Wednesday, June 29, 2011

सीबीआइ को अनुचित संरक्षण


सीबीआइ को सूचना अधिकार के दायरे से बाहर रखने को दुर्भाग्यपूर्ण कदम मान रहे हैं लेखक
केंद्र सरकार द्वारा सीबीआइ को सूचना अधिकार के दायरे से बाहर निकालना बेहद दुर्भाग्यपूर्ण कदम है। जांच-पड़ताल के क्षेत्र में पहले ही सूचना अधिकार अधिनियम की धारा 8(एच) के तहत इसे संरक्षण हासिल है। इसके अनुसार किसी भी नागरिक को ऐसी सूचनाएं नहीं दी जा सकती जो दोषी की जांच, गिरफ्तारी या इससे संबद्ध अदालती प्रक्रिया को बाधित करे। यह प्रावधान सीबीआइ या अन्य केंद्रीय जांच एजेंसियों पर ही नहीं, बल्कि राज्य सरकारों की जांच एजेंसियों के लिए भी लागू होता है। प्रकट रूप में यह कदम सुरक्षा और खुफिया एजेंसियों के दृष्टिकोण से उठाया गया है। यह स्पष्ट है कि किसी भी रूप में सीबीआइ न तो खुफिया एजेंसी है और न ही सुरक्षा संगठन। यह एक जांच एजेंसी है, जिसका काम कानूनी रूप से मामलों का खुलासा करना है, न कि उन्हें छुपाना। अपने काम की प्रकृति के कारण सीबीआइ को एक खुला संगठन होना चाहिए, कम से कम उन संवेदनशील मामलों के संबंध में जो इसकी जांच के दायरे में हैं। सीबीआइ के परिप्रेक्ष्य में संवेदनशीलता से तात्पर्य उन मामलों से है जो उच्च तबके के ताकतवर व प्रभावी लोगों से संबद्ध हैं। सीबीआइ की कानूनी और क्रियाशील आवश्यकता का आधार गोपनीयता की अनिवार्यता को बनाया गया है। खुफिया संगठन के विपरीत जिसे पारदर्शिता से पूरी सुरक्षा की आवश्यकता है, जांच में एक निश्चित चरण के बाद समग्र पारदर्शिता की आवश्यकता होती है। जांच की सूचनाओं के समय पूर्व खुलासे से ही आरोपी को अनुचित लाभ मिल सकता है। वह साक्ष्यों को नष्ट करके जांच को भटका सकता है, किंतु एक बार आरोपपत्र दायर होने के बाद उसे किसी तरह के संरक्षण की आवश्यकता नहीं रह जाती है। तब तमाम साक्ष्यों को आरोपी को संप्रेषित कर दिया जाता है ताकि वह अपने बचाव की तैयारी कर सके। एक बार अदालत में जमा करने के बाद आरोपपत्र सार्वजनिक दस्तावेज बन जाता है। जांच के दौरान हासिल की गई कुछ सूचनाओं और केस डायरियों में दर्ज ब्योरे को जांच एजेंसी को आरोपपत्र में शामिल नहीं करना चाहिए, क्योंकि इनका संबंध गवाहों या आरोपियों की सुरक्षा को खतरे से हो सकता है। इसलिए ऐसी सूचनाओं को सार्वजनिक नहीं करना चाहिए। ऐसी सूचनाएं और दस्तावेज जिन पर अभियोजन निर्भर नहीं होता पहले ही भारतीय दंड संहिता और इविडेंस एक्ट के तहत संरक्षित हैं। हालांकि न्याय के लिए जरूरी होने पर अदालत इन तमाम दस्तावेजों का संज्ञान लेने और अपने विवेक से इनका इस्तेमाल करने के लिए अधिकृत होती है। इस संबंध में मौजूदा कानून पर्याप्त हैं। सीबीआइ को और अधिक गोपनीयता की ढाल प्रदान करने, खासतौर पर भ्रष्टाचार के मामलों में, का साफ मतलब है कि इसका उद्देश्य प्रभावशाली लोगों को बचाना है। वर्तमान परिस्थितियों में किसी भी जांच एजेंसी को सूचना अधिकार अधिनियम के तहत और छूट देने की आवश्यकता नहीं है। एक पूर्व सीबीआइ अधिकारी होने और सरकार के अंदर भ्रष्ट तंत्र से लड़ने का अनुभव रखने के नाते मेरा मानना है कि सरकार के अधीन होने के कारण सीबीआइ तथ्यों के निष्पक्ष