Wednesday, June 15, 2011

लोकतंत्र में सिविल सोसाइटी



लेखक  शासन व्यवस्था पर सिविल सोसाइटी यानी नागरिक समाज के नैतिक नियंत्रण के विचार का विश्लेषण कर रहे हैं
इन दिनों नागरिक समाज की जमकर चर्चा हो रही है। थॉमस हॉब्स ने अपनी अमर पुस्तक लेवियाथन में लिखा सिविल सोसाइटी और सरकार अथवा सार्वभौम के बीच अनुबंध हो जाने के बाद नागरिकों के सारे अधिकार समाप्त हो जाते है। हॉब्स का मानना था कि प्राकृतिक अवस्था को सिविल सोसाइटी में बदलने की जरूरत है। इसमें व्यवस्था बनाए रखने के लिए एक मजबूत सार्वभौम की जरूरत है। अपनी सुरक्षा के बदले में नागरिक अपने अधिकारों को समर्पित करता है। केवल एक स्थिति में हॉब्स ने किसी व्यक्ति को राज्य के विरुद्ध विद्रोह करने की छूट दी है-यदि किसी की जान को राज्य से ही खतरा हो तो वह विद्रोह कर सकता है। जॉन लॉक ने सिविल सोसाइटी की महत्तर भूमिका पर बल देते लिखा है कि सार्वभौम की सत्ता पर नागरिक समाज का नियंत्रण होना चाहिए जो उसे शक्ति प्रदान करता है। हीगेल का मत था कि समाज के विकास में तीन चरण होते हैं-परिवार, सिविल सोसाइटी एवं राज्य। परिवार परमार्थ की भावना पर आधारित संस्था है, जिसमें एक-दूसरे का ख्याल रखा जाता है, परंतु यह परमार्थ बहुत सीमित संदर्भ में होता है। दूसरा चरण है सिविल सोसाइटी जो ज्यादा व्यापक होता है, किंतु इसमें अलग-अलग वर्गो एवं गुटों के हितों का टकराव होता है, जिसे रोकने के लिए राज्य की जरूरत होती है। इसलिए हीगेल की दृष्टि में राज्य आदर्श स्थिति है। मा‌र्क्स ने नागरिक समाज एवं राज्य, दोनों को अपूर्ण माना। आज अपने देश में नागरिक समाज की भूमिका को लेकर बहस छिड़ी हुई है कि कानून बनाने में उसके प्रतिनिधि की क्या भूमिका हो सकती है, जबकि देश में उसके लिए निर्वाचित विधायिका है। जन लोकपाल विधेयक प्रारूप समिति के अध्यक्ष प्रणब मुखर्जी ने कहा है कि सिविल सोसायटी के कुछ वर्गो ने लोकतांत्रिक संस्थाओं को नुकसान पहुंचाया है। यह सही है कि संवैधानिक योजना के तहत कानून बनाने की प्रक्रिया में नागरिक समाज की सीधी भागीदारी नहीं है। यदि जरूरत महसूस हो तो संसदीय समितियां विभिन्न वर्गो के प्रतिनिधियों के साथ विचार-विमर्श कर सकती हैं। कुछ देशों में नागरिक समाज की सीधी सहभागिता का कानूनी प्रावधान है। स्विट्जरलैंड में लोकतंत्र में जनता की भागीदारी के लिए तीन संस्थाएं हैं-प्रारंभिक प्रयास (इनिशिएटिव), जनमत संग्रह एवं प्रतिनिधि वापस बलाने का अधिकार। प्रारंभिक प्रयास के अंतरगत नागरिक कोई कानून बनाने लिए स्वयं कार्रवाई शुरू कर सकते हैं। इसके लिए जनसंख्या का एक खास प्रतिशत हस्ताक्षर कर यह प्रक्रिया शुरू कर सकता है। जनमत संग्रह के तहत किसी खास कानून या मुद्दे पर जनता की राय ली जाती है। इसके साथ ही जनता को प्रतिनिधि वापस बुलाने का अधिकार है। ऐसा कोई प्रावधान भारतीय संविधान में नहीं है, किंतु यहां सिविल सोसाइटी की अहम् भूमिका रही है, हालांकि उसको लेकर विवाद भी शुरू से रहा है। जब महात्मा गांधी ने असहयोग आंदोलन शुरू किया तो रवींद्र नाथ टैगोर ने इसका विरोध किया कि इससे अराजकता फैलेगी। गांधीजी टैगोर को समझाने शांति निकेतन गए, किंतु वह गांधीजी के विचार से सहमत नहीं हो पाए। उनका मानना था कि इसके बजाय शिक्षा का प्रसार होना चाहिए। कांग्रेस के नेता एवं पटना के मशहूर बैरिस्टर हसन इमाम भी असहयोग के विरुद्ध थे। उन्हें समझाने भी गांधीजी पटना गए, किंतु उन्होंने भी गांधीजी के तर्को को नहीं माना। एनी बेसेंट ने तो सविनय अवज्ञा का खुलकर विरोध किया था। गांधीजी नागरिक समाज के बहुत बड़े समर्थक थे और सरकार के ऊपर उसका नैतिक नियंत्रण बनाए रखने के पक्षधर थे। अंबेडकर ने संविधान सभा में असहयोग एवं सविनय अवज्ञा के तरीकों को खारिज कर दिया कि स्वाधीन भारत में अपनी ही सरकार के विरुद्ध इसके इस्तेमाल की जरूरत नहीं है, किंतु इस विचार से सहमत होना मुश्किल है, क्योंकि अपनी सरकार के विरुद्ध भी आंदोलन होते हैं। ह्यूम ने सवाल उठाया था कि किसी लोकतंत्र में कानूनों के पीछे जो बल होता है वह है आम आदमी का मत, परंतु क्या आम आदमी कानून बनाता है? इसलिए किसी ने कहा था कि लोकतंत्र हर मतदाता को अपने ऊपर अत्याचार करने का अवसर देता है। लोकतंत्र में नागरिक समाज की बड़ी महत्वपूर्ण भूमिका है। जयप्रकाश आंदोलन स्वतंत्र भारत में सबसे बड़ा जनांदोलन था। आज भ्रष्टाचार के विरुद्ध आंदोलन चल रहे हैं और कानून बनाने पर अत्यधिक जोर है, परंतु नागरिक समाज को कानून बनाने के साथ ही भ्रष्टाचार के विरुद्ध जनचेतना फैलाने का काम करना चाहिए। अमेरिका के प्रसिद्ध जज हैंड ने कहा था, मैं अक्सर हैरान होता हूं कि क्या हम अपनी उम्मीदें बहुत ज्यादा संविधान पर, कानूनों पर एवं अदालतों पर तो नहीं टिकाते? ये झूठी आशाएं हैं। स्वतंत्रता स्ति्रयों एवं पुरुषों के दिलों में निवास करती है, जब यह मर जाती है, कोई संविधान, कानून, अदालत इसे बचा नहीं सकती। जब तक यह वहां रहती है, इसे किसी संविधान, किसी कानून, किसी अदालत की जरूरत नहीं है अपनी रक्षा के लिए। (लेखक वरिष्ठ पत्रकार हैं)



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