Wednesday, June 1, 2011

झुग्गी विहीन भारत का सपना


लेखक नेहरू की पुण्यतिथि पर झुग्गी बस्तियों में रहने वाले लोगों के कल्याण के प्रति उनके संकल्प को याद कर रहे हैं...
जवाहरलाल नेहरू को झुग्गी बस्तियों से चिढ़ थी। उन्होंने लिखा था, मैं किसी भी दलील, अर्थशास्त्र या किसी अन्य बात में विश्वास नहीं रखता जो झुग्गी बस्तियों के निर्माण की वकालत करती हो। मैं झुग्गियों से डरता हूं। अगर बंजारों की तरह कोई व्यक्ति खुले में रहता है तो उससे मुझे आपत्ति नहीं है। अगर हम झुग्गियों में रहने वालों को मकान उपलब्ध नहीं करा सकते तो हमें उन्हें रहने को कुछ खुली जगह दे देनी चाहिए, जहां पानी और सीवर जैसी सुविधाएं हों। 1954 में दिल्ली के तुर्कमान गेट के दौरे के समय नेहरू झुग्गी बस्ती की गंदगी और घिचपिच से इस कदर गुस्सा गए थे कि उन्होंने चिल्ला कर कहा था-इन्हें फूंक दो। झुग्गी बस्तियों के प्रति नेहरू के नजरिये को देखते हुए ही पहली पंचवर्षीय योजना में घोषणा की गई, झुग्गी बस्तियां राज्य व केंद्र सरकारों के लिए खेद का विषय है। इस गंभीर समस्या पर अब तक पर्याप्त ध्यान नहीं दिया गया है। झुग्गी बस्तियां राष्ट्रीय समस्या हैं। झुग्गियों के कारण नारकीय जीवन का बोझ उठाने से बेहतर है इनके सफाए के लिए खर्च का बोझ उठाया जाए। किंतु छह दशकों में 11 पंचवर्षीय योजनाओं के बाद अब क्या स्थिति है? आज हमारे हर शहर में झुग्गी बस्तियों की भरमार है, जो नेहरू के समय से भी बदतर हालात में हैं। हमारी 35 फीसदी शहरी आबादी झुग्गियों में रहती हैं। ये झुग्गियां गंदगी, बीमारी, खतरे, अपराध और हताशा का पर्याय बनी हुई हैं। महानगरों में तो हालत और भी गंभीर है। मुंबई में 55 फीसदी लोग चाल में रहते हैं। धारावी में 1.75 वर्ग किलोमीटर के दायरे में करीब दस लाख लोग रह रहे हैं। यह इलाका अपनी दरिद्रता के लिए पूरे विश्व में कुख्यात है। इसके काफी बड़े हिस्से में प्रति 1500 लोगों के लिए मात्र एक शौचालय है। औसतन दस लोग एक कमरे में रहते हैं। आइटी इंडस्ट्री के गढ़ बेंगलूर में भी करीब एक हजार झुग्गी बस्तियों में बीस लाख लोग रह रहे हैं। वहां 90 हजार बच्चे सड़कों से कूड़ा बीनने के काम में लगे हुए हैं। देश की राजधानी में अगर पुरानी दिल्ली के कटराओं और 1600 अनधिकृत कॉलोनियों व एक हजार से अधिक झुग्गी बस्तियों को जोड़ लिया जाए तो करीब 77 फीसदी लोग गंदी बस्तियों में रह रहे हैं। 1991 में देश में आर्थिक सुधार लागू होने के बाद से शहरों में झुग्गी बस्तियों में कई गुना बढ़ोतरी हुई है। मानव आवास-झुग्गी बस्तियों की चुनौती नामक वैश्विक रिपोर्ट में रेखांकित किया गया है कि विकासशील देशों में नवउदारवादी शक्तियों के विकास के साथ-साथ असंगठित क्षेत्र में एक नया सामाजिक वर्ग उभरा है, जो निम्न स्तर, निम्न मजदूरी, काम के अधिक घंटे और असुरक्षित आवास से जूझ रहा है। भारत में अधिकांश बड़े शहरों में एक व्यक्ति के रहने का स्थान देश के औसत का चालीसवां हिस्सा है। सहश्चाब्दि विकास लक्ष्य सरीखी संयुक्त राष्ट्र द्वारा प्रायोजित परियोजनाओं में दुनिया भर में झुग्गी बस्तियों में रहने वाले दस करोड़ लोगों के स्तर को सुधारने के प्रयास किए जा रहे हैं। इस तरह के प्रयासों से कोई बड़ा परिवर्तन नहीं होने जा रहा है। ये परियोजनाएं केवल भारत में झुग्गी बस्तियों में रहने वाले दस फीसदी लोगों को ही छू पाती हैं। जमीनी धरातल पर कटु सच्चाई के परिप्रेक्ष्य में न तो नेहरू का काव्यात्मक असंतोष, न पंचवर्षीय योजनाएं और न ही निजी-सार्वजनिक साझेदारियों के कोई सार्थक नतीजे आए हैं। अब आवश्यकता नए नजरिए के साथ सुनियोजित विकास की है। प्रवासियों के लिए मूलभूत सुविधाओं से लैस बेहतर नक्शे वाली कॉलोनियों का निर्माण होना चाहिए, जिनमें नामचारे के किराये पर गरीब कामगारों को मकान देना चाहिए। दूसरे शब्दों में शहरों का नियोजन इस प्रकार होना चाहिए कि उनमें हर साल आने वाले प्रवासियों के रहने के स्थान का प्रावधान होना चाहिए। इसके लिए शहर के नियोजकों को पहले से ही ऐसी भूमि का अधिग्रहण कर लेना चाहिए जिस पर गरीब कामगारों के लिए सस्ते भवनों का निर्माण किया जा सके। यह काम सरकार के हस्तक्षेप के बिना संभव नहीं है। नवउदारवादी शक्तियों ने भले ही उद्योग और व्यापार के क्षेत्र में उल्लेखनीय प्रदर्शन किया हो, लेकिन शहरी गरीबों के लिए वे किसी विपत्ति से कम नहीं हैं। सामाजिक सरोकार से उनका कोई नाता नहीं है। निजी-सार्वजनिक साझेदारी के तहत जो योजनाएं शुरू की गईं वे या तो विफल हो चुकी हैं या फिर विफल होने के कगार पर हैं। दिल्ली में जोर-शोर से शुरू की गई तेहखंड योजना में पिछले सात वर्षो में एक इंच जमीन पर भी निर्माण नहीं हुआ है। मुंबई-धारावी योजना पिछले 15 सालों से घिसट रही है। इस दिशा में हमें नई सोच के साथ तेजी से काम करने की जरूरत है। हमें नहीं भूलना चाहिए कि 2030 तक भारत की शहरी आबादी 59 करोड़ हो जाएगी। यह संख्या अमेरिका की कुल आबादी के दोगुने के करीब होगी। तब तक भारत के 68 बड़े शहरों में प्रति शहर दस लाख लोगों के आवास की व्यवस्था करनी होगी। (लेखक पूर्व केंद्रीय मंत्री हैं)

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