संग्रहण में अपनी कानूनी भूमिका के खिलाफ खुलासा करने से अधिक छिपाने का काम करती है। सीबीआइ को जो छूट दी जा रही है वह एक प्रतिगामी कदम है। यह पूरी तरह अवांछित और अनावश्यक प्रावधान है। यह सरकारी तंत्र में भ्रष्टाचार और अपराध को बढ़ावा देगा। इसके प्रभाव से सीबीआइ भी अछूती नहीं रहेगी। आप चीजों को जितना पर्दे के पीछे रखेंगे, प्रक्रिया के दुरुपयोग की उतनी ही अधिक संभावना होगी। इससे ऐसे विशेषाधिकार प्राप्त वर्ग की रचना होगी जो कानून के दायरे से बाहर होगा। अन्य देशों के अनुभव पर नजर डालें तो ऐसे किसी भी देश में जांच एजेंसियों को इस प्रकार का संरक्षण नहीं है। इससे सवाल पैदा होता है कि क्या हम असभ्य दिनों की ओर लौट रहे हैं? क्या हम संविधान प्रदत्त कानून के शासन को नकार रहे हैं? हालांकि भारत में ऊंचे तबके के ताकतवर लोगों को बचाने के लिए इस प्रकार के कदम उठाने की बात नई नहीं है। इस संदर्भ में मैं दो उदाहरण देना चाहूंगा। पहला, आठवें दशक में निर्देश दिया गया था कि किसी भी जांच में संयुक्त सचिव से ऊपर के अधिकारियों व राजनेताओं को संरक्षित रखा जाए। जैन हवाला मामले में इस निर्देश को सुप्रीम कोर्ट ने अविवेकपूर्ण और गैरकानूनी करार दिया था। बाद में दिसंबर 1997 में भी इसे संदर्भित किया गया। 1998 में अधिसूचना के माध्यम से इसे फिर से विधायी दर्जा दिया गया और 2003 में इसे सीवीसी एक्ट के माध्यम से लागू किया गया। दूसरा मामला एक अत्यधिक प्रभावशाली आरोपी के खिलाफ विदेश में जांच करने से संबंधित है। इस मामले में जांच के लिए भारतीय अदालत से संबंधित देश की अदालत के लिए एक अनुरोध पत्र की आवश्यकता थी। भारतीय दंड संहिता की धारा 166 के तहत किसी भी थाने का एसएचओ इस प्रकार के पत्र के लिए निवेदन कर सकता है। 1993 में एक वीवीआइपी को बचाना था। इसके लिए सरकार ने एक एग्जिक्यूटिव ऑर्डर के माध्यम से प्रक्रिया में संशोधन कर दिया कि सरकार की अनुमति के बाद ही सीबीआइ अदालत में अनुरोध पत्र के लिए निवेदन कर सकती है। इस प्रकार विदेश में किसी प्रभावशाली व्यक्ति के खिलाफ जांच की संभावनाएं एक तरह से खत्म कर दी गईं। इस मामले में मई 1993 में सरकार से अनुमति मांगी गई, जो 1996 में मेरे सीबीआइ छोड़ने तक नहीं दी गई थी। इस प्रकार विदेश में कोई जांच नहीं हो पाई यद्यपि वीवीआइपी दलाली और घूस लेने, विदेशी बैंकों में भारी राशि जमा करने तथा भारत व विदेश में अनेक कंपनियां अधिग्रहित करने का आरोपी था। यहां तक कि भारतीय दंड संहिता के तहत किसी थाने के एसएचओ को भी अनुरोध पत्र के लिए आवेदन करने का अधिकार है, किंतु सीबीआइ के तमाम अधिकारियों को इस अधिकार से वंचित कर दिया गया। कोई मौका न छोड़ते हुए यह अधिकार भारत सरकार और वह भी प्रधानमंत्री कार्यालय को सौंप दिया गया। यद्यपि केंद्र सरकार के पास इस प्रकार के आवेदन सालों साल लंबित पड़े रहते हैं, किंतु सीबीआइ द्वारा ये तथ्य सार्वजनिक नहीं किए जा सकते। यह सरकार के सेंसर पर निर्भर है, जबकि खुद सीबीआइ के सरकार के अधीन होने के बावजूद वह ऐसा नहीं कर सकती। (लेखक सीबीआइ के पूर्व संयुक्त निदेशक हैं).

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