लेकिन पहले उस अत्याचार के साथ एक शर्म होती थी। लोग अत्याचार को अत्याचार स्वीकार करते थे लेकिन अब इन सभी अत्याचारों को तरक्की की तरकीब के रूप में देखा जा रहा है। (डॉ. सेन जाने-माने चिकित्सक और सामाजिक कार्यकर्ता हैं)
Subscribe to:
Post Comments (Atom)
No comments:
Post a Comment