आदिवासियों की समस्याएं विस्थापन और पुनर्वास तक ही सीमित नही हैं, बल्कि वे कहीं अधिक पेचीदा और बहुआयामी हैं। ये आदिवासी अपनी जडे़ं त्यागने को तो विवश हैं ही, उन्हें शिक्षा-रोजगार व बिजली-पानी जैसी समस्याओं से भी दो चार होना पड़ता है। इसके अलावा उनका जीवन और अस्तित्व संकट में है। आज एक आम धारणा बन रही है कि आदिवासियों को आधुनिक बनाकर ही उन्हें समाज की मुख्यधारा में लाया जा सकता है। उनके आधुनिकीकरण की यह प्रक्रिया ही उनकी अवस्था में सुधार लाकर उन्हें विकास की वर्तमान प्रक्रिया के साथ जोड़ सकती है, परंतु विकास का सरल दिखाई पड़ने वाला यह सूत्र इतना आसान नहीं है, क्योंकि उनके विकसित होने के मार्ग में रुकावट उनका कथित पिछड़ापन नहीं, बल्कि विकास के इस आसान दिखने वाले सूत्र की दोमंुही प्रकृति है। आज हालत यह है कि उन्हें अपनी ओर आकर्षित करने के लिए बदलाव के कई संस्करण सामने हैं। बदलाव का पहला रूप सरकारी प्रयासों के रूप में है। हमारे देश में लगभग बारह करोड़ आदिवासी हैं। उनके पुनर्वास की समस्या हालांकि किसी राज्य की सरकारें नहीं सुलझा पाई हैं, जबकि भारत सरकार ने अपने खजाने इनके लिए सदैव खुले रखे हैं। आजादी के बाद से ही आदिवासियों की मुश्किलें दूर करने का एकमात्र नारा विकास माना जाता है। सरकार की इनके लिए चिंता उचित ही है और यह सरकार की वैधानिक जिम्मेदारी भी है। विडंबना यह है कि हमारा शासक वर्ग यह स्वीकार करने में संकोच करता है कि आदिवासी गरीब नहीं, बल्कि प्राकृतिक उपहारों से वंचित हैं। वे क्षेत्रीय अफसरशाही और कर्मचारियों के अनुचित व्यवहार का शिकार हैं। राज्य और केंद्र सरकारों के संरक्षण में कारपोरेट घराने उनसे उनकी प्राकृतिक संपदा छीनने में लगे हैं। हालांकि इसी बदलाव के कारण आदिवासी नेतृत्व एक लंबी यात्रा व कई पड़ावों को पार करते हुए संसदीय लोकतंत्र का सक्रिय हिस्सा बन चुका है और झारखंड व छत्तीसगढ़ दो आदिवासी बहुल इलाके राज्य की शक्ल अख्तियार कर चुके हैं। उत्तर पूर्व में भी स्वायत्तशासी परिषदों को मान्य करार दिया जा चुका है, परंतु त्रासदी यह है कि नष्ट होते जंगल व फैलते शहरीकरण के कारण अनेक जनजातियों का अस्तित्व खतरे में है। दिक्कत यह है कि हमारे राजनेता इन्हें वोट बैंक ही मानते हैं। जड़ी-बूटियां एकत्र करने वाली कोरबा जनजाति समेत छत्तीसगढ़ की पांच संरक्षित जनजातियां नष्ट होने को हैं, परंतु राज्य और केंद्र सरकारें इस सबसे बेफिक्र होकर न जाने किस विकास की बात कर रही हैं। आजादी के छह दशक बाद भी आदिवासियों के जीवन स्तर में कोई विशेष सुधार नहीं आया है। धर्म के सहारे आदिवासियों का धर्मातरण भी एक चर्चित मुद्दा रहा है। पिछले कई दशकों से ईसाई संगठन उन्हें अनेक प्रकार के प्रलोभनों के जरिए अपने साथ जोड़ने की कोशिश कर रहे हैं और समाज के दबे-कुचले व पीडि़त तबकों को कई तरह के लालच देकर उन्हें अपने साथ जोड़ना उनका एक स्वभाव रहा है। वहीं अदिवासियों का ईसाई धर्म के साथ जुड़ना भला हिंदू धर्म के ठेकेदार किस प्रकार बर्दाश्त कर सकते हैं। विश्व हिंदू परिषद का वरदहस्त सिर पर धारण करने वाले वनवासी कल्याण आश्रम राम, हनुमान और यहां तक कि शबरी के नाम पर उन्हें अपना हिस्सा बनाना चाहते हैं। मगर बेचारा आदिवासी इन धर्म के ठेकेदारो के बीच पेंडुलम-सा झूलता नजर आता है। वोट बैंक के लिए दिए जाने वाले प्रलोभन जब इनके विकास के लिए उठाए जाने वाले कदम बताए जाते हैं तो यह एक प्रकार की नशे की गोली चासनी में डुबोकर देने के समान ही है। धर्म के आधार पर टिका यह परिवर्तन उग्र दक्षिणपंथी मानसिकता के एजेंडे को पूरा करने के अलावा कुछ नहीं है। हिसंक नक्सलवादी व माओवादी आंदोलन जो अतिवामपंथी मानसिकता दर्शाते हैं, वे भी बदलाव के नाम पर आदिवासियों को पथभ्रष्ट करने में पीछे नहीं रहे हैं। वन संपदा हथियाने और आदिवासियों के शोषण में जुटे जंगल के ठेकेदारों और सरकारी तंत्र की असफलता का फायदा उठाते हुए माओवादी इन इलाकों में सक्रिय हैं। पूंजीवादी ताकतों के खिलाफ लड़ाई में एकजुटता प्रदर्शित करने की आड़ में ये आम जनता को ही निशाना बनाते हैं और उन तक पंहुचाने वाले विकास कार्यो में बाधा बनते हैं। यही नहीं, वे विद्यालयों, अस्पतालों व सार्वजनिक यातायात जैसी जगहों पर हमले करते हैं, जहां आम आदमी इनके हमलों का शिकार बनता है। आदिवासी इलाके के पुलिस बलों को मजबूत बनाने में भी नक्सलवादी आंदोलन की अहम भूमिका है। याद रहे कि नक्सलवादी आंदोलन के इन इलाकों में पैर पसारने से पहले तक पुलिस की तस्वीर महज एक डंडा लेकर घूमने वाले सिपाही से अधिक कुछ नहीं थी। आदिवासी क्षेत्र के पुलिस बलों को अत्याधुनिक हथियारों से लैस करने और यहां अर्द्धसैनिक बलों की तैनाती में नक्सलवादी और माओवादी हिंसक आंदोलन का ही हाथ है। अब इनसे निपटने की सरकारी नीतियां भी सवालों के घेरे में है। सरकार इनसे निपटने के लिए सलवा जुड़ूम जैसे उपाय करती है या फिर अदिवसियों के बीच में ही लोगों को हथियार सौंपकर व इन्हें एसपीओ बनाकर एक प्रकार के आंशिक गृहयुद्ध को हवा दे रही है। दरअसल, यह आदिवासियों को आपस में ही लड़ाकर उनके जंगल और जमीन हड़पने की सरकारी रणनीति का हिस्सा है। माओवादियों और अर्द्धसैनिक बलों की उपस्थिति एवं संघर्ष आदिवासियों के लगातार अपनी जमीन से पलायन का कारण बन रही है। आदिवासी जीवन की परिवर्तन प्रक्रिया में अहिंसक जनवादी आंदोलनों की भी महत्वपूर्ण भूमिका रही है। शांतिप्रिय जनवादी समूहों का हस्तक्षेप भी आदिवासियों की समस्याओं, कठिनाइयों और मांगों को रेखांकित करने में कई बार सक्षम रहा है। मनीष कुंजाम, अभय साहू, हिमांशु पांडे और सुनील मिश्रा सरीखे ऐसे कई नाम हैं, जो समय-समय पर अदिवासियों की आवाज बनते रहे हैं और कुछ सीमा तक इन्हें सफलता भी मिली है। हालांकि अक्सर इनका मकसद फौरी राहत पहंुचाने तक सीमित रहता है और इनके काम करने की अपनी सीमाएं होती हैं। जनजातीय मामलों पर बनी विशेष संसदीय समिति द्वारा 2006 में जनजातीय अधिकारों, उनके विस्थापन, पुनर्वास, शिक्षा, स्वास्थ्य और रोजगार सहित जनजातीय विकास पर व्यापक चर्चा की गई और अदिवासियो के जीवन स्तर को बेहतर बनाने संबंधी आवश्यक हिदायतें भी सरकार को दी गई हैं। तमाम विकास प्रक्रियाओं के बावजूद थोड़ा बहुत ही लाभ इन्हें मिला है। आजादी के छह दशक बाद भी उनकी पहुंच बेहद सीमित रही है। देश की शांति और सुरक्षा को प्रभावित कर रहे वनवासी जीवन में शांति एवं स्थिरता लाने के लिए जरूरत इस बात की है कि जनवादी सत्ता का विकेंद्रीकरण हो ताकि जनवादी अधिकारों और सुविधाओं को ईमानदार एवं प्रभावी ढंग से आम आदमी तक पहुंचाया जा सके। इससे अंतिम पायदान पर खडे़ व्यक्ति का विकास होगा और आदिवासियों को बहकाने वाले लोगों को जवाब दिया जा सकता है। (लेखिका स्वतंत्र टिप्पणीकार हैं)
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